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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 56 of 526

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Page 56

( ६ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
पराधीन-पण्डितों के व्यवहार का निर्देश१२७आततायियों के लक्षण१३२
इन्द्रियों को वश में रखने का निर्देश,,एक क्षण भी स्त्री आदि की उपेक्षा न करने का निर्देश,,
इन्द्रियों को वश में न रखने से अनर्थ का निर्देश१२८विरुद्ध राजादिक जहां हों वहां एक दिन भी रहने का निषेध,,
स्त्रियों के स्पर्श की भी अनर्थकारिता का निर्देश,,अविवेकी राजादिक से धनादि की इच्छा करने का निषेध१३३
स्त्रियों के प्रति सम्बोधन-प्रकार,,मात्रादिक के पालनादि न करने पर शोक न करने का निर्देश,,
एक क्षण भी स्त्रियों के स्वातन्त्र्य का निषेध,,सावधानी से राजादि की सेवा करने का निर्देश१३४
यत्नपूर्वक स्त्रियों की रक्षा करने का निर्देश१२९माता आदि के साथ विरोधादि करने का निषेध,,
चैत्यादिकों के लंघन का निषेध,,स्वजनादि से विरोधादि एवं स्त्री आदि से विवाद का निषेध,,
तैर कर नदी को पार आदि करने का निषेध,,अकेला स्वादिष्ट भोजनादि का निषेध,,
देरतक उकरू बैठने, रात्रि में वृक्ष पर चढ़ने आदि का निषेध१३०अन्य धर्म के सेवन का निषेध,,
सूर्य को निरन्तर देखने का निषेध,,त्याज्य निद्रादि दोषों का निर्देश,,
सन्ध्या समय में भोजनादि का निषेध,,मनुष्य को कौन सा कार्य करना और कौन सा छोड़ना चाहिये इसका निर्देश१३५
व्यवहार में लोक की आचार्य्यता का कथन१३१बिना पूछे किसी से कुछ कहने का निषेध,,
राजादिगत धर्म में दोष लगाने का निषेध,,बिना अनुभव के स्वाभिप्राय प्रकट करने का निषेध,,
आग्रहपूर्वक भाषण का निषेध,,दम्पती आदि के बीच में किसी की साक्षी न देने का निर्देश१३६
किञ्चित् भी पाप का स्मरण करने का निषेध,,आपत्ति में विचलित होने एवं मर्मवेधी बातें करने का निषेध,,
अच्छे का ग्रहण एवं बुरे के त्याग का निर्देश,,अश्लील बातें आदि करने का निषेध,,
सार को यत्नपूर्वक ग्रहण करने का निर्देश१३२लोकनिन्दित आदि कार्य करने का निषेध,,
अधर्मरत-मित्र-पुत्रादि को राज्य से निकाल देने का निर्देश,,