सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextप्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार ] भाषानुवादसहित २९५
प्रत्ययवेद्यब्रह्मसत्तायां सावकाशं प्रत्यक्षमिति वक्तुं शक्यत्वाच्च ।
यच्चैकस्मिन्नपि प्रयोगे क्रमिकाभ्यां निमित्ताभ्यां क्रतौ तत्तन्नैमित्तिककर्तव्यतयोर्बदरफले श्यामरक्तरूपयोरिव क्रमेणोत्पादाद् रूपज्ञानद्वयवत् कर्तव्यताज्ञानद्वयमपि प्रमाणमेवेति न परेण पूर्वज्ञानबाधे अपच्छेदन्याय उदाहरणम् ।
अत एवापच्छेदाधिकरणे ( पू० मी० अ० ६ पा० ५ अधि० १९ )
प्रकृतमें अन्य विषयकी अन्वेषणा नहीं करनी पड़ती है। और इस स्थलमें भी * सम्पूर्ण प्रतीतिमें वेद्य ब्रह्मसत्तारूप विषयको लेकर प्रत्यक्ष सावकाश है।
कोई लोग कहते हैं कि जैसे एक बदर (बेर) के फलमें क्रमशः पहले हरारूप उत्पन्न होता है, अनन्तर पाकवशात् पूर्वरूपके नाशके बाद पीला या रक्तरूप उत्पन्न होता है, और दोनों रूप कालभेदसे प्रामाणिक हैं, वैसे ही एक ही क्रतु (याग) के प्रयोगमें क्रमशः उत्पन्न हुए निमित्तोंसे (अर्थात् उद्गाताका अपच्छेद और प्रतिहर्ताका अपच्छेदरूप निमित्तोंसे) तत् तत् प्रायश्चित्त कर्तव्यताओंमें दो ज्ञान भी प्रमाण ही हैं, अतः परज्ञानसे पूर्वज्ञानके बाधमें अपच्छेदन्याय उदाहरण नहीं हो सकता है।
इसीसे अपच्छेदाधिकरणमें 'नैमित्तिकशास्त्रका (किसी निमित्तको लेकर
* ब्रह्ममें पारमार्थिक सत्ता है, घट आदिमें व्यावहारिक सत्ता है और शुक्तिरजतमें प्रातिभासिक सत्ता है, इस प्रकारकी तीन सत्ताओंके स्वीकारपक्षमें घटादिसत्ताके प्रत्यक्षके लिए कोई विषयान्तरकी अन्वेषणा करनी नहीं पड़ती है, क्योंकि घट आदिमें विद्यमान व्यावहारिक सत्ता ही उस प्रत्यक्षकी विषय हो सकती है, और 'एक ही सर्वत्र सत्ता है' इस पक्षमें व्यावहारिक और प्रातिभासिक सत्ताके न रहनेसे घटादिसत्त्वप्रत्यक्षका अन्य विषय खोजना होगा। जैसे कि उत्तर कालमें उत्पन्न विरुद्ध अपच्छेदसे बाधित पूर्वापच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्त अपने विषयकी अन्वेषणा करता है। परन्तु एकसत्तावादियोंके मतसे भी कोई विरोध नहीं है, कारण कि घटादिद्वैतप्रत्यक्ष घटादिमें सत्ताके न रहनेपर भी निरवकाश नहीं है, क्योंकि अधिष्ठान सत्ताको लेकर उस प्रत्यक्षकी सावकाशता हो सकती है। इसलिए कहते हैं 'इहापि' अर्थात् 'एकसत्तापक्षमें भी संसारमें जितने प्रत्यय मनमें स्फुरित होते हैं, उन सबमें सत् वस्तु स्फूर्ति है, अतः सभी जगत्की सत्ता सर्वप्रत्ययवेद्य है और वह सभीके अधिष्ठानभूत ब्रह्मकी ही सत्ता है, उससे अतिरिक्त नहीं है, क्योंकि अतिरिक्त सत्ता माननेमें गौरव है, यह भाव है।