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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

About this granth

The Siddhantaleshasangraha (सिद्धान्तलेशसंग्रह) is a work on Advaita Vedanta by the sixteenth-century polymath Appayya Dikshita. After Shankara, Advaita teachers differed on many questions: where ignorance resides and what it veils, the nature of the individual soul and of God, whether souls are one or many, and how knowledge of Brahman arises. Appayya gathers these views concisely without taking sides, and the work remains a key guide to the schools of post-Shankara Vedanta.

It has four chapters following the order of the four books of the Brahma Sutras. This edition gives the text with a Hindi translation and notes by Vedantacharya Pandit Mulshankar Vyas, edited by Pandit Chandiprasad Shukla Shastri, principal of the J. G. Goenka Sanskrit College, and Pandit Shrikrishna Pant Shastri, head of the Achyut Granthamala.

It is the sixth volume of section B of the Achyut Granthamala, first published at Kashi by Gaurishankar Goenka in Samvat 1993 (1936) and printed by N. R. Soman at the Lakshminarayan Press, Benares. It runs to 590 pages.

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२९२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद


अथवा 'कृष्णलं श्रपयेत्' 'सोमेन यजेत' इत्यादौ न प्रत्यक्षा-
नुरोधेन लक्षणाश्रयणम्, किन्तु अनुष्ठानाशक्त्या । नहि कृष्णले उष्णी-
करणमात्रमिव मुख्यः पाकोऽनुष्ठातुं शक्यते । न वा सोमद्रव्यकरणको
याग इव तदभिन्नो यागः केनचिदनुष्ठातुं शक्यते । न चाऽनुष्ठेयत्वाभिम-
तस्य प्रत्यक्षविरोध एवाऽनुष्ठानाशक्तिरिति शब्दान्तरेण व्यवह्रियते इति
वाच्यम् । 'शशिमण्डलं कान्तिमत् कुर्याद्' इति विधौ अनुष्ठेयत्वाभि-
मतस्य शशिमण्डले कान्तिमत्त्वस्य प्रत्यक्षाविरोधेऽप्यनुष्ठानाशक्तिदर्शनेन
तस्यास्ततो भिन्नत्वात् । तथा च तत्र तत एव लक्षणाऽऽश्रयणम् ।


* अथवा 'कृष्णलं श्रपयेत्' और 'सोमेन यजेत' इत्यादि स्थलमें प्रत्यक्षके अनुरोधसे लक्षणाका आश्रयण नहीं करते हैं, किन्तु [ मुख्यार्थक माननेसे ] अनुष्ठान ही नहीं हो सकता है, अतः लक्षणाका आश्रयण करते हैं, कारण कि कृष्णलमें ( सुवर्णमाषोंमें ) उष्णीकरणके सिवा मुख्य पाक नहीं कर सकते हैं, [ इसी प्रकार 'सोमेन' इत्यादिमें भी सोम और यागका अभेद नहीं हो सकता है ] तथा सोमद्रव्य है उपकरण जिसमें, ऐसे यागके समान सोमद्रव्यसे अभिन्न यागका कोई पुरुष अनुष्ठान नहीं कर सकता है। यदि शङ्का हो कि अनुष्ठेयत्वेन जो अभिमत है, उसके साथ प्रत्यक्ष-विरोध ही शब्दान्तरसे 'अनुष्ठानकी अशक्ति' कहलाता है ? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'शशिमण्डलं कान्तिमत् कुर्यात्' ( चन्द्रमण्डलको कान्तियुक्त बनावे ) इस विधिमें अनुष्ठेयत्वरूपसे अभिमत जो चन्द्रमण्डलमें कान्तिमत्व ( कान्ति ) है, उसमें प्रत्यक्षविरोध न होनेपर भी अनुष्ठानकी अशक्ति दिखती है, अतः यह स्वीकार करना होगा कि प्रत्यक्ष-विरोध और


विरोधस्थलमें श्रुतिसे प्रत्यक्षके बाधित होने पर भी उसमें निरवकाशत्व नहीं है, क्योंकि कल्पितद्वैत और तद्गतसत्ता आदिसे उपपत्ति हो सकती है, यह तात्पर्य है ।

* पूर्वके ग्रन्थसे प्रत्यक्षसे श्रुतिके बाधमें अनेक उदाहरण दिखलाये गये, परन्तु श्रुतिसे प्रत्यक्षका बाध होता है, इसमें अधिक दृष्टान्त नहीं बतलाये गये, अर्थात् एक ही बतलाया है । इस अवस्थामें 'श्रुतिकी अपेक्षा प्रत्यक्ष बलवान् है' इसी उत्सर्गकी सिद्धि हो सकती है, प्रत्यक्षस श्रुति बलवती है, इसकी सिद्धि नहीं हो सकती है—इस अस्वरससे 'अथवा' इस पक्षको कहते हैं, यह भाव है ।

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प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २९३


तस्मादपच्छेदन्यायादिसिद्धस्य श्रुतिबलीयस्त्वस्य न कश्चिद् बाध इति ।

अथ कथमत्रापच्छेदन्यायप्रवृत्तिः ? उच्यते—यथा ज्योतिष्टोमे बहिष्पवमानार्थं प्रसर्पतामुद्गातुरपच्छेदे सति 'यद्युद्गातापच्छिद्येतादक्षिणम्


अनुष्ठानाशक्ति दो अलग-अलग पदार्थ हैं। इसलिए 'सोमेन यजेत' इत्यादिमें अनुष्ठानकी अशक्ति ही लक्षणाके स्वीकारमें बीज है। इससे अपच्छेदन्यायसे सिद्ध श्रुतिके प्राबल्यके साथ कोई विरोध या बाध नहीं है †

अब शङ्का होती है कि प्रकृतमें अपच्छेद न्यायकी प्रवृत्ति कैसे होती है ? कहते हैं—ज्योतिष्टोम यागमें बहिष्पवमानके * लिए जाते हुए ऋत्विजोंमें से यदि उद्गाताका अपच्छेद (विच्छेद) हो जाय, तो 'यद्युद्गातापच्छिद्येता०' † (यदि उद्गाताका विच्छेद हो, तो दक्षिणाके बिना उस यागको करके फिर उस यागको करे) इस श्रुतिके देखनेसे उद्गाताके विच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्त करनेका


† अनुष्ठानकी अशक्तिसे ही लक्षणाके आश्रयण करनेसे और प्रत्यक्षविरोधसे लक्षणा न माननेसे श्रुतिसे प्रत्यक्षका प्राबल्य सिद्ध नहीं होता है, आगमसे बाधित गगन-नैल्य आदिके प्रत्यक्ष बतलाये गये हैं, अतः आगम ही प्रबल है, यह औत्सर्गिक है, अर्थात् बाधित होनेपर उसका त्याग किया जायगा, अतः यदि प्रत्यक्षसे आगम बलवान् होगा, तो 'यजमान और प्रस्तरका' परस्पर अभेद हो जायगा, इत्यादि बाधोंका प्रसङ्ग, जो पहले आशंकित था, अब नहीं है, यह भाव है।

* बहिष्पवमाननामक स्तोत्र है और वह स्तोत्र 'उपास्मै गायत नरः' 'दविद्युतत्या रुचा' 'पवमानस्य ते कवे' इत्यादि तीन सूक्तोंके गानसे साध्य है।

† बहिष्पवमान स्तोत्रके लिए एक दूसरेका कच्छ पकड़ करके जाते हुए ऋत्विजोंमें से यदि उद्गाताका विच्छेद हो जाय, तो जिस यागका आरम्भ किया है, उसको दक्षिणाके बिना समाप्त करके यजमानको पुनः उस यागका आरम्भ करना चाहिए। यदि प्रतिहर्त्ताका विच्छेद हो जाय, तो यजमानको सर्वस्व दक्षिणा दे देनी चाहिए। ये दो विरुद्ध प्रायश्चित्त सुननेमें आते हैं, एक तो अदक्षिणापूर्वक यागकी समाप्ति और (पुनः याग) और दूसरा सर्वस्वदानपूर्वक यागकी समाप्ति। इस अवस्थामें यदि क्रमसे दोनोंका विच्छेद हो जाय, तो कौन प्रायश्चित्त करना चाहिए, क्योंकि विरुद्ध प्रायश्चित्तोंका एक कालमें तो अनुष्ठान नहीं हो सकता है, इसलिए क्या पूर्वनिमित्तक प्रायश्चित्त करना चाहिए या परनिमित्तक ? इस प्रकारका संशय होनेपर निर्णय किया गया है कि पूर्वसे पर बलवान् है, अर्थात् अनन्तर होनेवाला ज्ञान पूर्वमें अप्रामाण्यका निश्चय करके होता है, जैसे शुक्तिमें रजतज्ञानके उत्तरमें जायमान 'नेदं रजतम्' इस प्रकारका बाधज्ञान पूर्वज्ञानमें अप्रामाण्यका निश्चय करके ही प्रवृत्त होता है, वैसे ही पूर्वनिमित्तक प्रायश्चित्तसे उत्तरनिमित्तक प्रायश्चित्त बलवान् होगा और उत्तर प्रायश्चित्तसे पूर्वका बाध होता है, यह भाव है।

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२९४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद

यज्ञमिष्ट्वा तेन पुनर्यजेत' इति श्रुतिनिरीक्षणेन जाता उद्गात्रपच्छेदनिमित्तकप्रायश्चित्तकर्त्तव्यताबुद्धिः पश्चात् प्रतिहर्त्रपच्छेदे सति 'यदि प्रतिहर्त्ताऽपच्छिद्येत सर्ववेदसं दद्याद्' इति श्रुतिनिरीक्षणेन जातया तद्विरुद्धप्रतिहर्त्रपच्छेदनिमित्तप्रायश्चित्तकर्त्तव्यताबुद्ध्या बाध्यते ।

एवं पूर्वं घटादिसत्यत्वप्रत्यक्षं परया तन्मिथ्यात्वश्रुतिजन्यबुद्ध्या बाध्यते । न चोदाहृतस्थले पूर्वनैमित्तिककर्त्तव्यताबुद्धेः परनैमित्तिककर्त्तव्यताबुद्ध्या बाधेऽपि पूर्वनैमित्तिककर्त्तव्यताजनकं शास्त्रं यत्रोद्गातृमात्रापच्छेदः, उभयोरपि युगपदपच्छेदौ वा, उद्गात्रपच्छेदस्य परत्वं वा, तत्र सावकाशम्, प्रत्यक्षं तु अद्वैतश्रुत्या बाधे विषयान्तराभावान्निरालम्बनं स्यादिति वैषम्यं शङ्कनीयम् । यत्र घटादौ श्रुत्या बाध्यं प्रत्यक्षं प्रवर्तते, तत्रैव व्यावहारिकं विषयं लब्ध्वा कृतार्थस्य तस्य परापच्छेदस्थले सर्वथा बाधितस्य पूर्वापच्छेदशास्त्रस्येव विषयान्तरान्वेषणाभावात् । इहाऽपि सर्व-


