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संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages
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शरीरका वर्ण ( रंग )

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दूसरे स्त्री वा पुष्पके रूप रंगका खयाल आ जानेसे अपने शरीरमें उसी रंगकी सन्तान उत्पन्न करनेवाली धातु उत्कट होकर तेज धातुसे मिलकर वैसे ही रंगकी सन्तान उत्पन्न करती है।

चौथा विचार यह है कि 'जैसा रूप रंग गर्भाधान समयमें स्त्रीके सामने आ जाता है उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है। ठीक है, यह भी एक गौरवका सिद्धान्त है। इस विषयमें बहुत बड़ा एक प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि प्रायः सौदागर ऐसा करते हैं कि घोड़ीसे जिस रंगका बच्चा उनको लेना होता है तो घोड़ीके गर्भाधानके समय उसी रंगका घोड़ा घोड़ी के सामने खड़ा करते हैं और घोड़ीकी आंखोंमें पट्टी बांध देते हैं, जब गर्भाधान हो चुकता है तब उस घोड़ेको, कि जिससे गर्भाधान हुआ था, अलग कर देते हैं और आंखोंकी पट्टी खोल देते हैं। पट्टी खोलते ही घोड़ीकी नजर सामनेवाले घोड़ेपर पड़ती है और उसी रंगका घोड़ा पैदा होता है। इसी प्रकार स्त्रियोंमें भी दृष्टिका बहुत बड़ा असर होता है। गर्भाधान समयमें जैसा रूप रंग स्त्रीके सामने आ जाता है, तो उसका एक ऐसा प्रभाव स्त्री पर पड़ता है कि जिससे स्त्रीके शरीरमें वैसा ही रंग उत्पन्न करनेवाली धातु उत्कट होती है और वह तेज धातुसे मिलकर गर्भाधान समयमें देखे हुए रंगके समान रंगवाली सन्तान उत्पन्न करती है। इस विषयमें यूरोपकी एक बहुत बड़ी यह आख्यायिका प्रसिद्ध है। एक यूरोपियन व्यक्ति के यहां काले रंगकी सन्तान उत्पन्न हुई थी। कारण यह सावित हुआ कि गर्भाधानके समयमें स्त्रीकी लगाह एक काले रंगके हवश्रीके चित्र पर पड़ी थी, जो पलंगके सामने था। इन प्रमाणों से सारे विचारोंका एक ही सिद्धान्त निकलता है कि शरीरम

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सन्तति-शास्त्र ।

स्थित धातु भोजन, चिन्तवन और दृष्टिसे उसीके अनुसार उत्तेजित हो तेज धातुसे मिलकर सन्तान उत्पन्न करती है ।

यहां पर एक बहुत बड़ी शंका यह होती है कि यूरोपमें सब गोरे ही रंगके क्यों पैदा होते हैं? इस विषयमें जहांतक निश्चय किया गया यह बात पायी गयी है कि सर्दीके कारण यूरोपके लोगोंमें तेज धातु अधिकांश जलयुक्त होती है । इस कारण लोग गोरे रंगके उत्पन्न होते हैं । हमारे देशमें ही जहां सर्दी अधिक पड़ती है वहांके लोग इसी कारण कुछ गोरे होते हैं । इसी प्रकार जहां गर्मी अधिक पड़ती है, वहांके लोगोंमें तेज धातुके साथ पृथ्वी और आकाश धातु अधिक होती है । इस कारण वहांपर काले रंगके लोग होते हैं । खानेके पदार्थोंमें भी बड़ा हेरफेर हो जाता है । सर्द देशमें खानेकी चीजें सर्दीसे अधिक जलयुक्त होती हैं । गर्म देशोंमें खानेके पदार्थ अधिक पृथ्वी धातुके अंशोंसे युक्त रहते हैं । शुद्ध लोगोंमें कि जिनको सुखसे खाने पीनेको मिलता है, उनके वच्चोंकी रंगत कुछ और ही होती है । इन सब विचारोंसे यह बात निश्चय है कि हर देशके खाने पीनेकी चीजोंमें पंचतत्वोंकी कमी-चेशी जरूर होती है । यह भी प्रत्येक प्रान्तके निवासियोंके रंगमें अन्तर होनेका एक विशेष कारण है ।

