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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 339 of 590

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Page 339

उपजीव्य प्रत्यक्षसे श्रुतिका अवाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित ३०९


अत्र केचित् प्रचक्षते ॥ १३ ॥
न पदज्ञानमानत्वनियता शाब्दमानता ।
वृषभादिपदे भ्रान्त्या न्यूनाधिक्येऽपि दर्शनात् ॥ १४ ॥

इस शङ्काके परिहारमें कुछ लोग कहते हैं कि प्रमात्मक शाब्दबोध प्रमात्मक पदज्ञानसे नियत नहीं है, क्योंकि वृषभ आदि पदोंमें भ्रमात्मक ज्ञानसे भी शाब्दबोध देखा जाता है, अतः उक्त दोष नहीं है ॥ १३ ॥ १४ ॥

अत्र केचिदाहुः—‘वृषमानय’ इत्यादिवाक्यं श्रवणदोषाद् ‘वृषभ-मानय’ इत्यादिरूपेण शृण्वतोऽपि शाब्दप्रमितिदर्शनेन शाब्दप्रमितौ वर्ण-पदादिप्रत्यक्षं प्रमाभ्रमसाधारणमेवापेक्षितमित्यद्वैतागमेन वर्णपदादिप्रत्यक्ष-मात्रमुपजीव्यम्, न तत्प्रमा । तथा च वर्णपदादिस्वरूपोपमर्देऽपि नोप-जीव्यविरोध इति ।

असद्विलक्षणं रूपमुपजीव्यं न तात्त्विकम् ।
तच्चानिर्वचनीयार्थेष्वविरुद्धमितीतरे ॥ १५ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि पदका असद्विलक्षणस्वरूप ही शाब्दप्रमाके प्रति उपजीव्य है, तात्त्विक स्वरूप उपजीव्य नहीं है, असद्विलक्षणस्वरूप को अनिर्वचनीय प्रपञ्चमें माननेसे भी विरोध नहीं है, अतः उक्त दोषकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है ॥ १५ ॥


इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं—‘वृषमानय’ (बैलको लाओ) यह शब्द किसीसे कोई कहता है परन्तु कानके दोषसे वह ‘वृषभमानय’ ऐसा सुनता है फिर भी उसको ‘बैल लाओ’ इस प्रकार यथार्थ शाब्द ज्ञान होता है, इससे शाब्दज्ञानमें भ्रमप्रमासाधारण वर्ण, पद आदिका प्रत्यक्षमात्र उपजीव्य है, उसका प्रमात्मक प्रत्यक्ष उपजीव्य—कारण नहीं है, इसलिए आगम उसके स्वरूपांशका उपमर्द भले करे, तो भी उपजीव्यके साथ विरोध नहीं होगा । [ तात्पर्यार्थ यह है कि प्रपञ्चके सत्यत्व पक्षमें भी ‘वृषमानय’ इस दृष्टान्तके अनुरोधसे भ्रमप्रमासाधारण शब्दप्रत्यक्ष, अर्थात् शब्दका प्रत्यक्ष भ्रमात्मक हो चाहे प्रमात्मक हो, शाब्दबोधका उपजीव्य है, ऐसा कहना होगा, हमारे (वेदान्तियोंके) मतमें निषेधश्रुतिके बलसे भ्रमरूप प्रत्यक्ष ही सर्वत्र शाब्दबोधमें और अन्य व्यवहारोंमें कारण है, यह विशेष है, अतः शाब्दबोधके प्रति उपजीव्यविरोध नहीं है, क्योंकि शब्दस्वरूप उपजीव्य नहीं है ] ।

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