सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context३०४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
ङ्गत्वस्य, तदननुष्ठाने क्रतुवैकल्यप्रयोजकत्वस्य वा पाश्चात्त्यापच्छेदोत्पत्तेः पूर्वमसम्भवात् । नहि वस्तु किञ्चिद्वस्त्वन्तरं प्रति कञ्चित्कालं व्याप्यं पश्चान्नेति वा, कञ्चित्कालं कारणं पश्चान्नेति वा, क्वचिद् दृष्टम्, युक्तं वा । नापि कर्तव्यत्वं नाम धर्मान्तरमेवाऽऽगमापाययोग्यं कल्प्यम्, मानाभावात् ।
अपच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्तकी अङ्गताका और उसके अनुष्ठान न करनेपर विकलताके हेतुत्वका परकालीन अपच्छेदके पूर्वकालमें भी असम्भव ही है । क्योंकि ऐसा कहींपर नहीं देखा गया है और युक्त भी नहीं है कि * कोई वस्तु किसी वस्तुके प्रति कुछ कालतक व्याप्य होती है, और पीछे व्याप्य नहीं होती है तथा किसी भी वस्तुके प्रति कोई वस्तु अल्प समयतक कारण रहती हो और पीछे कारण नहीं रहती हो । और † आगम और विनाशके योग्य कोई धर्मान्तर भी कर्तव्यत्व नहीं हो सकता है, क्योंकि उसमें कोई प्रमाण नहीं है । विरुद्ध जो अपच्छेदशास्त्र हैं, उनकी 'पदे जुहोति' और 'आवहनीये जुहोति' इन दो शास्त्रोंके समान व्यवस्था हो सकती है, इसलिए क्रमिक दो कर्तव्यताओंके उपपादक वचन अप्रमाण हैं ।
* व्याप्यत्व और अङ्गत्व (कारणत्व) कादाचित्क नहीं होते हैं, स्वाभाविक ही होते हैं, उसमें प्रसिद्ध दृष्टान्त देते हैं कि वह्निके प्रति धूम व्याप्य है, उसमें व्याप्यता कुछ समयतक रहती है और कुछ समयतक नहीं रहती है, यह देखा नहीं गया है और किसी युक्तिसे सिद्ध भी नहीं है । यदि कदाचित् जबरदस्ती मान लिया जाय कि वह्निकी धूममें व्याप्यता कुछकाल तक ही रहती है, तो आपत्ति यह होगी कि तो 'वह्निमान् धूमात्' (धूम होनेसे पर्वत वह्निमान् है) इस स्थलको सोपाधिकता प्रसक्त होगी, क्योंकि व्याप्यत्वा-भावमें उपाधि प्रयोजक है, इसीलिए 'धूमवान् वह्नेः' इस स्थलमें वह्निहेतु सोपाधिक होता है । इसी प्रकार कारणमें कारणत्व कादाचित्क होगा, तो धूमादिकार्यके लिए वह्निरूप कारणके ग्रहणमें देवदत्त आदिकी जो प्रवृत्ति होती है, उसमें अद्य निष्कम्प प्रवृत्ति नहीं होगी, अतः व्याप्यत्व और अङ्गत्वको (कारणत्वको) कदाचित्क नहीं मान सकते हैं, यह भाव है ।
† यदि कर्तव्यत्वका यह अर्थ किया जाय कि जो धर्म आगम (उत्पत्ति) और अपाय (विनाश) योग्य हो, अर्थात् जो प्रथम निमित्तके जननके अनन्तर ही आगमयोग्य हो और द्वितीय निमित्तके उत्पन्न होनेके बाद ही विनाशके योग्य कोई अन्य धर्मसे—उक्तलक्षणलक्षित धर्मों भिन्न—कर्तव्यत्व है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसे विलक्षण धर्ममें कोई प्रमाण ही नहीं है । अतः जैसे—'आवहनीये जुहोति' इस शास्त्रकी पदहोमातिरिक्त स्थलमें विषयता है, वैसे ही क्रमिक विरुद्ध प्रायश्चित्तकी व्यवस्था भी हो सकती है, अतः क्रमिक कर्तव्यद्वयकी उत्पत्ति मानना निरालम्ब है, यह भाव है ।