स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextप्रथमः निष्यन्दः २०७
उसे समझता है और साथ ही उसकी प्राप्ति के उपायों का भी उपदेश देगा। व्युत्थाना-
वस्था में अवश्य उस प्रकार की अनुभवात्मक विशिष्ट अवस्थाओं की विपरीत भावों के
कारण अनुपपत्ति हो सकती है किन्तु यह एक व्यामोह है।१
स्पन्द का अन्तर्मुख भाव कभी नष्ट नहीं होता —शाश्वत अहंरूप में स्पन्दाय-
मान चैतन्य सत्ता सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, सर्वव्यापकत्व आदि गुणों का अधिष्ठान है।
उसका कभी नाश नहीं होता क्योंकि समाधि में किसी अन्य सत्ता का अनुभव नहीं होता।
भट्टकल्लट स्पन्दसर्वस्व में कहते हैं—'न तु यः अन्तर्मुखः अन्तश्चक्रारूढ-
स्वभावः सर्वज्ञत्वादिगुणाश्रयः तस्य विनाशः कदाचित्, तस्मात् द्वितीयस्यान्यस्याभावात्
तत्स्वरूपमेव व्योमवत् चिद्रूपतया सर्वत्र अनुभवति इति ॥'२
अन्तर्मुखभाव = आभ्यान्तर संवित्तिचक्र के रूप में सतत स्पन्दायमान रहने के
स्वभाव वाला और सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्व, सर्वव्यापकत्व आदि गुणों का अधिष्ठान ॥
इस वेदक सत्ता से अतिरिक्त अन्य सत्ता का न अभाव होने के कारण स्पन्दतत्त्व
चिद्रूप होने के कारण व्योमवत् है और यह आकाशवत् विभु चैतन्य सत्ता प्रत्येक दशा में
अनुभूति का विषय बनता है।
अन्तर्मुखो भावः = 'भाव' = 'भू' मूलधातु से 'भाव' निष्पन्न होता है और
'भाव' का अर्थ है—'सत्ता' या अस्तित्व। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी' (१.५.१४) में कहा
गया है कि—भाव का अर्थ है—काल से कवलित न होने वाली सत्ता। स्वतन्त्र कर्तृत्व
ही भाव या सत्ता है। प्रत्येक क्रिया के निष्पादित करने की क्षमता, एवं नित्य सत्तासीनता
ही 'भाव' है 'सत्ता च भवनकर्तृता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम् ॥'३
'देवदत्त युद्ध करता है' इस वाक्य में युद्ध करना एक क्रिया को संकेतित करता
है। क्रिया का सम्पादन तो किसी कर्ता के द्वारा होता है अतः कर्ता एवं क्रिया दो सत्ताएं
हैं। 'युद्ध करना' तो एक क्रिया है और इस क्रिया का कोई करने वाला होना चाहिए।
यह करने वाली सत्ता ही देवदत्त नामक कर्त्ता है। क्रिया के पूर्व उसकी वर्तमानता
आवश्यक है। अन्यथा क्रिया सम्पन्न ही नहीं हो सकती। समष्टि में भी यही नियम लागू
होता है। जगत् कार्य है और परमात्मा कर्ता है।
नित्यरूप में स्थायी यह कर्तृत्व 'अहं विमर्शात्मक स्पन्द' है। यही स्पन्द 'विमर्श
शक्ति' के नाम से भी प्रख्यात है। जगत् के प्रत्येक अणु को सत्ता प्रदान करने वाला जो
विश्वप्राण चैतन्य है वही विमर्श शक्ति (कर्तृत्व) है। आचार्य उत्पलदेव ने इस अनिर्वाच्य
भाव सत्ता को 'महासत्ता' 'स्फुरत्ता' 'सार' एवं 'हृदय' कहा है—
'सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी।
सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥'४
१. रामकण्ठाचार्य-'स्पन्दकारिकाविवृति'। २. भट्टकल्लट : स्पन्दकारिकावृत्ति ।
३. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१४)। ४. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (१.५.१४)।