सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
तुम लो. मैने तुम्हें दिया है यह कहकर त्रिलोचना पुतलीने
( ९२ ) सिंहासनबत्तीसी.
सत हो राजाके पास गया. वे पांच रत्न राजाको दिया और
घोडा अपने खडा कियाँ फिर सब वहांका वृत्तांत कहा. तब
राजाने प्रसन्न हो ब्राह्मणसे कहा कि-यह लाल और घोडा
तुम लो. मैने तुम्हें दिया है यह कहकर त्रिलोचना पुतलीने
राजा भोजको समझाया कि, सुन राजा भोज ! ऐसा पदार्थ राजा
विक्रमने देते विलंब न किया. वे लाल और घोडा कई राजाओंकी
कीमतके थे ऐसे दानी राजाके आसनपर बैठनेके योग्य तू नहीं॥
पंडित तू है पर माया तुझसे छूटती नहीं. वह दिनभी योंही
गुजर गया, दूसरे रोज राजा फिर सिंहासनपर बैठनेको
तैयार हो गया. तब अनूपवती-
पंद्रहवीं पुतली १५-
कहने लगी-सुन राजा भोज ! राजा वीर विक्रमादि-
त्यके गुण कहनेमें नहीं आसकते जो बात कहने योग्य
होवे तो कहिये. अयुक्त कहतेहुए जी शक खाता है.
राजा बोला-तू कह. मेरा जी सुननेको चाहता है जैसी
बात हुई है वैसी कह इसमें तुझे दोष नहीं तब अनूपवती बोली,
अच्छा अब मैं कहती हूँ वह तुम कान देकर सुनिये. एक दिन राजा
विक्रमादित्य सभामें बैठा था. और कहींसे पंडित आया. उसने आक-