देश और प्रान्तका यदि विचार करके एक एक घरमें देखा जाय तो मालूम होगा कि संयमके साथ भोजन करने-वालों और लापरवाहीसे बिना विचारके भोजन करनेवालोंकी सन्तानोंमें कितना अन्तर होता है । इन सब विचारोंसे यह बात सिद्ध हुई कि तेज धातुके साथ जल इत्यादि दूसरी धातु अधिकांशसे मिलकर अनेक रूप रंगकी सन्तान उत्पन्न करती है । यह बात मुख्य करके मानी गई है कि भोजनका प्रभाव

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मनुष्याकृति भिन्न भिन्न क्यों होती है ? २२५

रूप रंगके विषयमें दृष्टि और चिन्तवनसे प्रभावशाली होता है। क्योंकि अंगरेजोंके यहाँ गोरी ही सन्तान होती है, चाहेवे किसी देशमें रहें। इसी प्रकार काबुली, चीनी, जापानी और रंगूली कहीं रहते हुए अपने ही रूप रंगके अनुसार सन्तान उत्पन्न करते हैं। इसका कारण यह है कि प्रायः इनका भोजन दूसरे देशमें जाकर नहीं बदलता, परन्तु भारतमें यह बात नहीं है। बंगाली और मदरासी भारतके ही दूसरे प्रान्तोंमें जाकर भोजन बदल देते हैं। इनको पञ्जाब ऐसे देशमें जाकर चावलके साथ गेहूँ खानेकी वान पड़ जाती है इत्यादि। इस प्रकार भोजन बदल जाने या उसमें हेर फेर हो जानेसे शरीरकी धातुओंमें कमी वेशी हो जाती है। इस कारण भारतीय भारत के दूसरे प्रान्तोंमें जाकर वहाँके अनुसार सन्तान उत्पन्न करते हैं। इतना ही नहीं, एक ही स्थान और एक ही माता-पितासे दो रंगकी सन्तान उत्पन्न होती है। पहला लड़का गोरा दूसरा काला, इसका कारण भी भोजनका हेर फेर है, जैसे जाड़ेके दिनोंमें गरम पदार्थों और गरमियोंमें ठंडी वस्तुओंका अत्यन्त सेवन इत्यादि। इस प्रकार अनेक रङ्गकी सन्तानें उत्पन्न होती हैं कि जिनका मुख्य कारण जलादि धातु हैं और वे भोजन किये हुए पदार्थोंसे बनती हैं। अतएव भोजनके पदार्थोंका संशोधन करके मनुष्य मन-चाहे रङ्गकी सन्तान उत्पन्न कर सकता है; क्योंकि जिस धातुकी इच्छा हो वह मुख्य रीतिसे भोजनके पदार्थों द्वारा विशेष रूपसे उत्पन्न हो सकती है।

(५४) मनुष्याकृति भिन्न भिन्न क्यों होती है ?

संसारमें जितने मनुष्य हैं सबके चेहरेकी बनावट अलग अलग होती है। एकका चेहरा दूसरेसे नहीं मिलता। बहुत

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54. मनुष्याकृति भिन्न भिन्न क्यों होती है ?

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नन्दिनि-शाल ।

सी सूरतोंमें जब कि यह कहा जाता है कि इनमें कुछ भी भेद नहीं है तथापि कुछ न कुछ अन्तर अवश्य होता है। इनके अनेक कारण हैं।

१. वैचक्यका भत।

२. रजोदर्शनके समयमें मानाके हृदयपर जिस सूत्र गललके स्त्री पुरुषका ध्यान आ जाता है या आनन्दके समयमें जैसे पुरुषका दर्शन हो और उसका ध्यान बना रहे उसी रूपको सन्तान होगी है। (रतिशास्त्र)

इसी कारण रजोदर्शन समयमें एकान्तवासका विधान कहा गया है।

२. गर्भाधान समयमें जिस जीवमें स्त्रीका चित्त होगा अर्थात् जिस जीवका ध्यान आ जावेगा उसीके अनुसार सन्तान होगी। (च० श० अ० २ श्ल० २८)

इसी प्रकार भोज वैद्य और अन्य विद्वानोंने भी कहा है। इसके अनेक उदाहरण इसी पुस्तकमें 'मनोवेल' के विषयमें लिखे गये हैं।