ज्ञान होता है, उसके बाद 'यदि प्रतिहर्ता०' (यदि प्रतिहर्ताका विच्छेद हो, तो सर्वस्व दान दे दे) इस प्रकारकी श्रुतिके देखनेसे उत्पन्न हुई उद्गाताके विच्छेदनिमित्तकर्तव्यतासे विरुद्ध प्रतिहर्ताके विच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्तकर्तव्यबुद्धिसे प्राक्तन बुद्धिका बाध होता है ।

इसी प्रकार पूर्वमें घट आदिमें होनेवाला सत्यत्वविषयक प्रत्यक्ष अनन्तरमें होनेवाले श्रुतिजन्य मिथ्यात्वविषयक बुद्धिसे बाधित होता है, यदि शङ्का हो कि पूर्वके उदाहृतस्थलमें अर्थात् जहाँ प्रथम उद्गाताका अपच्छेद हुआ है, उस स्थलमें प्राथमिक नैमित्तिकप्रायश्चित्तकर्तव्यत्व ज्ञानसे पश्चात् हुई नैमित्तिक कर्तव्यताका बोधक शास्त्र—जहाँ केवल उद्गाताका विभाग हुआ है, वहाँ अथवा एक कालमें दोनोंका जहाँ विच्छेद हुआ है, वहाँ अथवा जहाँ उद्गाताका विच्छेद पीछे हुआ है, वहाँ—सावकाश है और प्रत्यक्ष, तो अद्वैतश्रुतिसे बाध होनेपर अन्य किसी विषयके न होनेसे, निरालम्बन है, अतः वैषम्य है ? तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है; कारण कि जिस घट आदिमें श्रुतिसे बाध्य प्रत्यक्ष प्रवृत्त होता है, उसी घट आदिमें व्यावहारिक—व्यवहार करनेमें उपयुक्त—सत्तारूप विषयकी प्राप्ति करके कृतार्थ प्रत्यक्षको, जैसे पर अपच्छेदस्थलमें सर्वथा बाधित पूर्व अपच्छेद शास्त्रको अन्य विषयकी अन्वेषणा करनी पड़ती है, वैसे


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प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार ] भाषानुवादसहित २९५


प्रत्ययवेद्यब्रह्मसत्तायां सावकाशं प्रत्यक्षमिति वक्तुं शक्यत्वाच्च ।

यच्चैकस्मिन्नपि प्रयोगे क्रमिकाभ्यां निमित्ताभ्यां क्रतौ तत्तन्नैमित्तिककर्तव्यतयोर्बदरफले श्यामरक्तरूपयोरिव क्रमेणोत्पादाद् रूपज्ञानद्वयवत् कर्तव्यताज्ञानद्वयमपि प्रमाणमेवेति न परेण पूर्वज्ञानबाधे अपच्छेदन्याय उदाहरणम् ।

अत एवापच्छेदाधिकरणे ( पू० मी० अ० ६ पा० ५ अधि० १९ )


प्रकृतमें अन्य विषयकी अन्वेषणा नहीं करनी पड़ती है। और इस स्थलमें भी * सम्पूर्ण प्रतीतिमें वेद्य ब्रह्मसत्तारूप विषयको लेकर प्रत्यक्ष सावकाश है।

कोई लोग कहते हैं कि जैसे एक बदर (बेर) के फलमें क्रमशः पहले हरारूप उत्पन्न होता है, अनन्तर पाकवशात् पूर्वरूपके नाशके बाद पीला या रक्तरूप उत्पन्न होता है, और दोनों रूप कालभेदसे प्रामाणिक हैं, वैसे ही एक ही क्रतु (याग) के प्रयोगमें क्रमशः उत्पन्न हुए निमित्तोंसे (अर्थात् उद्गाताका अपच्छेद और प्रतिहर्ताका अपच्छेदरूप निमित्तोंसे) तत् तत् प्रायश्चित्त कर्तव्यताओंमें दो ज्ञान भी प्रमाण ही हैं, अतः परज्ञानसे पूर्वज्ञानके बाधमें अपच्छेदन्याय उदाहरण नहीं हो सकता है।

इसीसे अपच्छेदाधिकरणमें 'नैमित्तिकशास्त्रका (किसी निमित्तको लेकर


* ब्रह्ममें पारमार्थिक सत्ता है, घट आदिमें व्यावहारिक सत्ता है और शुक्तिरजतमें प्रातिभासिक सत्ता है, इस प्रकारकी तीन सत्ताओंके स्वीकारपक्षमें घटादिसत्ताके प्रत्यक्षके लिए कोई विषयान्तरकी अन्वेषणा करनी नहीं पड़ती है, क्योंकि घट आदिमें विद्यमान व्यावहारिक सत्ता ही उस प्रत्यक्षकी विषय हो सकती है, और 'एक ही सर्वत्र सत्ता है' इस पक्षमें व्यावहारिक और प्रातिभासिक सत्ताके न रहनेसे घटादिसत्त्वप्रत्यक्षका अन्य विषय खोजना होगा। जैसे कि उत्तर कालमें उत्पन्न विरुद्ध अपच्छेदसे बाधित पूर्वापच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्त अपने विषयकी अन्वेषणा करता है। परन्तु एकसत्तावादियोंके मतसे भी कोई विरोध नहीं है, कारण कि घटादिद्वैतप्रत्यक्ष घटादिमें सत्ताके न रहनेपर भी निरवकाश नहीं है, क्योंकि अधिष्ठान सत्ताको लेकर उस प्रत्यक्षकी सावकाशता हो सकती है। इसलिए कहते हैं 'इहापि' अर्थात् 'एकसत्तापक्षमें भी संसारमें जितने प्रत्यय मनमें स्फुरित होते हैं, उन सबमें सत् वस्तु स्फूर्ति है, अतः सभी जगत्की सत्ता सर्वप्रत्ययवेद्य है और वह सभीके अधिष्ठानभूत ब्रह्मकी ही सत्ता है, उससे अतिरिक्त नहीं है, क्योंकि अतिरिक्त सत्ता माननेमें गौरव है, यह भाव है।

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२९६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद

'नैमित्तिकशास्त्रस्य ह्ययमर्थः—निमित्तोपजननात् प्रागन्यथाकर्तव्योऽपि क्रतुर्निमित्ते सत्यन्यथाकर्तव्यः' इति शास्त्रदीपिकावचनमिति, तन्न; अङ्गस्य सतः कर्तव्यत्वम् । न च पश्चाद्भाविप्रतिहर्त्रपच्छेदवति क्रतौ पूर्ववृत्तोद्गात्रापच्छेदनिमित्तकस्य प्रायश्चित्तस्याऽङ्गत्वमस्ति। आहवनीयशास्त्रस्य पदहोमातिरिक्तहोमविषयत्ववद् 'यद्युद्गाताऽपच्छिद्येत' इति शास्त्रस्य पश्चाद्भाविप्रतिहर्त्रपच्छेदरहितक्रतुविषयत्वात् ।

उक्तं हि न्यायरत्नमालायाम्—

'साधारणस्य शास्त्रस्य विशेषविषयादिना ।
संकोचः कॢप्तरूपस्य प्राप्तबाधोऽभिधीयते ॥'

प्रवृत्त हुए शास्त्रको नैमित्तिक शास्त्र कहा जाता है ) यह अर्थ है—निमित्तके उत्पन्न होनेके पूर्वमें अन्यरूपसे अर्थात् उत्तरकालमें उत्पन्न होनेवाले प्रतिहर्ताके अपच्छेदके पूर्वमें अदक्षिणारूपसे किया जानेवाला भी यज्ञ निमित्तके आ जानेपर अन्य रीतिसे अर्थात् अनन्तर प्रतिहर्ताके विच्छेद होनेपर सर्वस्वदक्षिणारूपसे किया जाता है' इस प्रकारका शास्त्रदीपिकाकारका वचन भी उपपन्न होता है । परन्तु यह सब कल्पना असङ्गत है, क्योंकि [ विरुद्ध प्रकारसे जहाँ अपच्छेद हुए हैं, वहाँ यदि ] पूर्व नैमित्तिककर्तव्यता क्रतुके प्रति अङ्ग हो, तो उसमें कर्तव्यत्व आ सकता है, परन्तु क्रतुके प्रति उसके अङ्गत्त्वमें प्रमाण नहीं है, अतः पूर्वकी प्रसक्ति हो ही नहीं सकती है । और पश्चात् कालमें उत्पन्न होनेवाले प्रतिहर्ताके अपच्छेदवाले क्रतुमें पूर्वकालमें उत्पन्न उद्गाताके अपच्छेदसे हुए प्रायश्चित्त अङ्ग नहीं है ] । ꕤ 'आवहनीये जुहोति' इस आवहनीयशास्त्रकी पदहोमातिरिक्त होममें ही जैसे विषयता है, वैसे ही 'यदि उद्गाता विच्छेद करे' इत्यादि शास्त्रकी भी पीछे कालमें होनेवाले प्रतिहर्ताके अपच्छेदसे शून्य क्रतुमें विषयता है ।

न्यायरत्नमालामें कहा भी है—
'साधारणस्य शास्त्रस्य ०' प्रत्यक्षसिद्ध और होममात्रमें प्रवृत्त साधारणशास्त्र आहवहनीये जुहोति ( आवहनीय अग्निमें होम करे ) इत्यादिका 'पदे जुहोति' ( गौके सप्तम पादविक्षेपमें [सप्तम खुर जहाँ पड़ा हो, उसमें] होम करे ) इस


ꕤ 'आवहनीये जुहोति' इस शास्त्रका 'पदे जुहोति' इस वाक्यसे संकोच होता है, इसीको प्राप्तबाध कहा जाता है, इसका आगेके न्यायरत्नमालाके श्लोकमें विचार किया जायगा ।

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प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २९७


