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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

वक्तव्य—इससे भिन्न मूर्च्छा होती है। देखें-माधवनिदान

षष्ठोऽध्यायः ] आहारादिगतिकथनम् 61
वक्तव्य—इससे भिन्न मूर्च्छा होती है। देखें-माधवनिदान
तथा च० सू० अ० 24।
उत्क्लेश का कारण और लक्षण
(उत्क्लिश्यान्नं न निर्गच्छेत् प्रसेकष्ठीवनेरितम् ।। 76 ।।
हृदयं पीड्यते चास्य तमुत्क्लेशं विनिर्दिशेत्।)
जिससे उदर में से अन्न निकलना चाहता है, किन्तु
निकलता नहीं, मुख में पानी जाता है, बार-बार थूक आता है
एवं हृदय में पीड़ा होती है, उसे 'उत्क्लेश' (जी मिचलाना या
मिचली आना) कहते हैं।
भ्रम का कारण और लक्षण
(चक्रवद् भ्रमतो लोकान् स्वात्मानं मन्यते तथा ।। 73 ।।
उत्थाने चाऽसमर्थः स्यात् यस्मात्स वै भ्रमः स्मृतः ।)
जिससे संसार के सभी पदार्थ चक्र के समान घूमते से
दिखलायी पड़ें और मनुष्य अपने को भी वैसा ही माने तथा
जिससे मनुष्य खड़ा रहने में भी असमर्थ हो जाये, उसका नाम
'भ्रम' या चक्कर आना है।
तन्द्रा का कारण और लक्षण
(इन्द्रियार्थेष्वसंवित्तिर्गौरवं जृम्भणं क्लमः ।। 74 ।।
निद्रार्त्तस्येव यस्येहा तस्य तन्द्रां विनिर्दिशेत्।)
जिसको रूपादि विषयों का सम्यक् ज्ञान न हो, शरीर में
भारीपन हो, जम्भाइयाँ आ रही हों, सुस्ती हो तथा उँघाई
आती हो, उसकी इस व्याधि को 'तन्द्रा' कहते हैं।
ग्लानि का कारण और लक्षण
(वक्त्रे मधुरता तन्द्रा हृदयोद्वेष्टनं भ्रमः ।। 77 ।।
न चान्नमभिकाङ्क्षेत ग्लानिं तस्य विनिर्दिशेत्।)
जिससे मुख में मीठापन, तन्द्रा, हृदय में ऐंठन, भ्रम एवं
अन्न में अरुचि हो, उसे 'ग्लानि' कहते हैं।
गौरव का कारण और लक्षण
(आर्द्रचर्मावनद्धं हि यो गात्रमभिमन्यते ।
तथा गुरु शिरोऽत्यर्थं गौरवं तद् विनिर्दिशेत् ।। 78 ।।)
इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे आहारादिगतिकथनं नाम
षष्ठोऽध्यायः ।। 6 ।।
जिससे रोगी शरीर को आर्द्र चर्म (गीला चमड़ा) से
बँधा हुआ-सा और शिर को अत्यन्त भारी-सा अनुभव करता
हो, उसे 'गौरव' कहते हैं।
क्लम का कारण और लक्षण
(योजनायासः श्रमो देहे प्रवृद्धः श्वासवर्जितः ।। 75 ।।
क्लमः स इति विज्ञेय इन्द्रियार्थप्रबाधकः ।)
जिससे बलपूर्वक कार्य किये बिना शरीर में 'श्रम'
(थकावट) बढ़ जाता है, किन्तु श्वास में किसी प्रकार का कष्ट
नहीं होता, इन्द्रियों द्वारा विषयों के ग्रहण में बाधा पड़ती है,
उसे 'क्लम' जानना चाहिये।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका-व्याख्या,
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का छठा अध्याय समाप्त ।। 6 ।।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

सप्तमोऽध्यायः
रोगगणना


[बायाँ स्तम्भ]

रोगभेद-परिचय
रोगाणां गणना पूर्वं मुनिभिर्या प्रकीर्तिता।
