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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

About this granth

The Shukraniti (शुक्रनीति), or Shukranitisara, is a Sanskrit treatise on kingship and government ascribed to Shukracharya, the preceptor of the asuras. It covers the duties of the king, the appointment of ministers and officials, the treasury and taxation, justice, forts, the army and the conduct of war, as well as social conduct, town planning and the making of images. Its date is disputed; because it describes firearms (nalika), many scholars regard its present form as relatively late.

This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi commentary called Vidyotini. It was first published in Samvat 2025 (1968) by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Varanasi, as No. 185 of the Kashi Sanskrit Granthamala; the commentator is not named in the opening pages. The scan is of a copy from the Mumukshu Bhavan Veda-Vedanga library, Varanasi.

The text runs chapter by chapter; the second chapter, for example, lays down rules on the pay of royal servants, such as setting aside a sixth or a quarter of a servant's wage for him. The volume has 526 pages.

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३३२ | शुक्रनीतिः

स्थान वाला, एवं जिसमें शरीर स्वयम् हिंडोले पर बैठने के समान आन्दोलित हो जाय (अर्थात् सुन्दर कमानीदार), और जिसके आगे की तरफ मध्य भाग में सारथी के बैठने का स्थान हो तथा जिसके अन्दर शस्त्र तथा अस्त्र भरे पड़े हों एवं मनोनुकूल छाया हुआ—इस प्रकार का बना हुआ मनोरम रथ सदा रक्खे, जिसमें अच्छे २ घोड़े जुते हों, राजा सदा सैन्य में रक्खे ।

नीलतालुर्नीलजिह्वो वक्रदन्तो ह्यदन्तकः ॥ ३२ ॥
दीर्घद्वेषी क्रूरमदस्तथा पृष्ठविधूनकः ।
दशाष्टोननखो मन्दो भुविशोधनपुच्छकः ॥ ३३ ॥
एवंविधोऽनिष्टगजो विपरीतः शुभावहः ।

**अनिष्ट तथा शुभप्रद गज का लक्षण—**नील तालु और जीभवाला, टेढ़े दाँतोंवाला या बिना दाँत का, दीर्घ काल तक द्वेष रखनेवाला, विश्रृङ्खल भाव से मद बहानेवाला, पीठ हिलानेवाला, १८ से कम नखवाला, मन्दगामी और पृथ्वी तक लटकनेवाली पूंछ से युक्त ऐसा हाथी अनिष्ट फल देनेवाला होता है एवं इससे विपरीत लक्षणों से युक्त शुभ फल देनेवाला होता है ।

भद्रो मन्द्रो मृगो मिश्रो गजो जात्या चतुर्विधः ॥ ३४ ॥

**हाथी के ४ प्रकार—**१. भद्र, २. मन्द्र, ३. मृग और ४. मिश्र भेद से गज की ४ जातियां होती हैं ।

मध्वाभदन्तः सबलः समाङ्गो वर्तुलाकृतिः ।
सुमुखोऽवयवश्रेष्ठो ज्ञेयो भद्रगजः सदा ॥ ३५ ॥

**भद्रगज के लक्षण—**मधु (शहद) के समान आभा से युक्त दाँतोंवाला, बलवान, अनुरूप अङ्गोंवाला, गोल आकारवाला, सुन्दर मुख एवं श्रेष्ठ अङ्गों-पाङ्गोंवाला गज 'भद्र' संज्ञक सदा जानना चाहिये ।

स्थूलकुक्षिः सिंहदृक् च बृहत्त्वग्गलशुण्डकः ।
मध्यमावयवो दीर्घकायो मन्द्रगजः स्मृतः ॥ ३६ ॥

**मन्द्रगज के लक्षण—**जिसके पेट स्थूल, आँखें सिंह के समान, चमड़ा मोटा एवं गला और शूंढ लम्बी, अवयव मध्यम आकार का एवं शरीर दीर्घ हो उसे 'मन्द्र' संज्ञक गज समझना चाहिये ।

तनुकण्ठदन्तकर्णशुण्डः स्थूलाक्ष एव हि ।
सुह्रस्वाधरमेढ्रस्तु वामनो मृगसंज्ञकः ॥ ३७ ॥

**मृगगज के लक्षण—**जिसके कण्ठ, दांत, कान एवं शूंढ पतले हों और आँखें स्थूल, ओष्ठ और लिङ्ग अत्यन्त छोटे तथा शरीर का आकार छोटा हो, उसे 'मृग' संज्ञक गज जानना चाहिये ।

एषां लक्षणैर्विमिश्रितो गजो मिश्र इति स्मृतः ।

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् १३३

भिन्नं भिन्नं प्रमाणं तु त्रयाणामपि कीर्तितम् ॥ ३८ ॥
मिश्रगज के लक्षण— इन सबों के कुछ २ लक्षण जिसमें मिलते हों उसे 'मिश्र' संज्ञक गज समझना चाहिये । उक्त तीनों गजों के प्रमाण भी भिन्न २ कहे हुये हैं ।

गजमाने ह्यङ्गुलं स्यादाष्टभिस्तु यवोदरैः ।
चतुर्विंशत्यङ्गुलैस्तैः करः प्रोक्तो मनीषिभिः ॥ ३९ ॥
गजमान में अंगुलादिकों का प्रमाण— गजों को नापने के लिये जौ के उदर भाग की चौड़ाई के समान चौड़ाई १ अंगुल की होती है । ऐसे २४ अंगुलों का १ हाथ विद्वान लोग कहते हैं ।

सप्तहस्तोन्नतिर्भद्रे ह्यष्टहस्तप्रदीर्घता ।
परिणाहो दशकर उदरस्य भवेत् सदा ॥ ४० ॥
भद्रगज के शरीर का मान— 'भद्रगज' की ऊंचाई ७ हाथ की, लम्बाई ८ हाथ की तथा पेट का विस्तार १० हाथ का सदा होता है ।

प्रमाणं मन्दमृगयोर्हस्तहीनं क्रमाद्गतः ।
कथितं दैर्घ्यसाम्यं तु मुनिभिर्भद्रमन्द्रयोः ॥ ४१ ॥
मन्द्र तथा मृग गज का मान— मन्द्र और मृग की ऊंचाई का प्रमाण भद्रगज से क्रम से १-१ हाथ छोटा होता है अर्थात् मन्द्र की ऊंचाई ६ हाथ की एवं मृग की ५ हाथ की होती है किन्तु मुनियों ने भद्र और मन्द्र की लम्बाई समान ही बताई है ।

बृहद्भ्रूगण्डफालस्तु धृतशीर्षगतिः सदा ।
गजः श्रेष्ठस्तु सर्वेषां शुभलक्षणसंयुतः ॥ ४२ ॥
सर्वश्रेष्ठ जिसके भौंह, गण्डस्थल तथा मस्तक बृहदाकार के हों एवं चाल सदा शीघ्रता से युक्त हो, ऐसा शुभ लक्षणों से युक्त हाथी सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है ।

पञ्चयवाङ्गुलेनैव वाजिमानं पृथक् स्मृतम् ।
चत्वारिंशाङ्गुलमुखो वाजी यश्चोत्तमोत्तमः ॥ ४३ ॥
उत्तमोत्तम अश्व के लक्षण— घोडों का मान हाथियों के मान से भिन्न होता है । इसमें ५ जौ का १ अंगुल माना जाता है । जिसका मुख ४० अंगुल का होता है, वह घोड़ा 'उत्तमोत्तम' माना जाता है ।

षट्त्रिंशदङ्गुलमुखो ह्युत्तमः परिकीर्तितः ।
द्वात्रिंशदङ्गुलमुखो मध्यमः स उदाहृतः ॥ ४४ ॥
उत्तम तथा मध्यम अश्व के लक्षण— ३६ अंगुल का मुख जिसका होता है वह 'उत्तम' तथा ३२ अंगुल का मुख हो तो 'मध्यम' समझा जाता है ।

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३३४शुक्रनीतिः

अष्टाविंशत्यङ्गुलो यो मुखे नीचः प्रकीर्तितः।
वाजिनां मुखमानेन सर्वावयवकल्पना ॥ ४५ ॥

**नीच अश्व के लक्षण तथा अश्व के अवयवों की मान-कल्पना—**और जिसका मुख २८ अंगुल का होता है वह 'नीच' घोड़ा समझा जाता है। और घोड़ों के मुख के मान के द्वारा सम्पूर्ण अवयवों के मान की भी कल्पना की जाती है।

औच्चं तु मुखमानेन त्रिगुणं परिकीर्तितम् ।
शिरोमणि समारभ्य पुच्छमूलान्तमेव हि ॥ ४६ ॥
तृतीयांशाधिकं दैर्घ्यं मुखमानाच्चतुर्गुणम् ।
परिणाहस्तूदरस्य त्रिगुणस्त्र्यङ्गुलाधिकः ॥ ४७ ॥

