Skip to content
SarvaKosh
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished590 pages

Page 332 of 590

Read in context
Page 332

३०२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद


क्रतुमें वैकल्य हो जाय, वह कर्तव्यत्व है, अथवा क्रतुके प्रति अङ्गता कर्तव्यता


अपच्छेद हुआ हो, पश्चात् प्रतिहर्ताका अपच्छेद हुआ हो, वहाँ उद्गाताके प्रायश्चित्तका अनुष्ठान क्रतुके वैकल्यका प्रयोजक है अथवा वह प्रायश्चित्त क्रतुका अङ्ग है, इस प्रकार कहनेवालेको यह कहना चाहिए कि पूर्व प्रायश्चित्तके अनुष्ठानमें वैकल्यप्रयोजकत्व क्या है, क्या वैकल्योत्पादकता है अथवा वैकल्यव्यापकता है अथवा वैकल्यव्याप्यता है ? आद्य पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि अभावरूप अनुष्ठान किसीका उत्पादक नहीं हो सकता है और क्रतुवैकल्यके क्रतुके उपकारके प्रागभावरूप होनेसे वह उत्पाद्य भी नहीं हो सकता है और द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि जिस यज्ञमें केवल उद्गाताका अपच्छेद हुआ है उस यज्ञमें तन्निमित्तके प्रायश्चित्त भी किया है और किसी अन्य कारणसे क्रतुका वैकल्य भी हुआ है, उस यागमें उद्गाताके प्रायश्चित्तका अनुष्ठान नहीं होनेसे व्यभिचार हो जायगा, अतः परिशेषत् तृतीय पक्ष ही अवशिष्ट रहता है अर्थात् क्रतुवैकल्यव्याप्यता ही क्रतुवैकल्यप्रयोजकत्व है और प्रायश्चित्तको क्रत्वङ्ग माननेपर उसमें दो प्रकारसे अङ्गता मान सकते हैं एक तो फलोपकारित्वरूप और दूसरी सन्निपत्योपकारित्वरूप । फलोपकारित्वरूप अर्थात् परमापूर्वरूप ( मुख्य अपूर्व ) के प्रति अदृष्ट द्वारा जिसकी कारणता हो, जैसे प्रयाज आदि अदृष्टद्वारा परमापूर्वमें उपकारक होते हैं । इसी प्रकार सन्निपत्योपकारकका अर्थ है यागके स्वरूपका उपकारक जैसे द्रव्य और देवता, ये दोनों यागके स्वरूपमें ही उपकारक हैं । यदि क्रतुवैकल्यप्रयोजकत्व और क्रत्वङ्गत्व क्रतुवैकल्यव्याप्यत्व और फलोपकारित्व या सन्निपत्योपकारित्वरूप क्रमशः माना जाय तो क्या हानि है ? इसपर यह प्रश्न हो सकता है कि क्रमशः उत्पन्न हुए विरुद्ध प्रायश्चित्तोंसे युक्त ऋतुमें पूर्वप्रायश्चित्तके अनुष्ठानमें रहनेवाले ऋतुवैकल्यव्याप्यत्वरूप क्रतुप्रयोजकत्व और उसी पूर्वप्रायश्चित्तमें रहनेवाला अङ्गत्व द्वितीय निमित्तकी उत्पत्तिके बाद अनुवर्तमान होता है, या नहीं ? यदि अनुवृत्ति मानी जाय, तो क्रतुवैकल्यप्रयोजक अनुष्ठानके प्रतियोगी अनुष्ठानशालित्वरूप पूर्वप्रायश्चित्तगतकर्तव्यत्वका और उस प्रायश्चित्तगत अङ्गत्वत्वका उत्तरनैमित्तिकप्रायश्चित्तकर्तव्यतासे जो विनाश माना गया है, उसका भङ्ग प्रसक्त होगा, यदि द्वितीय कल्प मानें, तो यही अर्थ पर्यवसन्न होगा कि पूर्व प्रायश्चित्तके अनुष्ठानमें क्रतुवैकल्य व्याप्यत्व द्वितीय निमित्तकी उत्पत्तिके पूर्वमें ही होगा, उसकी उत्पत्तिके बाद नहीं होगा, इसी प्रकार पूर्वप्रायश्चित्तगत अङ्गत्वरूप कर्तव्यता द्वितीय निमित्तके उत्पन्न होनेके पूर्वमें ही पूर्वप्रायश्चित्तमें है, अनन्तर नहीं है । इस अवस्थामें व्याप्यत्व और कारणत्वकी अपने आश्रयमें सत्ता कादाचित्की ( कुछ समयके लिए ) ही प्रसक्त होगी, अतः कादाचित्कत्वप्रसङ्गके निरासके लिए अर्थात् अङ्गत्व और प्रयोजकत्वके यावदाश्रयभावित्वरूप स्वाभाविकत्वके निर्वाहके लिए यही कहना होगा—अनन्तरकालमें उत्पन्न होनेवाले विरुद्ध अपच्छेदके अभावसे युक्त क्रतुका पूर्वापच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्त अङ्ग है अर्थात् पूर्वके अपच्छेदसे किया जानेवाला प्रायश्चित्त वहींपर क्रतुका अङ्ग होता है जहाँपर उत्तरकालीन अपच्छेद न हुआ हो, इसी प्रकार पश्चात् भावी अपच्छेदसे विधुर क्रतुमें पूर्वकालिक अपच्छेदनिमित्तिक प्रायश्चित्तका अनुष्ठान उस क्रतुके वैकल्यका सम्पादक है । इस परिस्थितिमें जब उत्तर अपच्छेद होगा, तब उस अपच्छेदसे युक्त क्रतुमें पूर्वापच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्तमें अङ्गत्व और उसी पूर्वनिमित्तक प्रायश्चित्तके अनुष्ठानमें


[email protected]