शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
About this granth
The Shukraniti (शुक्रनीति), or Shukranitisara, is a Sanskrit treatise on kingship and government ascribed to Shukracharya, the preceptor of the asuras. It covers the duties of the king, the appointment of ministers and officials, the treasury and taxation, justice, forts, the army and the conduct of war, as well as social conduct, town planning and the making of images. Its date is disputed; because it describes firearms (nalika), many scholars regard its present form as relatively late.
This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi commentary called Vidyotini. It was first published in Samvat 2025 (1968) by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Varanasi, as No. 185 of the Kashi Sanskrit Granthamala; the commentator is not named in the opening pages. The scan is of a copy from the Mumukshu Bhavan Veda-Vedanga library, Varanasi.
The text runs chapter by chapter; the second chapter, for example, lays down rules on the pay of royal servants, such as setting aside a sixth or a quarter of a servant's wage for him. The volume has 526 pages.
( ४० )
इनमें भी सर्वप्रथम संस्कारक थे 'भार्गव' (शुक्र)। शुक्र-नीति-सार में तो यहाँ तक कहा गया है कि शुक्र की नीति को छोड़ कर अन्य सभी नीतियाँ कुनीतियाँ हैं। महाकवि¹ दण्डी ने भी अपने दश-कुमार-चरित² में राजनीति-शास्त्र-कारों की नामावली में सर्व-प्रथम स्थान शुक्राचार्य को ही दिया है। महाकवि अश्व-घोष ने भी अपने 'बुद्ध-चरित'³ में शुक्र तथा बृहस्पति का बड़े सम्मान के साथ राज-शास्त्र के निर्माताओं के रूप में उल्लेख किया है। हमारे महाकवि कालिदास ने⁴ भी यह बतलाया है कि मनुष्य में व्यवहार-कुशलता या नीति-कुशलता का चरमोत्कर्ष शुक्र की नीति के अनुसरण से ही हो सकता है, अन्यथा नहीं।
उपर्युक्त विवरण से यह सिद्ध है कि नीति-शास्त्र-कारों में शुक्राचार्य का स्थान बहुत ही महत्त्व-पूर्ण है।
शुक्राचार्य के ग्रन्थ
ऊपर यह बतलाया जा चुका है कि शुक्राचार्य (उशना) का एक राजनीति-शास्त्र पर प्रमुख-ग्रन्थ रहा और विज्ञानेश्वर तथा कौटिल्य के आधार पर औशनस अर्थ-शास्त्र की भी सत्ता असन्दिग्ध है। जैसा प्रारम्भ में बतलाया जा चुका है कि अर्थ-शास्त्र तथा राज-नीति-शास्त्र समानार्थक शब्द हैं, अतः महाभारत में उल्लिखित राज-नीति-शास्त्र तथा विज्ञानेश्वर आदि के द्वारा निर्दिष्ट अर्थ-शास्त्र एक ही ग्रन्थ सम्भावित है। मनु के सुप्रसिद्ध मीमांसक भाष्यकार मेधातिथि ने औशनसी राज-नीति के दो श्लोक⁵ भी उद्धृत किए हैं। महाभारत में तथा अन्यान्य ग्रन्थों में भी इस ग्रन्थ के उद्धरण का संकेत भी पहले किया जा चुका है।
१. न कवेः सदृशी नीतिस्त्रिषुलोकेषु विद्यते ।
फल्ग्वेव नीतिरन्या तु कुनीतिर्व्यवहारिणाम् ॥ शु०नी०सा०४।१२४३-४ ॥
२. येऽपि मन्त्र-कर्कशाः शास्त्र-तन्त्रकाराः शुक्राङ्गिरस-बिलाशाक्ष-बृहदन्ती-पुत्र-पराशर-प्रभृतयः । द० कु० च०, उ० पी० ८ ॥
३. यद्राज-शास्त्रं भृगुरङ्गिरा च न चक्रतुर्वंशकरावुभौ तौ ।
तयोः सुतौ तौ च ससर्जतुस्तत्कालेन शुक्रश्च बृहस्पतिश्च ॥
बुद्ध-चरित १४६ ॥
४. अध्यापितस्योशनसाऽपि नीतिं प्रयुक्त-राग-प्रणिधिर्द्विषंस्ते ।
कस्यार्थ-धर्माविह पीडयामि सिन्धोस्तटावोध इव प्रवृद्धः ॥
कुमार-सम्भव-३।४६॥
५. मनु-स्मृति-७।१५ तथा ८।५० पर भाष्य ।
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इसके अतिरिक्त स्मृति-कारों की प्रायः सभी सूचियाँ, जिनका उल्लेख हमने चौखम्बा विद्याभवन से ( 'काशी संस्कृत-ग्रन्थ-माला-१७८' ) १९६७ ई० में प्रकाशित याज्ञवल्क्य-स्मृति की 'प्रस्तावना' के ९-१२ पृष्ठों पर किया है, उशना को धर्म-शास्त्र-प्रवर्त्तक या स्मृति-कार के रूप में उल्लिखित करती हैं, जिससे यह प्रतीत होता है कि उशना की कोई स्मृति भी अवश्य ही रही। मिताक्षरा¹ तथा मन्वर्थमुक्तावली² आदि में भी उशना के गद्यात्मक ( यत्र तत्र पद्यात्मक भी ) वचन उपलब्ध होते हैं। दो औशनस धर्मशास्त्र ( डेकन कालेज संग्रह ) तथा एक और औशनस धर्मशास्त्र ( जीवनानन्द संग्रह तथा आनन्दाश्रम संग्रह ) एवम् एक औशनस स्मृति का उल्लेख महामहोपाध्याय काणे³ महाशय ने किया है। परन्तु यह निर्णय करना कठिन है कि ये सभी उशना एक ही हैं या भिन्न-भिन्न व्यक्ति । इस विषय में किसी निर्णय का अधिगम कठोर अनुसन्धान के बाद ही कथञ्चित् सम्भावित है ।
शुक्रनीति
( क ) इसके रचयिता
प्रस्तुत शुक्र-नीति के रचयिता के विषय में परम्परागत मत तो यही है कि शुक्राचार्य की ही यह रचना है। इस परम्परा का समर्थन शुक्र-नीति⁴ से भी होता है। परन्तु इतना तो निश्चित है कि महाभारत में अनेकत्र संकेतित शुक्र-कृत नीति-शास्त्र से यह भिन्न ही है, क्योंकि महाभारतोक्त 'नीति-शास्त्र' में १००० अध्याय थे और इस 'शुक्र-नीति' में केवल २२००⁵ श्लोक मौलिक और इधर-उधर के सभी श्लोकों को मिला कर कुल २५५४ श्लोक हैं । यह कथमपि सुसंगत नहीं हो सकता है कि एक हजार अध्यायों में विभक्त किसी ग्रन्थ में केवल २२०० श्लोक या २५५४ श्लोक हों । हाँ, इस परम्परा के अनुसार यह कहा जा सकता है कि शुक्राचार्य ने ही अपने एक हजार अध्यायों में विभक्त ग्रन्थ-रत्न को पुनः लोकानुग्रहार्थ इतने छोटे आकार में प्रस्तुत किया है।
परन्तु आधुनिक विवेचकों की दृष्टि में प्रस्तुत शुक्र-नीति, जिसमें गुप्तसाम्राज्य से उत्तर-वर्ती तथा हर्षवर्धन से पूर्ववर्त्ती स्थिति स्पष्ट है, उस शुक्राचार्य की रचना नहीं हो सकती है। इसके रचयिता के विषय में साधारणतः