**अश्व की ऊंचाई और लम्बाई का प्रमाण—**उक्त मुखमान से तिगुनी ऊंचाई कही हुई है। घोड़े की शिरोमणि भाग से लेकर पूंछ के मूल भाग तक की लम्बाई मुखमान से तृतीयांश अधिक चौगुनी होती है। और उदर का विस्तार ३ अंगुल अधिक तिगुना होता है।

साधारणमिदं मानमुच्यते विस्तरादथ ।
अष्टाविंशाङ्गुलमुखं पुरस्कृत्य यथा तथा ॥ ४८ ॥
शफोच्चं त्र्यङ्गुलं ज्ञेयं मणिबन्धोऽङ्गुलाधिकः ।

यह साधारण रूप से मान कहा गया, अब विस्तारपूर्वक कहा जा रहा है। यदि २८ अंगुल प्रमाण मुखवाला नीच संज्ञक अश्व हो तो उसके खुर की ऊंचाई तीन ३ अंगुल प्रमाण की होती है और मणिबन्ध अर्थात् खुर का ऊपरी भाग १ अंगुल अधिक अर्थात् ४ अंगुल प्रमाण का होता है।

चतुर्हस्ताङ्गुला जङ्घा त्र्यङ्गुलं जानु कीर्तितम् ॥ ४९ ॥
चतुर्दशाङ्गुलावूरू कूर्परान्तं स्मृतो बुधैः ।
अष्टत्रिंशाङ्गुलं ज्ञेयं स्कन्धान्तं कूर्परादितः ॥ ५० ॥

और जंघा ४ हस्त के अंगुल प्रमाण की, जानु ३ अंगुल प्रमाण का कहा कहा हुआ है। और कूर्पर के दूनी पर्यन्त दोनों ऊरु १४ अंगुल प्रमाण का पण्डितों ने कहा है। कूर्पर से लेकर स्कन्ध पर्यन्त ऊंचाई ३८ अंगुल की होती है।

प्रत्यगूरू मुखसमौ जङ्घोना पादमानतः ।
प्रोक्तोच्चता चाथ दैर्घ्यमुच्यते शास्त्रसङ्गतम् ॥ ५१ ॥

और पीछे के दोनों ऊरु मुख के समान अर्थात् २८ अंगुल प्रमाण के होते हैं। और पीछे की जंघा चौथाई मान से कम होती है। इस प्रकार से घोड़ों की ऊंचाई का वर्णन किया गया अब शास्त्र-संगत लम्बाई का वर्णन किया जा रहा है।

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३५

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३५

षष्ठांशेनाधिका ग्रीवा द्विगुणा सुप्रसारिता ।
मुखतश्चोच्छ्रिता सार्धपादहीना तु पूर्वतः ॥ ५२ ॥
स्कन्धादि मुष्कमूलान्तं ग्रीवातुल्यं तु तत्र हि ।
द्व्यंशषष्ठं त्रिकं यावत् शेषमंसं प्रकल्पयेत् ॥ ५३ ॥
मुखार्धं पुच्छदण्डं च शिश्न आण्डौ तदर्धकौ ।
कर्णः षडङ्गुलो दीर्घश्चतुःपञ्चाङ्गुलः क्वचित् ॥ ५४ ॥

सुविस्तृत ग्रीवा लम्बाई में मुख की अपेक्षा षष्ठांश अधिक दुगुनी होती है तथा मुख से साढ़े चौथाई हीन उन्नत होती है । उसमें घोड़ों में स्कन्ध से लेकर अण्डकोष के मूल पर्यन्त लम्बाई ग्रीवा के तुल्य होती है । पृष्ठवंश (रीढ़) के (अधोभाग तक शेष भाग स्कन्ध की लम्बाई ग्रीवा के ) दो अंश और षष्ठ भाग तुल्य होती है । पुच्छदण्ड और शिश्न की लम्बाई मुख की आधी होती है, दोनों अण्डकोषों की लम्बाई शिश्न की आधी होती है । कर्ण की लम्बाई ६ अंगुल की होती है और कहीं २ चार या पांच अंगुल की भी होती है ।

परिणाहः शफस्योक्तो मुखार्धेनाङ्गुलाधिकः ।
तदर्धो मणिबन्धस्य जङ्घायाः परिधिः स्मृतः ॥ ५५ ॥
दशैकाङ्गुलपरिधी रम्योरूः कीर्त्तिता बुधैः ।
पृष्ठोरुपरिधिर्मूले त्रिः षष्ठांशो मुखेषु च ॥ ५६ ॥
बहिरन्तर्धनुःखण्डसदृशा शरभोन्मजा ।
मणिबन्धमणेर्ज्ञेयः परिधिश्च नवाङ्गुलः ॥ ५७ ॥
अन्त्यजङ्घादिपरिधिर्विज्ञेयः पूर्ववद् बुधैः ।

खुर का विस्तार एक अंगुल अधिक मुख के परिमाण का आधे भाग का होता है । और मणिबन्ध और जंघा की परिधि उसकी आधी होती है । रमणीय ऊरु की परिधि ११ अंगुल परिमित पण्डितों ने कही है । पीछे की ऊरु की परिधि मूल भाग में ३ अंगुल परिमित और अग्रभाग में षष्ठ अंश परिमित होती है । मणिबन्ध की चिह्न विशेष मणि की परिधि नव अंगुल की होती है और अन्तिम जंघा आदि की परिधि पूर्ववत् पण्डितों को जानना चाहिये ।

अक्ष्णोरन्तरे चिह्नमङ्गुलं पक्ष्ममूलयोः ॥ ५८ ॥
सार्धाङ्गुलं सटास्थानं ग्रीवोपरि सुविस्तृतम् ।
शिरोमणिं समारभ्य दीर्घं स्कन्धान्तमुत्तमम् ॥ ५९ ॥
अधोगमा सटा कार्या हस्तमात्रायता शुभा ।
सार्धहस्ता द्विहस्ता वा पुच्छबालाः सुशोभनाः ॥ ६० ॥

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३३६ शुक्रनीतिः

और दोनों ऊरुओं के मध्य में पार्श्वमूलों का चिह्न अंगुल परिमित होता है। ग्रीवा के ऊपर सुविस्तृत शिरोमणि से लेकर स्कन्ध पर्यन्त प्रधान सटा (अयाल) का स्थान डेढ़ अंगुल लम्बा है। और (मूर्ति में) नीचे की ओर लटकती हुई हाथभर की लम्बी शुभ सटा (अयाल) करनी चाहिये। और पूंछ के बाल डेढ़ हाथ या दो हाथ लम्बे शोभन करने चाहिये।

सप्ताष्टनवदशभिरङ्गुलैः कर्णदीर्घता।
तथा तद्विस्तृतिर्ज्ञेया त्र्यङ्गुला चतुरङ्गुला ॥ ६१ ॥
न स्थूला नापि चिपिटा ग्रीवा मयूरसन्निभा।
ग्रीवाप्रपरिधिस्तुल्यो मुखेनाधिकमुष्टिकः ॥ ६२ ॥
ग्रीवामूलस्य परिधिर्द्विगुणो विदशाङ्गुलः।
तृतीयांशविहीनं तु सत्क्रोडं वक्ष ईरितम् ॥ ६३ ॥

और कर्ण की लम्बाई ७, ८, ९ या १० अंगुल परिमित की होनी चाहिये और उसकी चौड़ाई ३ या ४ अंगुल की होनी चाहिये। और न मोटी, न चिपटी, मयूर के समान ग्रीवा होनी चाहिये। ग्रीवा के अग्रभाग की परिधि मुख के परिमाण से एक मुष्टि अधिक होनी चाहिये। ग्रीवामूल की परिधि मुख के परिमाण से १० अंगुल कम दुगुना होना चाहिये। और उत्तम उत्संगवाला वक्षःस्थल का मान मुख के मान से तृतीयांश कम कहा हुआ है।

नेत्रोपरि परीणाहो मुखेनाष्टाङ्गुलाधिकः।
नासिकोपरि नेत्राधो मुखस्य परिधिस्तु यः ॥ ६४ ॥
तृतीयांशविहीनेन मुखेन सदृशो भवेत्।
द्व्यङ्गुलं नेत्रविस्तृतिस्त्र्यङ्गुला तस्य दीर्घता ॥ ६५ ॥
अर्धाङ्गुलाधिका वापि विस्तृतिर्दीर्घताङ्गुला।
मुखतृतीयांशमेतदूर्वोर्मध्येऽन्तरं स्मृतम् ॥ ६६ ॥
नेत्राग्रयोरन्तरं तु पञ्चमांशं मुखस्य हि।
कर्णयोरन्तरं तद्वत् कर्णनेत्रान्तरं तथा ॥ ६७ ॥

