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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 57 of 526

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Page 57

( ७ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
शत्रु के भी गुणों को ग्रहण करने का निर्देश१३६विद्यादिकों के फल१४१
प्रारब्धवश धनी-निर्धन होने का निर्देश१३७शूरतादि के फलों का निर्देश”
दीर्घदर्शी के लक्षण”सुन्दर विद्यादि को नीच से भी ग्रहण करने का निर्देश”
प्रत्युत्पन्नमति के लक्षण”नष्ट वस्तु की उपेक्षा करने का निर्देश१४२
आलसी मनुष्य के लक्षण”परद्रव्यहरणादि का निषेध”
साहसी के लक्षण व दोष”प्राणनाशादि की संभावना में झूठ बोलने का निर्देश”
चिरकारी मनुष्य के लक्षण१३८स्त्री-पुरुषादि में भेद डालने का निषेध”
सहसा कार्य करने का निषेध”वार्त्ता करते हुये पुरुषों के बीच जाने का निषेध”
मित्र की विशेषता”सपुत्र के लिये सपुत्र कन्या आदि को लाकर गृह में बसाने का निषेध१४३
बिना समझे किसी को मित्र बनाने का निषेध”सर्पादि को तुच्छ समझकर अपमान करने का निषेध”
मित्र की प्राप्ति के लिये यत्न करने का निर्देश”सर्पादि से संभल कर व्यवहार करने का तथा ऋणादि का समूल नाश करने का निर्देश”
विश्वस्त का भी अत्यन्त विश्वास करने का निषेध१३९याचकादि के साथ व्यवहार का प्रकार”
प्रामाणिकादि का विश्वास करने का निर्देश”दाता आदि की कीर्त्ति सुनने का निर्देश१४४
परीक्षा करके विश्वस्त मानने का निर्देश”समय आदि पर परिमित भोजन आदि करने का निर्देश”
उग्र दण्ड और कटु वचन का निषेध”स्त्री-संभोगादि का एकान्त में करने का निर्देश”
विद्यादिकों से प्रमत्त होने का निषेध१४०मधुरादि षड्रस अन्न को प्रीतिपूर्वक भोजन का निर्देश”
विद्यामत्तता के अनर्थकारी फल”स्व-स्त्री के साथ विहार करने का निर्देश”
शौर्यमत्तता के अनर्थकारी फल”
धनमत्त पुरुष की स्थिति का वर्णन”
कुलीनता के मद से मत्त की स्थिति का वर्णन”
बलमत्त की स्थिति का वर्णन१४१
मानमत्त की स्थिति का वर्णन”
विद्यादि से सज्जनों को विनयी बनने का निर्देश”