१. मिताक्षरा ३।३६०।
२. मन्वर्थमुक्तावली १०।४९॥
३. हिस्ट्री ऑफ धर्म-शास्त्र-भाग १, अधिकरण-१७॥
४. शु० नी० सा० ४।१२४१-४४॥
५. वही ४।१२४२॥
( ४२ )
दो मत प्रचलित हैं—( १ ) किसी अन्य व्यक्ति ने इसकी रचना कर इसे प्रतिष्ठित करने की भावना से शुक्राचार्य के नाम से इसे सम्बद्ध कर दिया है, अथवा ( २ ) किसी अन्य शुक्र नाम के विद्वान् की रचना है । इस आधुनिक परम्परा के समर्थन में यह कहा जा सकता है कि कौटिल्य आदि के द्वारा उल्लिखित औशनस सिद्धान्त इस 'शुक्र-नीति' में प्रायेण अनुपलब्ध हैं ।
( ख ) शुक्र-नीति का रचना-काल
शुक्र-नीति में वर्णित, जाति-व्यवस्था, आचार-विचार तथा वैवाहिक-सम्बन्ध की स्थिति से मूर्त्ति-कला तथा भवन-निर्माण-कला के विशद-विवरण से और 'कुल', 'श्रेणी', 'गण' आदि कुछ विशिष्ट संस्थाओं ( जिनका अस्तित्व हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद इतिहास के साक्ष्य के आधार पर नहीं सा माना जाता है ) के निर्देश से यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि यह ग्रन्थ गुप्त-काल में या उसके कुछ ही बाद की रचना है । परन्तु डा० अल्तेकर का कथन है कि इसकी रचना ईसा के अष्टम शतक के अन्तिम भाग में हुई है जब कुछ लोग इसे सोलहवीं शताब्दी की रचना मानने के पक्ष में हैं । इन मतों में अल्तेकर साहब का मत बहुत ही उपादेय है । अन्ततः इतना प्रतीत होता है कि कुछ परिष्कार भी अर्वाचीन समय में इसका अवश्य ही हुआ है ।
( ग ) शुक्र-नीति के विषय का संक्षिप्त-विवरण
अब हमें शुक्र-नीति के प्रधान-विषयों का संक्षिप्त रूप देखना चाहिए । जैसा पहले बतलाया जा चुका है राजा का धर्म है सन्मार्ग-प्रापण । दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि अपने-अपने धर्म में धर्म-च्युत को व्यवस्थित करना ही राजा का मुख्य धर्म है । इसलिए यह आवश्यक है कि नीति-शास्त्र के ग्रन्थों में वर्ण-धर्म और वर्णाश्रम-धर्म आदि षड्विध-स्मार्त्त-धर्मों का निरूपण किया जाय, क्योंकि किसी भी व्यक्ति या जाति के उचित धर्म के परिज्ञान के विना उसे उचित धर्म पर ले जाना असम्भव है । अतएव शुक्र-नीति में¹ भी वर्ण-धर्म आदि का निरूपण किया गया है । इस वर्ण-धर्मादि में उत्पथ जन के व्यवस्थापन के लिए राजा को दण्ड-प्रयोग की और उसके साधन के रूप में सैन्य आदि सात राज्याङ्गों की आवश्यकता होती है । अतः शुक्र-नीति में भी इन विषयों का यथावत् प्रतिपादन किया गया है ।
१. शु० नी० सा० ४।२४९-३७६ ॥
( ४३ )
कुछ मुख्य विषयों का संक्षिप्त विवरण निम्न-लिखित है :-
( क ) राज्योत्पत्ति :-
मनु याज्ञवल्क्य आदि के समान ही शुक्रनीति में भी राजा को आठ लोकपालों¹ की समष्टि मानी गई है और इस प्रकार राज्योत्पत्ति के विषय में इसका दैवीसिद्धान्त ( Divine Right) प्रतीत होता है।
( ख ) राजा :-
शु० नी० के अनुसार राजा के दो रूप हैं 'देवांश' तथा 'राक्षसांश'। औचित्य का ही अवलम्बन करनेवाला राजा 'देवांश'² है और अनौचित्य का अवलम्बन करनेवाला 'राक्षसांश'³। यद्यपि अन्यान्य शास्त्रों में भी अधर्मकारी राजा को पापी बतलाया गया है तथापि दो रूपों में इस प्रकार का स्पष्ट वर्गीकरण नहीं है।
( ग ) राजा के कर्त्तव्य :-
शु० नी० के अनुसार राजा के मुख्य कर्त्तव्य हैं प्रजा-पालन तथा दुष्ट-दमन⁴। अतएव प्रजानुरञ्जन भी राजा के कर्त्तव्यों में आ ही जाता है। इनके अतिरिक्त राजसूय आदि यज्ञों का अनुष्ठान, न्याय-पूर्वक कोश-सम्वर्धन, अन्य राजाओं का वर्गीकरण, शत्रुओं का दमन, भूमि का अर्जन भी राजा के प्रमुख⁵ कर्त्तव्य हैं।
( घ ) उत्तराधिकार :-
उत्तराधिकार या यौवराज्य के विषय में शुक्राचार्य का कथन है कि ज्येष्ठ औरस पुत्र प्रथम⁶ अधिकारी है। परन्तु यदि उसमें त्रुटि हो तो उसके स्थान पर कनिष्ठों में ज्येष्ठ भ्राता अथवा भ्रातृ-पुत्र को राज्याधिकार⁷ मिलना चाहिए। परन्तु यौवराज्याधिकार के विवरण के समय ज्येष्ठ पुत्र के अनधिकारी होने पर या अभाव में प्रथम स्थान पितृव्य (चाचा) को⁸ दिया गया है। अतः यह प्रतीत होता है कि राज्याधिकारी में पितृव्य भी आते हैं। इन सर्वो के अभाव में दत्तक पुत्र और उसके अभाव में दौहित्र और उसके अभाव में भगिनी-पुत्र (भाञ्जा) को उत्तराधिकार प्राप्त होता⁹ है।
| १. वही १।७१ ॥ | २. वही १।७१-८५ ॥ |
| ३. वही १।७०, ८६ ॥ | ४. वही १।१४ ॥ |
| ५. वही १।१२३-२४ ॥ | ६. वही १।३४१; २।१३ ॥ |
| ७. वही १।३४२-४३ ॥ | ८. वही २।१५ ॥ ९. वही २।१५-१६ ॥ |
( ४४ )
( ङ ) राज्य का विभाजन नहीं :—
शुक्रनीति के अनुसार राजा के अनेक पुत्र होने पर भी सभी अधिकारी नहीं होते अर्थात् सबों में समान रूप में राज्य का विभाजन नहीं किया जा सकता है, क्योंकि राज्य के विभाजन¹ से तथा अनेक² नायक के होने से राज्य का विनाश नियत हो जाता है। अतः राज्य एक अविभाज्य सम्पत्ति है। हाँ, इतना अवश्य है कि अन्यान्य दायादों को जीविकार्थ कुछ³ सम्पत्ति या राज्य का चतुर्थांश⁴ देकर अपने राज्य के चतुर्दिक्षु सुव्यवस्थित कर देना चाहिए ताकि उन सबों की सहानुभूति बनी रहे, अन्यथा अन्तर्द्वन्द्व से राज्य का मूल शिथिल होने लग जाता है।
( च ) उपाय :—