मयात्र प्रोच्यते सैव तद्भेदा बहवो मताः॥१॥
महर्षियों ने पूर्वकाल में (ग्रन्थों में) रोगों की जो गणना
(संख्या) कही है, मैं इस ग्रन्थ में उसी (गणना) को कहता
हूँ, किन्तु उसके बहुत से भेद माने गये हैं।
वक्तव्य- ग्रन्थकर्त्ता ने इस अध्याय में केवल रोगों की
संख्या मात्र का उल्लेख किया है कि अमुक रोग इतने प्रकार
का होता है; और रोग का अपना लक्षण तो उसके नाममात्र से
जान लिया जा सकता है। अतः किसी रोग का लक्षण लिखना
अनावश्यक समझ कर छोड़ दिया है। इसीलिए हमने भी रोगों
के विशिष्ट लक्षण लिखने का विचार छोड़ दिया। रोगों का
निश्चय करने के लिए प्रत्येक वैद्य के पास माधव-निदान
आदि पुस्तकें रहती ही हैं। यहाँ एक बात स्मरण रखनी चाहिये
कि आर्षग्रन्थों में रोगों की संख्या का निर्देश भिन्न-भिन्न
दृष्टिकोणों से किया गया है। यही कारण है कि किसी ग्रन्थ में
ज्वर आठ प्रकार का और किसी में पच्चीस प्रकार का, इसी
प्रकार किसी ग्रन्थ में अतिसार 6 है, तो किसी में सात इत्यादि।
इस प्रकार के भेदों को तात्त्विक भेद नहीं समझना चाहिये।
उदाहरण के लिए देखें—'एकम् एव रोगानीकं दुःखसामान्यात्।'
अर्थात् दुःखदायी होने के कारण सभी रोग एक से ही हैं,
इनका भेद भी नहीं है। 'द्वे रोगानीके भवतः प्रभावभेदेन साध्यं
चासाध्यं च'। अर्थात् साध्य और असाध्य भेद से रोग दो
प्रकार के होते हैं (च० वि० अ० ३)। दस प्रकार के भेदों का
कारण केवल यही है कि किसी ने किसी प्रकार से गणना
की और किसी ने किसी प्रकार से। इसी विषय को आचार्य
शार्ङ्गधर ने 'तद्भेदा बहवो मताः' कहकर व्यक्त किया
हैं।


[दायाँ स्तम्भ]

ज्वर-संख्या
पञ्चविंशतिरुद्दिष्टा ज्वरास्तद्भेद उच्यते।
पृथग्दोषैस्तथा द्वन्द्वभेदेन त्रिविधः स्मृतः ॥२॥
एकश्च सन्निपातेन तद्भेदा बहवः स्मृताः।
प्रायशः सन्निपातेन पञ्च स्युर्विषमज्वराः ॥३॥
सन्ततः सततश्चैव अन्येद्युष्कस्तृतीयकः।
चातुर्थकश्च पञ्चैते कीर्तिता विषमज्वराः ॥४॥
तथागन्तुज्वरोऽप्येकस्त्रयोदशविधो मतः।
अभिचारग्रहावेशशापैरागन्तुकस्त्रिधा ॥५॥
श्रमाच्छेदात् क्षताद्दाहाच्चतुर्धाऽऽघातजो ज्वरः।
कामाद्भीतेः शुचो रोषाद् विषादौषधगन्धतः ॥६॥
अभिषङ्गज्वराः षट् स्युरेवं ज्वरविनिश्चयः।
ज्वर पच्चीस होते हैं। उनका भेद कहा जाता है—
पृथक्-पृथक् दोषों से तीन, दो-दो दोषों से तीन और सन्निपात
से एक; और सन्निपात के अनेक भेद होते हैं। तीनों दोषों के
सन्निपात से पाँच तो विषम ज्वर होते हैं। यथा—1. सन्तत, 2.
सतत, 3. अन्येद्यु, 4. तृतीयक (तिजारी) और 5. चातुर्थक
(चौथैया)। ये पाँचों 'विषमज्वर' भी कहे जाते हैं। इसी
प्रकार 'आगन्तु' ज्वर भी एक ही होता है, किन्तु उसके तेरह
भेद होते हैं। यथा—1. अभिचार (मारण, मोहन आदि क्रियाओं
से), 2. ग्रहावेश (ग्रहपीड़ा) से तथा 3. शाप से। अभिघात
(चोट आदि) से चार ज्वर होते हैं—1. श्रम (थकावट) से, 2.
