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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 46 of 526

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Page 46

( ४४ )

( ङ ) राज्य का विभाजन नहीं :—

शुक्रनीति के अनुसार राजा के अनेक पुत्र होने पर भी सभी अधिकारी नहीं होते अर्थात् सबों में समान रूप में राज्य का विभाजन नहीं किया जा सकता है, क्योंकि राज्य के विभाजन¹ से तथा अनेक² नायक के होने से राज्य का विनाश नियत हो जाता है। अतः राज्य एक अविभाज्य सम्पत्ति है। हाँ, इतना अवश्य है कि अन्यान्य दायादों को जीविकार्थ कुछ³ सम्पत्ति या राज्य का चतुर्थांश⁴ देकर अपने राज्य के चतुर्दिक्षु सुव्यवस्थित कर देना चाहिए ताकि उन सबों की सहानुभूति बनी रहे, अन्यथा अन्तर्द्वन्द्व से राज्य का मूल शिथिल होने लग जाता है।

( च ) उपाय :—

शुक्रनीति में भी मनु आदि के समान चार ही उपाय—साम,⁵ दान, भेद तथा दण्ड—न कि मत्स्य-पुराण की तरह सात उपाय, माने गए हैं। इन उपायों के प्रयोग के विषय में शु० नी० का मत है कि प्रबल शत्रुओं के प्रसङ्ग में साम तथा दान, अत्यन्त प्रबल शत्रु के विषय में साम तथा भेद, समबल शत्रु के लिये भेद तथा दण्ड और हीनबल शत्रु के लिए दण्ड का प्रयोग करना चाहिए⁶। मित्रों के लिए भेद तथा दण्ड का सर्वथा प्रतिषेध और साम तथा दान का विधान, शत्रु राजाओं की प्रजा में भेद का, शत्रु-पीडित प्रजा के संग्रह के लिए साम तथा दान का भी विधान किया गया है⁷। अपनी प्रजा में साधारणतः साम तथा दान का ही प्रयोग⁸ उचित है। परन्तु यदि इन उपायों से काम न चल सके तो दण्ड का प्रयोग भी करना चाहिए जैसा पहले बतलाया जा चुका है। इन उपायों की प्रशंसा लौकिक दृष्टान्त के आधार पर शु० नी० में बहुत ही मनोहर ढंग से की⁹ गई है।

( छ ) राज्याङ्ग :—

महाभारत तथा कौटिल्य आदि में वर्णित अङ्गों की तरह शु० नी० सा० में राज्य के सात अङ्ग माने गए हैं—राजा, मन्त्री, मित्र, कोष, राष्ट्र, दुर्ग तथा बल।¹⁰ इन सात अङ्गों में मन्त्री को राजा का चक्षु, मित्र को श्रोत्र, कोश को


१. वही २।४५२. वही २।३९
३. वही २।४४४. वही २।४६
५. वही ४।३४६. वही ४।३५
७. वही ४।३६–३७८. वही ४।३८–३९
९. वही ४।११२४–२८१०. वही १।६१