शुक्रनीति में भी मनु आदि के समान चार ही उपाय—साम,⁵ दान, भेद तथा दण्ड—न कि मत्स्य-पुराण की तरह सात उपाय, माने गए हैं। इन उपायों के प्रयोग के विषय में शु० नी० का मत है कि प्रबल शत्रुओं के प्रसङ्ग में साम तथा दान, अत्यन्त प्रबल शत्रु के विषय में साम तथा भेद, समबल शत्रु के लिये भेद तथा दण्ड और हीनबल शत्रु के लिए दण्ड का प्रयोग करना चाहिए⁶। मित्रों के लिए भेद तथा दण्ड का सर्वथा प्रतिषेध और साम तथा दान का विधान, शत्रु राजाओं की प्रजा में भेद का, शत्रु-पीडित प्रजा के संग्रह के लिए साम तथा दान का भी विधान किया गया है⁷। अपनी प्रजा में साधारणतः साम तथा दान का ही प्रयोग⁸ उचित है। परन्तु यदि इन उपायों से काम न चल सके तो दण्ड का प्रयोग भी करना चाहिए जैसा पहले बतलाया जा चुका है। इन उपायों की प्रशंसा लौकिक दृष्टान्त के आधार पर शु० नी० में बहुत ही मनोहर ढंग से की⁹ गई है।
( छ ) राज्याङ्ग :—
महाभारत तथा कौटिल्य आदि में वर्णित अङ्गों की तरह शु० नी० सा० में राज्य के सात अङ्ग माने गए हैं—राजा, मन्त्री, मित्र, कोष, राष्ट्र, दुर्ग तथा बल।¹⁰ इन सात अङ्गों में मन्त्री को राजा का चक्षु, मित्र को श्रोत्र, कोश को
| १. वही २।४५ | २. वही २।३९ |
| ३. वही २।४४ | ४. वही २।४६ |
| ५. वही ४।३४ | ६. वही ४।३५ |
| ७. वही ४।३६–३७ | ८. वही ४।३८–३९ |
| ९. वही ४।११२४–२८ | १०. वही १।६१ |
( ४५ )
मुख, बल को मन, दुर्ग को हाथ तथा राष्ट्र को पैर¹ माना गया है। एक अन्य स्थल में² इन सात अङ्गों से एक राज्य-वृक्ष का रूपक-मय वर्णन किया गया है। इन सभी अङ्गों का महत्त्व भी पूर्वाचार्य के अनुसार विश्रुत है।
( ज ) मन्त्रि-परिषत् :—
शु० नी० सा० में यह कहा गया है कि स्वतन्त्र राजा स्वेच्छाचारी हो जाता है और अनुचित कार्य में प्रवृत्त हो सकता है। इस लिए उसे अन्यान्य सुयोग्य सहायकों का संग्रह करना³ चाहिए। इसी को हम 'मन्त्रि-परिषत्' कह सकते हैं। इसमें अपेक्षित सदस्यों की संख्या, शुक्र-नीति-सार के अनुसार, दस होनी चाहिए। ये दस सदस्य हैं—पुरोधा, प्रतिनिधि, प्रधान, सचिव, मन्त्री, प्राड्विवाक, पण्डित, सुमन्त्र, अमात्य तथा दूत⁴। इस प्रसंग में एक मतान्तर का भी उल्लेख है जिसमें केवल आठ सदस्य माने गए हैं। इस मन्त्रि-परिषद् के सदस्यों की योग्यता के विषय में शु० नी० का मत है कि इन्हें कुलीन, गुणवान्, शीलवान्, शूर, विद्वान्, राज-भक्त, प्रियम्बद्, हितोपदेष्टा, क्लेश-सह, धर्मिष्ठ, चतुर, राग-द्वेषादिदोष-रहित⁵ अतएव सच्चरित्र होना चाहिए। दुश्चरित्र एवम् अधार्मिक सहायकों के रहने पर राज्य-नाश हो जाता है। इन सदस्यों का विशेष वर्णन मूल ग्रन्थ में ही देखना चाहिए।
( झ ) सदस्यों के कार्य का विभाजन :—
शु० नी० के अनुसार सभी सदस्य सभी कार्य में हाथ नहीं बँटा सकते हैं, उन सबका अपना-अपना क्षेत्र निश्चित होना चाहिए और यह निश्चय भी उनकी तत्तद्विषयक अर्हता के आधार पर करना चाहिए। साथ ही, किसी भी समस्या का प्रस्ताव प्रजा को पहले विभागीय मन्त्री के सामने ही करना चाहिए पश्चात् उस विभागीय मन्त्री को राजा के समक्ष उस समस्या को रखनी चाहिए⁶। तदनन्तर तर्क-वितर्क तथा बहुमत के आधार पर राजा को अपना निर्णय देना चाहिए। सभी सदस्यों के कार्य के अवलोकनार्थ दर्शक ( Inspectors ) भी आवश्यक हैं। परन्तु एक-एक वर्ष में उन दर्शकों का परिवर्त्तन⁷ कर देना चाहिए, नहीं तो कार्य में सौष्ठव नहीं रह सकता है।
| १. वही १।६२ ॥ | २. वही ४।१२५७-५८ ॥ |
| ३. वही २।१-७ ॥ | ४. वही २।६९-७० ॥ |
| ५. वही २।८-१० ॥ | ६. वही २।९४-१०६ ॥ |
| ७. वही २।११० ॥ |
( ४६ )
( झ ) भृत्यों की नियुक्ति, पदोन्नति, पद-च्युति ( Discharge ) पर परिवर्त्तन तथा पद-मुक्ति ( Retirement ) :—
शुक्रनीति के अनुसार कुल-जाति तथा विशेषतः चरित्र तथा कार्य-क्षमता के आधार पर भृत्यों की नियुक्ति की जानी$^१$ चाहिए।
पदोन्नति के विषय में अनुक्रम-सिद्धान्त, अर्थात् उच्च पद पर अव्यवहित निम्न-पदस्थ व्यक्ति की पदोन्नति का सिद्धान्त, मान्य है।$^२$
पदच्युति के विषय में यहाँ यह कहा गया है कि अयोग्यता के प्रमाणित हो जाने पर,$^३$ प्रजा के द्वारा शिकायत होने पर,$^४$ निन्द्य आचरण करने पर तथा सत्याचरण, परोपकार एवम् आज्ञा-पालन इन तीन गुणों से रहित होने पर हिंसा और मिथ्या भाषण$^५$ करने पर अधिकारी को पद-च्युति कर देनी चाहिए।
यदि यह समझ में आजाय कि यह व्यक्ति वर्त्तमान कार्य-सम्पादन में अकुशल परन्तु कार्यान्र-सम्पादन में कुशल है तो उसका पद-परिवर्त्तन$^६$ करना चाहिए। परन्तु जब जीर्णता की स्थिति आ जाय$^७$ तब उसे पद-मुक्त या कार्य-मुक्त कर देना चाहिए एवम् जीविका की व्यवस्था (Pension) भी करनी चाहिए$^८$।
इसके अतिरिक्त कार्य में प्रोत्साहित करने के लिये भृत्यों को पुरस्कार $^९$तथा प्रमाद करने वालों को दण्ड$^{१०}$ देने का भी निर्देश शु० नी० में किया गया है।
( ट ) कोश-सञ्चय:—
मूल धन को छोड़ कर $^{११}$ लाभ के बीसवें अथवा सोलहवें अंग के शुल्क के रूप में आदान से कोश का सञ्चय करना चाहिये। भाग-कर,$^{१२}$ आकर-कर$^{१३}$ और शुल्कादि$^{१४}$ के द्वारा कोश की समृद्धि की विशद्-व्याख्या शु० नी० में की गई है। शुल्क एक ही बार लेना चाहिये,$^{१५}$ बारम्बार नहीं, क्योंकि ऐसा करने से प्रजा को पीड़ा होती है। परन्तु शुल्क-संग्रह के समय उस व्यक्ति के लाभालाभ का भी ध्यान रखना अनिवार्य है।
| १. वही २।५३–६४ ॥ | २. वही २।११३–१५ ॥ | ३. वही २।१११ ॥ |
| ४. वही १।३७५ ॥ | ५. वही २।२०५ ॥ | ६. वही २।१११–१३ ॥ |
| ७. वही १।२६४–६५ ॥ | ८. वही २।४०२–७ ॥ | ९. वही २।४०५ ॥ |
| १०. वही २।४०७ ॥ | ११. वही ४।२२० ॥ | १२. वही ४।२२२ ॥ |
| १३. वही ४।२२८ ॥ | १४. वही ४।२१७–२१८ ॥ | १५. वही ४।२१८ ॥ |
( ४७ )
उपर्युक्त साधनों के अतिरिक्त अर्थ-दण्ड, अधर्मी राजा के कोश के$^१$ हरण तथा उपायन ( Presents ) आदि के द्वारा भी कोश-सञ्चय करना चाहिए। सेना, प्रजा आदि के संरक्षण तथा यज्ञादि-सम्पादन के लिए कोश$^२$ का व्यय उचित है।
( ठ ) बल :—
