स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context२१० स्पन्दकारिका
है—'ऐसी कोई अवस्था नहीं है जिसमें संवित् नहीं रहती अतः योगी चिद्घनस्वरूप की
ही उपासना करते हैं।' १
काप्यवस्था न ते साऽस्ति यस्यां संविन्न वर्तते ।
तेन चिद्घनमेतत्वां योगिनः पर्युपासते ॥
यदि योगी पूर्णप्रबुद्ध न हो तो भी कार्य के आदि अन्त में संवित् का अनुभव होता
है । कार्य की प्रथमावस्था और अन्तिमावस्था चिन्मय ही होती है—
'तदादौ प्रागवस्थायां तदन्तेऽपि च तन्मये ।
पदं प्रत्ययवाद्यन्ते जाग्रत्तूर्येष्ववाग्मात् ॥' २
कार्य की मध्यावस्था संविद्रूप होने पर भी अन्य रूप से भासित होता है । इसका
अभिप्राय यह भी हो सकता है कि आदि, अन्त, मध्य, जाग्रत, स्वप्न सर्वत्र प्रबुद्ध योगी
को संवित् की ही स्पष्टतः उपलब्धि होती है । ३
'व्यतिरिक्तस्वभावोपलब्धि' नामक इस द्वितीय निष्यन्द की यह प्रथम कारिका है
तथा 'स्वरूपस्पंद' निष्यन्द की सत्रहवीं कारिका है ।
इस प्रकार पूर्वोक्त कारिकाओं में देहादिक अनात्म तत्त्वों से व्यतिरिक्त (भिन्न)
स्वानुभूतिगम्य एवं स्वानुभवसिद्ध आत्मतत्त्व की उपपत्तियों से व्यवस्थापित करके अब
उसके प्राप्ति के उपायों के उपदेश के अवसर पर (१) सुप्रबुद्ध (२) प्रबुद्ध (३) अप्रबुद्ध-
तीन प्रकार के वेदकों के विषय से सम्बद्ध प्रकरण पर प्रकाश डाला जा रहा है ।
तस्य = उसका । यथापूर्व प्रतिपादित स्वात्मा रूप परमात्मा का ॥
उपलब्धिः = प्राप्ति अनुभवात्मक निर्विकल्पा प्रतिपत्ति ॥
नित्य = सदैव । सदैव सभी अनुभव-दशाओं में ।
सप्रबुद्धस्य = सुष्ठु + प्रबुद्धः + तस्य ॥ अत्यन्त उच्च आत्मज्ञानी । अर्थात्
देहादिक अनात्म तत्त्वों में अहंप्रत्ययरूप दीर्घस्वप्न से युक्त मोहमहानिद्रा से स्वल्पमात्र भी
जिसका संवित् आवृत नहीं हुआ हो ऐसे सिद्ध सम्यग्दर्शी ज्ञानी का ॥
सततम् = लगातार । बिना किसी व्यवधान के ।
त्रिपदाव्यभिचारिणी = जागर-स्वप्न-सुषुप्ति नामक पदों में । इन तीन संवेदन-
भूमिकाओं में 'अव्यभिचारिणी' अविसंवादिनी । किसी भी अवस्था के द्वारा अनभिभूत
होने के कारण अव्यवहितसंनिधि ॥
इस प्रकार के 'सुप्रबुद्ध' स्वीकृतस्वात्मा (स्वस्वभाव को अपनी स्वात्मा मानकर
आत्मस्थ योगी) लोगों के लिए यह उपदेश नहीं है क्योंकि वे तो कृतकृत्य हैं ।
अपरस्य—दूसरे का । उसके समनन्तर किसी दूसरे 'प्रबुद्ध' का अर्थात्
परशक्तिपात से आविर्भूत प्रमातालोक वाले माया तमिश्रा के विलुप्त हो जाने के कारण
समुन्मिषित विवेकचक्षु वाले एवं मोहोत्साह-संपदा से मुक्त योगी पुरुष का ॥
१-३. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।