छेद (अंग कटने) से, 3. क्षत (घाव) से और 4. दाह (जलने)
से। 1. काम (मैथुनाभिलाष) से, 2. भीति (भय या डर) से,
3. शोक से, 4. क्रोध से, 5. विष से और औषधियों (जहरीली)
के गन्ध से—ये 6 ज्वर 'अभिषंग' से होते हैं। इस प्रकार ज्वरों
की संख्या का निश्चय किया गया है।

सप्तमोऽध्यायः] रोगगणना 63

वक्तव्य-शरीर में साधारण से अधिक गर्मी या ताप का
बढ़ जाना 'ज्वर' कहलाता है। रोगी के अनुभव से, स्पर्श एवं
'थर्मामीटर' (धर्ममितर) नामक प्रसिद्ध यन्त्र (पारद-पूर्ण
काँच-नलिका) से ज्वर रोग की सत्ता जान ली जाती है।
प्रत्येक मनुष्य की शारीरिक साधारण गर्मी 97 से 98½ डिग्री
होती है। विशेष देखें-च० नि० अ० 1 'चन्द्रिका-टीका'।
अतिसार-ग्रहणी-प्रवाहिका-गणना
पृथक् त्रिदोषैः सर्वैश्च शोकादामाद् भयादपि ।।7।।
अतीसारः सप्तधा स्याद् ग्रहणी पञ्चधा मता।
पृथग्दोषैः सन्निपातात् तथा चामेन पञ्चमी ।।8।।
प्रवाहिका चतुर्धा स्यात् पृथग्दोषैस्तथास्रतः।
पृथक्-पृथक् तीन दोषों से तीन, सन्निपात से एक, शोक
से एक, और भय से एक इस प्रकार 'अतिसार' (दस्त) सात
प्रकार का होता है। 'ग्रहणी' पाँच प्रकार की होती है-तीनों
दोषों से तीन, सन्निपात से चौथी और आम से पाँचवीं।
'प्रवाहिका' चार प्रकार की होती है-तीन दोषों से तीन और
रक्त से चौथी।
वक्तव्य-शरीर के तरल पदार्थों का गुदमार्ग से निकलना
या पतला पाखाना होना ही 'अतिसार' कहा जाता है। कभी
सूखे और कभी पतले पीड़ा युक्त अतिसार की परम्परा का
नाम 'ग्रहणी' या 'संग्रहणी' है और ऐंठन या मरोड़ के साथ
आँव का निकलना 'प्रवाहिका' या 'पेचिस' कहा जाता है।
इसी कारण मूत्र के अधिक होने को 'मूत्रातिसार' भी कहते हैं।
अजीर्ण-अलसक-विसूची-दण्डालसक-विलम्बिका-गणना
अजीर्णं त्रिविधं प्रोक्तं विष्टब्धं वायुना मतम् ।।9।।
पित्ताद् विदग्धं विज्ञेयं कफेनामं तदुच्यते।
विषाजीर्णं रसादेकं दोषैः स्यादलसस्त्रिधा ।।10।।
विसूची त्रिविधा प्रोक्ता दोषैः सा स्यात् पृथक्पृथक्।
दण्डकालसकश्चैव एकैव स्याद् विलम्बिका।।11।।
अजीर्ण (अनपच) तीन प्रकार का होता है-1. वायु से
विष्टब्ध, 2. पित्त से विदग्ध और 3. कफ से आम नामक
अजीर्ण होता है। रस से एक अजीर्ण होता है-विषाजीर्ण।
तीनों दोषों से 'अलसक' तीन प्रकार का होता है। विसूची
(हैजा या कालरा) पृथक्-पृथक् दोषों से तीन प्रकार की
होता है। 'दण्डालसक' एवं विलम्बिका एक-एक प्रकार के
होते हैं।
वक्तव्य-उक्त सभी रोग अनपच के ही रूपान्तर हैं। रस
का पूर्णतया परिपाक न होने से शरीर में विष के से लक्षण
उत्पन्न होने के कारण एक 'विषाजीर्ण' संज्ञा भी दी गयी है।
अलसक को 'गुम हैजा' भी कहते हैं। 'दण्डालसक' में रोगी
का शरीर दण्ड के समान अकड़ जाता है।
अर्श-गणना
अर्शांसि षड्विधान्याहुर्वातपित्तकफास्रतः।
सन्निपाताच्च संसर्गात् तेषां भेदो द्विधा स्मृताः ।। 12।।
सहजोत्तरजन्मभ्यां तथा शुष्कार्द्रभेदतः।
त्रिधैव चर्मकीलानि वातात् पित्तात् कफादपि ।। 13।।
बवासीर छः प्रकार के होते हैं-1. वायु से, 2. पित्त से,
3. कफ से, 4. रक्त से, 5. सन्निपात से और 6. दो-दो दोषों
के संसर्ग से, ये दो प्रकार के होते हैं-1. सहज (शरीर के
साथ ही उत्पन्न होने वाले) और 2. जन्म के पश्चात् उत्पन्न होने
वाले। 'शुष्कार्श' (सूखी या वादी) तथा 'आर्द्र (स्राव युक्त
या खूनी) के भेद से दो प्रकार के होते हैं। चर्मकील (मस्से)
तीन प्रकार के होते हैं-1. वायु से, 2. पित्त से और 3. कफ
से।
वक्तव्य-गुद-प्रदेश में जो मांस के 'अंकुर' उत्पन्न हो