शु० नी० में बल को राज्य के अङ्गों में प्रमुख माना गया है। इसके छः प्रकार हैं—शारीरिक-बल,$^३$ शौर्य-बल, सैन्य-बल, अस्त्र-बल, बुद्धि-बल तथा आयु-बल। बल के बिना राज्य-निर्वाह असम्भव सा है।
अर्थ-शास्त्र में मन्त्र-शक्ति, प्रभु-शक्ति तथा उत्साह-शक्ति में सभी बलों का अन्तर्भाव बतलाया गया है।
( ड ) राष्ट्र :—
राजा के अधीन वर्त्तमान$^४$ सम्पत्ति—चल तथा अचल—राष्ट्र है। इस राष्ट्र में छोटी-छोटी अनेक बस्तियाँ होती हैं—ग्राम, पल्ली, कुम्भ$^५$। ग्राम के सर्वांगीण व्यवस्थापन के लिए अधिकारियों की नियुक्ति करनी चाहिए। ये अधिकारी हैं$^६$—दण्डाधिपति, ग्रामाधिपति ( चौधरी ), भाग-हर ( कर लेनेवाला ), लेखक, शुल्क-ग्राहक तथा प्रतीहार।
इस राष्ट्र के अन्तर्गत 'नगर' का भी व्यवस्थापन महत्त्वपूर्ण है। इस नगर ( बाजार ) में भी सुव्यवस्था के लिए उपर्युक्त अधिकारी अपेक्षित होते हैं। नगर की दूकानों में यह ध्यान रखना चाहिए कि एक चीज की सारी दूकानें$^७$ एक ही जगह हों। इसकी विशेष व्यवस्था के लिए एक विशेषाधिकारी की भी नियुक्ति करनी चाहिए। इन अध्यक्षों की योग्यता का विवरण भी स्पष्ट रूप में किया गया है।
राष्ट्र के अन्तर्गत सड़कों का भी निर्माण होना चाहिए। ३० हाथ चौड़ी सड़क को उत्तम, बीस हाथ चौड़ी सड़क को मध्यम और पाँच हाथ चौड़ी सड़क को अधम कहा गया है$^८$।
इसके अतिरिक्त पथिकों के सौविध्य के लिए पान्थ-शालाओं का भी निर्माण बतलाया गया है। दो ग्रामों के बीच एक पान्थ-शाला होनी चाहिए।$^९$ 'ग्रामप'
| १. वही ४।१२१–२२ ॥ | २. वही ४।११८–११९ ॥ |
| ३. वही ४।८६८–६९ ॥ | ४. वही ४।२४२–४३ ॥ |
| ५. वही १।१९२ ॥ | ६. वही २।१२०–२१ ॥ |
| ७. वही १।२५७ ॥ | ८. वही १।२५९–६० ॥ ९. वही १।२६८ । |
( ४८ )
अधिकारी उसकी देख-रेख करें और एक स्थायी व्यक्ति उसका नित्य-व्यवस्थापन करे। इस व्यक्ति को 'पान्थ-शालाधिप' कहा गया है। इस पान्थ-शाला में आए व्यक्ति के स्थानादि का विवरण रहना¹ चाहिए।
इसी प्रकार अन्यान्य प्रमुख विषयों का भी विशद् वर्णन इस ग्रन्थ में मिलता है, यहाँ तो केवल कुछ ही विषयों का संक्षिप्त परिचय दिया गया है, जो अपर्याप्त है। अतः समस्त ग्रन्थ का विधिवत् अध्ययन ही इस अंश में पर्याप्त हो सकता है।
शुक्र-नीति के संस्करण
उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि शुक्र-नीति अपने विषय का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। अतएव इस ग्रन्थ का कई बार प्रकाशन हुआ। प्रामाणिक संस्करण के रूप में हम ऑपर्ट ( Oppert ) महाशय के द्वारा मद्रास से प्रकाशित तथा जीवानन्द विद्यासागर के संस्करण को ले सकते हैं। प्राध्यापक विनय कुमार सरकार ने 'सेक्रेड बुक्स ऑफ हिन्दू-सीरीज' में अंग्रेजी अनुवाद भी इस ग्रन्थ-रत्न का प्रकाशित किया है। सभी संस्करणों में यह ग्रन्थ चार अध्यायों में विभक्त है।
ऐसे अपूर्व ग्रन्थ का हिन्दी व्याख्यान भी परमावश्यक था, विशेषतः आज के भारतवर्ष में। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए यह संस्करण पाठकों के सामने प्रस्तुत है। यद्यपि 'वेंकटेश्वर प्रेस, बम्बई' से आचार्य मिहिरचन्द्र जी की हिन्दी व्याख्या (अनुवाद) के साथ भी इसका प्रकाशन हुआ है तथापि उसकी हिन्दी आज की दृष्टि से बहुत उपयोगी नहीं है। हमें विश्वास है कि विद्वान् पाठकगण इस संस्करण की कुछ त्रुटियों की उपेक्षा कर विद्वान् व्याख्याकार तथा धैर्य एवम् उत्साह से सम्पन्न प्रकाशक की कामना की पूर्ति करने में सानुग्रह दृष्टि-कोण अपनायेंगे जिससे इस ग्रन्थ-रत्न का अग्रिम संस्करण भी यथा-सम्भव परिष्कार के साथ शीघ्र ही प्रस्तुत हो सके।
वाराणसी ⎬
वि० सं० २०२५ ⎭
विदुषामनुविधेयः—
श्रीनारायण मिश्रः
१. वही १।२६९-७१ ॥
विषय-सूची
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| मङ्गलाचरण तथा ग्रन्थोपक्रम | १ | भूमि के मानभेदों का निर्देश | ३० |
| नीतिशास्त्र का उपक्रम | ,, | राजधानी बनाने योग्य प्रदेश | ३२ |
| नीतिशास्त्र-प्रशंसा | २ | राजोचित भवन का निर्देश | ३३ |
| राजा का नीतिशास्त्र-ज्ञान में प्रयोजन | ३ | राजोचित दुर्ग बनाने का निर्देश | ३६ |
| राजा की काल-कारणता का निर्देश | ४ | राजसभा बनाने का निर्देश | ,, |
| धर्म की प्रशंसा | ५ | मन्त्री आदि के भवन का निर्देश | ३७ |
| राजा के सात्त्विकादि तीन भेद | ,, | सेना तथा प्रजावर्गों के स्थान | ,, |
| सुगति-दुर्गति भेद से प्राक्तन कर्म की कारणता | ६ | धर्मशाला-निर्माण का निर्देश | ३८ |
| राजा के देवांश होने का निर्देश | ११ | राजमार्गादि-निर्माण का निर्देश | ,, |
| ७ गुणों से युक्त राजा की प्रजा-रंजकता का निर्देश | १२ | धर्मशाला की व्यवस्था | ४० |
| इन्द्रियजय की आवश्यकता | १६ | राजाओं के दैनिक कृत्य | ४१ |
| विनाश के चार कारण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध | ,, | प्रहरियों का कर्त्तव्य | ४२ |
| जैसे शब्द-विषय के द्वारा | ,, | राजा के आदेशों की घोषणा | ४३ |
| रूप-विषय द्वारा | १७ | राजाओं के कर्त्तव्य | ४५ |
| रस-विषय द्वारा | ,, | विषादि से दूषित अन्नादि-परीक्षा | ४७ |
| गन्ध-विषय द्वारा | ,, | शिकार खेलने का वर्णन | ४८ |
| द्यूतादिव्यसन के दोषों का निर्देश | ,, | राजा के सम्बन्धी आदियों का राजनिर्धारित कर्त्तव्य | ५० |
| आठ प्रकार के राजा के व्यवहार का निर्देश | २० | परिषद् की व्यवस्था का निर्देश | ५१ |
| राजा के दोष-गुण का निर्देश | ,, | राजा को राजचिह्न रखने का निर्देश | ५२ |
| आन्वीक्षिकी आदि के लक्षण | २४ | राजा के कर्त्तव्य | ५३ |
| मनोहर वचन बोलने का निर्देश | २६ | राजा को प्रतिवर्ष देश के अधिकारियों के निरीक्षण का निर्देश | ५४ |
