सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
कथा. विषय. पृष्ठ. | कथा. विषय. पृष्ठ.
अथ सिंहासनबत्तीसीकी अनुक्रमणिका।
कथा. विषय. पृष्ठ. | कथा. विषय. पृष्ठ.
सिंहासन निकलनेकी | १५ अनूपवती ९२
उत्पत्ति और राजा | १६ सुन्दरवती १०१
भोजको उसपर बैठने | १७ रत्नवती १०७
का विचार १ | १८ रूपरेखा ११५
१ रत्नमंजरी १० | १९ तारा ११८
२ चित्ररेखा २५ | २० चंद्रज्योति १२५
३ सत्यभामा ३५ | २१ अनुरोधवती १२८
४ चंद्रकला ३७ | २२ अनूपरेखा १४१
५ लीलावती ४१ | २३ करुणावती १४५
६ कामकंदला ४९ | २४ चित्रकला १५१
७ कामोदी ५३ | २५ जयलक्ष्मी १६२
८ पुष्पावती ५७ | २६ विद्यावती १६८
९ मधुमालती ६५ | २७ जगज्ज्योति १७१
१० प्रेमावती ६७ | २८ मनमोहिनी १७५
११ पद्मावती ७२ | २९ वैदेही १७८
१२ कांतिवती ७८ | ३० रूपवती १८६
१३ त्रिलोचनी ८५ | ३१ कौशल्या १८८
१४ त्रिलोचना ९० | ३२ भानुमती १९४
श्रीः
सिंहासनबत्तीसी
[ए] क राजाभोज उज्जैन नगरीका राजा महाबली और बड़ा
धनी यशस्वी और धर्मात्मा था, जितने लोग उसके राज्य
में बसते थे सो सब चैन करते थे, राजा राजप्रजा सुखी,
किसी को कोई किसी तरहका दुःख नहीं दे सक्ता था, यह
न्याय उसके यहां था, जो बाघ, बकरी, एक घाटका पानी
पीतेथे, यह और सब उसके आसरेमे जीते, परमेश्वरने जबसे उसे दुनियाँके
परदेपर उतारा तबसे वे सहारोंका किया सहारा, और रूप उसका
देखकर चौदशकी रात के चांदको चकाचौंधी पड़ी, वह अतिबड़ा चतुर
सुघर और गुणी था, अति अच्छी अच्छी जितनी बातें थीं सो सब
उसमे समाई थीं, भलाई उसकी जगत्में मशहूर थी, और नगरी
उसकी इसतरह बसती थी कि, जो चिप्पा रखनेको जगह नहीं
मिलती थी, वह हरा भरा नगर, शादियां घर घर, नये तोरके अच्छे
अच्छे मकान बनेहुये, चौपड़का बाजार दरमियान, नहर बहतीहुई,
उत्तम दूकानोंमें एक एक दूकानदार सराफ, बजाज, सौदागर
( २ ) सिंहासनबत्तीसी.
कारीगर, सुनार, लुहार, सावकार, कसेरा, पटुआ, किनारी,
बाफ, कौफतरार, जिलाकार, आईनासाज अपने अपने काममें
सरगर्म थे. जौहरीबाजारमें जवाहरोंसे थैलियां भरी हुई
मोती, मूँगा, जमुरूद लाल, याकूत, नीलम, पुखराज, जौहरी
देखते भालतेथे और खरीद्दारोंसे बाजारका बाजार भराहुआ
और उसके बराबर दूकानोंमें मेवाफरोश विलायती अनार,
सेव, बिही, नाशपाती, अँगूरसे पिटारे पिटारियां भरकर लगाए
हुए और बेर, छुहारे, पिस्ते, बादामोंके किये हुए बेच रहे.
फूलवाले फूल गूँथ रहे. तंबोली बीड़े बाँधरहे. गंधियोंकी
दूकानें तेल, फुलेल, इत्र अरगजेकी लपटोंसे महक रहीं. और
सुपारीवाले दूकानोंमें पूड़े सुपारीके बाँधकर लगाए हुए डब्बे
माझमोंके आगे धरे सुपारियां कतर रहे. बिसांती हर रंगकी
चीजें दूकानोंमें चुने हुये मोल शाहतौस कर रहे. चौक चौकोर
बनाहुआ मीना बाजार लगा हुआ, तीसरे पहरकी गुदरी
लगी हुई असबाब तरह तरहका नया पुराना बेंचनेवाले
बेंचरहे और माल लेनेवाले मोल ले रहे. गर्म बाजारी
हरएक चीजकी होरही, कटीर हर तरफ बाजारहे. कहीं नाच,
कहीं राग, कहीं गम्मत, कहीं नकल, कहीं किस्सा होरहा.