नेत्र के ऊपर का विस्तार मुख के मान के तुल्य होता है किन्तु ८ अंगुल अधिक होता है। नासिका के ऊपर और नेत्र के नीचे जो मुख की परिधि है वह तृतीयांशहीन मुख के मान के तुल्य होती है। नेत्र के विस्तार का मान २ अंगुल एवं नेत्र की लम्बाई का मान ३ अंगुल का होता है अथवा नेत्र का विस्तार आधा अंगुल अधिक अर्थात् ढाई अंगुल मान का और लम्बाई एक अंगुल अधिक अर्थात् तीन अंगुल की होनी चाहिये। ऊरुओं के मध्य में यह अन्तर मुख का तृतीयांश तुल्य होना चाहिये तथा नेत्र के दोनों अग्रभागों का

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३७

अन्तर मुख के पञ्चमांशतुल्य होना चाहिये । दोनों कर्णों का अन्तर भी सदृश तथा कर्ण और नेत्र का अन्तर भी उसी प्रकार से होता है ।

भूस्थयोः शफयोः प्रोक्तं तदेतत् कर्णसंमितम् ।
मणिनेत्रप्रान्तरं च भ्रुवोरन्तरमेव हि ॥ ६८ ॥
सक्थ्यङ्गुलं तृतीयांशं नासानेत्रान्तरं तथा ।
त्रिभागपूरणं प्रोथः सोष्ठश्च परिकीर्तितः ॥ ६९ ॥
नासारन्ध्रान्तरं चैव तद्-दैर्घ्येनवमांशकम् ।
कायो नरार्धविस्तारस्त्रिके हृदयसंमितः ॥ ७० ॥
चतुर्थांशं तु हृदयं बाहुमूलादधः स्मृतम् ।
षष्ठांशमन्तरं बाह्वोर्हृत्समीपे प्रकीत्तितम् ॥ ७१ ॥

और भूमिस्थित दोनों खुरों का जो यह अन्तर है वह कर्ण के मान के तुल्य कहा हुआ है । मणि और नेत्र का अन्तर, दोनों भौंहों का अन्तर तथा नासिका और नेत्र का अन्तर सक्थि (ऊरु) के अंगुलों का तृतीयांश तुल्य मान समझना चाहिये । और ओष्ठ के सहित मुख का अग्रभाग मुख के मान के तृतीयांशतुल्य कहा हुआ है । तथा दोनों नासिकाओं के छिद्रों का अन्तर उन दोनों की लम्बाई के मान के तृतीयांश तुल्य मानवाला होता है । शरीर मनुष्य के विस्तार से आधा विस्तारवाला, पृष्ठवंश (रीढ़) के नीचे भाग में हृदय (वक्षस्थल) के समान विस्तार होता है तथा हृदय बाहुमूल के नीचे चतुर्थांश तुल्य कहा हुआ है । हृदय के समीप में दोनों बाहुओं का अन्तर षष्ठांश तुल्य होता है ।

अधरोष्ठोऽनुचिबुकं सार्धाङ्गुलमथोन्नतम् ।
शोभते चोन्नतग्रीवो नतपृष्ठः सदा हयः ॥ ७२ ॥
यद्रूपं कर्तुमुद्युक्तस्तद्विम्बं वीक्ष्य सर्वतः ।
अदृष्ट्वा कस्य यद्रूपं न कर्तुं क्षमते हि तत् ॥ ७३ ॥
शिल्प्यग्रे वाजिनं ध्यात्वा कुर्यादवयवानतः ।
दिशाऽनया च विभूतेः सर्वमानानि वाजिनाम् ॥ ७४ ॥

अधरोष्ठ चिबुक तक डेढ़ अंगुल उन्नत होता है । और घोड़ा सदा उन्नत ग्रीवा तथा नत पृष्ठवाला शोभायमान होता है । जिसकी आकृति बनाने के लिये जो उद्यत हो वह सब तरफ से देखकर उसके बिम्ब (प्रतिकृति) को करे । किसी का जो रूप हो उसको बिना देखकर उसकी प्रतिकृति बनाने के लिये कोई समर्थ नहीं हो सकता है । अतः शिल्पी (मूर्तिकार) प्रथम घोड़े का ध्यान कर पश्चात् उसके अङ्गों को बनावे । इसी रीति से घोड़ों के अवयवों के सभी मानों की कल्पना करे ।

२२ शु०

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३३८शुक्रनीतिः

श्मश्रुहीनमुखः कान्तः प्रगल्भोत्तुङ्गनासिकः ।
दीर्घोद्धतग्रीवमुखो ह्रस्वकुक्षिखुरश्रुतिः ॥ ७५ ॥
तुरप्रचण्डवेगश्च हंसमेघसमस्वनः ।
नातिक्रूरो नातिमृदुर्देवसत्त्वो मनोरमः ॥ ७६ ॥

उत्तम अश्व के अन्य लक्षण— जिस घोड़े के मुख पर बाल न हों एवं सुन्दर मुख तथा शब्द हो और नासिका ऊंची हो, तथा गर्दन और मुख लम्बे एवं कुछ उठे हुये हों, पेट, खुर एवं कान छोटे हों, अत्यन्त शीघ्र और प्रचण्ड वेग हो, हंस तथा मेघ के समान शब्द हो और स्वभाव न अत्यन्त क्रूर तथा न अत्यन्त मृदु ही हो, देवताओं के घोड़ों के समान उत्तम पराक्रम हो—ऐसा घोड़ा मन को मोहित करनेवाला अतएव उत्तम होता है ।

सुकान्तिगन्धवर्णश्च सद्गुणभ्रमरान्वितः ।
घोड़ों की कान्ति, गन्ध और वर्ण सुन्दर एवं अच्छे गुणवाले भौंरी ( भ्रमर ) होनी चाहिये ।

भ्रमरस्तु द्विधावर्त्तो वाम-दक्षिणभेदतः ॥ ७७ ॥
पूर्णोऽपूर्णः पुनर्द्वेधा दीर्घो ह्रस्वस्तथैव च ।

अश्व के भौंरी के दो भेद— और भौंरी का घुमाव वाम तथा दक्षिण भेद से दो प्रकार का होता है पुनः प्रत्येक के पूर्ण तथा अपूर्ण एवं दीर्घ और ह्रस्व भेद से दो २ प्रकार होते हैं ।

स्त्रीपुंदेहे वामदक्षौ यथोक्तफलदौ क्रमात् ॥ ७८ ॥

घोड़ा और घोड़ी के शरीर में दक्षिण तथा वाम तरफ भौंरी के शुभ फल— उक्त भौंरियां तभी यथोक्त उत्तम फल देनेवाली होती हैं जब कि वे क्रम से घोड़ी के बाएँ तथा घोड़े के दाहिनी ओर हों ।

न तथा विपरीतो तु शुभाशुभफलप्रदौ ।

अन्यथा होने पर फलाभाव का निर्देश— यदि उक्त प्रकार से विपरीत हों अर्थात् उक्त स्थान ( दायें-बायें ) से अन्यत्र कहीं पर हों तो शुभ या अशुभ कोई फल नहीं देनेवाली होती है ।

नीचोर्ध्वतिर्यङ्मुखतः फलभेदो भवेत्तयोः ॥ ७९ ॥

भौंरियों के नीचे-ऊंचे होने में फलभेद— यदि भौंरियों का मुख नीचा, ऊंचा या तिरछा हो तो तदनुसार फल में भी भेद हो जाता है ।

शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म-वेदि-स्वस्तिकसन्निभः ।
प्रासादतोरणधनुःसुपूर्णकलशाकृतिः ॥ ८० ॥
स्वस्तिकस्रङ्मीनखड्गश्रीवत्साभः शुभ्रो भ्रमः ।

शुभ भौंरी के लक्षण— भौंरी शंख, चक्र, गदा, पद्म, वेदी या स्वस्तिक

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३९

(卐), के चिह्न की किंवा प्रासाद, तोरण, धनुष या पूर्ण कलश के आकार की होती है और स्वस्तिक, माला, मत्स्य, खङ्ग तथा श्रीवत्स के समान आकारवाली भौंरी शुभ मानी जाती है।

नासिकाग्रे ललाटे च शङ्खे कण्ठे च मस्तके ॥ ८१ ॥
आवर्त्तॊ जायते येषां ते धन्यास्तुरगोत्तमाः ।

**भौंरी के स्थानानुसार घोड़े की उत्तमता—**जिन घोड़ों की नासिका के अग्रभाग, ललाट, शङ्ख (कनपटी), कण्ठ या मस्तक में भौंरो हो वे धन्य तथा घोड़ों में 'उत्तम' माने जाते हैं।

