सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| ३०८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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ननूपजीव्यप्रत्यक्षविरुद्धेऽर्थे श्रुतेः कथम् ।
मानत्वं युक्तमिति चेद्,
यदि शङ्का हो कि उपजीव्यभूत प्रत्यक्षसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेवाले आगममें प्रामाण्य कैसे होगा, क्योंकि अबाधितार्थबोधकत्व ही प्रामाण्य है,
ननु तथाऽप्युपजीव्यत्वेन प्रत्यक्षस्यैव प्राबल्यं दुर्वारम् । अपच्छेदशास्त्रयोर्हि न पूर्वं परस्योपजीव्यमिति युक्तः परेण पूर्वस्य बाधः । इह तु वर्णपदादिस्वरूपग्राहकतया मिथ्यात्वबोधकागमं प्रति प्रत्यक्षस्योपजीव्यत्वाद् आगमस्यैव तद्विरुद्धमिथ्यात्वावोधकत्वरूपो बाधो युज्यते । न च मिथ्यात्वश्रुत्या वर्णपदादिसत्यत्वांशोपमर्देऽपि उपजीव्यस्वरूपांशोपमर्दाभावान्नोपजीव्यविरोध इति वाच्यम्, 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि-श्रुतिभिः स्वरूपेणैव प्रपञ्चाभावबोधनात् ।
अब पुनः शङ्का होती है कि* यद्यपि आगमके समान प्रत्यक्ष स्वतः बलवान् नहीं है, तथापि आगमका उपजीव्य होनेसे प्रत्यक्ष ही बलवान् है, अपच्छेदशास्त्रोंमें पूर्व परका उपजीव्य ( कारण ) नहीं है, अतः उनमें पर पूर्वका बाध अवश्य करता है, और प्रकृतमें अर्थात् आगम और प्रत्यक्ष-स्थलमें मिथ्यात्वबोधक 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि आगम ( शास्त्र ) का—वर्ण, पद आदि स्वरूपका ग्राहक होनेसे—प्रत्यक्ष उपजीव्य है, अतः प्रत्यक्षविरुद्ध मिथ्यात्वरूप अर्थका बोधक होनेसे आगमका ही बाध युक्त है । इस विषयमें यदि शङ्का हो कि मिथ्यात्वबोधक श्रुतिसे वर्ण, पद आदिमें सत्यत्व अंशका उपमर्द ( बाध ) होनेपर भी उपजीव्यस्वरूपांशका बाध न होनेसे उपजीव्यभूत प्रत्यक्षसे आगमका विरोध नहीं है ? तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'नेह नानास्ति' इत्यादि श्रुतियोंसे स्वरूपका ही निषेध होता है, [ अतः उपजीव्यके साथ सर्वथा विरोध होनेसे प्रत्यक्ष ही बलवान् है आगम बलवान् नहीं है, यह भाव है ] ।
* यद्यपि इस शङ्काका 'न चैवमुपजीव्यविरोधः' इत्यादिसे उत्थान और परिहार किया गया है, तथापि उस परिहारका फिर आक्षेप करनेके लिए इस ग्रन्थका उल्लेख किया गया है, 'नेह नानास्ति' इत्यादि श्रुतिसे प्रपञ्चका स्वरूप ही निषिद्ध होता है, अतः उपजीव्य स्वरूपका उपमर्द होनेसे उपजीव्य विरोधका निरास नहीं है, इसलिए अनधिगताबाधितविषयकत्व न होनेके कारण अप्रामाण्यापत्ति दुर्वार है, यह भाव है ।