सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
ग्यारहवीं पुतली ११. ( ७७ )
ग्यारहवीं पुतली ११. ( ७७ )
मेरे कुलकीभी लाज रक्खी तुझे संसारमें यश और कीर्ति होगी.
जैसा तूने मुझपर उपकार किया, वैसाही मुझसे आशीष ले.
हजार बरसतक जीता रह और किसीके वश न पड. दिन
दिन तेरा सत और तेज बढते जायगा साहस तेरा ऐसा होवेगा
कि तुझे कोई न जीते. इतनी आशीष जब वह दे चुकी तब
उसे बेटी कह राजाने अपन पास तख्तपर बिठा लिया और
मोहनीकोभी उठा बेतालको हुकुम किया कि, हमारे नगरको
लेचलो. तब बेताल सबको लेकर उडे, पलक मारने महलमें
ला दाखिल किया. राजाने आतेही दीवानको याद किया. वह
मंत्री आकर हाजिर हुवा. राजाने कहा-कोई पंडित सुज्ञानी
ब्राह्मण ढूंढकर ले आओ जलदी. प्रधानाने आज्ञा पाय नगर
नगर ब्राह्मणोंको भेज एक ब्राह्मण सुंदर विद्वानको बुलाया.
मार्कंडेय नाम वह ब्राह्मण जब आया, तब उसे ले मंत्रीने राज-
सभामें लाया. राजाने उससे हाथ जोडकर कहा कि-महाराज ! एक
ब्राह्मणकी कन्या हमारे यहां है, उससे हम तुमको दिया चाह-
तेहैं. तुमभी यह बात कबूल करो. ब्राह्मण बोला-वह कन्या
हमको दो और जगतमें तुम यश, धर्म और बडाई लो. राजाने
यह बात सुनतेही ब्राह्मणको तिलक दे सादीके सामानका
दान दहेज तैयार किया. फिर ब्राह्मण बुलाकर संकल्प कर
उस कन्याका कन्यादान किया और उसको बहुत कुछ दिया.