हृदि स्कन्धे गले चैव कटिदेशे तथैव च ॥ ८२ ॥
नाभौ कुक्षौ च पार्श्वाग्रे मध्यमाः संप्रकीर्तिताः ।

**भौंरी के स्थानानुसार घोड़े की मध्यमत्ता—**जिनके हृदय, स्कन्ध (कन्धा), गळा, कमर, नाभि, कुक्षि (उदर) तथा पार्श्व के अग्रभाग में भौंरी होती है वे घोड़े 'मध्यम' माने जाते हैं।

ललाटे यस्य चावर्त्तद्वितयस्य समुद्भवः ॥ ८३ ॥
मस्तके च तृतीयस्य पूर्णहर्षोऽश्व उत्तमः ।

**'पूर्णहर्ष' अश्व के लक्षण तथा फल—**जिसके ललाट में दो भौरियां हों और तीसरी मस्तक में हों वह 'पूर्णहर्ष' (पूर्ण हर्ष देनेवाला) उत्तम अश्व माना जाता है।

पृष्ठवंशे यदावर्त्तो यस्यैकः संप्रजायते ॥ ८४ ॥
स करोत्यश्वसंघातान् स्वामिनः सूर्यसंज्ञकः ।

**'सूर्यसंज्ञक' अश्व के लक्षण तथा फल—**जिस अश्व के पृष्ठवंश (रीढ़) के ऊपर एक भौंरी हो वह 'सूर्यसंज्ञक' कहा जाता है एवं वह अपने स्वामी के यहां आने पर बहुत से घोड़ों को एकत्र कर देता है।

त्रयो यस्य ललाटस्था आवर्त्तास्तिर्यगुत्तराः ॥ ८५ ॥
त्रिकूटः स परिज्ञेयो वाजिवृद्धिकरः सदा ।

**अश्व-वृद्धिकर 'त्रिकूट' अश्व के लक्षण—**जिस अश्व के ललाट में तीन भौरियां हों और तिरछे मुखवाली हों तो उसे 'त्रिकूट' संज्ञक कहते हैं, जो सदा स्वामी के यहां घोड़ों की वृद्धि करनेवाला होता है।

एवमेव प्रकारेण त्रयो ग्रीवां समाश्रिताः ॥ ८६ ॥
समावर्त्ताः स बाजीशो जायते नृपमन्दिरे ।

**अन्य भौरियों से युक्त अश्वों के लक्षण—**इसी तरह से यदि अश्व की ग्रीवा में ३ भौरियां हों तो वह अश्व श्रेष्ठ राजमन्दिर में ही रहता है अर्थात् ऐसा यदि किसी के पास रह जाय तो स्वामी को राजा बना दे।

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३४० शुक्रनीतिः

कपोलस्थौ यदावर्त्तौ दृश्येते यस्य वाजिनः ॥ ८७ ॥
यशोवृद्धिकरौ प्रोक्तौ राज्यवृद्धिकरौ मतौ ।
एको वाऽथ कपोलस्थो यस्यावर्त्तः प्रदृश्यते ॥ ८८ ॥
सर्वनामा स विख्यातः स इच्छेत् स्वामिनाशनम् ।

यशोवर्द्धक तथा 'सर्व' संज्ञक अश्व के लक्षण— यदि किसी अश्व के दोनों कपोलों पर दो भौरियां हों तो स्वामी के लिये वे दोनों यश तथा राज्य की वृद्धि करनेवाली मानी गई हैं । जिस अश्व के एक ही कपोल पर एक ही भौरी हो वह 'सर्व' संज्ञक होता है तथा स्वामी का नाश चाहता है ।

गण्डसंस्थो यद्यावर्त्तो वाजिनो दक्षिणाश्रितः ॥ ८९ ॥
स करोति महासौख्यं स्वामिनः शिवसंज्ञकः ।
तद्वामाश्रितः क्रूरः प्रकरोति धनक्षयम् ॥ ९० ॥

शिव-संज्ञक तथा क्रूर-संज्ञक के लक्षण— जिसके दक्षिण गण्डस्थल पर एक भौंरी हो वह 'शिव' संज्ञक अश्व स्वामी के लिये महा सुखकारी होता है । इसी प्रकार से बायें गण्डस्थल पर यदि भौंरी हो तो वह अश्व 'क्रूर' संज्ञक होता है तथा धनक्षयकारक होता है ।

इन्द्राख्यौ तावुभौ शस्तौ नृपराज्यविवृद्धिदौ ।

इन्द्र-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— यदि गण्डस्थल के दोनों ओर भौरियां पड़ी हों तो वे 'इन्द्र' संज्ञक होती हैं और उत्तम एवं राजा के राज्य की वृद्धि करनेवाली होती हैं ।

कर्णमूले यदावर्त्तौ स्तनमध्ये तथाऽपरौ ॥ ९१ ॥
विजयाख्यावुभौ तौ तु युद्धकाले यशःप्रदौ ।

विजय-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— अश्व के कर्ण के मूल भाग में दो तथा स्तन के मध्य में दो भौरियां हों तो ये दोनों 'विजय' संज्ञक होती हैं और युद्ध काल में विजय दिलाने से यशप्रद होती हैं ।

स्कन्धपार्श्वे यदावर्त्तौ स भवेत् पद्मैलक्षणः ॥ ९२ ॥
करोति विविधान् पद्मान् स्वामिनः सततं सुखम् ।

पद्म-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— दोनों स्कन्ध के पार्श्व भाग में यदि भौंरी हों तो उसे 'पद्म' संज्ञक कहते हैं । ऐसा अश्व स्वामी के सुख की सदा वृद्धि करता है एवं विविध प्रकार से पद्मसंख्यक धन का आगमन कराता है ।

नासामध्ये यदावर्त्त एको वा यदि वा त्रयम् ॥ ९३ ॥
चक्रवर्ती स विज्ञेयो वाजी भूपालसंज्ञकः ।

भूपाल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— जिसकी नासिका के मध्य में

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४१

यदि १ या ३ भौरियां हों तो वह 'भूपाल' संज्ञक अश्व होता है जो स्वामी को चक्रवर्ती राजा बना देता है ।

कण्ठे यस्य महावर्त्त एकः श्रेष्ठः प्रजायते ॥ ६४ ॥
चिन्तामणिः स विज्ञेयश्चिन्तितार्थसुखप्रदः ।

चिन्तामणि-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— जिसके कण्ठ में श्रेष्ठ एक बड़ी-सी भौंरी हो वह अश्व 'चिन्तामणि' संज्ञक होता है जो अभिलषित अर्थ तथा सुख को देनेवाला होता है ।

शुक्लाख्यौ भालकण्ठस्थौ आवर्तौ वृद्धिकीर्तिदौ ॥ ६५ ॥

शुक्ल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— जिस अश्व के ललाट तथा शंख देश में जो भौरियां होती हैं वे दोनों 'शुक्ल' संज्ञक होती हैं और राज्य-धनादि की वृद्धि तथा कीर्ति को देनेवाली होती हैं ।

यस्यावर्त्तौ वक्त्रगतौ कुद्यन्ते वाजिनो यदि ।
स नूनं मृत्युमाप्नोति कुर्याद् वा स्वामिनाशनम् ॥ ६६ ॥

अनिष्टकारक अश्वों के लक्षण— जिस अश्व के कुक्षि के अन्त भाग में यदि टेढ़ी दो भौरियां हों तो वह निश्चय स्वयं मर जाय या अपने स्वामी का नाश करे ।

जानुसंस्था यदावर्त्तः प्रवासक्लेशकारकाः ।
वाजिमेढ़े यदावर्त्तो विजयश्रोविनाशनः ॥ ६७ ॥

जिस अश्व के जानुओं ( घुट्टों ) पर ३ भौरियां हों, उनसे स्वामी को परदेश में विशेष क्लेश होता है । घोड़े के यदि लिङ्ग में भौंरी हो तो वह विजय और श्री ( लक्ष्मी ) का नाशक होता है ।

त्रिकसंस्थो यदावर्त्तस्त्रिवर्गस्य प्रणाशनः ।
पुच्छमूले यदावर्त्तो धूमकेतुरनर्थकृत् ॥ ६८ ॥

धूमकेतु-संज्ञक भौंरी के लक्षण फल— जिसकी पीठ के त्रिकस्थान में भौंरी हो तो वह त्रिवर्ग ( धर्म, अर्थ, काम ) का नाशक होता है । घोड़े के पूंछ के मूल में जो भौंरी हो, वह 'धूमकेतु' संज्ञक है तथा अनर्थकारक होता है ।