जाते हैं, उन्हें 'अर्श' या बवासीर कहते हैं और त्वचा पर जो
मस्से निकल आते हैं, उन्हें 'चर्मकील' कहते हैं।
कृमि-गणना
एकविंशतिभेदेन कृमयः स्युर्द्विधा च ते।
बाह्यास्तथाभ्यन्तराः स्युस्तेषु यूका बहिश्चराः ।।14।।
लिक्षाश्चान्येऽन्तरचराः कफात्ते हृदयादकाः।
अन्नादा उदरावेष्ठाश्चूरवश्च महागुहाः ।। 15।।
सुगन्धा दर्भकुसुमास्तथा रक्ताच्च मातरः।
सौरसा लोमविध्वंसा रोमद्वीपा उदुम्बराः।। 16।।
केशादाश्च तथैवान्ये शकृज्जाता मकेरुकाः।
लेलिहाश्च सलूनाश्च सौसुरादाः ककेरुकाः ।। 17।।
तथान्यः कफरक्ताभ्यां सञ्जातः स्नायुकः स्मृतः।
व्रणस्य क्रिमयश्चान्ये विषमा बाह्ययोनयः ।। 18।।
कृमि बीस प्रकार के होते हैं और वे सब 'बाह्य' (बाहर
होने वाले) तथा 'आभ्यन्तर' (भीतर होने वाले) के भेद से
दो प्रकार के होते हैं। उनमें 'यूका' (जूएँ) तथा 'लिक्षा'
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64 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
(लीख) बाह्य या 'बहिर्श्वर' (बाहरी त्वचा पर घूमने वाले)
कहे जाते हैं। शेष सब अन्तश्चर (भीतर घूमने वाले) होते
हैं। यथा-1. हृदयादक (हृदय को खाने वाले 'कृमिज हृद्रोग'
के उत्पादक), 2. अन्नाद (आँतड़ियों को खाने वाले 'आन्त्रिक
ज्वर' के उत्पादक), 3. उदरावेष्ट (आमाशय में लिपटने वाले)
4. चुरु 5. महागुहा (महास्रोतस् या आँतड़ियों में होने वाले)
6. सुगन्धा (नाक तथा शिर में उत्पन्न होने वाले) और 7.
दर्भकुसुम (फुफ्फुसों में उत्पन्न होने वाले या यक्ष्मा रोग के
उत्पादक), ये सब कफ से होते हैं। तथा-1. मातृ (जन्तु
माता) 2. सौरस (तरुणास्थियों को खाने वाले), लोमविध्वंस
(रोमनाशक), 4. रोमद्वीप (रोमों की जड़ में रहने वाले), 5.
उदुम्बर (गूलर के फल जैसा शोथ उत्पन्न करने वाले, उसमें
अनन्त कृमि होते हैं) और 6. केशाद (शिर के बालों की जड़
को खा जाने वाले)। ये छः रक्त से होते हैं, जो कुष्ठरोगियों के
रक्त में पाये जाते (कुष्ठैककर्माणः) हैं। और दूसरे पुरीष
(मल) में उत्पन्न होते हैं। यथा-1. मकेरुक, 2. लेलिह, 3.
ससूना (सशूलाः, च० वि० अ० 7), 4. सौसुराद तथा 5.
ककेरुक। तथा एक और कृमि जो कफ एवं रक्त से उत्पन्न
होता है, उसे 'स्नायुक' या 'नहरुआ' कहते हैं। व्रणों या घावों
में छोटे-बड़े कृमि उत्पन्न हो जाते हैं, वे बाहरी कारणों से
(किरौनी नामक मक्खी के बैठने से) उत्पन्न होते हैं।
वक्तव्य-उक्त कृमियों में से कुछ तो आँखों से देखे जाते
हैं, किन्तु कुछ ऐसे भी हैं, जो 'अणुवीक्षण' यन्त्र द्वारा देखे जा
सकते हैं। मेरे विचार से आजकल जो पाश्चात्य चिकित्सकों
में कृमियों की चर्चा चल रही है, उसको इन बीस प्रकार के
कृमियों से मिलान करने का कष्ट करें तो इस विषय को
समझने में आपको बड़ी सहायता मिलेगी। 'स्नायुक' प्रायः
शरीर की शाखाओं (टाँगों और बाँहों) में होता है और सफेद
डोरे जैसा निकलता है। आचार्य शार्ङ्गधर ने व्रण के कृमियों
को अलग गिना है, किन्तु चरक में वे 'जन्तुमातरः' (जन्तुः
माता येषां ते=जन्तुमातरः) के नाम से कहे गये हैं। कृमियों के
विवेचन के लिए सु० उ० अ० 54 को पूर्ण जानकारी के लिए
अवश्य देखें।
पाण्डुकामला-कुम्भकामला-हलीमक-गणना
पाण्डुरोगाश्च पञ्च स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा।
त्रिदोषैर्मृत्तिकाभिश्च तथैका कामला स्मृता।। १९।।
स्यात् कुम्भकामला चैका तथैकं च हलीमकम्।
पाण्डुरोग पाँच प्रकार का होता है-1. वायु से, 2. पित्त
से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से, और 5. मिट्टी खाने से।