इति उक्तलक्षणप्राप्तबाधविवेचने, ‘तत्रैवं सति शास्त्रार्थो भवति, पश्चाद्भाव्युद्गात्रपच्छेदविधुरप्रतिहर्त्रपच्छेदवतः क्रतोस्सर्ववेदसदानमङ्गम्, एवमुद्गात्रपच्छेदेऽपि द्रष्टव्यम्’ इति ।

यत्तु शास्त्रदीपिकावचनमुदाहृतम्, तदपि—‘तेनोत्पन्नमपि पूर्वप्रायश्चित्तज्ञानं मिथ्या भवति, बाधितत्वाद्, उत्तरस्य तु न किञ्चिद्बाधकमस्ति’ इति पूर्वकर्तव्यताबाध्यत्वप्रतिपादकग्रन्थोपसंहारपठितत्वाद् निमित्तोपजननात् प्राङ्निमित्तोपजननं विनानिमित्तोपजननाभावे सति अन्यथा कर्तव्यो-


विशेषविषयक शास्त्रसे संकोच होता है अर्थात् पदहोमातिरिक्त स्थलमें आहवनीय होम करे, इस प्रकार जो संकोच होता है; उसे प्राप्तबाध कहते हैं। तात्पर्यार्थ यह हुआ कि इस स्थानमें जैसे सामान्यशास्त्रका विशेष शास्त्र बाधक है, वैसे ही सामान्यशास्त्रोंमें भी किसी विषयमें विरोध होनेपर पूर्वकालमें प्राप्त नैमित्तिकशास्त्रका उत्तरकालमें प्राप्त नैमित्तिकशास्त्रसे बाध होता है, जैसे कि विरुद्ध अपच्छेदनिमित्तकशास्त्रोंमें । इससे श्लोकस्थ विशेष विषयादिमें पठित आदि शब्दसे ‘परशास्त्र’ आदिका संग्रह होता है यह बात श्लोकमें उक्तलक्षण प्राप्तबाधके विवेचनके अवसरमें कही गई है । अपच्छेद स्थलमें उत्तरज्ञानसे पूर्वज्ञानका बाध होनेपर उक्त नैमित्तिक शास्त्रका यह अभिप्राय होता है कि उत्तरकालमें होनेवाले उद्गाताके अपच्छेदसे रहित प्रतिहर्ताके विच्छेदसे युक्त क्रतुका सर्वस्वदान अङ्ग है और पश्चात्कालमें होनेवाले प्रतिहर्ताके अपच्छेदसे रहित उद्गाताके विच्छेदसे युक्त क्रतुकी दक्षिणाके विना समाप्ति करना अङ्ग है—यह ध्यान रखना चाहिए ।

जो कि पूर्वमें शास्त्रदीपिकाकार (पार्थसारथिमिश्र) का ‘नैमित्तिकशास्त्रस्य’ इत्यादि वाक्य उदाहरणरूपसे दिया गया है, वह भी -पूर्वकालमें प्रवृत्त नैमित्तिकशास्त्रसे उत्पन्न होनेपर भी प्राक्तनप्रायश्चित्तज्ञान उत्तर नैमित्तिक शास्त्रसे बाधित होनेसे मिथ्या ही होता है, और उत्तरकालमें उत्पन्न हुए प्रायश्चित्त ज्ञानका कोई बाधक नहीं है, इस प्रकार पूर्वकर्तव्यतामें बाध्यत्वका प्रतिपादन करनेवाले ग्रन्थके उपसंहारमें पढ़ा गया है, अतः निमित्तकी उत्पत्तिके बिना अर्थात् निमित्तके उत्पन्न न होनेपर अन्यरूपसे भी कर्तव्य हैं इस प्रकार—

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२९८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद

ऽपीति—कृत्वाचिन्तामात्रपरम्। न तूत्तरनिमित्तोपजननात्प्राक्पूर्वनैमित्तिक-
कर्तव्यता वस्तुत आसीदित्येवंपरम्, पूर्वग्रन्थसन्दर्भविरोधापत्तेः ।

कृत्वाचिन्तापरक है, उत्तरनिमित्तके उत्पन्न होनेसे पूर्व उसमें वस्तुतः कर्तव्यता
थी, इस अर्थका प्रतिपादक वह ग्रन्थ नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे पूर्व
ग्रन्थके साथ विरोध होगा * ।


* शास्त्रदीपिकाकारका वचन 'नैमित्तिकशास्त्रस्य०' (निर्णयसागरमुद्रित पुस्तकमें
शास्त्रदीपिकामें 'नैमित्तिकशास्त्राणां ह्ययमर्थः' ऐसा पाठ उपलब्ध होता है, और इस ग्रन्थमें
'नैमित्तिकशास्त्रस्य' इत्यादिरूपसे पाठ उपलब्ध होता है, अतः अन्य पुस्तकोंमें कदाचित्
एकवचनान्त पाठ भी होगा यह ज्ञात होता है) इत्यादिका उपन्यास इसलिए किया गया है कि
दो रूपज्ञानके समान अर्थात् एक ही घटमें क्रमिक रूपद्वयज्ञान जैसे प्रामाणिक हैं, वैसे एक
ही क्रतुमें क्रमिक नैमित्तिकप्रायश्चित्तद्वयज्ञान भी प्रामाणिक हो सकते हैं, अतः पूर्वसे परका
बाध या परसे पूर्वका बाध करनेकी चिन्ता ही नहीं हो सकती है। इसपर सिद्धान्ती कहते हैं
कि नहीं उक्त ग्रन्थका आपके मतानुसार अर्थ नहीं है, परन्तु उसका अभिप्राय कुछ दूसरा
ही है। 'नैमित्तिकशास्त्रस्य' इत्यादि वाक्य उपसंहारभागमें पठित है, इसलिए उसका अभिप्राय
उपक्रम ग्रन्थके अनुसार ही होगा और उपक्रमस्थ वाक्य है—'तेनोत्पन्नमपि' इत्यादि। इसका
तात्पर्यार्थ यह है कि पहले शङ्का की गई कि जिस स्थलमें क्रमिक उद्गाता और प्रतिहर्ताका
विभाग हुआ हो, वहाँपर पूर्वनिमित्तक ही प्रायश्चित्त करना चाहिए, क्योंकि उसका कोई विरोधी
नहीं है, अतः अनायास उसका परिज्ञान हो जाता है। और उत्तरनिमित्तक प्रायश्चित्तका पूर्व-
निमित्तक प्रायश्चित्तसे विरुद्ध होनेके कारण ज्ञान नहीं हो सकता है, इसलिए पूर्व ही बलवान् है।
इस परिस्थितिमें 'तेनोत्पन्नम्' इत्यादिसे कहा कि यद्यपि पूर्वनैमित्तिकशास्त्रसे उस पूर्व प्रायश्चित्तकी
अवगति होती है, तथापि वह बाधित होनेसे मिथ्या है। भाव यह है कि यद्युद्गातापच्छिन्द्यात्'
इत्यादि प्रत्यक्षशास्त्रसे पूर्वनिमित्तक प्रायश्चित्तका ज्ञान होता है, परन्तु जो उत्तरनिमित्तक
प्रायश्चित्तका ज्ञान है, वह अपनेसे विरुद्ध पूर्वज्ञानका बाध करके ही प्रवृत्त होता है, लोकमें भी
'शुक्तिरजतम्' और 'नेदं रजतम्' इत्यादिस्थलमें, ऐसा देखा गया है; अतः पूर्वज्ञान मिथ्या है,
इसलिए वह बलवान् नहीं है। इस अवस्थामें 'तेनोत्पन्नमपि' इत्यादि उपक्रम ग्रन्थके अनुसार
'निमित्तोपजननं विना' इत्यादिका यही अर्थ होगा कि जिस क्रतुमें दो प्रकारके क्रमिक विरुद्ध
अपच्छेद न हों, उस स्थलमें यदि द्वितीय निमित्तकी उत्पत्ति न हो, तो पूर्वनिमित्तके बलसे
इस क्रतुका प्रयोग अन्य रीतिसे हो सकता है, परन्तु प्रकृतमें तो ऐसा है नहीं अर्थात् द्वितीय
निमित्तकी उत्पत्ति हो गई है, अतः उत्तरनिमित्तक प्रायश्चित्तज्ञान पूर्वका बाध करेगा ही,
इस प्रकार पूर्वनिमित्तसे अन्यथाकर्तव्यत्वकी क्रतुमें केवल संभावना होती है, वस्तुतः उसकी
सत्ता निश्चित नहीं होती है कि अन्यथाकर्तव्य याग था, इसलिए शास्त्रदीपिकावचन भी दो
ज्ञानोंमें प्रामाण्यका प्रतिपादक नहीं है, यह भाव है।

ज्योतिष्टोम यज्ञ सोमयागका ही प्रकार है 'ज्योतींषि स्तोमा यस्य सः=ज्योतिष्टोमः' इस

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प्रत्यक्षसे 'श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २९९

[ टिप्पणी ]

प्रकार ज्योतिरूप स्तोम जिसमें हों उसे ज्योतिष्टोम कहना चाहिए, यह अर्थ लब्ध होता है। त्रिवृत्, पञ्चदश, सप्तदश एकविंश इस प्रकार चार स्तोम होते हैं इसमें 'त्रिवृत्पञ्चदशः सप्तदश एकविंश एतानि वाव ज्योतींषि य एतस्य स्तोमाः' ( तै० ब्रा० १।५।११ ) यह वाक्य प्रमाण है । इस ज्योतिष्टोम यागमें हविर्धानसे वहिष्पवमान देशके प्रति जाते हुए ऋत्विजोंका अन्वारम्भ सुना जाता है अर्थात् अध्वर्यु प्रस्तोताके कच्छको पकड़े और उद्गाता प्रस्तोताके कच्छको, प्रतिहर्ता उद्गाताके कच्छको, ब्रह्मा प्रतिहर्ताके कच्छको, यजमान ब्रह्माके कच्छको और प्रशास्ता यजमानके कच्छको पकड़े । इस प्रकार एक दूसरेका कच्छ पकड़ कर जाते हुए ऋत्विजोंमेंसे एकका विच्छेद होनेपर प्रायश्चित्त करना पड़ता है—वह इस प्रकार है—प्रस्तोता अपच्छेद करे तो प्रम्राधो वर दे । यदि प्रतिहर्ता अपच्छेद करे तो सर्वस्व दे । यदि उद्गाता अपच्छेद करे, तो उस यज्ञको दक्षिणा बिना समाप्त कर पुनः याग करे। उसमें वही दक्षिणा दे जो पूर्वमें दी जानेवाली थी ।