| राजा के सामन्तादि भेदों का निर्देश | २८ | राजा के पारलौकिक कार्य | ५६ |
| एकाकी राजा का राज्यकार्य करने की दुष्करता का निर्देश | ५७ |
शुक्र ०
( २ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| बिना मन्त्रियों के सलाह लिये व्यवहार-निर्णय का निषेध | ५७ | अधिकारयोग्य को अधिकार देने का निर्देश | ७३ |
| अच्छे सहायकों से युक्त राजा की श्रेष्ठता का निर्देश | ,, | योग्य अधिकारी के अभाव में अन्य की योजना का निर्देश | ,, |
| बुरे सहायकों से राजा की हानि का निर्देश | ५८ | अन्य कर्मों के सचिव की योजना का निर्देश | ७४ |
| युवराजादि राजा के अङ्ग हैं इसका निर्देश | ,, | दण्डाधिपति आदि ६ की योजना का निर्देश | ,, |
| युवराज के कार्य तथा अभिषेकार्ह युवराज के अधिकारो | ५९ | राजा को तपस्वी आदियों की रक्षा करने का निर्देश | ७५ |
| दुराचारी राजपुत्रों में आचार-स्थापना का निर्देश | ६० | योजनाकर्त्ता की दुर्लभता | ,, |
| राजपुत्रों के पिता के विषय में कर्तव्यता का निर्देश | ६३ | गजाधिपति एवं महावत के लक्षण | ,, |
| अमात्यादिभृत्य-विषयक विचार | ६४ | अश्वाधिपति के लक्षण | ७६ |
| श्रेष्ठ भृत्य के लक्षण | ६५ | सारथि के लक्षण | ,, |
| निन्यभृत्य के लक्षण | ६६ | घुड़सवार के लक्षण | ,, |
| दस प्रकृतियों के नाम | ६७ | अश्वशिक्षक के लक्षण | ,, |
| आठ प्रकृतियों के नाम | ,, | अश्वसेवक ( साईस ) के लक्षण | ७७ |
| पुरोहितादिकों के अधिकार | ६८ | सेनापति तथा सैनिकों के लक्षण | ,, |
| पुरोहितादिकों के लक्षण | ,, | पत्ति ( पैदल सेना ) पाल आदिकों के अधिकार | ,, |
| प्रतिनिधि का कार्य | ७० | शतानीकादिकों के लक्षण | ७८ |
| प्रधान का कृत्य | ,, | उपर्युक्त अधिकारियों को अपने २ चिह्नों से युक्त रहने का निर्देश | ,, |
| सचिव के कृत्य | ,, | तित्तिरादिपोषकों की योजना का निर्देश | ७९ |
| मन्त्री के कार्य | ७१ | रत्नादि के अध्यक्षों के लक्षण | ,, |
| प्राड्विवाक के कार्य | ,, | कोषाध्यक्ष के लक्षण | ,, |
| पण्डित के कार्य | ,, | वस्त्राधिपति के लक्षण | ,, |
| सुमन्त्र के कार्य | ,, | वितानाधिप के लक्षण | ,, |
| अमात्य के कार्य | ७२ | धान्यपति के लक्षण | ८० |
| राजा के अन्योन्य के स्थान पर अन्योन्य की योजना का निर्देश | ,, | पाकाध्यक्ष के लक्षण | ,, |
| अधिकार की व्यवस्था का निर्देश | ७३ |
( ३ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| आरामाधिपति के लक्षण | ८० | सत्य तथा परोपकार की श्रेष्ठता तथा इससे युक्त राजकर्मचारी रखने का निर्देश | ८७ |
| गुहाद्यधिपति के लक्षण | ,, | संपूर्ण पापों से हिंसा तथा असत्य की प्रबलता तथा इनसे युक्त भृत्यों को न रखने का निर्देश | ८८ |
| देवाध्यक्ष के लक्षण | ८१ | सद्भृत्य के लक्षण तथा कृत्य | ,, |
| दानाध्यक्ष के लक्षण | ,, | द्वारपाल के कर्तव्यों का निर्देश | ,, |
| सभासद के लक्षण | ,, | राजपार्श्ववर्ती दण्डधारियों का कर्त्तव्य | ,, |
| सत्राधिप के लक्षण | ,, | भृत्य का राजसमीपावस्थान करने पर कर्त्तव्य | ८९ |
| परीक्षक के लक्षण | ८२ | राजा के पक्ष की पुष्टि करने का निर्देश | ,, |
| साहसाधिप के लक्षण | ,, | राजाज्ञा से विवादियों के मत को युक्ति से बोलने का निर्देश | ,, |
| ग्रामाधिप के लक्षण | ,, | राजा से स्वकार्य-निवेदन-प्रकार तथा जोर से हंसने आदि का निषेध | ,, |
| कर वसूल करनेवाले के लक्षण | ,, | हितकारी सेवक का कृत्य | ९० |
| लेखक के लक्षण | ,, | राजा को किसी भी मिष से प्रजा को पीड़ित न करने का निर्देश | ९१ |
| द्वारपाल के लक्षण | ८३ | समझदारों को अपने २ कार्यों में नियुक्त रहने का निर्देश | ,, |
| चुङ्गी लेनेवाले के लक्षण | ,, | स्वामी के गुप्त कार्य के प्रकाश करने का निषेध | ,, |
| तपोनिष्ठ के लक्षण | ,, | राजवेशभूषा-धारण की नकल करने का निषेध | ९२ |
| दानशील के लक्षण | ,, | राजा की विरक्ति तथा अनुरक्ति का ज्ञान रखने एवं तदनुसार त्याग तथा ग्रहण का निर्देश | ,, |
| श्रुतज्ञ के लक्षण | ,, | विरक्त राजा के लक्षण | ,, |
| पौराणिक के लक्षण | ,, | अनुरक्त राजा के लक्षण | ९३ |
| शास्त्रविद् के लक्षण | ,, | ||
| ज्योतिर्विद् के लक्षण | ८४ | ||
| मान्त्रिक के लक्षण | ,, | ||
| वैद्य के लक्षण | ,, | ||
| तान्त्रिक के लक्षण | ,, | ||
| अन्तःपुर के योग्य पुरुष के लक्षण | ,, | ||
| परिचारक के लक्षण | ,, | ||
| जासूस के लक्षण | ८५ | ||
| दण्डधारी-आसा-वल्लमधारी के लक्षण | ,, | ||
| गायकाधिप के लक्षण | ,, | ||
| वेश्या के लक्षण | ,, | ||
| वेश्या-भृत्य के लक्षण | ८६ | ||
| वैतालिक तथा शिल्पज्ञों को पास में रखने का निर्देश | ,, |
( ४ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| राजा से प्रदत्त भूषणादि धारण का निर्देश | ९३ | निश्चितान्यस्वामिक संचित धन के भेद | १०६ |
| स्वामी के प्रति भृत्य के कर्त्तव्य | ९४ | औपनिध्य-याचित-औत्तमर्णिक के लक्षण | ,, |
| आपस में भृत्यों के कर्त्तव्य | ९५ | अज्ञातस्वामिक के लक्षण | १०७ |
| राजा तथा भृत्य के परस्पर अच्छा व्यवहार करने का निर्देश | ,, | स्वत्वविनिश्चित के भेद | ,, |
| डाकू के समान राजा के लक्षण | ,, | साहजिक के लक्षण | ,, |
| प्रच्छन्न चोर के लक्षण | ,, | अधिक के लक्षण | ,, |
| बालक भी राजपुत्र का तिरस्कार का निषेध | ९६ | संचित धन के लक्षण | ,, |
| लेख्यों के भेदों का निर्देश | १०१ | संचित धन के भेद | ,, |
| लेख के दो भेदों का निर्देश | १०२ | पार्थिवसंज्ञक आय के भेद | १०८ |
