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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 330 of 590

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Page 330
३००सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

[ टिप्पणी ]
युगपदपच्छेदमें प्रायश्चित्तका विकल्प है अर्थात् सर्वस्वदान करे या प्रथम प्रयोगको समाप्त करके पुनः याग करे।

क्रमिक प्रायश्चित्त स्थलमें भी विचार किया गया है कि जहाँ पहले उद्गाताका विच्छेद हुआ अनन्तर प्रतिहर्त्ताका, वहाँपर क्या पूर्व प्रायश्चित्त करना चाहिए या उत्तरनिमित्तकप्रायश्चित्त करना चाहिए ? ऐसा संशय होनेपर पूर्वपक्षी कहता है कि पूर्व ही करना चाहिए, क्योंकि वह असञ्जात-विरोधी है अर्थात् श्रुति, लिङ्ग आदि स्थलमें असञ्जात विरोध होनेसे पूर्व-पूर्व ही बलवान् होते हैं और उत्तरकी प्रवृत्ति रुक जाती है, वैसे ही प्रकृतमें भी पूर्वनिमित्तकप्रायश्चित्तसे उत्तरनिमित्तकप्रायश्चित्त रुक जायगा अर्थात् वह प्रवृत्त ही न होगा, अतः पूर्व ही बलवान् है, इस प्रकार पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर सिद्धान्त किया जाता है कि श्रुति, लिङ्ग आदिके दृष्टान्तसे पूर्वनिमित्तकप्रायश्चित्तको प्रबल नहीं मान सकते हैं, क्योंकि श्रुति, लिङ्ग आदि स्थलमें उत्तर पूर्वकी अपेक्षा रखते हैं, इसलिए पूर्वके साथ विरोध होनेपर उत्तरकी उत्पत्ति ही नहीं होगी, और प्रकृतमें दोनों ज्ञान परस्पर निरपेक्ष होकर दो वाक्योंसे उत्पन्न होते हैं, उत्पद्यमान उत्तर ज्ञान पूर्वका बाध करके ही उत्पन्न होता है । यद्यपि निरपेक्षत्वांश दोनोंमें समान है, तथापि पूर्वज्ञानकी उत्पत्ति-दशामें अविद्यमान उत्तरज्ञान बाधित नहीं होता है । उत्तरकालमें स्वयं बाधित पूर्वज्ञान उत्तरका बाधक कैसे होगा ? अर्थात् नहीं होगा । और दूसरा कोई कारण भी नहीं है जिससे कि उसका बाधक हो सके । इसलिए क्रमिक प्रायश्चित्तस्थलमें उत्तरकालीन अपच्छेदनिमित्तक प्राय-श्चित्तका ही अनुष्ठान करना चाहिए । इस प्रकारके अपच्छेदाधिकरणका निम्नश्लोकोंसे विचार किया गया है—

‘उद्गातुः प्रतिहर्तुश्च सहापच्छेदेनेऽस्ति न ।
प्रायश्चित्तमुताऽस्त्यत्र, न निमित्तविघाततः ॥
एकैकस्यैव विच्छेद-कर्तृत्वान्न विहन्यते ।
कालमात्रं तु तत्रैकप्रायश्चित्तमतो भवेत् ॥
समुचयो विकल्पो वा प्रायश्चित्तद्वयेऽग्रिमः ।
अदक्षिणत्वं पूर्वस्मिन् प्रयोगेऽन्यत्तु पश्चिमे ॥
प्रयोगे पश्चिमे नास्ति निमित्तं तेन तद्वयम् ।
प्राप्तमेकप्रयोगेऽतो विरुद्धत्वाद्विकल्प्यते ॥
अपच्छेदक्रमे पूर्वः प्रबलः स्यादुतोत्तरः ।
असंजातविरोधेन पूर्वेणोत्तरबाधनम् ॥
निरपेक्षोत्तरज्ञानं जायते पूर्वबाधया ।
न बाधकान्तरं तस्य तेन प्रबलमुत्तरम् ॥’
[ अ० न्या० पृ० ३४८ श्लो० २१–२६ आनन्दाश्रम ]

इस प्रकारसे अपच्छेदन्यायके कुछ अंशका निरूपण किया गया है । इस न्यायसे भी श्रुति पर होनेसे बलवती ही है और पूर्वभावी प्रत्यक्ष निर्बल है । इसका अन्य ग्रन्थोंमें भी अर्थात् अद्वैतसिद्धि आदि ग्रन्थोंमें भी विचार करके पूर्वभावी प्रत्यक्षको निर्बल निश्चित करते हुए आगम ही बलवान् माना गया है ।

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