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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 333 of 590

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Page 333

प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित ३०३


ष्ठाने क्रतुवैकल्यप्रयोजकत्वस्य नियमविशेषरूपत्वेन कर्माङ्गत्वस्य फलोप-
कारितया सन्निपातितया वा कारणत्वविशेषरूपत्वेन च तयोः कादाचित्क-
त्वायो pick
स्वाभाविकत्वनिर्वाहाय पश्चाद्भाविविरुद्धापच्छेदाभाववतः क्रतोः
पूर्वापच्छेदनैमित्तिकमङ्गम्। तत्रैव तदननुष्ठानं क्रतुवैकल्यप्रयोजकमिति
विशेषणीयतया पाश्चात्त्यापच्छेदान्तरवति क्रतौ पूर्वापच्छेदनैमित्तिके क्रत्व-


हैं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अनुष्ठानके न करनेमें—अनुष्ठानके अभावमें—
जो ऋतुके वैकल्यके प्रति प्रयोजकत्व (हेतुत्व) है, वह नियमविशेषरूप है
अर्थात् क्रतुवैकल्यव्याप्यत्वरूप * है, और कर्मके प्रति जो अङ्गत्व है, वह
फलोपकारितारूपसे अथवा † सन्निपातितारूपसे कारणत्वविशेषरूप है, इसलिए
उनमें अर्थात् क्रतुवैकल्यप्रयोजकत्व और कर्माङ्गत्वमें कादाचित्कत्वके न
होनेसे स्वाभाविकत्वके निर्वाह करनेके लिए उत्तरकालमें होनेवाले विरुद्ध अप-
च्छेदके अभावसे युक्त क्रतुका पूर्वकालीन निमित्तसे जायमान प्रायश्चित्त अङ्ग
है, और उसीमें उसका अननुष्ठान क्रतुकी विकलतामें कारण है, इस प्रकार
विशेषण देना ‡ होगा, इससे पश्चाद्भावी अपच्छेदसे युक्त क्रतुमें पूर्वकालीन


ङ्गतुवैकल्यकी प्रयोजकताके पाश्चात्य अपच्छेदोत्पत्तिके पूर्वमें न होनेसे भ्रान्ति ही होगी, अतः
क्रतुवैकल्यप्रयोजकाननुष्ठानप्रतियोग्यनुष्ठानशालित्व अथवा पश्चाद्भाविविरुद्धापच्छेदाभाववत्क्रतु-
वैकल्यप्रयोजकाननुष्ठानप्रतियोग्यनुष्ठानशालित्वरूप कर्तव्यत्व अथवा तादृश अङ्गत्व (पश्चाद्भा-
व्यपच्छेदाभाववत्क्रतुं प्रति फलोपकारित्वेन सन्निपत्योपकारित्वेन कारणत्वरूप अङ्गत्व) को भी
कर्तव्यत्व नहीं मान सकते हैं, यह भाव है।

* क्रतुवैकल्यव्याप्यत्वका अर्थ है—जहाँ-जहाँ अनुष्ठानका अभाव हो वहाँ-वहाँ क्रतुमें
वैकल्य होना चाहिए, व्याप्यके अस्तित्वमें व्यापकका अस्तित्व अवश्य रहता है, जैसे धूमके
रहनेपर वह्निकी सत्ता पर्वतमें अवश्य रहती है, इसलिए प्रायश्चित्तके अननुष्ठानमें क्रतुवैकल्य-
व्याप्यता अवश्य रहेगी।

† अपच्छेदसंयुक्त प्रायश्चित्तमें क्रतुकी अङ्गता मानी जाय, तो वह दो प्रकारसे घटेगी
अर्थात् साक्षात् या परम्परया। क्रतुके स्वरूपमें जो कारण होगा वह फलोपकारी अङ्ग होगा
और क्रतुजन्य परमापूर्वका अदृष्टद्वारा सम्पादक जो कारण होगा वह सन्निपाती अङ्ग होगा,
इसलिए मूलमें 'फलोपकारितया' और 'सन्निपातितवा' इत्यादि कहा गया है, यह भाव है।

‡ व्याप्यत्व और अङ्गत्वका कादाचित्कत्व प्रसङ्ग किस प्रकार है, उसका निरूपण पूर्वमें
किया जा चुका है। इसके परिहारके लिए क्रतुवैकल्य प्रयोजकका और क्रत्वङ्गका क्रमशः
उत्तरकालिक विरुद्ध अपच्छेदसे रहित क्रतुका ही पूर्व प्रायश्चित्त अङ्ग है, ऐसा अर्थ करना होगा,
इससे उक्त व्याप्यत्व और अङ्गत्वका स्वाभाविकत्व सिद्ध होगा, अन्यथा नहीं होता है, यह भाव है।


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