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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 47 of 526

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Page 47

( ४५ )

मुख, बल को मन, दुर्ग को हाथ तथा राष्ट्र को पैर¹ माना गया है। एक अन्य स्थल में² इन सात अङ्गों से एक राज्य-वृक्ष का रूपक-मय वर्णन किया गया है। इन सभी अङ्गों का महत्त्व भी पूर्वाचार्य के अनुसार विश्रुत है।

( ज ) मन्त्रि-परिषत् :—

शु० नी० सा० में यह कहा गया है कि स्वतन्त्र राजा स्वेच्छाचारी हो जाता है और अनुचित कार्य में प्रवृत्त हो सकता है। इस लिए उसे अन्यान्य सुयोग्य सहायकों का संग्रह करना³ चाहिए। इसी को हम 'मन्त्रि-परिषत्' कह सकते हैं। इसमें अपेक्षित सदस्यों की संख्या, शुक्र-नीति-सार के अनुसार, दस होनी चाहिए। ये दस सदस्य हैं—पुरोधा, प्रतिनिधि, प्रधान, सचिव, मन्त्री, प्राड्विवाक, पण्डित, सुमन्त्र, अमात्य तथा दूत⁴। इस प्रसंग में एक मतान्तर का भी उल्लेख है जिसमें केवल आठ सदस्य माने गए हैं। इस मन्त्रि-परिषद् के सदस्यों की योग्यता के विषय में शु० नी० का मत है कि इन्हें कुलीन, गुणवान्, शीलवान्, शूर, विद्वान्, राज-भक्त, प्रियम्बद्, हितोपदेष्टा, क्लेश-सह, धर्मिष्ठ, चतुर, राग-द्वेषादिदोष-रहित⁵ अतएव सच्चरित्र होना चाहिए। दुश्चरित्र एवम् अधार्मिक सहायकों के रहने पर राज्य-नाश हो जाता है। इन सदस्यों का विशेष वर्णन मूल ग्रन्थ में ही देखना चाहिए।

( झ ) सदस्यों के कार्य का विभाजन :—

शु० नी० के अनुसार सभी सदस्य सभी कार्य में हाथ नहीं बँटा सकते हैं, उन सबका अपना-अपना क्षेत्र निश्चित होना चाहिए और यह निश्चय भी उनकी तत्तद्विषयक अर्हता के आधार पर करना चाहिए। साथ ही, किसी भी समस्या का प्रस्ताव प्रजा को पहले विभागीय मन्त्री के सामने ही करना चाहिए पश्चात् उस विभागीय मन्त्री को राजा के समक्ष उस समस्या को रखनी चाहिए⁶। तदनन्तर तर्क-वितर्क तथा बहुमत के आधार पर राजा को अपना निर्णय देना चाहिए। सभी सदस्यों के कार्य के अवलोकनार्थ दर्शक ( Inspectors ) भी आवश्यक हैं। परन्तु एक-एक वर्ष में उन दर्शकों का परिवर्त्तन⁷ कर देना चाहिए, नहीं तो कार्य में सौष्ठव नहीं रह सकता है।


१. वही १।६२ ॥२. वही ४।१२५७-५८ ॥
३. वही २।१-७ ॥४. वही २।६९-७० ॥
५. वही २।८-१० ॥६. वही २।९४-१०६ ॥
७. वही २।११० ॥