Skip to content
SarvaKosh
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished590 pages

Page 322 of 590

Read in context
Page 322

२९२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद


अथवा 'कृष्णलं श्रपयेत्' 'सोमेन यजेत' इत्यादौ न प्रत्यक्षा-
नुरोधेन लक्षणाश्रयणम्, किन्तु अनुष्ठानाशक्त्या । नहि कृष्णले उष्णी-
करणमात्रमिव मुख्यः पाकोऽनुष्ठातुं शक्यते । न वा सोमद्रव्यकरणको
याग इव तदभिन्नो यागः केनचिदनुष्ठातुं शक्यते । न चाऽनुष्ठेयत्वाभिम-
तस्य प्रत्यक्षविरोध एवाऽनुष्ठानाशक्तिरिति शब्दान्तरेण व्यवह्रियते इति
वाच्यम् । 'शशिमण्डलं कान्तिमत् कुर्याद्' इति विधौ अनुष्ठेयत्वाभि-
मतस्य शशिमण्डले कान्तिमत्त्वस्य प्रत्यक्षाविरोधेऽप्यनुष्ठानाशक्तिदर्शनेन
तस्यास्ततो भिन्नत्वात् । तथा च तत्र तत एव लक्षणाऽऽश्रयणम् ।


* अथवा 'कृष्णलं श्रपयेत्' और 'सोमेन यजेत' इत्यादि स्थलमें प्रत्यक्षके अनुरोधसे लक्षणाका आश्रयण नहीं करते हैं, किन्तु [ मुख्यार्थक माननेसे ] अनुष्ठान ही नहीं हो सकता है, अतः लक्षणाका आश्रयण करते हैं, कारण कि कृष्णलमें ( सुवर्णमाषोंमें ) उष्णीकरणके सिवा मुख्य पाक नहीं कर सकते हैं, [ इसी प्रकार 'सोमेन' इत्यादिमें भी सोम और यागका अभेद नहीं हो सकता है ] तथा सोमद्रव्य है उपकरण जिसमें, ऐसे यागके समान सोमद्रव्यसे अभिन्न यागका कोई पुरुष अनुष्ठान नहीं कर सकता है। यदि शङ्का हो कि अनुष्ठेयत्वेन जो अभिमत है, उसके साथ प्रत्यक्ष-विरोध ही शब्दान्तरसे 'अनुष्ठानकी अशक्ति' कहलाता है ? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'शशिमण्डलं कान्तिमत् कुर्यात्' ( चन्द्रमण्डलको कान्तियुक्त बनावे ) इस विधिमें अनुष्ठेयत्वरूपसे अभिमत जो चन्द्रमण्डलमें कान्तिमत्व ( कान्ति ) है, उसमें प्रत्यक्षविरोध न होनेपर भी अनुष्ठानकी अशक्ति दिखती है, अतः यह स्वीकार करना होगा कि प्रत्यक्ष-विरोध और


विरोधस्थलमें श्रुतिसे प्रत्यक्षके बाधित होने पर भी उसमें निरवकाशत्व नहीं है, क्योंकि कल्पितद्वैत और तद्गतसत्ता आदिसे उपपत्ति हो सकती है, यह तात्पर्य है ।

* पूर्वके ग्रन्थसे प्रत्यक्षसे श्रुतिके बाधमें अनेक उदाहरण दिखलाये गये, परन्तु श्रुतिसे प्रत्यक्षका बाध होता है, इसमें अधिक दृष्टान्त नहीं बतलाये गये, अर्थात् एक ही बतलाया है । इस अवस्थामें 'श्रुतिकी अपेक्षा प्रत्यक्ष बलवान् है' इसी उत्सर्गकी सिद्धि हो सकती है, प्रत्यक्षस श्रुति बलवती है, इसकी सिद्धि नहीं हो सकती है—इस अस्वरससे 'अथवा' इस पक्षको कहते हैं, यह भाव है ।

[email protected]