इस प्रायश्चित्तोंके विषयमें एक यह भी विचार प्रस्तुत होता है कि यदि एक कालमें उद्गाता और प्रतिहर्ताका अपच्छेद हो जाय तो क्या प्रायश्चित्त करना चाहिए या नहीं ? इस सन्देहमें पूर्वपक्षी यह कहता है कि ऐसी स्थितिमें प्रायश्चित्त नहीं करना चाहिए, क्योंकि एककालमें प्रतिहर्ता और उद्गाताका जहाँपर विच्छेद हुआ हो, वहाँपर सापेक्ष होनेसे यह निश्चित नहीं होता है कि विच्छेदका कौन प्रायश्चित्त किया जाय । इसलिए युगपत् अपच्छेदकालमें प्रायश्चित्त करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, इस पूर्वपक्षके परिहारमें सिद्धान्तीका कहना है—युगपत् अपच्छेदमें भी प्रायश्चित्त होता ही है, क्योंकि विभजन ( अपच्छेद ) क्रियाके प्रति जो कर्ता है वह सापेक्ष नहीं है, किन्तु निरपेक्ष ही है, अतः विच्छेदक्रियाके प्रति एक एकमें भी कर्तृता है, विशेष इतना ही है कि युगपत् अपच्छेदमें काल एक है। तात्पर्यार्थ यह है कि अपच्छेदशब्दका अर्थ है—विभाग । और यद्यपि विभाग उभयमें समवायसम्बन्धसे रहता है, तथापि जिसकी क्रियासे उत्पन्न होगा तत्कर्तृक ही कहा जाता है। प्रकृतमें यद्यपि दोनों पुरुषोंकी ( प्रतिहर्ता और उद्गाताकी ) क्रियासे विभागकी उत्पत्ति हुई है, अतः प्रत्येकमें निरपेक्ष कर्तृता न होनेके कारण इस अपच्छेदमें एककर्तृकत्वका व्यवहार नहीं होगा यह शङ्का हो सकती है; तथापि अन्य स्थलमें अर्थात् एककी क्रियासे जन्य विभागमें एक पुरुषकी ही कर्तृता भासती है, इससे दैवात् एक कालमें दोनों कर्ताओंका समावेश होनेपर भी प्रत्येकमें ही कर्तृत्व निरपेक्ष है, अतः अवश्य प्रायश्चित्त करना होगा ।

अथ यहां युगपत् विच्छेदमें शङ्का होती है कि क्या दोनों ही प्रायश्चित्त करने चाहिएँ या विकल्पसे एक; इस संशयमें पूर्वपक्ष होता है कि दोनों प्रायश्चित्त करने चाहिएँ, क्योंकि युगपत् अपच्छेदमें समुच्चय करना ही न्याय्य है, कारण कि प्रयोग एक है। अथवा अदक्षि-णत्व और सर्वस्वदक्षिणात्वका विरोध है, तो प्रयोगभेदसे व्यवस्था अर्थात् विकल्प करना चाहिए—अपच्छेदयुक्त प्रथम प्रयोगमें दक्षिणा न देनी चाहिए और उत्तर प्रयोगमें सर्वस्व-दक्षिणा देनी चाहिए, इसपर सिद्धान्त यह होता है कि उत्तर प्रयोगमें अपच्छेद नहीं है, इसलिए निमित्तके बिना नैमित्तिक प्रायश्चित्त हो नहीं सकता, इससे पूर्वके प्रयोगमें दोनों निमित्तोंके होनेसे प्रायश्चित्त होते, परन्तु वे अन्योऽन्य विरुद्ध हैं, अतः विकल्प मानना उचित है, इसलिए

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३००सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

[ टिप्पणी ]
युगपदपच्छेदमें प्रायश्चित्तका विकल्प है अर्थात् सर्वस्वदान करे या प्रथम प्रयोगको समाप्त करके पुनः याग करे।

क्रमिक प्रायश्चित्त स्थलमें भी विचार किया गया है कि जहाँ पहले उद्गाताका विच्छेद हुआ अनन्तर प्रतिहर्त्ताका, वहाँपर क्या पूर्व प्रायश्चित्त करना चाहिए या उत्तरनिमित्तकप्रायश्चित्त करना चाहिए ? ऐसा संशय होनेपर पूर्वपक्षी कहता है कि पूर्व ही करना चाहिए, क्योंकि वह असञ्जात-विरोधी है अर्थात् श्रुति, लिङ्ग आदि स्थलमें असञ्जात विरोध होनेसे पूर्व-पूर्व ही बलवान् होते हैं और उत्तरकी प्रवृत्ति रुक जाती है, वैसे ही प्रकृतमें भी पूर्वनिमित्तकप्रायश्चित्तसे उत्तरनिमित्तकप्रायश्चित्त रुक जायगा अर्थात् वह प्रवृत्त ही न होगा, अतः पूर्व ही बलवान् है, इस प्रकार पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर सिद्धान्त किया जाता है कि श्रुति, लिङ्ग आदिके दृष्टान्तसे पूर्वनिमित्तकप्रायश्चित्तको प्रबल नहीं मान सकते हैं, क्योंकि श्रुति, लिङ्ग आदि स्थलमें उत्तर पूर्वकी अपेक्षा रखते हैं, इसलिए पूर्वके साथ विरोध होनेपर उत्तरकी उत्पत्ति ही नहीं होगी, और प्रकृतमें दोनों ज्ञान परस्पर निरपेक्ष होकर दो वाक्योंसे उत्पन्न होते हैं, उत्पद्यमान उत्तर ज्ञान पूर्वका बाध करके ही उत्पन्न होता है । यद्यपि निरपेक्षत्वांश दोनोंमें समान है, तथापि पूर्वज्ञानकी उत्पत्ति-दशामें अविद्यमान उत्तरज्ञान बाधित नहीं होता है । उत्तरकालमें स्वयं बाधित पूर्वज्ञान उत्तरका बाधक कैसे होगा ? अर्थात् नहीं होगा । और दूसरा कोई कारण भी नहीं है जिससे कि उसका बाधक हो सके । इसलिए क्रमिक प्रायश्चित्तस्थलमें उत्तरकालीन अपच्छेदनिमित्तक प्राय-श्चित्तका ही अनुष्ठान करना चाहिए । इस प्रकारके अपच्छेदाधिकरणका निम्नश्लोकोंसे विचार किया गया है—

‘उद्गातुः प्रतिहर्तुश्च सहापच्छेदेनेऽस्ति न ।
प्रायश्चित्तमुताऽस्त्यत्र, न निमित्तविघाततः ॥
एकैकस्यैव विच्छेद-कर्तृत्वान्न विहन्यते ।
कालमात्रं तु तत्रैकप्रायश्चित्तमतो भवेत् ॥
समुचयो विकल्पो वा प्रायश्चित्तद्वयेऽग्रिमः ।
अदक्षिणत्वं पूर्वस्मिन् प्रयोगेऽन्यत्तु पश्चिमे ॥
प्रयोगे पश्चिमे नास्ति निमित्तं तेन तद्वयम् ।
प्राप्तमेकप्रयोगेऽतो विरुद्धत्वाद्विकल्प्यते ॥
अपच्छेदक्रमे पूर्वः प्रबलः स्यादुतोत्तरः ।
असंजातविरोधेन पूर्वेणोत्तरबाधनम् ॥
निरपेक्षोत्तरज्ञानं जायते पूर्वबाधया ।
न बाधकान्तरं तस्य तेन प्रबलमुत्तरम् ॥’
[ अ० न्या० पृ० ३४८ श्लो० २१–२६ आनन्दाश्रम ]

इस प्रकारसे अपच्छेदन्यायके कुछ अंशका निरूपण किया गया है । इस न्यायसे भी श्रुति पर होनेसे बलवती ही है और पूर्वभावी प्रत्यक्ष निर्बल है । इसका अन्य ग्रन्थोंमें भी अर्थात् अद्वैतसिद्धि आदि ग्रन्थोंमें भी विचार करके पूर्वभावी प्रत्यक्षको निर्बल निश्चित करते हुए आगम ही बलवान् माना गया है ।

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प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित ३०१

आस्तां मीमांसकमर्यादा । श्यामतदुत्तररक्तरूपन्यायेन क्रमिककर्तव्यताद्वयोत्पत्त्युपगमे को विरोधः ?

उच्यते—तथा हि किं तत् कर्तव्यत्वम्, यत् परनैमित्तिककर्तव्यतोत्पत्त्या निवर्तेत । न तावत् पूर्वनैमित्तिकस्य कृतिसाध्यत्वयोग्यत्वम् । तस्य पश्चादप्यनपायात् । नापि फलमुखं कृतिसाध्यत्वम्, तस्य पूर्वमप्यजननात् । नापि यदननुष्ठाने क्रतोर्वैकल्यं तत्त्वम्, अङ्गत्वं वा । अननु-


थोड़ी देरके लिए मीमांसकोंकी *परिपाटी अलग ही रहे, श्यामरूप और उसके उत्तरकालमें उत्पन्न होनेवाले रक्तरूपके दृष्टान्तसे क्रमिक दो कर्तव्यताओंकी उत्पत्ति यदि मानी जाय, तो विरोध क्या है ? अर्थात् कुछ नहीं है ।

इसे कहते हैं—वह कौनसी कर्तव्यता है जो उत्तरकालीन नैमित्तिक कर्तव्यताकी उत्पत्तिसे निवृत्त होगी ? यदि कहो कि पूर्वकालीन निमित्तसे जायमान प्रायश्चित्तमें कृतिसाध्यताकी योग्यतारूप है, तो यह युक्त नहीं है, कारण कि उस कर्तव्यत्वकी अनुवृत्ति पीछे भी होती है † । और यदि कहो कि फलमुख कृतिसाध्यत्व ‡ कार्यत्व है, तो यह भी असङ्गत है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति पहले भी नहीं है । यदि कहो कि जिसके × अनुष्ठान न करनेसे


* तात्पर्य यह है कि घटमें पहले श्यामरूप रहता है, उत्तर क्षणमें पाकसे श्यामरूपका नाश और रक्तरूपकी उत्पत्ति जैसे होती है, वैसे ही उत्तरनैमित्तिक कर्त्तव्यकी उत्पत्तिसे विनष्ट होनेवाला यदि पूर्वनिमित्तक कर्तव्यत्व माना जाय, तो उस कर्तव्यत्वका निरूपण प्रथम करना चाहिए और वह अशक्य है, इसी बातको मूलमें 'उच्यते' इत्यादिसे कहते हैं ।