गुह्यपुच्छत्रिकावर्ती स कृतान्तो भयप्रदः ।

कृतान्त-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल— जिस घोड़े की गुदा, पूंछ तथा त्रिकस्थान में भौंरी हो वह 'कृतान्त' संज्ञक होता है जो कि भयदायक होता है ।

मध्यदण्डा पार्श्वगमा सैव शतपदी कचे ॥ ६९ ॥
अतिदुष्टाङ्गुष्ठमिता दीर्घा दुष्टा यथा यथा ।

घोड़े के पूंछ के शुभाशुभ फल— जिसकी पूंछ दोनों पाश्र्वों की ओर जावे और मध्य में दण्ड के आकार का चिह्न हो एवं यह एक अंगुष्ठ बराबर लम्बा

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३४२शुक्रनीतिः

हो तो उसे 'मध्यदण्डा' या 'शतपदी' कहते हैं यह अत्यन्त दुष्ट मानी जाती है। उसके बाद जैसे २ वह लम्बी होती जाती है वैसे २ उसकी दुष्टता नष्ट होकर शुभ फल देनेवाली होती जाती है ।

अश्रुपातो हनुगण्डहृद्गलप्रोथवस्तिषु ॥ १०० ॥
कटिशङ्खजानुमुष्क-ककुन्नाभिगुदेषु च ।
दक्षकुकौ दक्षपादे त्वशुभो भ्रमरः सदा ॥ १०१ ॥

**भौरियों के अशुभप्रद स्थानों का निर्देश—**यदि अश्व के हनु ( ठोढ़ी ), गण्डस्थल, हृदय, गला, प्रोथ ( मुखाग्रभाग ), बस्तिस्थान, कमर, शंख ( कनपटी ), जानु ( घोटू ), मुष्क ( अण्डकोश ), ककुद् ( पीठ पर उभरा हुआ स्थान ), नाभि, गुदा, में भौंरी हो तो अश्रुपातकारक होती है और दक्षिण कुक्षि या दक्षिण पेट में हो तो वह सदा अशुभ फल देनेवाली मानी जाती है।

गलमध्ये पृष्ठमध्ये उत्तरोष्ठेऽधरे तथा ।
कर्णनेत्रान्तरे वामकुक्षौ चैव तु पार्श्वयोः ॥ १०२ ॥
ऊरुषु च शुभावतौ वाजिनामग्रपादयोः ।

**आवत्तं भौरियों के शुभप्रद स्थानों का निर्देश—**अश्व के गले या पीठ के मध्य में, ऊपर या नीचे के ओष्ठ, कर्ण और नेत्र के मध्य में, बाईं कुक्षि, दोनों पार्श्व, दोनों ऊरु, या दोनों अगले पांवों में, भौरियाँ हों तो बड़ी शुभ देने वाली होती हैं।

आवर्तौ सान्तरौ भाले सूर्य्यचन्द्रौ शुभप्रदौ ॥ १०३ ॥
मिलितौ तौ मध्यफलौ ह्यतिलग्नौ तु दुष्फलौ ।

**सूर्य-चन्द्रसंज्ञक भौंरी के स्थानानुसार शुभाशुभ फल का निर्देश—**और भाल में यदि कुछ अन्तर पर दो भौरियाँ हो तो वे सूर्य-चन्द्र संज्ञक होती हैं तथा 'उत्तम' शुभ फल देने वाली होती हैं यदि कुछ सटी हुई हों तो 'मध्यम' शुभ फल देनेवाली एवं अत्यधिक सटी हुई हों तो 'दुष्ट' फल देनेवाली होती हैं।

आवर्तत्रितयं भाले शुभं चोर्ध्वं तु सान्तरम् ॥ १०४ ॥
अशुभं चातिसंलग्नमावर्त्तद्वितयं तथा ।
त्रिकोणत्रितयं भाले आवर्तानां तु दुःखदम् ॥ १०५ ॥
गलमध्ये शुभस्त्वेकः सर्वाशुभनिवारणः ।

**शुभाशुभ फलप्रद भौंरी के स्थानों का निर्देश—**यदि अश्व के भाल में ऊपर की ओर ३ भौरियां अलग २ हों तो शुभ फलप्रद होती हैं। यदि भाल में दो भौरियां अत्यन्त सटी हुई हों तो अशुभ फलप्रद होती हैं। और भाल में

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चतुर्थोऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४३

यदि त्रिकोणाकार ३ भौरियां हों तो दुःखप्रद होती हैं। गले के मध्य में यदि एक भौंरी हो तो वह शुभ फलप्रद और समस्त अशुभ फलों को दूर करने वाली होती है।

अधोमुखः शुभः पादे भाले चोर्ध्वमुखो भ्रमः ॥ १०६ ॥
न चैवात्यशुभा पृष्ठमुखी शतपदी मता।

पैर में अधोमुख एवं भाल में ऊर्ध्वमुख भौंरी शुभ होती है पीठ की ओर मुखवाली जो 'शतपदी' होती है वह अत्यन्त अशुभ फल देनेवाली नहीं होती है।

मेढ्रस्य पश्चाद् भ्रमरी स्तनी बाजी स चाशुभः ॥ १०७ ॥

और जिस अश्व के लिङ्ग के पीछे भौंरी या स्तन हो, वह अशुभ फलप्रद होता है।

भ्रमः कर्णसमीपे तु शृङ्गी चैकः स निन्दितः ।
ग्रीवोर्ध्वेपाश्र्वे भ्रमरी ह्येकरश्मिः स चैकतः ॥ १०८ ॥

**एकशृङ्गी तथा एकरश्मि-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल—**जिस के कान के समीप में भौंरी होती है वह अश्व 'एकशृङ्गी' कहलाता है और निन्दित होता है। ग्रीवा के ऊपर पार्श्व में एक तरफ जो भौंरी होती है वह 'एकरश्मि' कहलाती है वह भी निन्दित होती है।

पादोर्ध्वमुखभ्रमरी कीलोत्पाटी स निन्दितः ।
शुभाशुभौ भ्रमौ यस्मिन्स वाजी मध्यमः स्मृतः ५ १०६ ॥

**कीलोत्पाटी व मध्यम आवत्तों के लक्षण व फल—**पैरों में यदि ऊर्ध्व मुख वाली भौंरी हो तो उसे 'कीलोत्पाटी' कहते हैं। वह निन्दित होता है। जिस अश्व में शुभ तथा अशुभ दोनों प्रकार की भौरियां होती हैं, वह 'मध्यम' कहलाता है।

मुखे पत्सु सितः पञ्चकल्याणोऽश्वः सदा मतः ।
स एव हृदये स्कन्धे पुच्छे श्वेतोऽष्टमङ्गलः ॥ ११० ॥

**पञ्चकल्याण व अष्टमङ्गल अश्व के लक्षण व फल—**जिसके मुख और चारों पैर सफेद हों, वह अश्व 'पञ्चकल्याण' संज्ञक सदा कहलाता है। यही सफेदी हृदय, स्कन्ध तथा पुच्छ में घोड़े को हो तो वह 'अष्टमङ्गल' संज्ञक होता है।

कर्णे श्यामः श्यामकर्णः सर्वतस्त्वेकवर्णभाक् ।
तत्रापि सर्वतः श्वेतो मेध्यः पूज्यः सदैव हि ॥ १११ ॥

**श्यामकर्ण अश्व के लक्षण—**यदि केवल कान ही मात्र कृष्ण वर्ण के हों और सर्वत्र कोई एक वर्ण हो तो वह अश्व 'श्यामकर्ण' संज्ञक होता है। और

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३४४ | शुक्रनीतिः

जिस श्यामकर्ण घोड़े का सारा शरीर एक वर्ण का हो किन्तु वह श्वेत वर्ण हो तो वह अश्वमेध के योग्य होने से सदैव पूज्य होता है।

वैदूर्यसन्निभे नेत्रे यस्य स्तो जयमङ्गलः।
मिश्रवर्णस्त्वेकवर्णः पूज्यः स्यात् सुन्दरो यदि ॥ ११२॥
**जयमङ्गल अश्व के लक्षण—**जिस घोड़े की आंखें वैदूर्य मणि के समान कालापन युक्त सफेद हों वह 'जयमङ्गल' संज्ञक होता है। कोई भी घोड़ा चाहे अनेक वर्ण का या एक वर्ण का हो किन्तु देखने में सुन्दर हो तो वह पूज्य होता है।

कृष्णपादो हरिर्निन्यस्तथा श्वेतैकपादपि ।
रूक्षो धूसरवर्णश्च गर्दभामोऽपि निन्दितः ॥ ११३॥
जिस अश्व के पैर काले हों अथवा एक ही पैर सफेद हो किंवा जो रूप धूसर वर्ण का गदहे के समान हो वह निन्दित होता है।