कामला एक ही होता है, कुम्भकामला एक होता है और
'हलीमक' भी एक होता है।
वक्तव्य-रक्त में रक्तकणों की कमी हो जाने से शरीर
पीलापन लिये सफेद हो जाता है। इस रोग को 'पाण्डुरोग'
कहते हैं। यदि रक्त में पित्त का अधिक मिश्रण हो जाता है, तो
शरीर का रंग हल्दी का-सा हो जाता है, आँखें और मूत्र
अधिक पीले हो जाते हैं। इसे 'कामला' या 'पीलिया' कहते
हैं। उक्त रोगों का यदि कुम्भ (उदर) में (यकृत्-प्लीहा पर)
अधिक प्रभाव पड़ता है, तो उसे 'कुम्भकामला' कहा जाता है
और जब रोगी का वर्ण काला या हरापन लिये पीला होता है,
तो उसे 'हलीमक' कहते हैं। हलीमक को ही 'कालाजार'
कहते हैं। इन सबमें यकृत् और प्लीहा की विकृति ही कारण
होता है।
रक्तपित्त-गणना
रक्तपित्तं त्रिधा प्रोक्तमूर्ध्वगं कफसम्भवम् ।। २० ।।
अधोगं मारुतं ज्ञेयं तद्द्वयेन द्विमार्गगम्।
रक्तपित्त तीन प्रकार का होता है-1. ऊर्ध्वगामी नाक,
मुख आदि ऊपर के स्रोतों से निकलने वाला, जो कफ से
होता है, 2. अधोगामी लिंग एवं योनिमार्ग से निकलने वाला,
जो वायु से होता है और 3. द्विमार्गगामी, ऊपर एवं नीचे के
स्रोतों से, जो कि वायु एवं कफ के प्रकोप से होता है।
वक्तव्य-पित्त की वृद्धि से रक्त इतना पतला हो जाता है
कि वह केशिकाओं से रिसकर (चूकर) निकलने लगता है।
यह रक्तपित्त का असाध्य स्थिति कही जाती है।
कास-गणना
कासाः पञ्च समुद्दिष्टास्ते त्रयः स्युस्त्रिभिर्मलैः ।। २१ ।।
उरः क्षताच्चतुर्थः स्यात् क्षयाद्धातोश्च पञ्चमः।
कास पाँच प्रकार का होता है-वातादि दोषों से तीन, उरः
(फुफ्फुस एवं श्वासमार्ग) में क्षत या घाव होने से चौथा और
धातुक्षय से पाँचवाँ।
क्षय-गणना
क्षयाः पञ्चैव विज्ञेयास्त्रिभिर्दोषैस्त्रयश्च ते ।। २२ ।।

सप्तमोऽध्यायः] रोगगणना 65
चतुर्थः सन्निपातेन पञ्चमः स्यादाुरःक्षतात्।
क्षय पाँच ही माने जाते हैं। यथा-तीनों दोषों से तीन,
सन्निपात से चौथा और उरःक्षत से पाँचवाँ।
वक्तव्य-क्षय का दूसरा नाम 'राजयक्ष्मा' या तपेदिक
है। एक तो इस रोग में रसधातु कफ के रूप में और उरःक्षत
होने पर रक्त के रूप में निकल जाता है। अतः इसे 'कफक्षयी'
भी कहा जाता है और शुक्र के अधिक क्षय से (सब धातु
शुक्र रूप में परिणत होकर निकल जाते हैं) उक्त दोनों ही
प्रकार से धातुओं का क्षय या ह्रास होता जाता है, अतएव इसे
'क्षय' कहते हैं।
शोष की कारण-भेद से गणना
शोषाः स्युः षट्प्रकारेण स्त्रीप्रसङ्गाच्छुचो व्रणात् ।। २३ ।।
अध्वश्रमाच्च व्यायामाद् वार्धक्यादपि जायते।
शोष छः प्रकार का होता है-1. अधिक मैथुन करने से,
2. शोक से, 3. व्रण से, 4. मार्ग की थकावट से, 5. अधिक
व्यायाम (कसरत) से और 6. बुढ़ापा से।
वक्तव्य-स्वस्थान स्थित धातुओं का सूख जाना ही 'शोष'
होता है। हमारे विचार में मैथुन एवं व्रण से होने वाले शोष को
क्षय कहना उचित होगा, क्योंकि इनमें शुक्र और पूय (मवाद)
के रूप में धातुओं का क्षय होता है, न कि शोष।
श्वास-गणना
श्वासाश्च पञ्च विज्ञेयाः क्षुद्रः स्यात्तमकस्तथा ।। २४ ।।
ऊर्ध्वश्वासो महाश्वासश्छिन्नश्वासश्च पञ्चमः।
'श्वास' रोग पाँच होते हैं। यथा-1. क्षुद्र, 2. तमक, 3.
ऊर्ध्वश्वास, 4. महाश्वास और 5. छिन्नश्वास।
वक्तव्य-'श्वास रोग' को 'दमा' कहते हैं। श्वास लेने में
कष्ट होना ही 'श्वास रोग' है।
हिक्का-गणना
कथिताः पञ्च हिक्कास्तु तास्तु क्षुद्राऽन्नजा तथा ।। २५ ।।
गम्भीरा यमला चैव महती पञ्चमी तथा।
हिक्का पाँच प्रकार की होती है। यथा-1. क्षुद्रा, 2.