| जयपत्रक के लक्षण | ,, | चलसंज्ञक आय के लक्षण | ,, |
| आज्ञापत्र के लक्षण | ,, | विभागानुसार आय-व्यय के व्याप्य-व्यापक का निर्देश | ,, |
| प्रज्ञापनपत्र के लक्षण | ,, | व्यय के भेदों एवं पुनरावर्त्तक के लक्षण | ,, |
| शासनपत्र के लक्षण | १०३ | निधि, उपनिधि आदि व्यय के लक्षण | १०९ |
| प्रसादलिखित के लक्षण | ,, | स्वत्वनिवर्त्तक के भेद | ,, |
| भोग-कर-उपायन-पुरुषावधिक और कालावधिक पत्रों के लक्षण . | ,, | ऐहिक तथा पारलौकिक व्यय के भेद | ,, |
| विभागपत्र या भागलेख्य के लक्षण | ,, | प्रतिदान, पारितोषिक और वेतन-व्यय के लक्षण | ,, |
| दानपत्र के लक्षण | ,, | उपभोग्य के लक्षण | ,, |
| क्रयपत्र के लक्षण | १०४ | भोग्य व्यय के लक्षण | ११० |
| सादिलेख्य के लक्षण | ,, | पारलौकिक व्यय के चार भेद और उनके लक्षण | ,, |
| संवित्पत्र के लक्षण | ,, | आय-व्यय-लेखक के कर्त्तव्य | ,, |
| ऋणलेख्य के लक्षण | ,, | अवशिष्ट आय के विविध भेद | १११ |
| शुद्धिपत्र के लक्षण | ,, | मान-उन्मान-परिमाण संख्या के लक्षण | ,, |
| सामयिक लेख्यपत्र-लक्षण | ,, | लोकव्यवहारार्थ द्रव्य तथा धन के लक्षण | ,, |
| संमतिसंज्ञक पत्र के लक्षण | ,, | मूल्य की परिभाषा | ,, |
| क्षेमपत्र के लक्षण | १०५ | ||
| वेदनार्थक पत्र के लक्षण | ,, | ||
| आय-व्यय लेख्य के लक्षण | ,, | ||
| राजाओं के आय-व्ययादिक के लक्षण | ,, | ||
| आय के भेद | १०६ | ||
| संचित आय के भेद | ,, |
( ५ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| मूल्य के न्यूनाधिक्य का कारण-निर्देश | ११२ | कटुभाषी भृत्य का भृति-दान-प्रकार | १२१ |
| पत्रलेखन-प्रकार | ,, | राजा के भृत्य के संग वर्त्तन का वर्णन | १२२ |
| सब लेखों पर स्व-स्वमुद्राङ्कित करने का निर्देश | ११३ | भृत्य को कार्य-मुद्रा से अंकित करने का निर्देश | ,, |
| पत्र में आय-व्यय लेखन का स्थान-विचार | ११४ | भृत्यों को विशिष्ट राजचिह्न न देने का निषेध | ,, |
| व्यापक-व्याप्य के लक्षण | ,, | १० प्रकृति पुरोहितादियों का जातिनियम | १२३ |
| स्थान-टिप्पणादि के भेद | ११५ | भागग्राही और साहसाधिपति आदि पद के लिये क्षत्रियादि रखने का निर्देश | ,, |
| शेषापव्यय-स्थलापव्ययज्ञान | ,, | सेनापति-पद पर शूरमात्र को रखने का निर्देश | ,, |
| तिथ्यादि लिखने का निर्देश | ,, | भृत्य के लिये त्यागने योग्य राजा के लक्षण | ,, |
| गुञ्जादिकों का लक्षण | ११६ | सबों के सुख के अर्थ प्रवृत्ति का निर्देश | १२५ |
| प्रस्थपाद का लक्षण | ,, | धर्म के बिना सुख न मिलने का निर्देश | ,, |
| संख्या का प्रमाण | ,, | सर्व-साधारण के लिये विहिताचरण का निर्देश | ,, |
| संख्या की अनन्तता | ,, | निषिद्धाचरणों का निर्देश | १२६ |
| एकादि-परार्ध तक संख्याओं के नाम | ११७ | दशविध पापों का निर्देश | ,, |
| कालमान का वैविध्य एवं चान्द्रादिकों की व्यवस्था | ,, | दरिद्री आदिकों का रक्षण करने का निर्देश | ,, |
| भृति के ३ प्रकारों का निर्देश | ,, | समय पर हित और मित वचन कहने का निर्देश | १२७ |
| कार्यमानादिकों के लक्षण | ,, | अकेले सुखों का उपभोगादि करने का निषेध | ,, |
| मध्यमादि भृति के लक्षण | ११८ | अपने अपमान को प्रकाशित न करने का निषेध | ,, |
| पोषण-योग्य भृति नियत करने का निर्देश | ,, | ||
| हीन भृति देने से अनर्थ का निर्देश | ,, | ||
| शूद्रादिकों को आच्छादन मात्र देने का निर्देश | ,, | ||
| भृत्य के तीन भेद | ११९ | ||
| भृत्यों को छुट्टी देने का नियम | ,, | ||
| रोग के समय भृति देने का प्रकार | ,, | ||
| बारबार रोगग्रस्त के स्थान पर प्रतिनिधि रखने का निर्देश | १२० | ||
| सेवा के बिना ही भृति देने का निर्देश | ,, |
( ६ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| पराधीन-पण्डितों के व्यवहार का निर्देश | १२७ | आततायियों के लक्षण | १३२ |
| इन्द्रियों को वश में रखने का निर्देश | ,, | एक क्षण भी स्त्री आदि की उपेक्षा न करने का निर्देश | ,, |
| इन्द्रियों को वश में न रखने से अनर्थ का निर्देश | १२८ | विरुद्ध राजादिक जहां हों वहां एक दिन भी रहने का निषेध | ,, |
| स्त्रियों के स्पर्श की भी अनर्थकारिता का निर्देश | ,, | अविवेकी राजादिक से धनादि की इच्छा करने का निषेध | १३३ |
| स्त्रियों के प्रति सम्बोधन-प्रकार | ,, | मात्रादिक के पालनादि न करने पर शोक न करने का निर्देश | ,, |
| एक क्षण भी स्त्रियों के स्वातन्त्र्य का निषेध | ,, | सावधानी से राजादि की सेवा करने का निर्देश | १३४ |
| यत्नपूर्वक स्त्रियों की रक्षा करने का निर्देश | १२९ | माता आदि के साथ विरोधादि करने का निषेध | ,, |
| चैत्यादिकों के लंघन का निषेध | ,, | स्वजनादि से विरोधादि एवं स्त्री आदि से विवाद का निषेध | ,, |
| तैर कर नदी को पार आदि करने का निषेध | ,, | अकेला स्वादिष्ट भोजनादि का निषेध | ,, |
| देरतक उकरू बैठने, रात्रि में वृक्ष पर चढ़ने आदि का निषेध | १३० | अन्य धर्म के सेवन का निषेध | ,, |
| सूर्य को निरन्तर देखने का निषेध | ,, | त्याज्य निद्रादि दोषों का निर्देश | ,, |
| सन्ध्या समय में भोजनादि का निषेध | ,, | मनुष्य को कौन सा कार्य करना और कौन सा छोड़ना चाहिये इसका निर्देश | १३५ |
| व्यवहार में लोक की आचार्य्यता का कथन | १३१ | बिना पूछे किसी से कुछ कहने का निषेध | ,, |
| राजादिगत धर्म में दोष लगाने का निषेध | ,, | बिना अनुभव के स्वाभिप्राय प्रकट करने का निषेध | ,, |
| आग्रहपूर्वक भाषण का निषेध | ,, | दम्पती आदि के बीच में किसी की साक्षी न देने का निर्देश | १३६ |