† अर्थात् उत्तरकालीन प्रायश्चित्तके कर्त्तव्यत्वकालमें भी उक्तलक्षणलक्षित पूर्वनिमित्तक कर्त्तव्यत्वकी अनुवृत्ति होती है, अतः उत्तरकालीन कर्त्तव्यतासे पूर्वकालीन कर्तव्यताका विनाश हो ही नहीं सकता, इसलिए 'घेर' के श्याम और रक्तरूपके समान उन कर्तव्यताओंमें क्रमिकत्वका स्वीकार नहीं कर सकते हैं, यह भाव है ।

‡ फलमुखकृतिसाध्यत्वका अर्थ है—फलोन्मुखकृतिसाध्यत्व, फल—कार्य उससे उन्मुख—युक्त अर्थात् कर्तव्यत्व उसे कहते हैं जो कृतिसाध्य होकर उत्पत्तिसे युक्त हो, प्रकृतमें यह नहीं है, क्योंकि उस कर्तव्यत्वकी उत्पत्ति पहले भी नहीं हुई है, जब उसकी उत्पत्ति हो, तब उसमें फलमुखकृतिसाध्यत्व रहे, परन्तु ऐसा है नहीं । इस अवस्थामें पूर्वनैमित्तिक ज्ञानमें अप्रमत्व ही मीमांसकोंके अनुसार सिद्ध होता है, श्याम और रक्तरूपके समान प्रमात्व सिद्ध नहीं होता है । इसलिए कर्तव्यताद्वय प्रमाण सिद्ध नहीं है, यह भाव है ।

× जिसके अनुष्ठानाभावसे क्रतुमें कुछ न्यूनता हो अर्थात् क्रतुके वैकल्यमें प्रयोजक अनुष्ठानके प्रतियोगीभूत अनुष्ठानका जो आश्रय हो, वह कर्तव्य है । जहाँ प्रथम उद्गाताका

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३०२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद


क्रतुमें वैकल्य हो जाय, वह कर्तव्यत्व है, अथवा क्रतुके प्रति अङ्गता कर्तव्यता


अपच्छेद हुआ हो, पश्चात् प्रतिहर्ताका अपच्छेद हुआ हो, वहाँ उद्गाताके प्रायश्चित्तका अनुष्ठान क्रतुके वैकल्यका प्रयोजक है अथवा वह प्रायश्चित्त क्रतुका अङ्ग है, इस प्रकार कहनेवालेको यह कहना चाहिए कि पूर्व प्रायश्चित्तके अनुष्ठानमें वैकल्यप्रयोजकत्व क्या है, क्या वैकल्योत्पादकता है अथवा वैकल्यव्यापकता है अथवा वैकल्यव्याप्यता है ? आद्य पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि अभावरूप अनुष्ठान किसीका उत्पादक नहीं हो सकता है और क्रतुवैकल्यके क्रतुके उपकारके प्रागभावरूप होनेसे वह उत्पाद्य भी नहीं हो सकता है और द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि जिस यज्ञमें केवल उद्गाताका अपच्छेद हुआ है उस यज्ञमें तन्निमित्तके प्रायश्चित्त भी किया है और किसी अन्य कारणसे क्रतुका वैकल्य भी हुआ है, उस यागमें उद्गाताके प्रायश्चित्तका अनुष्ठान नहीं होनेसे व्यभिचार हो जायगा, अतः परिशेषत् तृतीय पक्ष ही अवशिष्ट रहता है अर्थात् क्रतुवैकल्यव्याप्यता ही क्रतुवैकल्यप्रयोजकत्व है और प्रायश्चित्तको क्रत्वङ्ग माननेपर उसमें दो प्रकारसे अङ्गता मान सकते हैं एक तो फलोपकारित्वरूप और दूसरी सन्निपत्योपकारित्वरूप । फलोपकारित्वरूप अर्थात् परमापूर्वरूप ( मुख्य अपूर्व ) के प्रति अदृष्ट द्वारा जिसकी कारणता हो, जैसे प्रयाज आदि अदृष्टद्वारा परमापूर्वमें उपकारक होते हैं । इसी प्रकार सन्निपत्योपकारकका अर्थ है यागके स्वरूपका उपकारक जैसे द्रव्य और देवता, ये दोनों यागके स्वरूपमें ही उपकारक हैं । यदि क्रतुवैकल्यप्रयोजकत्व और क्रत्वङ्गत्व क्रतुवैकल्यव्याप्यत्व और फलोपकारित्व या सन्निपत्योपकारित्वरूप क्रमशः माना जाय तो क्या हानि है ? इसपर यह प्रश्न हो सकता है कि क्रमशः उत्पन्न हुए विरुद्ध प्रायश्चित्तोंसे युक्त ऋतुमें पूर्वप्रायश्चित्तके अनुष्ठानमें रहनेवाले ऋतुवैकल्यव्याप्यत्वरूप क्रतुप्रयोजकत्व और उसी पूर्वप्रायश्चित्तमें रहनेवाला अङ्गत्व द्वितीय निमित्तकी उत्पत्तिके बाद अनुवर्तमान होता है, या नहीं ? यदि अनुवृत्ति मानी जाय, तो क्रतुवैकल्यप्रयोजक अनुष्ठानके प्रतियोगी अनुष्ठानशालित्वरूप पूर्वप्रायश्चित्तगतकर्तव्यत्वका और उस प्रायश्चित्तगत अङ्गत्वत्वका उत्तरनैमित्तिकप्रायश्चित्तकर्तव्यतासे जो विनाश माना गया है, उसका भङ्ग प्रसक्त होगा, यदि द्वितीय कल्प मानें, तो यही अर्थ पर्यवसन्न होगा कि पूर्व प्रायश्चित्तके अनुष्ठानमें क्रतुवैकल्य व्याप्यत्व द्वितीय निमित्तकी उत्पत्तिके पूर्वमें ही होगा, उसकी उत्पत्तिके बाद नहीं होगा, इसी प्रकार पूर्वप्रायश्चित्तगत अङ्गत्वरूप कर्तव्यता द्वितीय निमित्तके उत्पन्न होनेके पूर्वमें ही पूर्वप्रायश्चित्तमें है, अनन्तर नहीं है । इस अवस्थामें व्याप्यत्व और कारणत्वकी अपने आश्रयमें सत्ता कादाचित्की ( कुछ समयके लिए ) ही प्रसक्त होगी, अतः कादाचित्कत्वप्रसङ्गके निरासके लिए अर्थात् अङ्गत्व और प्रयोजकत्वके यावदाश्रयभावित्वरूप स्वाभाविकत्वके निर्वाहके लिए यही कहना होगा—अनन्तरकालमें उत्पन्न होनेवाले विरुद्ध अपच्छेदके अभावसे युक्त क्रतुका पूर्वापच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्त अङ्ग है अर्थात् पूर्वके अपच्छेदसे किया जानेवाला प्रायश्चित्त वहींपर क्रतुका अङ्ग होता है जहाँपर उत्तरकालीन अपच्छेद न हुआ हो, इसी प्रकार पश्चात् भावी अपच्छेदसे विधुर क्रतुमें पूर्वकालिक अपच्छेदनिमित्तिक प्रायश्चित्तका अनुष्ठान उस क्रतुके वैकल्यका सम्पादक है । इस परिस्थितिमें जब उत्तर अपच्छेद होगा, तब उस अपच्छेदसे युक्त क्रतुमें पूर्वापच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्तमें अङ्गत्व और उसी पूर्वनिमित्तक प्रायश्चित्तके अनुष्ठानमें


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प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित ३०३


ष्ठाने क्रतुवैकल्यप्रयोजकत्वस्य नियमविशेषरूपत्वेन कर्माङ्गत्वस्य फलोप-
कारितया सन्निपातितया वा कारणत्वविशेषरूपत्वेन च तयोः कादाचित्क-
त्वायो pick
स्वाभाविकत्वनिर्वाहाय पश्चाद्भाविविरुद्धापच्छेदाभाववतः क्रतोः
पूर्वापच्छेदनैमित्तिकमङ्गम्। तत्रैव तदननुष्ठानं क्रतुवैकल्यप्रयोजकमिति
विशेषणीयतया पाश्चात्त्यापच्छेदान्तरवति क्रतौ पूर्वापच्छेदनैमित्तिके क्रत्व-


हैं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अनुष्ठानके न करनेमें—अनुष्ठानके अभावमें—
जो ऋतुके वैकल्यके प्रति प्रयोजकत्व (हेतुत्व) है, वह नियमविशेषरूप है
अर्थात् क्रतुवैकल्यव्याप्यत्वरूप * है, और कर्मके प्रति जो अङ्गत्व है, वह
फलोपकारितारूपसे अथवा † सन्निपातितारूपसे कारणत्वविशेषरूप है, इसलिए
उनमें अर्थात् क्रतुवैकल्यप्रयोजकत्व और कर्माङ्गत्वमें कादाचित्कत्वके न
होनेसे स्वाभाविकत्वके निर्वाह करनेके लिए उत्तरकालमें होनेवाले विरुद्ध अप-
च्छेदके अभावसे युक्त क्रतुका पूर्वकालीन निमित्तसे जायमान प्रायश्चित्त अङ्ग
है, और उसीमें उसका अननुष्ठान क्रतुकी विकलतामें कारण है, इस प्रकार
विशेषण देना ‡ होगा, इससे पश्चाद्भावी अपच्छेदसे युक्त क्रतुमें पूर्वकालीन


ङ्गतुवैकल्यकी प्रयोजकताके पाश्चात्य अपच्छेदोत्पत्तिके पूर्वमें न होनेसे भ्रान्ति ही होगी, अतः
क्रतुवैकल्यप्रयोजकाननुष्ठानप्रतियोग्यनुष्ठानशालित्व अथवा पश्चाद्भाविविरुद्धापच्छेदाभाववत्क्रतु-
वैकल्यप्रयोजकाननुष्ठानप्रतियोग्यनुष्ठानशालित्वरूप कर्तव्यत्व अथवा तादृश अङ्गत्व (पश्चाद्भा-
व्यपच्छेदाभाववत्क्रतुं प्रति फलोपकारित्वेन सन्निपत्योपकारित्वेन कारणत्वरूप अङ्गत्व) को भी
कर्तव्यत्व नहीं मान सकते हैं, यह भाव है।

