सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
बारहवीं पुतली १२. (७९)
बारहवीं पुतली १२. (७९)
औरभी बहुत कुछ दान करता है. और ऐसा राजा धर्मात्मा उसके
सिवाय दूसरा हमने कहीं नहीं देखा यह बात सुनकर राजाके
जीमें इच्छा हुई कि, उस राजाको चलकर देखिये. यों अपने
जीमें विचार कर बैतालोंको बुला तख्तपर सवार हो समुद्रके
किनारे चला और जो उसके नगरके पास पहुँचा, सिंहासनसे
उतर बैतालोंको कहा कि-अब तुम देशको जाओ और हम इस
राजाकी सेवा करनेपर तैयार हुए. तुम वहांसे हमारी खबर
लेते रहियो तब बैताल बोला-इसका विचार क्या है? राजाने
कहा-तुम्हें इस बातसे क्या काम है? जो हम तुम्हें कहते हैं
सो करो. यह बात सुनकर बैताल अपने नगरको आये और
राजा पाँओ पाँओसे शहरमें दाखिल हुआ. नगरमें फिरता हुआ
राजाके द्वारपर जाकर पहुँचा. और द्वारपालसे कहा-अपने
स्वामीको समाचार दो कि, कोई विदेशी तुम्हारी सेवा करनेके
लिये खड़ा है. इसकी बात डेवढीदारोंने सुनकर राजासे अर्ज
की. महाराज सुनतेही हंसता हुआ आपही बाहर निकल आया.
राजाको देखकर विक्रमाने जुहार किया. तब उसने पूछा कि-
क्षेम कुशलसे हो? तब विक्रम बोला कि-आपके दयासे. फिर
राजाने कहा, तुम किस देशसे आये हो? और तुम्हारा नाम
क्या है? और तुम्हारा अर्थ क्या है? सो सब सुनाओ यह
बोला,-सुनो महाराज ! मेरा नाम विक्रम है. राजा वीर विक्रमादित्यके
देशके मैं रहनेवाला हूं कुछ वैराग्य मेरे जीमें हुआ इससे मैं
आपके दर्शनको आयाहूं, अब आपका दर्शन मैंने किया इससे
सब मेरा सोच विचार गया. राजा बोला-तुझे हम क्या रोज
करदें, और कितनेमें तुम्हारा निर्वाह होगा ? तब इसने कहा-
चार हजार रुपयेमें मेरी गुजरान् होगी. यह सुनकर राजाने
कहा-ऐसा क्या काम करते हो जो चार हजार रुपये रोजीना
हम तुझे देवें ? फिर विक्रम बोला-जो काम हमसे कहोगे
हम वह करेंगे. जिस राजाके पास मैं रहता हूं उसको गाढ़ी
भीड़िमें काम आता हूं और इस तरहसे चार हजार रुपये
लेकर राजा वहां रहने लगा. यह बात पुतलीने समझा राजा
भोजसे कही. जब इसी तरहसे नौदस दिन गुजर गये तब
राजा वीरविक्रमादित्यने अपने मनमें विचारा कि, जो लाख
रुपये रोज दान करता है उसका नित्यनेम क्या है, इसे मालूम
किया चाहिए. किस देवताका इसे बल है ? इसी सोचमें रहने
लगा. एक दिन क्या देखना है कि, दोपहर रातके समय
राजा अकेला बनको जाता है यह देखतेही उसके पीछे होलिया.
आगे आगे राजा और पीछे पीछे विक्रमादित्य इस तरहसे
शहरके बाहर निकल एक बनमें पहुँचे. वहां जाकर देखा तो एक
देवीको मंदिर है. और उस मंदिरके बाहर कहाड चढ़ा है
और उसमें ब्रह्मकी आगसे घी औटता है वह राजा तालाबमें,