कृष्णतालुः कृष्णजिह्वः कृष्णोष्ठश्च विनिन्दितः।
सर्वतः कृष्णवर्णो यः पुच्छे श्वेतः स निन्दितः ॥ ११४॥
जिसका तालु, जिह्वा और ओष्ठ कृष्ण वर्ण का हो अथवा सर्वत्र कृष्ण वर्ण का हो किन्तु पूंछ श्वेत वर्ण की हो तो वह निन्दित होता है।

उच्चैः पदन्यासगतिर्द्विपव्याघ्रगतिश्च यः।
मयूरहंसतित्तिरपारावतगतिश्च यः ॥ ११५॥
मृगोष्ट्रश्वानरगतिः पूज्यो वृषगतिर्हयः ।
**अश्वों की श्रेष्ठ गति के लक्षण—**जो अश्व ऊंचा पैर उठाकर चलता हो किंवा जिसकी चाल हाथी अथवा सिंह की सी हो और जिसकी मोर, हंस, तीतर, कबूतर, मृग, ऊँट या बैल की सी चाल हो तो वह पूज्य (श्रेष्ठ चालवाला) होता है।

अतिमुक्तोऽतिपीतोऽपि यथा सादी न पीड्यते ॥ ११६॥
श्रेष्ठा गतिस्तु सा ज्ञेया स श्रेष्ठस्तुरगो मतः।
घोड़े की वही चाल श्रेष्ठ कहलाती है कि जिससे अत्यन्त भोजन करके या अत्यन्त जल पीकर के भी सवारी करने पर सवार को कष्ट न मालूम पड़े। और वही घोड़ा श्रेष्ठ भी माना जाता है।

सुश्वेतभालतिलको विद्धो वर्णान्तरेण च ॥ ११७॥
स वाजी दलभञ्जी तु यस्य सैवातिनिन्दितः।
**निन्दित 'दलभंजी' अश्व के लक्षण—**जिस अश्व के मस्तक का श्वेत तिलक अन्य वर्ण से मिश्रित भी हो तो वह 'दलभंजी' नामक कहा जाता है और वह तथा उसका स्वामी दोनों निन्दित माने जाते हैं।

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चतुर्थोऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४५

संहन्याद्वर्णजान् दोषान् स्निग्धवर्णो भवेद् यदि ॥ ११८ ॥

**स्निग्ध वर्ण होने से सर्व वर्णगत दोष-नाशकता का निर्देश—**घोड़ा यदि स्निग्ध (चिकनाई लिये हुये) वर्ण का हो तो वर्ण से होनेवाले सारे दोषों को नष्ट कर डालता है ।

बलाधिकश्च सुगतिर्महान् सर्वाङ्गसुन्दरः ।
नातिक्रूरः सदा पूज्यो भ्रमाद्यैरपि दूषितः ॥ ११९ ॥

**आवर्त्तादिदोष से दूषित होने पर भी पूजनीय अश्व के लक्षण—**जो अधिक बलशाली, अच्छी चालवाला, ऊंचा, सर्वाङ्ग-सुन्दर, अत्यन्त बदमाश नहीं होने पर यदि भौंरी आदि दोषों से युक्त हो तो भी वह सदा पूजनीय होता है ।

वाजिनामत्यवहनात् सुदोषाः संभवन्ति हि ।
कृशो व्याधिपरीताङ्गो जायतेऽत्यन्तवाहनात् ॥ १२० ॥
अवाहितो भवेन्मन्दः सर्वकर्मसु निन्दितः ।
अपोषितो भवेत् क्षीणो रोगी चात्यन्तपोषणात् ॥ १२१ ॥

**अश्वों के कृशत्वादि दोष उत्पन्न होने के कारण—**यदि घोड़े अच्छे भी हों किन्तु अधिकतर सवारी न की जाय तो उसमें दोष उत्पन्न हो जाते हैं और अत्यन्त अधिक सवारी करने से भी घोड़े दुर्बल तथा रोगी हो जाते हैं अतः योग्यतानुसार उन्हें सवारी में लेना चाहिये । और बिना सवारी के भी घोड़े मन्द गतिवाले एवं किसी काम के नहीं रह जाते हैं । और बिना पौष्टिक खुराक के क्षीण तथा अधिक पौष्टिक भोजन कराने तथा तदनुरूप सवारी न करने से रोगी हो जाते हैं, अतः मात्रानुरूप खिलाना चाहिये ।

सुगतिर्दुर्गतिर्नित्यं शिक्षकस्य गुणागुणैः ।

**घोड़े की अच्छी तथा बुरी चाल होने में शिक्षक की कारणता का निर्देश—**घोड़े में शिक्षक के गुण तथा दोष के द्वारा ही नित्य अच्छी या बुरी चाल हो जाती है अर्थात् जैसा सिखानेवाला होता है वैसा घोड़ा बन जाता है ।

जान्वधश्चलपादः स्यादृजुकायः स्थिरासनः ॥ १२२ ॥
तुलाधृतखलीनः स्यात् काले देशे सुशिक्षकः ।
मृदुना नातितीक्ष्णेन कशाघातेन ताडयेत् ॥ १२३ ॥

**घोड़ों के सुशिक्षक के लक्षण—**घोड़े को सुन्दर रीति से सिखानेवाला सवार जानु (घुठनों) ओंसे नीचे पैर को हिलाता हुआ, शरीर को सीधा रक्खे हुये, स्थिर आसन से बैठकर तुला की भांति लगाम को पकड़े हुए, काल तथा देश के अनुसार न अत्यन्त कठिन और न अत्यन्त कोमल चाबुक की मार से घोड़े को मार कर सिखावे ।

ताडयेन्मध्यघातेन स्थाने स्वश्वं सुशिक्षकः ।

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३४६
शुक्रनीतिः

हेषिते कक्षयोर्हन्यात् स्खलिते पक्षयोस्तथा ॥ १२४ ॥
भीते कर्णान्तरे चैव ग्रीवासून्मार्गगामिनि ।
कुपिते बाहुमध्ये च भ्रान्तचित्ते तथोदरे ॥ १२५ ॥
अश्वः सन्ताड्यते प्राज्ञैर्नान्यस्थानेषु च कर्हिचित् ।

**अश्व-सुशिक्षक के कृत्यों का निर्देश—**सुन्दर सिखानेवाला सवार अपने अच्छे घोड़ों को उचित स्थान पर चाबुक की मध्यम मार से मारे। जैसे यदि ज्यादा हिनहिनाता हो तो दोनों आँखों में, फिसलने पर दोनों बगलों में, डरने (भड़कने) पर दोनों कानों के बीच में, विपरीत मार्ग से चलने पर ग्रीवा में, दोनों अगले पैरों को उठाकर खड़ा होने पर आगे के पैरों के मध्य में, और भ्रान्त चित्त होने पर उदर में बुद्धिमान सवार घोड़े के मारे किन्तु अन्य स्थानों में कभी भी न मारे ।

अथवा हेषिते स्कन्धे स्खलिते जघनान्तरे ॥ १२६ ॥
भीते वक्षःस्थलं हन्याद् वक्त्रमुन्मार्गगामिनि ।
कुपिते पुच्छसंघाते भ्रान्ते जानुद्वयं तथा ॥ १२७ ॥

अथवा अधिक हिनहिनाने पर कन्धे में, फिसलने पर जांघों के बीच में, डरने पर वक्षःस्थल में, कुमार्ग पर चलने पर मुख में, कुपित होने पर पूंछ की सन्धि के अन्त में, चित्त की भ्रान्ति होने पर दोनों जानुओं में मारे।

नासकृत्ताडयेदश्वमकाले च विदेशके ।
अकालस्थानघातेन वाजिदोषान् वितन्वते ॥ १२८ ॥

**अन्यथा ताडन करने से अनिष्ट—**घोड़े को बार बार या असमय तथा कुठॉव में (जहां नहीं मारना चाहिये, वहां पर) नहीं मारना चाहिये क्योंकि असमय तथा कुठांव में मारने से घोड़े में दोषों की वृद्धि हो जाती है।

तावद् भवन्ति ते दोषा यावज्जीवत्यसौ हयः ।
दुष्टं दण्डेनाभिभवेन्नारोहेद्दण्डवर्जितः ॥ १२९ ॥

और वे दोष घोड़े में तब तक बने रहते हैं, जब तक घोड़ा जीवित रहता है। दुष्ट घोड़े को दण्ड देकर परास्त कर देवे, विना दण्ड दिये उस पर सवारी न करे।

गच्छेत् षोडशमात्राभिरुत्तमोऽश्वो धनुःशतम् ।
यथा यथा न्यूनगतिरश्वो हीनस्तथा तथा ॥ १३० ॥