अन्नजा, 3. गम्भीरा, 4. यमला और 5. महती।
वक्तव्य-हिक्का को ही 'हिचकी' कहते हैं।
जठराग्नि विकार गणना
चत्वारोऽग्नेर्विकाराः स्युर्विषमो वातसम्भवः ।। २६ ।।

तीक्ष्णः पित्तात् कफान्मन्दो भस्मको वातपित्तयोः।
अग्नि-विकार चार होते हैं। यथा-1. वायु से विषम,
2. पित्त से तीक्ष्ण, 3. कफ से मन्द एवं 4. वात-पित्त से
'भस्मक'।
अरोचक-गणना
पञ्चैवारोचका ज्ञेया वातपित्तकफैस्त्रिधा ।। २७ ।।
सन्निपातान्मनस्तापात् -
अरोचक पाँच होते हैं। यथा-1. वायु से, 2. पित्त से, 3.
कफ से, 4. सन्निपात से और 5. मानसिक कष्ट से।
वक्तव्य-जब रोगी यह कहता है कि खाने को जी नहीं
चाहता या खाना अच्छा नहीं लगता, तो इसे 'अरोचक या
अरुचि' समझना चाहिये।
छर्दि-गणना
-छर्दयः सप्तधा मताः।
त्रिभिर्दोषैः पृथक् तिस्रः कृमिभिः सन्निपाततः ।। २८ ।।
घृणया च तथा स्त्रीणां गर्भाधानाच्च जायते।
छर्दि सात प्रकार की होती है। यथा-तीनों दोषों से
पृथक्-पृथक् तीन, कृमियों से चौथी, सन्निपात से पाँचवीं,
घृणा से छठी और स्त्रियों को गर्भधान हो जाने से सातवीं।
वक्तव्य-छर्दि को ही उलटी, कै, वमि या वमन कहते हैं।
स्वरभेद-गणना
स्वरभेदाः षडेव स्युर्वातपित्तकफैस्त्रयः ।। २९ ।।
मेदसा सन्निपातेन क्षयात् षष्ठः प्रकीर्तितः।
स्वरभेद छः प्रकार का होता है-1. वायु से, 2. पित्त से,
3. कफ से, 4. मेदा के बढ़ने से, 5. सन्निपात से और
6. धातुक्षय से।
वक्तव्य-गला बैठना या बोला न जाना ही 'स्वर भेद'
कहा जाता है।
तृष्णा-गणना
तृष्णा च षड्विधा प्रोक्ता वातात् पित्तात् कफादपि ।। ३० ।।
त्रिदोषैरुपसर्गेण क्षयाद् धातोश्च षष्ठिका।
तृष्णा छः प्रकार की कही गयी है। यथा-1. वायु से, 2.
पित्त से, 3. कफ से, 4. सन्निपात से, 5. उपसर्ग से और 6.
धातुक्षय से।

66 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
वक्तव्य-आवश्यकता से अधिक प्यास लगना 'तृष्णा
रोग' होता है उपसर्ग-घाव आदि होने पर जब शरीर से रक्त
धातु अधिक निकल जाता है, तो प्यास बहुत लगती है। इसी
को 'उपसर्गजा तृष्णा' कहते हैं।
मूर्च्छादि-गणना
मूर्च्छा चतुर्विधा ज्ञेया वातपित्तकफैः पृथक् ।। 31 ।।
चतुर्थी सन्निपातेन तथैकश्च भ्रमः स्मृतः।
निद्रा तन्द्रा च संन्यासो ग्लानिंश्चैकैकशः स्मृताः ।। 32 ।।
मूर्च्छा चार प्रकार की होती है-वात, पित्त तथा कफ से
तीन और सन्निपात से चौथी। भ्रम रोग एक ही प्रकार का होता
है। निद्रा (नींद), तन्द्रा, संन्यास एवं ग्लानि ये रोग एक-एक
प्रकार के ही होते हैं।
वक्तव्य-बेहोशी को ही मूर्च्छा कहा जाता है। संन्यास
उस मूर्च्छा को कहते हैं, जिससे रोगी चिकित्सा के बिना होश
में नहीं आता और मर भी जाता है। मूर्च्छा का रोगी तो कुछ
समय के बाद स्वयं होश में आ जाता है।
मद-मदात्ययादि-गणना
मदाः सप्त समाख्याता वातपित्तकफैस्त्रयः।
त्रिदोषैरसृजा मद्याद्विषादपि च सप्तमः ।। 33 ।।
मदात्ययश्चतुर्था स्याद् वातपित्तकफादपि।
त्रिदोषैरपि विज्ञेय एकः परमदस्तथा ।। 34 ।।
पानाजीर्णं तथा चैकं तथैकः पानविभ्रमः।
पानात्ययस्तथा चैको-
मद सात कहे गये हैं-वात, पित्त तथा कफ से तीन,
सन्निपात से एक, रक्त से एक, मद से एक एवं विष से
