शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 205, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः ] आसवारिष्टकल्पना 169
घृतभाण्डे विनिक्षिप्य चन्दनागरुधूपिते।
कर्पूरवासितो ह्येष ग्रहण्या दीपनः परः।।44।।
अर्शसां नाशने श्रेष्ठ उदावर्तस्य गुल्मनुत्।
जठरक्रिमिकुष्ठानि व्रणांस्तु विविधांस्तथा।।45।।
अक्षिरोगशिरोरोगगलरोगांश्च नाशयेत्।)
मुनक्का सौ पल (5 सेर) लेकर चार द्रोण जल में
पकाना चाहिये, जब एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4 तोला)
जल अवशिष्ट रह जाये तो क्वाथ को छान लें और जब यह
क्वाथ शीतल हो जाये तो इसमें मधु एक तुला (5 सेर),
खाँड़ एक तुला (5 सेर) धाय के फूल 3 पाव 4 तोला और
शीतलचीनी, लौंग, जायफल, मरिच, दालचीनी, बड़ी
इलायची, तेजपत्ता, नागकेशर, पीपल, चीता, चव्य, पीपलामूल
तथा रेणुका प्रत्येक द्रव्य का एक-एक पल चूर्ण डालें। इन
सब वस्तुओं को एक साथ घोलकर सफेद चन्दन तथा अगरु
द्वारा सुधूपित पात्र में डालकर एक मास पर्यन्त मुख बन्द
करके रख दें। तैयार हो जाने पर छानकर दूसरे पात्र में भर दें
और उसमें दो तीन तोला शुद्ध देशी कर्पूर डाल दें। जब कपूर
(एक सप्ताह के पश्चात्) घुल जाये और द्रव निर्मल हो जाये
तो स्वच्छ वस्त्र से छानकर बोतलों में भर दें। यह अरिष्ट
ग्रहणी (पाचकसंस्थान) की क्रिया का परम दीपक है। अर्श,
उदावर्त, गुल्म, उदररोग, क्रिमिरोग, कुष्ठरोग, अनेक प्रकार के
व्रण, नेत्ररोग, शिरोरोग तथा गलरोगों को नष्ट करता है।
वक्तव्य-स्मरण रहे कि कपूर जल में नहीं घुलता, किन्तु
मद्य में घुल जाता है। इसलिये उक्त अरिष्ट में मध्यांश उत्पन्न
होने पर अन्त में कपूर डाला जाता है जिससे मद्य में वह घुल
सके।
कुटजारिष्ट
तुलां कुटजमूलस्य मृद्वीकार्धतुलां तथा।।46।।
मधूकपुष्पकाश्मर्यभागान् दशपलोन्मितान्।
चतुर्द्रोणेऽम्भसः पक्त्वा क्वाथे द्रोणावशेषिते।।47।।
धातक्या विंशतिपलं गुडस्य च तुलां क्षिपेत्।
मासमात्रं स्थितो भाण्डे कुटजारिष्टसञ्जितः।।48।।
ज्वरान् प्रशमयेत् सर्वान् कुर्यात् तीक्ष्णं धनञ्जयम्।
कुरैया के जड़ की छाल 1 तुला (5 सेर), मुनक्का
आधी तुला (2½ सेर), महुए के फूल तथा गम्भार के फल
दस-दस पल (40-40 तोला)-इन सब द्रव्यों को जौकुट
करके चार द्रोण जल में डालकर क्वाथ करे, जब एक द्रोण
(12 सेर 3 पाव 4 तोला) जल शेष रह जाये तो क्वाथ को
छानकर रख लें। फिर इस क्वाथ में धाय के फूल बीस पल
(1 सेर) और गुड़ एक तुला (5 सेर) मिट्टी के घड़े में भरकर
और उसका मुख बन्द करके एक मास-पर्यन्त रख दें। तैयार
हो जाने पर छानकर रख लें। इसका नाम 'कुटजारिष्ट' है। यह
सभी प्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है और अग्नि को दीप्त
करता है।
विडङ्गारिष्ट
विडङ्गं ग्रन्थिकं रास्ना कुटजत्वक्फलानि च ।। 49 ।।
पाठैलवालुकं धात्री भागान् पञ्चपलान् पृथक्।
अष्टद्रोणेऽम्भसः पक्त्वा कुर्याद् द्रोणावशेषितम् ।। 50 ।।
पूते शीते क्षिपेत् तत्र क्षौद्रं पलशतत्रयम् ।
धातकीं विंशतिपलां त्रिजातं द्विपलं तथा ।। 51 ।।
प्रियङ्गुकाञ्चनाराणां सलोध्राणां पलं पलम्।
व्योषस्य च पलान्यष्टौ चूर्णीकृत्य प्रदापयेत् ।। 52 ।।
घृतभाण्डे विनिक्षिप्य मासमेकं निधापयेत्।
ततः पिबेद् यथार्हं तु जयेद् विद्रधिमुत्थितम् ।। 53 ।।
ऊरुस्तम्भामरीमेहान् प्रत्यष्ठीलाभगन्दरान्।
गण्डमालां हनुस्तम्भं विडङ्गारिष्टसञ्ज्ञकम् ।। 54 ।।
वायविडंग, पीपलामूल, रास्ना, कुरैया का छाल एवं
फल (इन्द्रजौ), पाठा, एलवालुक एवं आँवला, प्रत्येक द्रव्य
1-1 पाव लेकर और उनको जौकुट करके आठ द्रोण जल में
डालकर क्वाथ करें। जब एक द्रोण जल शेष रह जाये तो
छान लें और शीतल हो जाने पर उसमें तीन सौ पल (15
सेर) मधु डालकर घोल दें। फिर उसमें धाय के फूल बीस
पल (1 सेर), दालचीनी, बड़ी इलायची एवं तेजपत्ता दो-दो
पल (8-8 तोला), 3 फूलप्रियंगु, कचनार की छाल एवं
पठानी लोध (4-4 तोला), त्रिकटु (तीनों द्रव्य मिलाकर)
आठ पल (32 तोला) लेकर उनका चूर्ण बनाकर उपर्युक्त
क्वाथ तथा मधु के घोल में मिलाकर घृतलिप्त मिट्टी के पात्र
में डालकर उसके मुख को बन्दकर एक मांस तक रख दें।
तैयार होने पर छानकर रख लें। इसका उचित मात्रा में
विधिपूर्वक सेवन करना चाहिये। यह भयानक विद्रधि,
ऊरुस्तम्भ, अश्मरी (पथरी) प्रमेहों, प्रत्यष्ठीला (वातव्याधि),
भगन्दरों, गण्डमाला एवं हनुस्तम्भ को जीतता है। इसका नाम
'विडङ्गारिष्ट' है।
देवदार्वादि अरिष्ट
तुलार्धं देवदारोः स्याद् वासा च पलविंशतिः।
मञ्जिष्ठेन्द्रयवा दन्ती तगरं रजनीद्वयम् ।। 55 ।।