**उत्तम और हीन घोड़े की गति का प्रमाण—**उत्तम घोड़ा १६ मात्रा का उच्चारण करते-करते १०० धनुष की दूरी तक पहुँच जाता है। जैसे २ जिसकी न्यून गति होती है वैसे २ वह हीन माना जाता है।

सहस्रचापप्रमितं मण्डलं गतिशिक्षणे ।'

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४७

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४७

उत्तमं वाजिनो मध्यं नीचमर्धं तदर्धकम् ॥ १३१ ॥
**उत्तमादि मण्डलों के प्रमाणों का निर्देश—**गतिकी शिक्षा देने में घोड़े के लिये १ मण्डल का प्रमाण १००० धनुषों का होता है जो उत्तम होता है उसका आधा (५०० धनुषों का) मण्डल मध्यम और उसका भी आधा (२५० धनुषों का) मण्डल नीच होता है।

अल्पं शतधनुः प्रोक्तमत्यल्पं च तदर्धकम् ।
और १०० धनुषों का मण्डल अल्प और उसका आधा (५० धनुषों का) मण्डल अत्यल्प होता है।

शतयोजनगन्ता स्याद्दिनेकेन यथा हयः ॥ १३२ ॥
गतिं संवर्धयेन्नित्यं तथा मण्डलविक्रमैः ।
मण्डल के द्वारा गति बढ़ाने की शिक्षा से तब तक घोड़े की गति नित्य बढ़ाता रहे कि जब तक वह एक दिन में १०० योजन (४००) तक न दौड़ लगाने लगे।

सायं प्रातश्च हेमन्ते शिशिरे कुसुमागमे ॥ १३३ ॥
सायं ग्रीष्मे तु शरदि प्रातरश्वं वहेत् सदा ।
**ऋतु के भेद से अश्वशिक्षा के समय में भेद का निर्देश—**हेमन्त, शिशिर तथा वसन्तऋतु में सायंकाल तथा प्रातःकाल एवं ग्रीष्म में सायंकाल और शरदऋतु में प्रातःकाल घोड़े को शिक्षा देवे।

वर्षासु न वहेद्दीषत्तथा विषमभूमिषु ॥ १३४ ॥
**वर्षाऋतु में और विषम भूमि में घोड़े को चलाने का निषेध—**और वर्षा ऋतु तथा विषम भूमि में घोड़े को थोड़ी भी दौड़ाने की शिक्षा न देवे।

सुगत्याऽग्निर्बलं दार्ढ्यमारोग्यं वर्धते हरेः ।
**उत्तमगति से अश्व के फल का निर्देश—**उत्तम चाल से घोड़ों की जठराग्नि, बल, शरीर की दृढ़ता तथा आरोग्य की वृद्धि होती है। अतः चाल की शिक्षा देना आवश्यक है।

भारमार्गपरिश्रान्तं शनैश्चङ्क्रमयेद्धयम् ॥ १३५ ॥
स्नेहं सम्पाथयेत् पश्चाच्छर्करासक्तुमिश्रितम् ।
हरिमन्थांश्च माषांश्च भक्षणार्थे मकुष्ठकान् ॥ १३६ ॥
शुष्कानाद्रांश्च मांसानि सुस्विन्नानि प्रदापयेत् ।
**थके हुये अश्व को धीरे २ चलाने का एवं उनके भक्षणार्थ हितकारक पदार्थ देने का निर्देश—**भारवहन तथा मार्ग चलने से थके हुये घोड़े को धीरे २ टहलावे उसके बाद शक्कर तथा सत्तू मिले हुये स्नेह (घृत) को पिलावे। और खाने के

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३४८ | शुक्रनीतिः

लिये चने, उड़द तथा मोठ को दे चाहे वे सूखे हों या हरे (भिगोये हुये) एवं अच्छी तरह पकाये हुये मांस भी दे।

यद्यत्र स्खलितं गात्रं तत्र दण्डं न पातयेत् ॥ १३७ ॥
मोच आये अंग पर घोड़े को चाबुक न मारने का निर्देश— यदि कभी घोड़े के किसी अंग में मोच हो जाय तो वहां पर चाबुक नहीं मारना चाहिये।

नावतारितपल्याणं हयं मार्गसमागतम्।
दत्त्वा गुडं सलवणं बलसंरक्षणाय च ॥ १३८ ॥
मार्ग से चलकर आये हुये घोड़े को गुड़ तथा लवण देने का निर्देश— मार्ग चलकर आये हुये घोड़ों को बिना जीन उतारे हुये ही बल का संरक्षण करने के लिये लवण (निमक) के साथ गुड़ देना चाहिये।

गतस्वेदस्य शान्तस्य सुरूपमुपतिष्ठतः।
मुक्तपृष्ठादिबन्धस्य खलीनमवतारयेत् ॥ १३९ ॥
पसीना शान्त होने पर लगाम उतारने का निर्देश— पसीना सूख जाय एवं घोड़ा शान्त होकर अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित हो जाय तब उसके पीठ के बन्धन (कसे हुये चारजामे) को खोल कर लगाम निकाल लेवे।

मर्दयित्वा तु गात्राणि पांसुमध्ये विवर्त्तयेत्।
स्नानपानावगाहैश्च ततः सम्यक् प्रपोषयेत् ॥ १४० ॥
घोड़ों के अङ्गों को मलकर फेरने का निर्देश— और घोड़े के सारे शरीर का मर्दन (खरहरा) करके धूलि में लोटने की व्यवस्था कर दे। इसके बाद स्नान कराना, पानी पिलाना, नदी आदि में अवगाहन (स्नान) कराना आदि से उसे भलीभांति पुनः परिपुष्ट (ताजा) कर लेवे।

सर्वदोषहरोऽश्वानां मद्यजाङ्गल्यो रसः।
शक्त्या सम्पापयेत् क्षीरं घृतं वा वारिसक्तुकम् ॥ १४१ ॥
घोड़ों को मद्य व मांसरस देने का फल— घोड़ों के लिये मद्य तथा जंगली जीवों का मांसरस सर्वदोषनाशक (लाभप्रद) होता है। शक्ति के अनुसार दूध, घी या जल में घुला हुआ सत्तू पिलावे।

अन्नं भुक्त्वा जलं पीत्वा तत्क्षणाद्वाहितो हयः।
उत्पद्यन्ते तदाश्वानां कासश्वासादिका गदाः ॥ १४२ ॥
चारा आदि खिलाने के बाद तत्काल घोड़े की सवारी के दोष— यदि चारा खिलाने के बाद पानी पिलाकर फौरन घोड़े पर सवारी की जाय तो उससे घोड़े को खांसी तथा दमे की बीमारी हो जाती है।

यवाश्च चणकाः श्रेष्ठा मध्या माषा मकुष्ठकाः।
नीचा मसूरा मुद्गाश्च भोजनार्थं तु वाजिनः ॥ १४३ ॥

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४६

**घोड़ों के लिये उत्तम, मध्यम तथा नीच भोजनों का निर्देश—**घोड़ों को भोजन के लिये जौ तथा चना देना उत्तम, उर्द तथा मोठ मध्यम और मसूर तथा मूंग का देना नीच माना जाता है।

गतयः षड्विधा धाराऽऽस्कन्दितं रेचितं प्लुतम् ।
धौरीतकं वल्गितं च तासां लक्ष्म पृथक् पृथक् ॥ १४४ ॥

**घोड़ों की ६ प्रकार की गति का नाम-निर्देश—**१. धारा, २. आस्कन्दित, ३. रेचित, ४. प्लुत, ५. धौरीतक, ६. वल्गित इन भेदों से गति ६ प्रकार की होती है। अब उनके लक्षण पृथक् २ कहते हैं।

धारागतिः सा विज्ञेया यातिवेगतरा मता ।
पार्ष्णिस्तोदाविनुदितो यस्यां भ्रान्तो भवेद्धयः ॥ १४५ ॥

**धारा गति के लक्षण—**जो अत्यन्त वेग से युक्त गति हो उसे 'धारा' गति समझनी चाहिये। इसमें सवार की एड़ी या चाबुक की मार से अत्यन्त प्रेरित होकर घोड़ा वेग से चक्कर या दौड़ लगाने लगता है।

आकुञ्चिताग्रपादाभ्यामुत्प्लुत्योत्प्लुत्य या गतिः ।
आस्कन्दिता च सा ज्ञेया गतिविद्भिस्तु वाजिनाम् ॥ १४६ ॥

**आस्कन्दित गति के लक्षण—**जिसमें अगले पैरों को सिकोड़े हुये उछल २ कर घोड़े की गति होती है उसे 'आस्कन्दित' गति घोड़ों की गति जाननेवाले विद्वान् मानते हैं ।

