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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 317 of 519

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Page 317

२१६ स्पन्दकारिका
आरोहण के स्तर पर (पूर्ण शिव भाव की स्थिति में) शक्ति के ५ मुख कहे गये
हैं जो निम्नांकित हैं—
'चित्', 'निवृत्ति', 'इच्छा', 'ज्ञान', एवं 'क्रिया'
माया के प्रभाव से (अवरोहण के स्तर पर) उक्त ५ शक्तियाँ—विमर्श या स्वातन्त्र्य
शक्ति-'माया' बन जाती है और 'चित्' इच्छादिक शक्तियाँ—'कला' 'विद्या' 'राग'
'काल' एवं 'नियति', बन जाती हैं— माया - 'कला'
(१) 'कला'—सर्वकर्तृत्व को किंचित् कर्तृत्व में परिवर्तित कर देती है।
(२) 'विद्या'—सर्वज्ञातृत्व को अल्प ज्ञातृत्व में परिवर्तित कर देती है।
(३) 'राग'—तृप्त की अतृप्ति, अपूर्णमन्यता रूप आसक्ति में परिवर्तित कर देता है।
(४) 'काल'—नित्यता को अनित्यता में परिवर्तित कर देती है।
(५) 'नियति'—व्यापकता को अव्यापकता में बदल देती हैं।
स्वातन्त्र्य शक्ति माया तत्त्व
शक्ति पंचकंचुक
(चितः) सर्वज्ञता — (विद्याः) — अल्पज्ञता।
(निवृत्तिः) सर्वकर्तृत्व — (कल) — अल्पकर्तृत्व।
(इच्छाः) पूर्णत्व — (राग) — अपूर्णता।
(ज्ञानः) नित्यता — (काल) — अनित्यता
(क्रियाः) व्यापकता — (नियति) — अव्यापकता
'माया' = अन्तरंग आवरण ।। पूर्ण संवित् को आवृत कर लेता है।
देह, प्राण, पुर्यष्टक, इन्द्रियाँ = बहिरंग आवरण ।।
तत्र सृष्ट्युन्मुखो भगवान् शुद्धाध्वनि वर्तमानः स्वशक्तिभिः
१) मायां विक्षोभ्य 'कलातत्त्व'—किंचित्कर्तृत्वलक्षणं पुद्गलस्य सृजति।¹
२) ततोऽपि किंचिदवबोधाख्यं 'विद्यातत्त्वं'
३) किंचिदभिलाषरूपं च 'रागतत्त्वं' तदेतत्सरोगं कर्तृत्वं ।२
४) भूतभविष्यद्वर्तमानतया त्रिधा अवच्छिद्यतेवत 'कालतत्त्वं'
५) तुल्यत्वेऽपि रागे येन कर्तृत्वस्य अवच्छेदः क्रियते तत् नियति तत्त्वं—
तदेतत् कंचुक षट्कम् अन्तर्मलावृ³तस्य पुद्गलस्य बहिराच्छादकम् :
माया कला शुद्धविद्या राग कालौ नियंत्रणा ।
षडेतान्यावृतिवशात्कंचुकानि मितात्मनः ।।
एवं च पुद्गलस्यान्तर्मलः कंचुकवत्स्थितः ।
तुषवत्कंचुकानि स्युस्तस्माज्ज्ञानक्रियोज्झितः ।।'४
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१-३. जन्ममरणविचार। ४. चिल्लाचक्रेश्वरमत।