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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 312 of 519

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Page 312

प्रथमः निष्यन्दः २११
तदाद्यन्ते—तब आदि एवं अन्त में।
जागर-स्वप्न-सुषुप्ति—इन तीनों पदों का आदिभूत जो पद (जाग्रदवस्थात्मक
पद)। उस पद का जो अन्तर्भूत पद है अर्थात् स्वप्न एवं सुषुप्ति नामक पद। वहाँ पर
उसकी (आत्मतत्त्व की) उपलब्धि होती है।
त्रिपद-स्वप्नसुषुप्तादौ ॥
यहाँ 'आदि' शब्द स्वप्न—सुषुप्ति अवस्था में संगृहीत स्मृति मोह आदि अवस्था
के परिग्रह का वाचक है।
इस व्याख्यान का आशय यह है कि—यहाँ द्विविध आत्मतत्त्व को उपलब्धि का
उपदेश दिया गया है। ये दो प्रकार निम्नानुसार हैं—(१) सर्वव्यतिरिक्त चिन्मात्रस्वरूप
(२) विश्वात्मक और उसकी शक्तिचक्र का विषय।
सुषुप्ति-स्वप्नरूप पदद्वय में भी 'प्रबुद्ध' योगी के लिये यह उपदेश उपादेय नहीं
है। जैसे कि सुप्रबुद्ध के लिए पदत्रय में—जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति तीनों में, क्योंकि उनकी
तत्त्वोपलब्धि हो चुकी है और वह भी बिना प्रयत्न के।
पदद्वयवर्ती संवित् के प्रत्यवमर्शमात्र से तत्वोपलब्धि होती है—यह प्रतिपादित
किया जा चुका है। जब समस्त विकल्प रूप वेद्योँ के विगलित हो जाने पर योगी प्रबोध
दशा में निष्केवला सुषुप्तावस्था का परामर्श करता है। तब समस्त उपरागों से रहित और
स्वरूप मात्र में विश्रान्त, नित्य अविलुप्त, चेतयितृमात्र स्वभाव वाले आत्मा (आत्म-
तत्त्व) स्वयं प्राप्त हो जाता है।
जब स्फुटतर अवभास से युक्त चेतन और अचेतन से युक्त भावचक्र निर्माणमयी
अपनी स्वप्नावस्था का योगी परामर्श करता है तब उसी दृष्टान्त के द्वारा प्रबोध के बल से
स्वस्वभाव परम कारण परमेश्वर की, व्यतिरिक्त कारणान्तर से निरपेक्ष होकर और मात्र
अपनी स्वेच्छा से सर्वकर्तृता रूप तत्त्व प्राप्त कर लेता है।
जहाँ तक अप्रबुद्ध की बात है वह सैकड़ों प्रयत्न करने पर भी समर्पित तुम्बक तोय
द्रव्य के समान अन्तर का स्पर्श नहीं सकता—
अप्रबुद्धस्य पुनरेतत् प्रयत्नशतैरपि समर्प्यमाणं तुम्बकतोयद्रव्यवत् नान्तः स्पर्शं
करोति ॥
इन दोनों पदों में 'प्रबुद्धं' को ही उपलब्धि प्राप्त हो सकती है। किन्तु इसे
जाग्रत्तूर्याख्य पद द्वय में इसे भी उपलब्धि नहीं मिल पाती—
'परिशिष्टे जाग्रत्तूर्याख्ये पदद्वये सा अस्य नास्ति इति अर्थात् उक्तं भवति ॥'
अतः जागरावस्था में शब्दादिविषयग्रहण में व्यग्र इन्द्रियव्यापार व्यवहित व्यक्ति
को, तथा तुर्यावस्था में (लोकोत्तर एवं अत्यन्त अपरिचित होने के कारण) स्वयमेव
अत्यन्त दुर्लक्ष परतत्त्व की प्राप्ति के लिए प्रबुद्ध व्यक्ति को भी उपदेशों की अपेक्षा होती
है। वृत्तिकार ने कहा भी है—
१. रामकण्ठाचार्य : 'स्पन्दकारिकाविवृति' ।