* क्रतुवैकल्यव्याप्यत्वका अर्थ है—जहाँ-जहाँ अनुष्ठानका अभाव हो वहाँ-वहाँ क्रतुमें
वैकल्य होना चाहिए, व्याप्यके अस्तित्वमें व्यापकका अस्तित्व अवश्य रहता है, जैसे धूमके
रहनेपर वह्निकी सत्ता पर्वतमें अवश्य रहती है, इसलिए प्रायश्चित्तके अननुष्ठानमें क्रतुवैकल्य-
व्याप्यता अवश्य रहेगी।

† अपच्छेदसंयुक्त प्रायश्चित्तमें क्रतुकी अङ्गता मानी जाय, तो वह दो प्रकारसे घटेगी
अर्थात् साक्षात् या परम्परया। क्रतुके स्वरूपमें जो कारण होगा वह फलोपकारी अङ्ग होगा
और क्रतुजन्य परमापूर्वका अदृष्टद्वारा सम्पादक जो कारण होगा वह सन्निपाती अङ्ग होगा,
इसलिए मूलमें 'फलोपकारितया' और 'सन्निपातितवा' इत्यादि कहा गया है, यह भाव है।

‡ व्याप्यत्व और अङ्गत्वका कादाचित्कत्व प्रसङ्ग किस प्रकार है, उसका निरूपण पूर्वमें
किया जा चुका है। इसके परिहारके लिए क्रतुवैकल्य प्रयोजकका और क्रत्वङ्गका क्रमशः
उत्तरकालिक विरुद्ध अपच्छेदसे रहित क्रतुका ही पूर्व प्रायश्चित्त अङ्ग है, ऐसा अर्थ करना होगा,
इससे उक्त व्याप्यत्व और अङ्गत्वका स्वाभाविकत्व सिद्ध होगा, अन्यथा नहीं होता है, यह भाव है।


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३०४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद


ङ्गत्वस्य, तदननुष्ठाने क्रतुवैकल्यप्रयोजकत्वस्य वा पाश्चात्त्यापच्छेदोत्पत्तेः पूर्वमसम्भवात् । नहि वस्तु किञ्चिद्वस्त्वन्तरं प्रति कञ्चित्कालं व्याप्यं पश्चान्नेति वा, कञ्चित्कालं कारणं पश्चान्नेति वा, क्वचिद् दृष्टम्, युक्तं वा । नापि कर्तव्यत्वं नाम धर्मान्तरमेवाऽऽगमापाययोग्यं कल्प्यम्, मानाभावात् ।

अपच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्तकी अङ्गताका और उसके अनुष्ठान न करनेपर विकलताके हेतुत्वका परकालीन अपच्छेदके पूर्वकालमें भी असम्भव ही है । क्योंकि ऐसा कहींपर नहीं देखा गया है और युक्त भी नहीं है कि * कोई वस्तु किसी वस्तुके प्रति कुछ कालतक व्याप्य होती है, और पीछे व्याप्य नहीं होती है तथा किसी भी वस्तुके प्रति कोई वस्तु अल्प समयतक कारण रहती हो और पीछे कारण नहीं रहती हो । और † आगम और विनाशके योग्य कोई धर्मान्तर भी कर्तव्यत्व नहीं हो सकता है, क्योंकि उसमें कोई प्रमाण नहीं है । विरुद्ध जो अपच्छेदशास्त्र हैं, उनकी 'पदे जुहोति' और 'आवहनीये जुहोति' इन दो शास्त्रोंके समान व्यवस्था हो सकती है, इसलिए क्रमिक दो कर्तव्यताओंके उपपादक वचन अप्रमाण हैं ।


* व्याप्यत्व और अङ्गत्व (कारणत्व) कादाचित्क नहीं होते हैं, स्वाभाविक ही होते हैं, उसमें प्रसिद्ध दृष्टान्त देते हैं कि वह्निके प्रति धूम व्याप्य है, उसमें व्याप्यता कुछ समयतक रहती है और कुछ समयतक नहीं रहती है, यह देखा नहीं गया है और किसी युक्तिसे सिद्ध भी नहीं है । यदि कदाचित् जबरदस्ती मान लिया जाय कि वह्निकी धूममें व्याप्यता कुछकाल तक ही रहती है, तो आपत्ति यह होगी कि तो 'वह्निमान् धूमात्' (धूम होनेसे पर्वत वह्निमान् है) इस स्थलको सोपाधिकता प्रसक्त होगी, क्योंकि व्याप्यत्वा-भावमें उपाधि प्रयोजक है, इसीलिए 'धूमवान् वह्नेः' इस स्थलमें वह्निहेतु सोपाधिक होता है । इसी प्रकार कारणमें कारणत्व कादाचित्क होगा, तो धूमादिकार्यके लिए वह्निरूप कारणके ग्रहणमें देवदत्त आदिकी जो प्रवृत्ति होती है, उसमें अद्य निष्कम्प प्रवृत्ति नहीं होगी, अतः व्याप्यत्व और अङ्गत्वको (कारणत्वको) कदाचित्क नहीं मान सकते हैं, यह भाव है ।

† यदि कर्तव्यत्वका यह अर्थ किया जाय कि जो धर्म आगम (उत्पत्ति) और अपाय (विनाश) योग्य हो, अर्थात् जो प्रथम निमित्तके जननके अनन्तर ही आगमयोग्य हो और द्वितीय निमित्तके उत्पन्न होनेके बाद ही विनाशके योग्य कोई अन्य धर्मसे—उक्तलक्षणलक्षित धर्मों भिन्न—कर्तव्यत्व है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसे विलक्षण धर्ममें कोई प्रमाण ही नहीं है । अतः जैसे—'आवहनीये जुहोति' इस शास्त्रकी पदहोमातिरिक्त स्थलमें विषयता है, वैसे ही क्रमिक विरुद्ध प्रायश्चित्तकी व्यवस्था भी हो सकती है, अतः क्रमिक कर्तव्यद्वयकी उत्पत्ति मानना निरालम्ब है, यह भाव है ।


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प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार ] भाषानुवादसहित ३०५

विरुद्धापच्छेदशास्त्रयोः पदाहवनीयशास्त्रवद् व्यवस्थोपपत्तेः । तस्मान्निरालम्बनं क्रमिककर्तव्यताद्वयोत्पत्तिवचः ।

ननूपक्रमवत् पूर्वं प्रत्यक्षं बलवच्छ्रुतेः ।
नैकवाक्येष्विदंवाधास्त्वपच्छेदनयादिह ॥१२॥

यदि यह शङ्का हो कि उपक्रमके समान प्रत्यक्ष पूर्वभावी है, अतः श्रुतिसे प्रत्यक्ष बलवान् है, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि परस्पर एकवाक्यता स्थलमें ही उपक्रम-न्यायसे पूर्व बलवान् होता है, यहाँ तो अपच्छेदन्यायसे प्रत्यक्षसे पर श्रुति ही बलवती है ॥ १२ ॥

ननु चोपक्रमाधिकरणन्यायेनाऽसञ्जातविरोधित्वात् प्रत्यक्षमेवाऽऽगमाद् बलीयः किं न स्यात् ?

उच्यते—यत्रैकवाक्यता प्रतीयते, तत्रैकस्मिन्नेवार्थे पर्यवसानेन भाव्यम्, अर्थभेदे प्रतीतैकवाक्यताभङ्गप्रसङ्गात् । अतस्तत्र प्रथममसञ्जातप्रतिपक्षेण

अब शङ्का होती है कि उपक्रमाधिकरणन्यायसे असञ्जातविरोधी ॐ होनेके कारण प्रत्यक्ष ही आगमसे बलवान् क्यों न होगा ? अर्थात् आगमकी अपेक्षा प्रत्यक्ष ही बलवान् है । [ तात्पर्य यह है कि जैसे उपक्रमवाक्यके अर्थज्ञानके समयमें उपसंहारवाक्यार्थका परिज्ञान न होनेसे किसी विरोधीका परिस्फुरण नहीं होता है, अतः उपक्रम असञ्जातविरोधी है, वैसे ही द्वैतमें सत्यत्वके प्रत्यक्ष-समयमें विरोधी अर्थ, अर्थात् द्वैतमिथ्यात्वग्राहक श्रुतिका अर्थ, अनुभूत नहीं होता है, अतः विरोधकी परिस्फूर्ति न होनेसे प्रत्यक्ष असञ्जातविरोधी है, इस-लिए वह बलवान् हो सकता है । ]

इस आक्षेपके समाधानमें कहते हैं कि जहाँपर एकवाक्यता प्रतीत होती है, वहाँ एक ही अर्थमें वाक्यका पर्यवसान होता है, यदि ऐसे स्थलमें अर्थभेद माना जाय, तो प्रतीत एकवाक्यताका भङ्ग होगा [ अर्थात् भिन्न-भिन्न अर्थोंके रहते एकवाक्यताका ज्ञान नहीं हो सकता है, अतः एकवाक्यतामें--उपक्रम


ॐ उपक्रमाधिकरणन्यायसे उपक्रम ही बलवान् होता है, क्योंकि उपक्रम—आरम्भ जब होता है, तब अन्य विरोधी नहीं होता, अतः इसी उपक्रमन्यायसे प्रत्यक्षके असञ्जातविरोधी-( न सञ्जातो विरोधो यस्य सः, अर्थात् जिसका प्रतिद्वन्द्वी उत्पन्न न हुआ हो ) होनेसे शब्दकी अपेक्षा वही बलवान् होगा, प्रत्यक्ष जब प्रवृत्त होगा, तब मिथ्यात्वबोधक श्रुतियोंकी प्रवृत्ति न होनेके कारण वह असञ्जातविरोधी है ही ।

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३०६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद-

'प्रजापतिर्वरुणायाश्वमनयद्' इत्याद्युपक्रमेण परकृतिरूपार्थवादेन दातुरिष्टौ बुद्धिमधिरोपितायां तद्विरुद्धार्थं 'यावतोऽश्वान् प्रतिगृह्णीयात्तावतो वारुणान् चतुष्कपालान्निर्वपेद्' इत्युपसंहारगतं पदजातमुपजातप्रतिपक्षत्वाद्यथाश्रुतार्थसमर्पणेन तदेकवाक्यतामप्रतिपद्यमानमेकवाक्यतानिर्वाहाय णिजर्थमन्तर्भाव्य तदानुगुण्येनैवाऽऽत्मानं लभते इति उपक्रमस्य प्राबल्यम् । यत्र तु परस्परमेकवाक्यता न प्रतीयते, तत्र पूर्ववृत्तमविगणय्य लब्धात्मकं विरुद्धार्थकं वाक्यं स्वार्थं बोधयत्येवेति न तत्र पूर्ववृत्तस्य प्राबल्यम् ।

