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सर्वकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 356 में से

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पृष्ठ 206

170 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
रास्ना कृमिघ्नं मुस्तं च शिरीषं खदिरार्जुनौ ।
भागान् दशपलान् दद्याद् यवान्या वत्सकस्य च ।। 56 ।।
चन्दनस्य गुडूच्याश्च रोहिण्याश्चित्रकस्य च।
भागानष्टपलानेतानष्टद्रोणेऽम्भसः पचेत् ।। 57 ।।
द्रोणशेषे कषाये च पूते शीते प्रदापयेत्।
धातक्याः षोडशपलं माक्षिकस्य तुलात्रयम् ।। 58 ।।
व्योषस्य द्विपलं दद्यात् त्रिजातस्य चतुष्पलम् ।
चतुष्पलं प्रियङ्गोश्च द्विपलं नागकेशरम् ।। 59 ।।
सर्वाण्येतानि सञ्चूर्ण्य घृतभाण्डे निधापयेत्।
मासादूर्ध्वं पिबेदेनं प्रमेहं हन्ति दुर्जयम् ।। 60 ।।
वातरोगान् ग्रहणीशोर्मूत्रकृच्छ्राणि नाशयेत्।
देवदार्वादिकोऽरिष्टः कण्डूकुष्ठविनाशनः ।। 61 ।।
देवदारु का बुरादा आधी तुला (2½ सेर), अडूसा की
पत्ती बीस पल (1 सेर), मजीठ, इन्द्रजौ, दन्ती, तगर, हल्दी,
दारुहल्दी, रास्ना, वायविडंग, मोथा, सिरस की छाल, खैरसार
तथा अर्जुनवृक्ष की छाल-प्रत्येक दस-दस पल (40-40
तोला), अजवायन, कुरैया की छाल, श्वेतचन्दन का बुरादा,
गिलोय, कुटकी तथा चीता की जड़-प्रत्येक द्रव्य आठ-आठ
पल (32-32 तोला) लेकर उनको जौकुट करके आठ द्रोण
जल में डालकर क्वाथ करे। जब एक द्रोण जल अवशिष्ट रह
जाये तो छान लें। शीतल होने पर उसमें धाय के फूल सोलह
पल (64 तोला) मधु तीन तुला (15 सेर), सोंठ, मरिच तथा
पीपल दो पल (सब मिलाकर 8 तोला), त्रिजात (दालचीनी,
बड़ी इलायची तथा तेजपत्ता मिलाकर) चार पल (16 तोला),
फूलप्रियंगु चार पल (16 तोला) तथा नागकेसर दो पल (8
तोला) इन सबका चूर्ण बनाकर उक्त क्वाथ में मिला दें और
मधु को भली-भाँति घोल दें, फिर इस घोल को घृतलिप्त
भांड में डालकर और उसका मुख कपड़मिट्टी से बन्द करके
रख दें, एक मास के पश्चात् जब अरिष्ट तैयार हो जाये तो छान
लें। यह आसव दुःसाध्य प्रमेह, वातजनित रोगों, ग्रहणीरोग,
अर्श तथा मूत्रकृच्छ्र को नष्ट करता है। इसका नाम 'देवदार्वादि
अरिष्ट' है। यह कण्डू (खुजली) तथा कुष्ठ रोग को भी नष्ट
करता है।
खदिरारिष्ट
खदिरस्य तुलार्धं तु देवदारु च तत्समम्।
बाकुची द्वादशपला दार्बी स्यात् पलविंशतिः ।। 62 ।।
त्रिफला विंशतिपला ह्यष्टद्रोणेऽम्भसः पचेत् ।
कषाये द्रोणशेषे च पूते शीते विनिःक्षिपेत् ।। 63 ।।
तुलाद्वयं माक्षिकस्य तुलैका शर्करा मता।
धातक्या विंशतिपलं कङ्कोलं नागकेशरम् ।। 64 ।।
जातीफलं लवङ्गैलात्वक्पत्राणि पृथक्-पृथक्।
पलोन्मितानि कृष्णाया दद्यात् पलचतुष्टयम् ।। 65 ।।
घृतभाण्डे विनिक्षिप्य मासादूर्ध्वं पिबेन्नरः ।
महाकुष्ठानि हृद्रोगं पाण्डुरोगाबुर्दे तथा ।। 66 ।।
गुल्मं ग्रन्थिं कृमीन् कासं श्वासप्लीहोदरं जयेत् ।
एष वै खदिरारिष्टः सर्वकुष्ठनिवारणः ।। 67 ।।
खैरसार आधी तुला (2½ सेर), देवदारु का बुरादा
आधी तुला (2½ सेर), बाकुची बारह पल (48 तोला),
दारुहल्दी बीस पल (1 सेर) तथा त्रिफला बीस पल (1
सेर)-इन सब द्रव्यों को जौकुट करके आठ द्रोण जल में
क्वाथ करें और एक द्रोण जल शेष रह जाने पर छान लें और
जब शीतल हो जाये तो इसमें मधु दो तुला (10 सेर) और
चीनी एक तुला (5 सेर) डालकर घोल दें। धाय के फूल
बीस पल (1 सेर), शीतलचीनी, नागकेसर, जायफल, लौंग,
बड़ी इलायची, दालचीनी तथा तेजपत्ता प्रत्येक एक-एक
पल (4-4 तोला) तथा पिप्पली चार पल (16 तोला)-इन
द्रव्यों को जौकुट करके उक्त घोल में मिला दें और घृतलिप्त
मृत्तिका-पात्र में डालकर उसका मुख बन्द करके रख दें।
एक मास के पश्चात् तैयार हो जाने पर इसे छानकर पीना
चाहिये। यह आसव सात प्रकार के महाकुष्ठों, हृद्रोग, पाण्डुरोग
तथा अर्बुद (रसौली), गुल्म, ग्रन्थि (लसीका ग्रन्थि) की
विकृति, कृमियों, कास, श्वास एवं प्लीहोदर को जीतता है।
इसका नाम 'खदिरारिष्ट' है और यह सब प्रकार के कुष्ठों को
भी नष्ट करता है।
बब्बूलारिष्ट
तुलाद्वयं तु बब्बूल्याश्चतुर्द्रोणे जले पचेत्।
द्रोणशेषे रसे शीते गुडस्य च तुलां क्षिपेत् ।। 68 ।।
धातकीं षोडशपलां कृष्णां च द्विपलां तथा।
जातीफलानि कङ्कोलमेलात्वक्पत्रकेशरम् ।। 69 ।।
लवङ्गं मरिचं चैव पलिकान्युपकल्पयेत् ।
मासं भाण्डे स्थितस्त्वेष बब्बूलारिष्टको जयेत् ।। 70 ।।
क्षयं कुष्ठमतीसारं प्रमेहश्वासकासकम्।
बबूल (कीकर) की छाल दो तुला (10 सेर) लेकर
उसको जौकुट करके चार द्रोण जल में डालकर क्वाथ करें।
जब एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4 तोला) जल शेष रह जाये
तो छान लें। शीतल हो जाने पर उसमें गुड़ एक तुला (5