ईषदूत्प्लुत्य गमनमखण्डं रेचितं हि तत् ।

**रेचित गति के लक्षण—**और घोड़ा जिसमें थोड़ा उछल २ कर अखण्ड गमन करता है उसे 'रेचित' कहते हैं ।

पादैश्चतुर्भिरुत्प्लुत्य मृगवत् सा प्लुता गतिः ॥ १४७ ॥
असंवलितपद्भ्यां तु सुव्यक्तं गमनं तुरम् ।
धौरीतकं च तज्ज्ञेयं रथसंवाहने वरम् ॥ १४८ ॥

**प्लुत तथा धौरीतक गति के लक्षण—**घोड़ा चारो पैरों से मृग के समान चौकड़ी भरकर जिसमें दौड़ता है उसको 'प्लुत' गति कहते हैं। जिसमें दोनों पैर बिना सिकोड़े हुये उठाकर चलाये जांय, और शीघ्र सुन्दर गति हो, जिससे रथ ( गाड़ी ) खींचने में अच्छाई हो, उसे 'धौरीतक' गति कहते हैं।

प्रसंवलितपद्भ्यां यो मयूरोद्धृतकन्धरः ।
दोलायितशरीरार्धकायो गच्छति वल्गितम् ॥ १४९ ॥

**वल्गित गति के लक्षण—**जिसमें घोड़ा सिकोड़े हुये दोनों पैरों से मयूर के समान गर्दन उठाये हुये और आधे शरीर को हिंडोले के समान हिलाता हुआ दौड़ता है उसको 'वल्गित' गति कहते हैं

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३५० | शुक्रनीतिः

परिणाहो वृषमुखादुदरे तु चतुर्गुणः।
सककुत् त्रिगुणोच्छ्रन्तु सार्धत्रिगुणदीर्घता ॥ १५० ॥
**बैल के मुखादि का प्रमाण—**वृष के मुख के प्रमाण से चौगुना उदर का विस्तार और ककुद् (बैल के पीठ पर का टिल्ला)-के सहित उदर मुख से तिगुना ऊंचा एवं मुख से उदर की लम्बान साढ़े तीन गुना होना चाहिये।

सप्ततालो वृषः पूज्यो गुणैरेभियुतो यदि।
**पूज्य सप्तताल बैल के लक्षण—**जो सात ताल प्रमाण ऊंचा होते हुये यदि इन निम्न लिखित गुणों से युक्त हो तो वह बैल पूजनीय (श्रेष्ठ) माना जाता है।

न स्थायी न च वै मन्दः सुवोढा स्वङ्गसुन्दरः ॥ १५१ ॥
नातिक्रूरः सुपृष्ठश्च वृषभः श्रेष्ठ उच्यते।
**श्रेष्ठ बैल के लक्षण—**जो चलते १ रुकनेवाला (अड़ियल) न हो और धीरे २ चलनेवाला भी न हो एवं सुन्दर वहन करनेवाला, सभी अङ्गों से सुन्दर, अत्यन्त क्रूर (बदमाश) न हो और जिसकी पीठ सुन्दर हो, ऐसा बैल श्रेष्ठ कहा जाता है।

त्रिंशद्योजनगन्ता वा प्रत्यहं भारवाहकः ॥ १५२ ॥
नवतालश्च सुदृढः सुमुखोष्ट्रः प्रशस्यते।
**श्रेष्ठ ऊंट के लक्षण—**जो प्रतिदिन ३० योजन (१२० कोश) तक चल सकनेवाला या भारवहन करनेवाला, नवताल-प्रमाण ऊंचा हो, एवं अत्यन्त मजबूत शरीरवाला तथा सुन्दर मुखवाला हो, ऐसा ऊंट प्रशस्त माना जाता है।

शतमायुर्मनुष्याणां गजानां परमं स्मृतम् ॥ १५३ ॥
मनुष्यगजयोर्बाल्यं यावद्विंशतिवत्सरम् ।
नृणां हि मध्यमं यावत् षष्टिवर्षे वयः स्मृतम् ॥ १५४ ॥
अशीतिवत्सरं यावद् गजस्य मध्यमं वयः।
**मनुष्य और हाथियों की आयु तथा बाल्यादि अवस्था का प्रमाण—**मनुष्यों और हाथियों की परम आयु १०० वर्ष तक की और बाल्यावस्था २० वर्ष तक की मानी गई है। और मनुष्यों की मध्यम (जवानी से प्रौढ़ावस्था तक) अवस्था ६० वर्ष तक की मानी जाती है किन्तु हाथियों की मध्यम अवस्था ८० वर्ष तक की मानी गई है।

चतुस्त्रिंशत्तु वर्षाणामश्वस्यायुः परं स्मृतम् ॥ १५५ ॥
पञ्चविंशतिवर्षं हि परमायुर्वृषोष्ट्रयोः ।
बाल्यमश्ववृषोष्ट्राणां पञ्चमं वत्सरं मतम् ॥ १५६ ॥
मध्यं यावत् षोडशाब्दं वार्धक्यं तु ततः परम्।

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३५१

**घोड़ा, बैल तथा ऊँट की आयु तथा अवस्थाओं का प्रमाण—**घोड़े की परमायु ३४ वर्ष तक की मानी गई है। और बैल तथा ऊंटों की परमायु २५ वर्ष तक की ही मानी जाती है। घोड़ा, बैल तथा ऊंट की बाल्यावस्था ५ वर्ष तक की और मध्यावस्था १६ वर्ष तक की होती है उसके बाद वृद्धावस्था मानी गई है।

दन्तानामुद्गमैर्वर्णैरायुर्ज्ञेयं वृषाश्वयोः ॥ १५७ ॥
**दांतों के द्वारा बैल व घोड़ों की अवस्था-ज्ञान का निर्देश—**बैल तथा घोड़े की अवस्था का ज्ञान उनके दांत निकलने तथा दांतों के वर्ण के द्वारा किया जाता है।

अश्वस्य षट् सिता दन्ताः प्रथमाब्दे भवन्ति हि ।
कृष्णलोहितवर्णास्तु द्वितीयेऽब्दे ह्यधोगताः ॥ १५८ ॥
**दांतों द्वारा घोड़ों के प्रथम वर्ष का ज्ञान—**घोड़ों के प्रथम वर्ष में उपरी भाग में सफेद ६ दांत होते हैं। और दूसरे वर्ष में काले तथा लाल मिश्रित वर्ण के ६ दांत नीचे भाग में निकलते हैं।

तृतीयेऽब्दे तु सन्दंशौ क्रमात् कृष्णौ षडब्दतः ।
तत्पार्श्ववर्त्तिनौ तौ तु चतुर्थे पुनरुद्गतौ ॥ १५९ ॥
तीसरे वर्ष में दो २ दांत ६ वर्ष तक क्रम से कृष्ण वर्ण के हो जाते हैं और चौथे वर्ष में पुनः उक्त दाँतों के पार्श्व में दो दांत निकल आते हैं।

अन्त्यौ द्वौ पञ्चमाब्दे तु संदंशौ पुनरुद्गतौ ।
मध्यपार्श्वान्तगौ द्वौ द्वौ क्रमात् कृष्णौ षडब्दतः ॥ १६० ॥
पांचवें वर्ष में अन्त में दो दांत फिर निकल आते हैं। मध्य तथा पार्श्व के अन्त भाग में दो २ दांत ६ वर्ष में क्रम से कृष्ण वर्ण के हो जाते हैं।

नवमाब्दात् क्रमात् पीतौ तौ सितौ द्वादशाब्दतः ।
दशपञ्चाब्दतस्तौ तु काचाभौ क्रमशः स्मृतौ ॥ १६१ ॥
नवें वर्ष से वे दोनों दांत क्रम से पीत वर्ण के तदनन्तर फिर १२ वें वर्ष तक में सफेद हो जाते हैं। फिर १५ वें वर्ष तक वे दोनों कांच की भांति क्रमशः उज्ज्वल हो जाते हैं।

अष्टादशाब्दतस्तौ हि मध्वाभौ भवतः क्रमात् ।
शङ्खाभौ चैकविंशाब्दाच्चतुर्विंशाब्दतः सदा ॥ १६२ ॥
छिद्रं सञ्चलनं पातो दन्तानां च त्रिके त्रिके ।
फिर १८ वें वर्ष तक वे दोनों मधु के समान वर्ण के क्रम से हो जाते हैं। फिर २१ वें वर्ष तक शङ्ख के समान वर्ण के हो जाते हैं पुनः २४ वें वर्ष तक तीन ३ दांतों में छिद्र, संचलन (हिलना) तथा गिरना जारी हो जाता है।