अत एव षोडशिग्रहणवाक्यं पूर्ववृत्तमविगणय्य तदग्रहणवाक्यस्यापि


और उपसंहार आदिकी एकवाक्यतामें—एक ही अर्थका प्रतिभास होना चाहिए, यह भाव है । इससे पूर्वकालमें जिसका विरोधी उत्पन्न न हुआ हो, ऐसे परकृति* के सदृश 'प्रजापतिर्व०' ( प्रजापतिने वरुणको अश्व दिया ) इत्यादि अर्थवादके उपक्रमसे दाताकी इष्टिके बुद्धिमें आरूढ होनेपर 'यावतोऽश्वान् ०' ( जितने अश्वोंका प्रतिग्रह करावे † उतने वारुणचतुष्कपालोंका निर्वाप करे ) इस प्रकारके उपक्रमसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेवाला उपसंहारस्थ वाक्य संजातविरोधी है, अतः आपाततः प्रतीयमान अर्थका बोधन करनेपर उपक्रमवाक्यके साथ एकवाक्यता प्राप्त नहीं कर सकता है, अतः उपक्रमवाक्यके साथ एकवाक्यता की उपपत्ति करनेके लिए णिच्के अर्थका अन्तर्भाव करके ही उपक्रमके अनुकूल एकवाक्यता होती है, अतः उपक्रमवाक्य बलवान् है । और जहांपर उपक्रम और उपसंहारकी एकवाक्यताकी प्रतीति किसी भी रीतिसे नहीं होती है, वहांपर पूर्ववृत्तान्तपर ध्यान न दे करके अपनी सत्तासे विरुद्धार्थक वाक्य अपने स्वार्थका बोधन करता ही है, अतः उस स्थलमें पूर्ववृत्त—पूर्ववाक्य—प्रबल नहीं होता है ।

इसीलिए पूर्ववृत्त षोडशिग्रहणवाक्यकी अर्थात् 'अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति'-


* 'परकृतिः—परस्य-प्रजापतेः कृतिः—अनुष्ठानम्' इस व्युत्पत्तिसे यद्यपि प्रजापतिका अनुष्ठान परकृतिशब्दका अर्थ प्रतीत होता है, तथापि यहाँपर उस अनुष्ठानका प्रतिपादक वाक्य परकृति-शब्दका अर्थ है ।

† प्रतिगृह्णीयात् ( प्रतिग्रह करे ) इस शब्दमें णिजर्थका अन्तर्भाव करके 'प्रतिग्राहयेत्' ( प्रतिग्रह करावे ) ऐसा अर्थ आगे ग्रन्थकार ही करेंगे । इस वाक्यसे—जितने अश्व दें, वरुणदेवताके उद्देश्यसे उतने ही चतुष्कपालोंका निर्वाप करे । कपालशब्दका अर्थ है—पुरोडाश बनानेके लिए बनाया हुआ मिट्टीका पात्रविशेष ।

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प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित ३०७

स्वार्थबोधकत्वमुपेयते, किन्तुभयोर्विषयान्तराभावाद् अगत्या तत्रैव विकल्पानुष्ठानमिष्यते ।

एवं चाऽद्वैतागमस्य प्रत्यक्षेणैकवाक्यत्वशङ्काऽभावात् पूर्ववृत्तमपि तद्विगणय्य स्वार्थबोधकत्वमप्रतिहतम् ।

तदर्थबोधजनने च—

'पूर्वं परमजातत्वादबाधित्वाैव जायते ।
परस्यानन्यथोत्पादान्नाबाधेन सम्भवः ॥'

इत्यपच्छेदन्यायस्यैव प्रवृत्तिः, नोपक्रमन्यायस्य ।
अत एव लोकेऽपि प्रथमवृत्तं शुक्तिरूप्यप्रत्यक्षमाप्तोपदेशेन बाध्यते इति ॥२॥


इस वाक्यकी 'नातिरात्रे षोडशिनं ‡ गृह्णाति' यह वाक्य भी अपेक्षा न करके ही स्वार्थबोधक है, ऐसा स्वीकार किया गया है, परन्तु विशेष इतना है कि षोडशीके ग्रहण और अग्रहणका अन्य विषय नहीं है, अतः अगत्या अर्थात् समुच्चयका भी असम्भव होनेसे अतिरात्रमें ही विकल्पसे अनुष्ठान माना जाता है ।

एवञ्च अर्थात् उपक्रमन्यायके प्रतीतैकवाक्यविषयक होनेसे अद्वैतबोधक शास्त्रकी प्रत्यक्षके साथ एकवाक्यताकी शङ्का भी नहीं हो सकती है, इसीलिए प्रत्यक्ष यद्यपि पूर्ववृत्त है, तथापि उसका ख्याल न करके आगम अपने अर्थका बोधन करता ही है ।

आगम अपने अर्थका बोध करता है, इसलिए—

'पूर्वं परमजातत्वात् ०' ( पूर्व अर्थात् प्रथम अपच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्त कर्त्तव्यताज्ञान परका अर्थात् दूसरे कालमें होनेवाले नैमित्तिककर्त्तव्यज्ञानकी उत्पत्ति न होनेसे उसका बाध न करके ही प्रवृत्त होता है और परशास्त्रकी पूर्वके बाधके विना उत्पत्ति नहीं हो सकती है, अतः वह पूर्वका बाध करके ही उत्पन्न होता है ) ।

इसीसे व्यवहारमें भी प्रथमकालमें प्रवृत्त शुक्ति-रजतका प्रत्यक्ष उत्तरकालमें प्रवृत्त आप्तोपदेशसे बाधित होता है ॥२॥


‡ षोडशिनामक स्तोत्रके बाद जहाँ अतिरात्र सामोंका गान किया जाता है, उस ज्योतिष्टोमका नाम अतिरात्र है ।

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३०८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

ननूपजीव्यप्रत्यक्षविरुद्धेऽर्थे श्रुतेः कथम् ।
मानत्वं युक्तमिति चेद्,

यदि शङ्का हो कि उपजीव्यभूत प्रत्यक्षसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेवाले आगममें प्रामाण्य कैसे होगा, क्योंकि अबाधितार्थबोधकत्व ही प्रामाण्य है,

ननु तथाऽप्युपजीव्यत्वेन प्रत्यक्षस्यैव प्राबल्यं दुर्वारम् । अपच्छेदशास्त्रयोर्हि न पूर्वं परस्योपजीव्यमिति युक्तः परेण पूर्वस्य बाधः । इह तु वर्णपदादिस्वरूपग्राहकतया मिथ्यात्वबोधकागमं प्रति प्रत्यक्षस्योपजीव्यत्वाद् आगमस्यैव तद्विरुद्धमिथ्यात्वावोधकत्वरूपो बाधो युज्यते । न च मिथ्यात्वश्रुत्या वर्णपदादिसत्यत्वांशोपमर्देऽपि उपजीव्यस्वरूपांशोपमर्दाभावान्नोपजीव्यविरोध इति वाच्यम्, 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि-श्रुतिभिः स्वरूपेणैव प्रपञ्चाभावबोधनात् ।

अब पुनः शङ्का होती है कि* यद्यपि आगमके समान प्रत्यक्ष स्वतः बलवान् नहीं है, तथापि आगमका उपजीव्य होनेसे प्रत्यक्ष ही बलवान् है, अपच्छेदशास्त्रोंमें पूर्व परका उपजीव्य ( कारण ) नहीं है, अतः उनमें पर पूर्वका बाध अवश्य करता है, और प्रकृतमें अर्थात् आगम और प्रत्यक्ष-स्थलमें मिथ्यात्वबोधक 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि आगम ( शास्त्र ) का—वर्ण, पद आदि स्वरूपका ग्राहक होनेसे—प्रत्यक्ष उपजीव्य है, अतः प्रत्यक्षविरुद्ध मिथ्यात्वरूप अर्थका बोधक होनेसे आगमका ही बाध युक्त है । इस विषयमें यदि शङ्का हो कि मिथ्यात्वबोधक श्रुतिसे वर्ण, पद आदिमें सत्यत्व अंशका उपमर्द ( बाध ) होनेपर भी उपजीव्यस्वरूपांशका बाध न होनेसे उपजीव्यभूत प्रत्यक्षसे आगमका विरोध नहीं है ? तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'नेह नानास्ति' इत्यादि श्रुतियोंसे स्वरूपका ही निषेध होता है, [ अतः उपजीव्यके साथ सर्वथा विरोध होनेसे प्रत्यक्ष ही बलवान् है आगम बलवान् नहीं है, यह भाव है ] ।


* यद्यपि इस शङ्काका 'न चैवमुपजीव्यविरोधः' इत्यादिसे उत्थान और परिहार किया गया है, तथापि उस परिहारका फिर आक्षेप करनेके लिए इस ग्रन्थका उल्लेख किया गया है, 'नेह नानास्ति' इत्यादि श्रुतिसे प्रपञ्चका स्वरूप ही निषिद्ध होता है, अतः उपजीव्य स्वरूपका उपमर्द होनेसे उपजीव्य विरोधका निरास नहीं है, इसलिए अनधिगताबाधितविषयकत्व न होनेके कारण अप्रामाण्यापत्ति दुर्वार है, यह भाव है ।

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उपजीव्य प्रत्यक्षसे श्रुतिका अवाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित ३०९


अत्र केचित् प्रचक्षते ॥ १३ ॥
न पदज्ञानमानत्वनियता शाब्दमानता ।
वृषभादिपदे भ्रान्त्या न्यूनाधिक्येऽपि दर्शनात् ॥ १४ ॥

इस शङ्काके परिहारमें कुछ लोग कहते हैं कि प्रमात्मक शाब्दबोध प्रमात्मक पदज्ञानसे नियत नहीं है, क्योंकि वृषभ आदि पदोंमें भ्रमात्मक ज्ञानसे भी शाब्दबोध देखा जाता है, अतः उक्त दोष नहीं है ॥ १३ ॥ १४ ॥

अत्र केचिदाहुः—‘वृषमानय’ इत्यादिवाक्यं श्रवणदोषाद् ‘वृषभ-मानय’ इत्यादिरूपेण शृण्वतोऽपि शाब्दप्रमितिदर्शनेन शाब्दप्रमितौ वर्ण-पदादिप्रत्यक्षं प्रमाभ्रमसाधारणमेवापेक्षितमित्यद्वैतागमेन वर्णपदादिप्रत्यक्ष-मात्रमुपजीव्यम्, न तत्प्रमा । तथा च वर्णपदादिस्वरूपोपमर्देऽपि नोप-जीव्यविरोध इति ।