मअशूक बाजारमे सैर करते हुए आशिक पीछे पीछे फिरते
हुए दिन रात यह समान वहां रहताथा. बाग बगीचे सैर और
सिंहासनबत्तीसी. ( ३ )
तमाशेके बने हुए, दरख्त मेवोंसे झूमते हुए, और फूल क्यारि-
योंमें खिले हुए. तालाबोंमें कमल फूले हुए. बावलियोंमें पानी
झलकता हुआ, हर एक कुएंपर रहट परोहा चलता हुआ, पनघट
लगा हुआ और राजाके चौरासी खास महल ऊँचे ऊँचे दरवाजे
खुशकितअ चार दीवारियां सीधी खींची हुई, चारोंतरफ उनके
बाहर अंदर मकान अनूठे अनूठे बने हुए. कोठरियां दालान,
दर दालान बारहदरियां भालाखाने चौमहिले पंचमहिले रंग-
महल ऐशमहल अगारियां बंगले तयार चिलमने परदे हर एक
दरवाजेपर लगे हुए, फर्श चांदनी सोजनी कालीनोंका जा-
बजा बिछा हुआ, मसनद तकिये लगे हुए, शहनशनोंमें
डंगल और कुर्सियां सोने रुपेकी जड़ाऊ बिछी हुई. ताखों
पर शीशे बेदमश्क गुलाबने चुनेहुए सायबान ताराबाद
लेके खिचे हुए, ननगीरे बाजी जगह अपने अपने नौकेपर
खडे हुए, सहनमें क्यारियां बनीहुई, चौपड़की नहरें पानीसे
भरीहुईं लहरें लेतीं, हौज बेदमश्क गुलाबसे भरे हुए, फुहारे
छूटते हुए चादरोंसे पानी बहता हुआ, आबजोए चारोंतरफ
जारी सर्ख खड़े हुए और छोटे छोटे दरख्त लगे हुए, राबिश
पहिया सब दुरुस्त फूल हजारों रंगके क्यारियोंमें फूले हुए, हर एक
महलमें एक एक ऐसा और कामगनी राजाका दिल हाथों
लिये रहतीथीं. नाच, राग, रंग, रातदिन होताथा और वह
( ४ ) सिंहासनबत्तीसी
आप-ऐसा सुघर था जो बात बातमें मोती पिरोता और नौ किस्म
के साहिब कमाल जैसे नौरत्न उसकी मजलिसमें हाजिर रहतेथे.
राजा इंद्र उसकी सभाको देखकर रश्ककी आगसे जल-
ताथा. और उसका अखाड़ा हसरतके मारे हाथ मलताथा. रंडो मर्द
उसकी सूरतपर दिवाने थे, जिसने एकबार उसे देखा वो आपेमें
न रहा, जिसने उसकी खूबसूरतीका बयान सुना बेचैन हुआ जो
बनके मदमे सरशार मोहनका अवतार नौजवान चतुर साहिबी
तदबीर था. उसकी शेर और तमाशेको शहरके किनारे बागखानोंमे
कोसोंतक क्यारिया बनाई थीं और हररंगके फूलोकी बहोरे दि-
खाईंथीं और इनके बराबर एक खेतमें किसी मुराईने खीरे वोएथे
जब ये उगे बेलें तमाम. खेतमे फैलगई और खूब हरियाली
हुई, जर्द जर्द फुला और तैयारीपर आया तब उस खेतवालेने
रखवालीको एक मचान तजरीब किया. देखा दर मियान उस
खेतके एक चौका जमीनका खाली रहताहै कि, न कुछ उसमे
जामा है, न उपजा है. मुराईने रखवाली करनेको इर्द गिर्द झाड़े
लगाकर ऊपर एक मचानसा बांधा उसपर बैठकर चारोंतरफ
निगाह करतेही कहने लगा कि-कोई है ? इसी बखत राजा भोजका
गढ़से पकड़ लाये ओर सजाको पहुँचावे. राजाके नोकरोंमेंसे
एकने इस बातको सुनतेही टांग पकड़कर उसे नीचे गिरादिया
और मुँहही मुँह थपेटाँसे मार मार सारा मुँह सुझादिया. कान
[Page Header]
सिंहासनबत्तीसी. (७)
पकड़कर उठाया और बिठाया, गरूरका नशा गोंको बुलाया
चढ़ाथा सो सब उतर गया. तब तोबा करके पांओमेयोंने बड़ी
कहने लगा क्या मैंने ऐसी तकसीर की, जो मुझपर खेवारमें कुछ
हुई ? इधर उधरकी राह बाट के लोग जो वहां इकट्ठे हुए थेकहा-२स
कहा तूने ऐसी बात मुँहसे निकाली और राजा सुनेगा तो अँध्रों
तुझे तोपके मुँहपर रखकर उडा देगा. यह सुनतेही वह गिड़
गिड़ाने लगा. रहे सहे उसके होश और हवास ओरभी जाते रहे.
जानके डरसे थलग, दम उसका होठोंपर आरहा. मिन्नत और
जारीसे बारे छूटगये. राजाके उस फिरवीने वहांसे घपकी राहली.
पर वह जब उस मंचानपर चढ़ता तो ऐसा बकबाद किये बिना
न उतरता. एक दिन चार हरकारे राजाने एक कामको किसी-
तरफ भेजेथे, वे रातको उधरसे फिरते हुए चले आतेथे और वह
मंचानपर चढ़ा हुआ बक रहाथा, कि बुलाओ हमारे दीवान
और अहलकारोंको कि इस जगह खारो महल और एक गढ़
बनावें सब सरंजाम लड़ाईका उसमें जमा करें कि, मैं राजा
भोजसे लडूं और मारूं. जो मेरी सात पुश्तिका राज यह राजा
करता है. यह सुनतेही उन चारों हरकारोंको अचंभा हुआ, और
एकको उनमेंसे गुस्सा आया. एकने गजबसे कहा-इसे तँगीह करके
मश्कें बांध राजाजीके पास लेचलें. दूसरेने कहा-वे इसके हकमें जो
चाहें सो करें. तीसरेने कहा-इसने शराब पी है, मतवाला है, जो