सातवाँ। 'मदात्यय' चार प्रकार का होता है-वात से, पित्त से,
कफ से तथा सन्निपात से। 'परमद' एक ही प्रकार का होता
है, 'पानाजीर्ण' एक प्रकार का होता है, 'पानविभ्रम' एक
होता है और 'पानात्यय' भी एक होता है।
वक्तव्य-'मद' उस अवस्था का नाम है, जो शराब,
भाँग आदि मादक द्रव्यों के सेवन करने पर हो जाता है।
'मदात्यय' मद से होने वाली हानि को कहते हैं। 'परमद' मद
की अधिकता का नाम है। सेवन किये हुये मादक द्रव्यों का
न पचना 'पानाजीर्ण' है और उन्हीं मादक द्रव्यों के विकार से
होने वाली हानि को 'पानविभ्रम' तथा मादक द्रव्यों का अधिक
सेवन करने पर होने वाली हानि को 'पानात्यय' कहा जाता है।
दाह-गणना
-दाहाः सप्त मतास्तथा ।। 35 ।।
रक्तपित्तात्तथा रक्तात्तृष्णायाः पित्ततस्तथा।
धातुक्षयान्मर्मघाताद् रक्तपूर्णोदरादपि ।। 36 ।।
'दाह' सात माने जाते हैं-1. रक्तपित्त से, 2. रक्त से, 3.
प्यास रोकने से, 4. पित्त से, 5. धातुक्षय से, 6. मर्मस्थानों पर
चोट आने से और 7. रक्त से उदर भर जाने से।
वक्तव्य-दाह उस जलन को कहते हैं, जिसका अनुभव
केवल रोगी ही करता है।
उन्माद-गणना
उन्मादाः षट् समाख्यातास्त्रिभिर्दोषैस्त्रयश्च ते।
सन्निपाताद् विषाज्ज्ञेयः षष्ठो दुःखेन चेतसः ।। 37 ।।
उन्माद छः कहे जाते हैं-तीनों दोषों से तीन, सन्निपात से
चौथा, विष से पाँचवाँ और मानसिक दुःख से छठा।
वक्तव्य-'उन्माद' पागलपन का नाम है। बुद्धि का बिगड़
जाना ही पागलपन है।
भूतोन्माद-गणना
भूतोन्मादा विंशतिः स्युस्ते देवाद्वानवादपि ।
गन्धर्वात् किन्नराद्यक्षात् पितृभ्यो गुरुशापतः ।। 38 ।।
प्रेताच्च गुह्यकाद् वृद्धात्सिद्धाद्भूतात्पिशाचतः।
जलाधिदेवतायाश्च नागाच्च ब्रह्मराक्षसात् ।। 39 ।।
राक्षसादपि कूष्माण्डात् कृत्यावेतालयोरपि।
भूतोन्माद बीस होते हैं-1. देवता से, 2. दानव से, 3.
गन्धर्व से, 4. किन्नर से, 5. यक्ष से, 6, पितर से, 7. गुरुजन
के शाप से, 8. प्रेत से, 9. गुह्यक से, 10. वृद्ध को कष्ट देने
से, 11. सिद्धों से, 12. भूत से, 13. पिशाच से, 14. वरुण से,
15. नाग से, 16. ब्रह्मराक्षस से, 17. राक्षस से, 18. कूष्माण्ड
से, 19. कृत्या (तान्त्रिकक्रिया-विशेष) से और 20. वेताल से।
वक्तव्य-गुरु तथा वृद्ध को छोड़कर शेष सभी अलौकिक
आत्माएँ हैं। इन आत्माओं का किन्हीं कारणों से मानव-शरीर
में आवेश होता है और मनुष्य पागल हो जाता है। कृत्या के
साहित्य तथा उसके उपचारों को तान्त्रिक लोगों से समझें।

सप्तमोऽध्यायः ] रोगगणना 67
अपस्मार-गणना
अपस्मारश्चतुर्धा स्यात् समीरात् पित्ततस्तथा ।। 40 ।।
श्लेष्मणोऽपि तृतीयः स्याच्चतुर्थः सन्निपाततः ।
अपस्मार चार प्रकार का होता है-1. वात से, 2. पित्त
से, 3. कफ से और 4. सन्निपात से।
वक्तव्य-अपस्मार को मृगी या मिरगी भी कहते हैं।
आमवात-गणना
चत्वारश्चामवाताः स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा ।। 41 ।।
चतुर्थः सन्निपातेन -
आमवात चार होते हैं-वात, पित्त और कफ से तीन और
चौथा सन्निपात से।
वक्तव्य-आमवात को प्रचलित भाषा में 'गठिया' कहा
जाता है।
शूल-गणना

  • शूलान्यष्टौ बुधा जगुः।
    पृथग्दोषैस्त्रिधा द्वन्द्वभेदेन त्रिविधान्यपि ।। 42 ।।