असद्विलक्षणं रूपमुपजीव्यं न तात्त्विकम् ।
तच्चानिर्वचनीयार्थेष्वविरुद्धमितीतरे ॥ १५ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि पदका असद्विलक्षणस्वरूप ही शाब्दप्रमाके प्रति उपजीव्य है, तात्त्विक स्वरूप उपजीव्य नहीं है, असद्विलक्षणस्वरूप को अनिर्वचनीय प्रपञ्चमें माननेसे भी विरोध नहीं है, अतः उक्त दोषकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है ॥ १५ ॥


इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं—‘वृषमानय’ (बैलको लाओ) यह शब्द किसीसे कोई कहता है परन्तु कानके दोषसे वह ‘वृषभमानय’ ऐसा सुनता है फिर भी उसको ‘बैल लाओ’ इस प्रकार यथार्थ शाब्द ज्ञान होता है, इससे शाब्दज्ञानमें भ्रमप्रमासाधारण वर्ण, पद आदिका प्रत्यक्षमात्र उपजीव्य है, उसका प्रमात्मक प्रत्यक्ष उपजीव्य—कारण नहीं है, इसलिए आगम उसके स्वरूपांशका उपमर्द भले करे, तो भी उपजीव्यके साथ विरोध नहीं होगा । [ तात्पर्यार्थ यह है कि प्रपञ्चके सत्यत्व पक्षमें भी ‘वृषमानय’ इस दृष्टान्तके अनुरोधसे भ्रमप्रमासाधारण शब्दप्रत्यक्ष, अर्थात् शब्दका प्रत्यक्ष भ्रमात्मक हो चाहे प्रमात्मक हो, शाब्दबोधका उपजीव्य है, ऐसा कहना होगा, हमारे (वेदान्तियोंके) मतमें निषेधश्रुतिके बलसे भ्रमरूप प्रत्यक्ष ही सर्वत्र शाब्दबोधमें और अन्य व्यवहारोंमें कारण है, यह विशेष है, अतः शाब्दबोधके प्रति उपजीव्यविरोध नहीं है, क्योंकि शब्दस्वरूप उपजीव्य नहीं है ] ।

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३१०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

अन्ये त्वाहुः—शाब्दप्रमितौ वर्णपदादिस्वरूपसिद्ध्यनपेक्षायामप्ययोग्यशब्दात् प्रमित्यनुदयाद्योग्यतास्वरूपसिद्ध्यपेक्षाऽस्ति । तदपेक्षायामपि नोपजीव्यविरोधः । 'नेह नानास्ति' इति श्रुत्या निषेधेऽपि यावद्ब्रह्मज्ञानमनुवर्तमानस्याऽर्थक्रियासंवादिनोऽसद्विलक्षणप्रपञ्चस्वरूपस्याऽङ्गीकारात् । अन्यथा प्रत्यक्षादीनां व्यावहारिकप्रमाणानां निर्विषयत्वप्रसङ्गात् ।

न च स्वरूपेण निषेधेऽपि कथं प्रपञ्चस्वरूपस्यात्मलाभः । निषेधस्य प्रतियोग्यप्रतिक्षेपरूपत्वे व्याघातादिति वाच्यम् , शुक्तौ 'इदं रजतम्' 'नेदं रजतम्' इति प्रतीतिद्वयानुरोधेनाधिष्ठानगताध्यस्ताभावस्य बाध-


कुछ लोग* उक्त उपजीव्यविरोधका अन्य प्रकारसे समाधान करते हैं—यद्यपि शाब्दबोधमें वर्ण, पद आदिके स्वरूपकी सिद्धि अपेक्षित नहीं है, तथापि अयोग्य शब्दसे शाब्दज्ञानकी उत्पत्ति न होनेके कारण योग्यता-स्वरूपकी सिद्धि अपेक्षित है । उस योग्यताकी अपेक्षा होनेपर भी उपजीव्यके साथ विरोध नहीं है, क्योंकि 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि श्रुतिसे ब्रह्मातिरिक्त समस्त प्रपञ्चका निषेध होनेपर भी ब्रह्मज्ञानपर्यन्त अनुवर्तमान तथा अर्थक्रियामें समर्थ असत् पदार्थोंसे विलक्षण प्रपञ्चके स्वरूपका अङ्गीकार किया जाता है । यदि असत् ( शशशृङ्ग ) पदार्थसे विलक्षण प्रपञ्चस्वरूप न माना जाय, तो जितने व्यावहारिक प्रमाण हैं, वे सब निर्विषयक हो जायेंगे ।

शङ्का होती है कि स्वरूपतः प्रपञ्चके निषिद्ध होनेपर प्रपञ्चस्वरूपके अस्तित्वका लाभ कैसे होगा ? क्योंकि यदि निषेधको प्रतियोगीका अभावरूप न माना जाय, तो व्याघात होगा । परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि शुक्तिमें 'इदं रजतम्' 'नेदं रजतम्' ( यह रजत है और यह रजत नहीं है ) इस प्रकार दो प्रतीतियोंके अनुरोधसे अधिष्ठानमें अध्यस्तका अभाव—बाधपर्यन्त अनुवृत्त होने-


* इस मतका अवलम्बन करनेवालोंका कहना है कि पूर्व मतमें केवल शब्दका प्रत्यक्षज्ञान शाब्दबोधमें प्रयोजक है, वह चाहे प्रमात्मक हो चाहे भ्रमात्मक हो, परन्तु वर्ण, पद आदिका स्वरूप कारण नहीं है, लेकिन यह उनका कहना युक्त नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष निर्विषयक नहीं होता है; अतः वर्णादिस्वरूपका अवश्य शाब्दबोधके कारणरूपसे अङ्गीकार करना चाहिए । इस परिस्थितिमें पूर्वमतमें भी उपजीव्य विरोध अवश्य है, अतः पूर्वोक्त समाधान युक्त नहीं है, अतः मतान्तर कहते हैं, यह भाव है ।

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उपजीव्य प्रत्यक्षसे श्रुतिका अबाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित ३११

पर्यन्तानुवृत्तिकासद्विलक्षणप्रतियोगिस्वरूपसहिष्णुत्वाभ्युपगमात् ।
एतेन प्रपञ्चस्य स्वरूपेण निषेधे शशशृङ्गवदसत्त्वमेव स्यादिति निरस्तम्, ब्रह्मज्ञाननिवर्त्यस्वरूपाङ्गीकारेण वैषम्यात् ।
न चाऽस्याध्यस्तस्याऽधिष्ठाने स्वरूपेण निषेधे अन्यत्र तस्य स्वरूपेण निषेधः स्वतः सिद्ध इति तस्य सर्वदेशकालसम्बन्धिनिषेधप्रतियोगित्वापश्या असत्त्वं दुर्वारम् । ‘सर्वदेशकालसम्बन्धिनिषेधप्रतियोगित्वमसत्त्वम्’


वाले असद्विलक्षण प्रतियोगीस्वरूपका—सहिष्णु है, ऐसा माना जाता है* ।

इससे अर्थात् वक्ष्यमाणब्रह्मज्ञाननिवर्त्यरूप प्रपञ्चस्वरूपका अङ्गीकार करनेसे यह भी निरस्त हुआ समझना चाहिए कि ‘नेह नानास्ति’ इत्यादि श्रुतिसे प्रपञ्चका स्वरूपतः निषेध करनेपर शशशृङ्गके समान प्रपञ्च असत् ही होगा, क्योंकि ब्रह्मज्ञानसे निवृत्त होनेवाले स्वरूपसे युक्त उस प्रपञ्चका स्वीकार किया गया है । अतः शशशृङ्गसे वैषम्य है ।

यदि शङ्का हो कि अध्यस्तका अधिष्ठानमें स्वरूपतः निषेध किया जाय, तो अन्यत्र अर्थात् अधिष्ठानसे अतिरिक्त देश, कालमें अध्यस्तका निषेध स्वतः सिद्ध है ही; इसलिए वह असत् हो जायगा, क्योंकि सब देश और कालके साथ सम्बन्ध रखनेवाले अभावका वह प्रतियोगी है । असत्त्वका निर्वचन भी यही है


† शङ्कासमाधानका तात्पर्य यह है कि अधिष्ठानभूत ब्रह्ममें प्रपञ्चस्वरूप और प्रपञ्चका निषेध दोनों एक कालमें नहीं मान सकते हैं, यदि निषेध श्रुतिके अनुसार प्रपञ्च-निषेध ब्रह्ममें माना जाय, तो प्रपञ्चकी अवस्थिति नहीं होगी, क्योंकि अभाव प्रतियोगीकी स्थितिका विरोधी होता है, यदि कथञ्चित् जबर्दस्ती मान लिया जाय कि प्रतियोगी और अभाव एकत्र रहते हैं, तो निषेधत्वका व्याघात होगा, क्योंकि निषेधत्व (अभावत्व) प्रतियोग्यवस्थितिविरोधित्वरूप है; अतः स्वरूपतः प्रपञ्चका निषेध करनेपर प्रपञ्चस्वरूप सिद्ध नहीं हो सकता है, अतः प्रपञ्चको सत्य मानना चाहिए, यह पूर्वपक्षका तात्पर्य है, इसपर सिद्धान्त कहते हैं कि कल्पितपदार्थप्रतियोगिक अभाव अधिष्ठानसे अन्यत्र प्रतियोगीके साथ भले ही विरोधी हो, परन्तु अधिष्ठानमें कुछ काल तक अविरोधी रहता है अर्थात् अधिष्ठानमें रहनेवाला कल्पितप्रतियोगिक अभाव प्रतियोगीकी अवस्थितिको सहन करता है, ऐसी कल्पनामें द्वैतग्राही प्रत्यक्ष और निषेधश्रुति प्रमाणरूपसे हमको मिल रहे हैं, जैसे न्यायमें घटत्वाद्यभावको प्रतियोगीके साथ घटाद्यधिकरणमें विरोधी मानते हैं, तथापि संयोगादिके अभावको प्रतियोगीके साथ विरोधी नहीं मानते हैं अर्थात् संयोगाधिकरणमें भी संयोगाभाव माना जाता है, वैसे ही हम लोग भी मान, तो क्यों हानि है अर्थात् कुछ हानि नहीं है ।

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