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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 55 of 526

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Page 55

( ५ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
मूल्य के न्यूनाधिक्य का कारण-निर्देश११२कटुभाषी भृत्य का भृति-दान-प्रकार१२१
पत्रलेखन-प्रकार,,राजा के भृत्य के संग वर्त्तन का वर्णन१२२
सब लेखों पर स्व-स्वमुद्राङ्कित करने का निर्देश११३भृत्य को कार्य-मुद्रा से अंकित करने का निर्देश,,
पत्र में आय-व्यय लेखन का स्थान-विचार११४भृत्यों को विशिष्ट राजचिह्न न देने का निषेध,,
व्यापक-व्याप्य के लक्षण,,१० प्रकृति पुरोहितादियों का जातिनियम१२३
स्थान-टिप्पणादि के भेद११५भागग्राही और साहसाधिपति आदि पद के लिये क्षत्रियादि रखने का निर्देश,,
शेषापव्यय-स्थलापव्ययज्ञान,,सेनापति-पद पर शूरमात्र को रखने का निर्देश,,
तिथ्यादि लिखने का निर्देश,,भृत्य के लिये त्यागने योग्य राजा के लक्षण,,
गुञ्जादिकों का लक्षण११६सबों के सुख के अर्थ प्रवृत्ति का निर्देश१२५
प्रस्थपाद का लक्षण,,धर्म के बिना सुख न मिलने का निर्देश,,
संख्या का प्रमाण,,सर्व-साधारण के लिये विहिताचरण का निर्देश,,
संख्या की अनन्तता,,निषिद्धाचरणों का निर्देश१२६
एकादि-परार्ध तक संख्याओं के नाम११७दशविध पापों का निर्देश,,
कालमान का वैविध्य एवं चान्द्रादिकों की व्यवस्था,,दरिद्री आदिकों का रक्षण करने का निर्देश,,
भृति के ३ प्रकारों का निर्देश,,समय पर हित और मित वचन कहने का निर्देश१२७
कार्यमानादिकों के लक्षण,,अकेले सुखों का उपभोगादि करने का निषेध,,
मध्यमादि भृति के लक्षण११८अपने अपमान को प्रकाशित न करने का निषेध,,
पोषण-योग्य भृति नियत करने का निर्देश,,
हीन भृति देने से अनर्थ का निर्देश,,
शूद्रादिकों को आच्छादन मात्र देने का निर्देश,,
भृत्य के तीन भेद११९
भृत्यों को छुट्टी देने का नियम,,
रोग के समय भृति देने का प्रकार,,
बारबार रोगग्रस्त के स्थान पर प्रतिनिधि रखने का निर्देश१२०
सेवा के बिना ही भृति देने का निर्देश,,