| किञ्चित् भी पाप का स्मरण करने का निषेध | ,, | आपत्ति में विचलित होने एवं मर्मवेधी बातें करने का निषेध | ,, |
| अच्छे का ग्रहण एवं बुरे के त्याग का निर्देश | ,, | अश्लील बातें आदि करने का निषेध | ,, |
| सार को यत्नपूर्वक ग्रहण करने का निर्देश | १३२ | लोकनिन्दित आदि कार्य करने का निषेध | ,, |
| अधर्मरत-मित्र-पुत्रादि को राज्य से निकाल देने का निर्देश | ,, |
( ७ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| शत्रु के भी गुणों को ग्रहण करने का निर्देश | १३६ | विद्यादिकों के फल | १४१ |
| प्रारब्धवश धनी-निर्धन होने का निर्देश | १३७ | शूरतादि के फलों का निर्देश | ” |
| दीर्घदर्शी के लक्षण | ” | सुन्दर विद्यादि को नीच से भी ग्रहण करने का निर्देश | ” |
| प्रत्युत्पन्नमति के लक्षण | ” | नष्ट वस्तु की उपेक्षा करने का निर्देश | १४२ |
| आलसी मनुष्य के लक्षण | ” | परद्रव्यहरणादि का निषेध | ” |
| साहसी के लक्षण व दोष | ” | प्राणनाशादि की संभावना में झूठ बोलने का निर्देश | ” |
| चिरकारी मनुष्य के लक्षण | १३८ | स्त्री-पुरुषादि में भेद डालने का निषेध | ” |
| सहसा कार्य करने का निषेध | ” | वार्त्ता करते हुये पुरुषों के बीच जाने का निषेध | ” |
| मित्र की विशेषता | ” | सपुत्र के लिये सपुत्र कन्या आदि को लाकर गृह में बसाने का निषेध | १४३ |
| बिना समझे किसी को मित्र बनाने का निषेध | ” | सर्पादि को तुच्छ समझकर अपमान करने का निषेध | ” |
| मित्र की प्राप्ति के लिये यत्न करने का निर्देश | ” | सर्पादि से संभल कर व्यवहार करने का तथा ऋणादि का समूल नाश करने का निर्देश | ” |
| विश्वस्त का भी अत्यन्त विश्वास करने का निषेध | १३९ | याचकादि के साथ व्यवहार का प्रकार | ” |
| प्रामाणिकादि का विश्वास करने का निर्देश | ” | दाता आदि की कीर्त्ति सुनने का निर्देश | १४४ |
| परीक्षा करके विश्वस्त मानने का निर्देश | ” | समय आदि पर परिमित भोजन आदि करने का निर्देश | ” |
| उग्र दण्ड और कटु वचन का निषेध | ” | स्त्री-संभोगादि का एकान्त में करने का निर्देश | ” |
| विद्यादिकों से प्रमत्त होने का निषेध | १४० | मधुरादि षड्रस अन्न को प्रीतिपूर्वक भोजन का निर्देश | ” |
| विद्यामत्तता के अनर्थकारी फल | ” | स्व-स्त्री के साथ विहार करने का निर्देश | ” |
| शौर्यमत्तता के अनर्थकारी फल | ” | ||
| धनमत्त पुरुष की स्थिति का वर्णन | ” | ||
| कुलीनता के मद से मत्त की स्थिति का वर्णन | ” | ||
| बलमत्त की स्थिति का वर्णन | १४१ | ||
| मानमत्त की स्थिति का वर्णन | ” | ||
| विद्यादि से सज्जनों को विनयी बनने का निर्देश | ” |
( ८ )
| रात्रि में सोने के समय का एवं दीनादिक-उपहास के निषेध का निर्देश १४४ | निन्दित भी कार्यों का बड़ों के लिये भूषण होने का निर्देश १४९ |
| कार्य-साधक के कृत्यों का वर्णन १४५ | बिना अनुमति के श्रेष्ठ के संमुख बैठने का निषेध ,, |
| दुर्वचन का एवं गुरुजनादि की आज्ञा के उल्लङ्घन का निषेध ,, | मूर्ख का स्वामी बनने की इच्छा का निषेध १५० |
| असत् कार्य करानेवाले गुरु को भी बोध कराने का एवं छोटे के भी समुचित बात मानने का निर्देश ,, | आवश्यक कार्य को सर्वप्रथम करने का निर्देश ,, |
| बुरे कार्य में देरी करने का निर्देश ,, | |
| जगत् को वश में करने के उपाय ,, | |
| तरुणी स्त्री को इ तन्त्र छोड़कर जाने का निषेध ,, | वश करने के उपायों की दुर्जनों के विषय में विफलता का निर्देश १५१ |
| साध्वी भार्यादि का यत्नपूर्वक पालन का निर्देश १४६ | वेदादि के अभ्यास की हितकारिता का निर्देश ,, |
| जीवन्मृत पुरुषों का निर्देश ,, | मनुष्यों के ४ व्यसनों का निर्देश ,, |
| गुप्त रखने योग्य बातों का निर्देश १४७ | कूट व्यवहार का निषेध ,, |
| देशाटनादि की कर्त्तव्यता ,, | विहित कार्य करने का निर्देश ,, |
| देशाटन के लाभ ,, | रात्रि में सुखपूर्वक न सो सकनेवालों का निर्देश १५२ |
| सभा में बैठने से लाभ का वर्णन ,, | योग्यता न रहने पर बड़ों के अनुकरण करने एवं सर्पादि पकड़ने के लिये एकाकी गमन का निषेध ,, |
| बहुत से शास्त्रों के अध्ययन के फल ,, | मारनेवाले गुरु को भी मारने का एवं कलह में सहायता 'न करने का निर्देश ,, |
| वेश्यादर्शन के फल १४८ | गुरुजनों के आगे प्रौढपाद बैठने का निषेध ,, |
| पण्डितों के साथ मैत्री के फल ,, | उत्तम पुरुष के लक्षण ,, |
| अपने लिये केवल भोजन बनाकर खाने का निषेध ,, | स्त्री के कथनमात्र से बिना स्वयं अनुभव किये समझने का निषेध १५३ |
| गुरुजनादि के लिये मार्ग देने का निर्देश ,, | स्त्रियों के ८ दुर्गुणों का निर्देश ,, |
| शकटादिकों से दूर रहकर चलने का निर्देश ,, | |
| शृङ्गी आदि का विश्वास करने का निषेध १४९ | |
| शयनादि के निषेध के विषय ,, | |
| बड़ों की आज्ञा के बिना उनके साथ कार्य करने का निषेध ,, |
( ६ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| १६ वर्ष से ऊपर की अवस्था वाले पुत्रादि के ताड़नादि का निषेध | १५३ | विभाग कर देने का अन्यथा अनर्थ की सम्भावना का निर्देश | १५८ |
| दौहित्र आदि का पुत्रादिकों से बढ़कर पालन करने का निर्देश | ,, | २ सौत स्त्रियों एवं २ मादाओं को एक पुरुष या नर पशु के साथ एकत्र रखने का निषेध | ,, |
| स्वामी के लक्षण | ,, | ब्याजी धन या दिये ऋण धन का विभाग करने का निषेध | १५९ |
| एक शय्या पर सदा स्त्री के साथ सोने का निषेध | ,, | शाश्वत मैत्री रखने के लिये त्याज्य कर्मों का निर्देश | ,, |
| वर और मित्र की परीक्षा करने का निर्देश | १५४ | बिना साक्षी या ऋणपत्र लेख के ऋण न देने का निर्देश | ,, |
| वर के लक्षण | ,, | उत्तमोत्तमादिक पुरुषों के लक्षण | ,, |
