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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 52 of 526

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Page 52

( २ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
बिना मन्त्रियों के सलाह लिये व्यवहार-निर्णय का निषेध५७अधिकारयोग्य को अधिकार देने का निर्देश७३
अच्छे सहायकों से युक्त राजा की श्रेष्ठता का निर्देश,,योग्य अधिकारी के अभाव में अन्य की योजना का निर्देश,,
बुरे सहायकों से राजा की हानि का निर्देश५८अन्य कर्मों के सचिव की योजना का निर्देश७४
युवराजादि राजा के अङ्ग हैं इसका निर्देश,,दण्डाधिपति आदि ६ की योजना का निर्देश,,
युवराज के कार्य तथा अभिषेकार्ह युवराज के अधिकारो५९राजा को तपस्वी आदियों की रक्षा करने का निर्देश७५
दुराचारी राजपुत्रों में आचार-स्थापना का निर्देश६०योजनाकर्त्ता की दुर्लभता,,
राजपुत्रों के पिता के विषय में कर्तव्यता का निर्देश६३गजाधिपति एवं महावत के लक्षण,,
अमात्यादिभृत्य-विषयक विचार६४अश्वाधिपति के लक्षण७६
श्रेष्ठ भृत्य के लक्षण६५सारथि के लक्षण,,
निन्यभृत्य के लक्षण६६घुड़सवार के लक्षण,,
दस प्रकृतियों के नाम६७अश्वशिक्षक के लक्षण,,
आठ प्रकृतियों के नाम,,अश्वसेवक ( साईस ) के लक्षण७७
पुरोहितादिकों के अधिकार६८सेनापति तथा सैनिकों के लक्षण,,
पुरोहितादिकों के लक्षण,,पत्ति ( पैदल सेना ) पाल आदिकों के अधिकार,,
प्रतिनिधि का कार्य७०शतानीकादिकों के लक्षण७८
प्रधान का कृत्य,,उपर्युक्त अधिकारियों को अपने २ चिह्नों से युक्त रहने का निर्देश,,
सचिव के कृत्य,,तित्तिरादिपोषकों की योजना का निर्देश७९
मन्त्री के कार्य७१रत्नादि के अध्यक्षों के लक्षण,,
प्राड्विवाक के कार्य,,कोषाध्यक्ष के लक्षण,,
पण्डित के कार्य,,वस्त्राधिपति के लक्षण,,
सुमन्त्र के कार्य,,वितानाधिप के लक्षण,,
अमात्य के कार्य७२धान्यपति के लक्षण८०
राजा के अन्योन्य के स्थान पर अन्योन्य की योजना का निर्देश,,पाकाध्यक्ष के लक्षण,,
अधिकार की व्यवस्था का निर्देश७३