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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 337 of 590

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Page 337

प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित ३०७

स्वार्थबोधकत्वमुपेयते, किन्तुभयोर्विषयान्तराभावाद् अगत्या तत्रैव विकल्पानुष्ठानमिष्यते ।

एवं चाऽद्वैतागमस्य प्रत्यक्षेणैकवाक्यत्वशङ्काऽभावात् पूर्ववृत्तमपि तद्विगणय्य स्वार्थबोधकत्वमप्रतिहतम् ।

तदर्थबोधजनने च—

'पूर्वं परमजातत्वादबाधित्वाैव जायते ।
परस्यानन्यथोत्पादान्नाबाधेन सम्भवः ॥'

इत्यपच्छेदन्यायस्यैव प्रवृत्तिः, नोपक्रमन्यायस्य ।
अत एव लोकेऽपि प्रथमवृत्तं शुक्तिरूप्यप्रत्यक्षमाप्तोपदेशेन बाध्यते इति ॥२॥


इस वाक्यकी 'नातिरात्रे षोडशिनं ‡ गृह्णाति' यह वाक्य भी अपेक्षा न करके ही स्वार्थबोधक है, ऐसा स्वीकार किया गया है, परन्तु विशेष इतना है कि षोडशीके ग्रहण और अग्रहणका अन्य विषय नहीं है, अतः अगत्या अर्थात् समुच्चयका भी असम्भव होनेसे अतिरात्रमें ही विकल्पसे अनुष्ठान माना जाता है ।

एवञ्च अर्थात् उपक्रमन्यायके प्रतीतैकवाक्यविषयक होनेसे अद्वैतबोधक शास्त्रकी प्रत्यक्षके साथ एकवाक्यताकी शङ्का भी नहीं हो सकती है, इसीलिए प्रत्यक्ष यद्यपि पूर्ववृत्त है, तथापि उसका ख्याल न करके आगम अपने अर्थका बोधन करता ही है ।

आगम अपने अर्थका बोध करता है, इसलिए—

'पूर्वं परमजातत्वात् ०' ( पूर्व अर्थात् प्रथम अपच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्त कर्त्तव्यताज्ञान परका अर्थात् दूसरे कालमें होनेवाले नैमित्तिककर्त्तव्यज्ञानकी उत्पत्ति न होनेसे उसका बाध न करके ही प्रवृत्त होता है और परशास्त्रकी पूर्वके बाधके विना उत्पत्ति नहीं हो सकती है, अतः वह पूर्वका बाध करके ही उत्पन्न होता है ) ।

इसीसे व्यवहारमें भी प्रथमकालमें प्रवृत्त शुक्ति-रजतका प्रत्यक्ष उत्तरकालमें प्रवृत्त आप्तोपदेशसे बाधित होता है ॥२॥


‡ षोडशिनामक स्तोत्रके बाद जहाँ अतिरात्र सामोंका गान किया जाता है, उस ज्योतिष्टोमका नाम अतिरात्र है ।

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