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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 327 of 590

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Page 327

प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २९७


इति उक्तलक्षणप्राप्तबाधविवेचने, ‘तत्रैवं सति शास्त्रार्थो भवति, पश्चाद्भाव्युद्गात्रपच्छेदविधुरप्रतिहर्त्रपच्छेदवतः क्रतोस्सर्ववेदसदानमङ्गम्, एवमुद्गात्रपच्छेदेऽपि द्रष्टव्यम्’ इति ।

यत्तु शास्त्रदीपिकावचनमुदाहृतम्, तदपि—‘तेनोत्पन्नमपि पूर्वप्रायश्चित्तज्ञानं मिथ्या भवति, बाधितत्वाद्, उत्तरस्य तु न किञ्चिद्बाधकमस्ति’ इति पूर्वकर्तव्यताबाध्यत्वप्रतिपादकग्रन्थोपसंहारपठितत्वाद् निमित्तोपजननात् प्राङ्निमित्तोपजननं विनानिमित्तोपजननाभावे सति अन्यथा कर्तव्यो-


विशेषविषयक शास्त्रसे संकोच होता है अर्थात् पदहोमातिरिक्त स्थलमें आहवनीय होम करे, इस प्रकार जो संकोच होता है; उसे प्राप्तबाध कहते हैं। तात्पर्यार्थ यह हुआ कि इस स्थानमें जैसे सामान्यशास्त्रका विशेष शास्त्र बाधक है, वैसे ही सामान्यशास्त्रोंमें भी किसी विषयमें विरोध होनेपर पूर्वकालमें प्राप्त नैमित्तिकशास्त्रका उत्तरकालमें प्राप्त नैमित्तिकशास्त्रसे बाध होता है, जैसे कि विरुद्ध अपच्छेदनिमित्तकशास्त्रोंमें । इससे श्लोकस्थ विशेष विषयादिमें पठित आदि शब्दसे ‘परशास्त्र’ आदिका संग्रह होता है यह बात श्लोकमें उक्तलक्षण प्राप्तबाधके विवेचनके अवसरमें कही गई है । अपच्छेद स्थलमें उत्तरज्ञानसे पूर्वज्ञानका बाध होनेपर उक्त नैमित्तिक शास्त्रका यह अभिप्राय होता है कि उत्तरकालमें होनेवाले उद्गाताके अपच्छेदसे रहित प्रतिहर्ताके विच्छेदसे युक्त क्रतुका सर्वस्वदान अङ्ग है और पश्चात्कालमें होनेवाले प्रतिहर्ताके अपच्छेदसे रहित उद्गाताके विच्छेदसे युक्त क्रतुकी दक्षिणाके विना समाप्ति करना अङ्ग है—यह ध्यान रखना चाहिए ।

जो कि पूर्वमें शास्त्रदीपिकाकार (पार्थसारथिमिश्र) का ‘नैमित्तिकशास्त्रस्य’ इत्यादि वाक्य उदाहरणरूपसे दिया गया है, वह भी -पूर्वकालमें प्रवृत्त नैमित्तिकशास्त्रसे उत्पन्न होनेपर भी प्राक्तनप्रायश्चित्तज्ञान उत्तर नैमित्तिक शास्त्रसे बाधित होनेसे मिथ्या ही होता है, और उत्तरकालमें उत्पन्न हुए प्रायश्चित्त ज्ञानका कोई बाधक नहीं है, इस प्रकार पूर्वकर्तव्यतामें बाध्यत्वका प्रतिपादन करनेवाले ग्रन्थके उपसंहारमें पढ़ा गया है, अतः निमित्तकी उत्पत्तिके बिना अर्थात् निमित्तके उत्पन्न न होनेपर अन्यरूपसे भी कर्तव्य हैं इस प्रकार—

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