    आमेन सप्तमं प्रोक्तं सन्निपातेन चाष्टमम्।
    विद्वान् लोग 'शूल' को आठ प्रकार का कहते हैं-
    पृथक्-पृथक् वात आदि दोषों से तीन, दो-दो दोषों से तीन,
    आम से सातवाँ और सन्निपात से आठवाँ।
    वक्तव्य-शूल मध्यकाय में कहीं भी हो सकता है। इसके
    विशेष ज्ञान के लिए देखें-सु० उ० तं० अ० 42।
    परिणामशूल-गणना
    परिणामभवं शूलमष्टधा परिकीर्तितम् ।। 43 ।।
    मलैयैः शूलसङ्ख्या स्यात् तैरेव परिणामजम्।
    अन्नद्रवभवं शूलं ज्वरपित्तभवं तथा ।। 44 ।।
    एकैकं गणितं सुज्ञैः-
    परिणामशूल आठ प्रकार का कहा गया है-जिन मलों
    (वातादि दोषों और आम) से शूल की गणना की गयी है,
    उन्हीं से परिणामशूल भी हो जाता है। अन्नद्रवशूल एवं जरत्पित्त
    से होनेवाला शूल ये एक एक प्रकार के होते हैं।
    वक्तव्य-ऊपर कहे गये शूलों का स्पष्टीकरण-
    परिणामशूल-यह केवल आहार की पच्यमानावस्था (पचते
    समय) में होता है। अन्नद्रवशूल-यह केवल द्रव आहार पीने
    से अथवा आहार में मिलने वाले द्रव रसों (पित्त आदि) के
    विकार से होता है। जरत्पित्तशूल- यह पित्त के पचते समय
    होता है जो कै या उलटी होने पर शान्त हो जाता है।
    उदावर्त्त-गणना
  • उदावर्तास्त्रयोदश ।
    एकः क्षुन्निग्रहात्प्रोक्तस्तृष्णारोधाद् द्वितीयकः ।। 45 ।।
    निद्राघातात्तृतीयः स्याच्चतुर्थः श्वासनिग्रहात्।
    छर्दिरोधात् पञ्चमः स्यात् षष्ठः क्षवथुनिग्रहात् ।। 46 ।।
    जृम्भारोधात् सप्तमः स्यादुद्गारग्रहतोऽष्टमः ।
    नवमः स्यादश्रुरोधाद् दशमः शुक्रधारणात् ।। 47 ।।
    मूत्ररोधान्मलस्यापि रोधाद् वातविनिग्रहात्।
    उदावर्तास्त्रयश्चैते घोरोपद्रवकारकाः ।। 48 ।।
    उदावर्त्त तेरह होते हैं-1. भूख को रोकने से, 2. प्यास
    को रोकने से, 3 निद्रा (नींद) को रोकने से, 4. श्वास (चढ़े
    हुये श्वास) को रोकने से, 5. कै (दूषित कै) को रोकने से, 6.
    छींक को रोकने से, 7. जँभाई को रोकने से, 8. उद्गार
    (डकार) को रोकने से, 9. आँसुओं को रोकने (जब रोने का
    वेग उत्पन्न हो, तो उसे रोकने) से, 10. शुक्र को अनुचित ढंग
    से (ब्रह्मचर्य रखना बहुत आवश्यक है) रोकने से, 11. मूत्र
    को रोकने से, 12. मल (विष्ठा) को रोकने से और 13. वायु
    (अपानवायु) को रोकने से, इनमें अन्तिम तीन उदावर्त्त बड़े
    भयंकर होते हैं।
    वक्तव्य-प्रकृति जिन पदार्थों को शरीर से बाहर निकाल
    देना चाहती है, उनको हठात् न निकलने देना अर्थात् उक्त
    पदार्थों का उत् (उलटा) आवर्त्त (पीछे को घूमना या लौट
    जाना) 'उदावर्त्त' कहलाता है। इससे बहुत हानि होती है,
    अतः 'न वेगान् धारयेत् धीमान्' अर्थात् उक्त वेगों को नहीं
    रोकना चाहिये, ऐसा कहा गया है। जैसे रोगयुक्त श्वास के वेग
    को रोकना तो हानिकारक होता है, किन्तु प्राणायाम के समय
    उसे रोकना लाभदायक होता है।
    आनाह-गणना
    आनाहो द्विविधो ज्ञेय एकः पक्वाशयोद्भवः ।
    आमाशयोद्भवश्चान्यः प्रत्यानाहः स कथ्यते ।। 49 ।।
    आनाह दो प्रकार का होता है-1. पक्वाशय का और 2.
    आमाशय का, इसे 'प्रत्यानाह' भी कहा जाता है।