Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 44 of 526

Read in context
Page 44

( ४२ )

दो मत प्रचलित हैं—( १ ) किसी अन्य व्यक्ति ने इसकी रचना कर इसे प्रतिष्ठित करने की भावना से शुक्राचार्य के नाम से इसे सम्बद्ध कर दिया है, अथवा ( २ ) किसी अन्य शुक्र नाम के विद्वान् की रचना है । इस आधुनिक परम्परा के समर्थन में यह कहा जा सकता है कि कौटिल्य आदि के द्वारा उल्लिखित औशनस सिद्धान्त इस 'शुक्र-नीति' में प्रायेण अनुपलब्ध हैं ।

( ख ) शुक्र-नीति का रचना-काल

शुक्र-नीति में वर्णित, जाति-व्यवस्था, आचार-विचार तथा वैवाहिक-सम्बन्ध की स्थिति से मूर्त्ति-कला तथा भवन-निर्माण-कला के विशद-विवरण से और 'कुल', 'श्रेणी', 'गण' आदि कुछ विशिष्ट संस्थाओं ( जिनका अस्तित्व हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद इतिहास के साक्ष्य के आधार पर नहीं सा माना जाता है ) के निर्देश से यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि यह ग्रन्थ गुप्त-काल में या उसके कुछ ही बाद की रचना है । परन्तु डा० अल्तेकर का कथन है कि इसकी रचना ईसा के अष्टम शतक के अन्तिम भाग में हुई है जब कुछ लोग इसे सोलहवीं शताब्दी की रचना मानने के पक्ष में हैं । इन मतों में अल्तेकर साहब का मत बहुत ही उपादेय है । अन्ततः इतना प्रतीत होता है कि कुछ परिष्कार भी अर्वाचीन समय में इसका अवश्य ही हुआ है ।

( ग ) शुक्र-नीति के विषय का संक्षिप्त-विवरण

अब हमें शुक्र-नीति के प्रधान-विषयों का संक्षिप्त रूप देखना चाहिए । जैसा पहले बतलाया जा चुका है राजा का धर्म है सन्मार्ग-प्रापण । दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि अपने-अपने धर्म में धर्म-च्युत को व्यवस्थित करना ही राजा का मुख्य धर्म है । इसलिए यह आवश्यक है कि नीति-शास्त्र के ग्रन्थों में वर्ण-धर्म और वर्णाश्रम-धर्म आदि षड्विध-स्मार्त्त-धर्मों का निरूपण किया जाय, क्योंकि किसी भी व्यक्ति या जाति के उचित धर्म के परिज्ञान के विना उसे उचित धर्म पर ले जाना असम्भव है । अतएव शुक्र-नीति में¹ भी वर्ण-धर्म आदि का निरूपण किया गया है । इस वर्ण-धर्मादि में उत्पथ जन के व्यवस्थापन के लिए राजा को दण्ड-प्रयोग की और उसके साधन के रूप में सैन्य आदि सात राज्याङ्गों की आवश्यकता होती है । अतः शुक्र-नीति में भी इन विषयों का यथावत् प्रतिपादन किया गया है ।


१. शु० नी० सा० ४।२४९-३७६ ॥