| कन्या के लक्षण | ,, | बिना दान किये कभी कोई दिन व्यतीत न करने का निर्देश | १६० |
| विद्या और धन का संचय करने का निर्देश | १५५ | यथेष्ट दान-धर्म करने का निर्देश | ,, |
| धनार्जन के उपयोगों का निर्देश | ,, | दान से शत्रु को भी मित्र बन जाने का निर्देश | ,, |
| धन की अपेक्षा विद्या की श्रेष्ठता का निर्देश | ,, | परलोक-सुखसाधन 'संविद्' दान के लक्षण | ,, |
| अवश्य धनार्जन करने का निर्देश | ,, | पारितोष्य, श्रियादत्त या यशोऽर्थक दान के लक्षण | ,, |
| धन के प्रभाव का निर्देश | १५६ | आचारदत्त या ह्रीदत्त दान | १६१ |
| व्यवहार में लेख की आवश्यकता का निर्देश | १५७ | भीदत्त दान | ,, |
| मित्रता के नाते बिना ब्याज के भी धन देने का निर्देश | ,, | नष्टदान | ,, |
| लिखा-पढ़ी के साथ सूद पर धन देने का एवं अन्यथा रीति से न देने का निर्देश | ,, | आराध्य देव को सर्वोत्कृष्ट मानना | ,, |
| आहारादि में लज्जा-त्याग का निर्देश | ,, | वशीकर वस्तुओं में दान तथा सरलता | ,, |
| उचित व्यय करने का निर्देश | १५८ | विचार करके स्नेह या द्वेष करना | ,, |
| भार्या आदि की रक्षा करने का निर्देश | ,, | अतिक्रूरतादि का निषेध | १६२ |
| सस्त्रीक प्रौढ़ पुत्रों को धन का |
( १० )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| अतिक्रूरता आदि से अनिष्ट फल | १६२ | हिंस्र पुरुषादि की उपेक्षा करने का निषेध | १६६ |
| अपने को अधिक श्रेष्ठ न मानना | ” | चुगुलखोरी आदि दोषों से गुणियों के गुणों के ढंक जाने का निर्देश | ” |
| देवादिकों पर प्रभुत्व रखने का निषेध | १६३ | बाल्यावस्था आदि में मां आदि के मरने में महापातक के फल का निर्देश | ” |
| देवादिकों के तिरस्कार उचित नहीं | ” | दुःखप्रद विषयों का निर्देश | ” |
| युवती स्त्री, धन तथा पुस्तक को परहस्तगत करने का निषेध | ” | सुखकारक न होनेवाली ६ बातों का निर्देश | ” |
| अल्प कारण से बड़े अर्थ का एवं अधिक धन-व्यय होने से कीर्ति के त्याग का निषेध | ” | जीवन्मुक्त, खल या पशु के तुल्य के लक्षण | १६७ |
| बीर सैनिकों के दुर्वचन भी सहना | ” | खल पुरुष के लक्षण | ” |
| विनोद में भी दुखी करनेवाले वचन बोलने का निषेध | १६४ | आशाबद्ध लोगों के लिये जगत् की सम्पूर्ण वस्तु की प्राप्ति से भी कमी बोध होने का निर्देश | ” |
| कहने का असर न हो वाले से कुछ भी न कहने का निर्देश | ” | धूर्त पुरुष के कर्मों का निर्देश | ” |
| बुरे व्यसनों से अलग न करने वाले नीच की नृशंसता | ” | प्रीतिकारक व दुःखदायी पुत्र के लक्षण | ” |
| कुमित्र के लक्षण | ” | प्रीति देनेवाली स्त्री के लक्षण | १६८ |
| कठोर वचन से मित्र के शत्रु बन जाने का निर्देश | ” | आनन्ददायिनी तथा दुःखदायिनी माता के लक्षण | ” |
| स्वबलाधिक शत्रु को कन्धे पर भी ले चलने का निर्देश | ” | आनन्ददायक पिता के लक्षण | ” |
| 'मनुष्य का भूषण सुजनता है' इसका निर्देश | १६५ | मित्र के लक्षण | ” |
| अश्वादिकों में वेगादिक गुणों की भूषणता तथा अन्यथा (विपरीत) होने पर दूषणता का निर्देश | ” | मानहानिकारक कार्यों का निर्देश | ” |
| एक ही नायक आदि से ही परिवार आदि की शोभा का निर्देश | ” | मैंने सेवा की है यह समझकर राजादि के साथ अधिक संसर्ग रखने का निषेध | १६९ |
| दुःखकारक कार्यों का निर्देश | ” | ||
| स्त्रियों को पति के प्रेम से ही अधिक सुख मानने का निर्देश | ” |
( ११ )
| विषय एवं निर्देश | पृष्ठ | विषय एवं निर्देश | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| स्त्री वशवर्तिनी बने इसके उपाय | १६९ | सतर्कता से व्यवहार करने का निर्देश | १७२ |
| व्यवसाय में साधन, व्यय, लाभ आदि का विचारकर प्रवृत्त होने का निर्देश | ” | दूर रहते हुई भी समीपस्थ की भांति कार्य करनेवालों का निर्देश | १७३ |
| अधिक व्ययवाले कार्यों को न करने तथा लाभवाले कार्यों को करने का निर्देश | १७० | वेदादि के पण्डितों का बिना नीतिशास्त्र के चतुर न बनने का निर्देश | ” |
| तपस्यादि में प्रतिनिधि बनाने में हितकारिता के अभाव का निर्देश | ” | प्रथम निर्धनतादि के बाद धनी आदि होने में सुख-प्राप्ति का निर्देश | ” |
| मधुरभोजी आदिको निर्धनता आदि की इच्छा रखने का निर्देश | ” | मृतापत्यता आदि से अनपत्यता आदि की श्रेष्ठता का निर्देश | ” |
| मूर्ख जनों के कृत्य | १७१ | प्रथम सुखकर पश्चात् दुःखकर विषयों का निर्देश | १७४ |
| सत्त्वगुणी तेज की सर्वाधिक श्रेष्ठता का निर्देश | ” | कुमन्त्री आदिकों से राजादिकों के नाश का निर्देश | ” |
| स्वकर्म से ब्राह्मण की सर्वाधिक महत्ता का निर्देश | ” | शिक्षानुसार हस्त्यादि का सद्गुणादि के धारण करने का निर्देश | ” |
| स्वधर्मस्थ ब्राह्मण से क्षत्रियादि के डरने का निर्देश | ” | अधिकार प्राप्त होने पर स्वयं प्राप्त होनेवाली ३ बातें | ” |
| धर्म को हानि न पहुँचानेवाली वृत्ति की श्रेष्ठता | ” | गृहस्थियों के सुखदायक विषयों का निर्देश | १७५ |
| कृषिवृत्ति की सर्वाधिक उत्तमता | १७२ | अन्तःपुर में नियुक्त करने योग्य पुरुषों के लक्षण | ” |
| भिक्षा की अधमता तथा कश्चित् भिक्षा व सेवा की भी उत्तमवृत्तिता | ” | समय बांधकर कार्य करने आदि का एवं अर्थ और धर्म में आत्मादि की नियुक्ति करने का निर्देश | ” |
| आश्चर्य्यादि कर्मों से महाधनी न बन सकने का निर्देश | ” | प्रवास के समय में सुखदायी अनपत्य भार्य्यादि ६ का निर्देश | ” |
| बिना राजसेवा के विपुल धनप्राप्ति न होने एवं राजसेवा की अतिशय कठिनता का निर्देश | ” | ||
| राजाओं के साथ सर्प की भांति | ” |