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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 329 of 590

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Page 329

प्रत्यक्षसे 'श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २९९

[ टिप्पणी ]

प्रकार ज्योतिरूप स्तोम जिसमें हों उसे ज्योतिष्टोम कहना चाहिए, यह अर्थ लब्ध होता है। त्रिवृत्, पञ्चदश, सप्तदश एकविंश इस प्रकार चार स्तोम होते हैं इसमें 'त्रिवृत्पञ्चदशः सप्तदश एकविंश एतानि वाव ज्योतींषि य एतस्य स्तोमाः' ( तै० ब्रा० १।५।११ ) यह वाक्य प्रमाण है । इस ज्योतिष्टोम यागमें हविर्धानसे वहिष्पवमान देशके प्रति जाते हुए ऋत्विजोंका अन्वारम्भ सुना जाता है अर्थात् अध्वर्यु प्रस्तोताके कच्छको पकड़े और उद्गाता प्रस्तोताके कच्छको, प्रतिहर्ता उद्गाताके कच्छको, ब्रह्मा प्रतिहर्ताके कच्छको, यजमान ब्रह्माके कच्छको और प्रशास्ता यजमानके कच्छको पकड़े । इस प्रकार एक दूसरेका कच्छ पकड़ कर जाते हुए ऋत्विजोंमेंसे एकका विच्छेद होनेपर प्रायश्चित्त करना पड़ता है—वह इस प्रकार है—प्रस्तोता अपच्छेद करे तो प्रम्राधो वर दे । यदि प्रतिहर्ता अपच्छेद करे तो सर्वस्व दे । यदि उद्गाता अपच्छेद करे, तो उस यज्ञको दक्षिणा बिना समाप्त कर पुनः याग करे। उसमें वही दक्षिणा दे जो पूर्वमें दी जानेवाली थी ।

इस प्रायश्चित्तोंके विषयमें एक यह भी विचार प्रस्तुत होता है कि यदि एक कालमें उद्गाता और प्रतिहर्ताका अपच्छेद हो जाय तो क्या प्रायश्चित्त करना चाहिए या नहीं ? इस सन्देहमें पूर्वपक्षी यह कहता है कि ऐसी स्थितिमें प्रायश्चित्त नहीं करना चाहिए, क्योंकि एककालमें प्रतिहर्ता और उद्गाताका जहाँपर विच्छेद हुआ हो, वहाँपर सापेक्ष होनेसे यह निश्चित नहीं होता है कि विच्छेदका कौन प्रायश्चित्त किया जाय । इसलिए युगपत् अपच्छेदकालमें प्रायश्चित्त करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, इस पूर्वपक्षके परिहारमें सिद्धान्तीका कहना है—युगपत् अपच्छेदमें भी प्रायश्चित्त होता ही है, क्योंकि विभजन ( अपच्छेद ) क्रियाके प्रति जो कर्ता है वह सापेक्ष नहीं है, किन्तु निरपेक्ष ही है, अतः विच्छेदक्रियाके प्रति एक एकमें भी कर्तृता है, विशेष इतना ही है कि युगपत् अपच्छेदमें काल एक है। तात्पर्यार्थ यह है कि अपच्छेदशब्दका अर्थ है—विभाग । और यद्यपि विभाग उभयमें समवायसम्बन्धसे रहता है, तथापि जिसकी क्रियासे उत्पन्न होगा तत्कर्तृक ही कहा जाता है। प्रकृतमें यद्यपि दोनों पुरुषोंकी ( प्रतिहर्ता और उद्गाताकी ) क्रियासे विभागकी उत्पत्ति हुई है, अतः प्रत्येकमें निरपेक्ष कर्तृता न होनेके कारण इस अपच्छेदमें एककर्तृकत्वका व्यवहार नहीं होगा यह शङ्का हो सकती है; तथापि अन्य स्थलमें अर्थात् एककी क्रियासे जन्य विभागमें एक पुरुषकी ही कर्तृता भासती है, इससे दैवात् एक कालमें दोनों कर्ताओंका समावेश होनेपर भी प्रत्येकमें ही कर्तृत्व निरपेक्ष है, अतः अवश्य प्रायश्चित्त करना होगा ।

अथ यहां युगपत् विच्छेदमें शङ्का होती है कि क्या दोनों ही प्रायश्चित्त करने चाहिएँ या विकल्पसे एक; इस संशयमें पूर्वपक्ष होता है कि दोनों प्रायश्चित्त करने चाहिएँ, क्योंकि युगपत् अपच्छेदमें समुच्चय करना ही न्याय्य है, कारण कि प्रयोग एक है। अथवा अदक्षि-णत्व और सर्वस्वदक्षिणात्वका विरोध है, तो प्रयोगभेदसे व्यवस्था अर्थात् विकल्प करना चाहिए—अपच्छेदयुक्त प्रथम प्रयोगमें दक्षिणा न देनी चाहिए और उत्तर प्रयोगमें सर्वस्व-दक्षिणा देनी चाहिए, इसपर सिद्धान्त यह होता है कि उत्तर प्रयोगमें अपच्छेद नहीं है, इसलिए निमित्तके बिना नैमित्तिक प्रायश्चित्त हो नहीं सकता, इससे पूर्वके प्रयोगमें दोनों निमित्तोंके होनेसे प्रायश्चित्त होते, परन्तु वे अन्योऽन्य विरुद्ध हैं, अतः विकल्प मानना उचित है, इसलिए