३. माता-पिताके मिले हुए रज-चीर्थमें गरीरके जिस अंग प्रत्यंगके बनानेवाला अंग निर्बल होता है तो गरीरका वह अंग उत्तम नहीं होता अथवा जब अंग प्रत्यंग बनानेका अंग नहीं होता तो अंग ही नहीं बनता।

(श० ६०)

४. गर्भावस्थामें माताका भोजन ठीक न होनेसे भी सन्तान की मित्र मिश्र आकृति होती है। इसके कई भेद हैं।

१. जिस अंगके जिस प्रकारका भोजन उपयोगी होता है उसके कम होने अथवा न होनेपर अधूरा अंग रह जाता है। (श० ६०)

56. अवयजीवी और दीर्घजीवी सन्तान कैसे होती है ?

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मनुष्याकृति भिन्न भिन्न क्यों होती है ?

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२. जिस पदार्थके खानेसे शरीरके जिस अंगको हानि पहुँचती है गर्भमें बच्चेका वही अंग विकृत हो जाता है। ( श० क० )

३. जिस पदार्थके खानेसे जिस अंगकी पुष्टि होती है गर्भमें बालकका वह अंग उत्तम रीतिसे विकसित होता है। ( श० क० )

यही कारण है कि बच्चे माता पिता, मामा और नौकरों इत्यादिकी आकृतिके होते हैं। इसमें माताका विचार रजस्वला समयका दर्शन तथा गर्भाधान समयका चिन्तवन कारण है। स्त्री के हृदयमें एक ऐसी दैवीशक्ति है कि जिससे चिन्तवन किये हुए मनुष्यकी आकृतिकी सन्तान उत्पन्न होती है। जिस प्रकार तसवीर खिचते समयमें हँसने रोनेवालेकी उसी विकारके अनुसार तसवीर खिंच जाती है, इसी प्रकार माताके हृदयपर पड़े हुए स्त्री पुरुषके आकारके अनुसार सन्तान होती है। इस विषयमें माता-पिताका मिला हुआ रज-वीर्य भी कम असर नहीं रखता। जिस अंगके बननेका सामान रजवीर्यमें कम होता है, वह अंग बेदंगा और निस्तेज होता है। जिस अंगके बननेका अंश प्रबल होता है वह अंग पूरी रीतिसे प्रफुल्लित रहता है। इसी प्रकार गर्भावस्थामें माताके खाए हुए भोजनका कुछ कम प्रभाव नहीं पड़ता। जिस पदार्थके खानेसे जिन्न अंगकी पुष्टि होती है उसके खानेसे वह अंग गर्भमें उत्तम बन जाता है और जिसके खानेसे जिस अंगको हानि होती है वह ठेढ़ा और बदस्वरत हो जाता है।

अतएव इस विषयमें रजोधर्म और गर्भाधान समयका चिन्तवन और ध्यान तथा गर्भावस्थामें माताका भोजन मुख्य

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सन्तति-शास्त्र ।

कारण है कि जो एक सा सारी स्त्रियाँका नहीं हो सकता । अतएव प्रत्येक मनुष्यकी आकृति भिन्न भिन्न होती है ।

( ५५ ) नेत्रोंका उत्तम और मध्यम होना ।

जिस प्रकार मनुष्यका रूप रंग एकसा नहीं होता इसी प्रकार नेत्र भी एक प्रकारके नहीं होते । गर्भ जब चार महीनेका हो जाता है तब आँखोंमें कुछ ज्योति आने लगती है । इसलिये चौथे महीनेमें जैसा तेज दृष्टि-भाग में आता है वैसी ही आँखें होती हैं ।

वैयक्तिका मत ।

( सु० श० अ० २ ख० ० ९३ )

१ यदि गर्भके बालककी आँखोंमें तेज धातु न पहुँचे तो बालक जन्मसे ही अन्ध होता है ।

२ यदि तेज धातु रक्तके साथ होकर दृष्टि-भागमें जावे तो बालक लाल नेत्रोंवाला होता है ।

३ यदि तेज धातु पित्तके साथ होकर आँखोंमें पहुँचे तो बालक पीले नेत्रोंवाला होता है ।

४. यदि तेज धातु कफके साथ होकर दृष्टि-भागमें पहुँचे तो सफेद नेत्रोंवाला बालक होता है ।

५ यदि तेज धातु वायुके साथ होकर दृष्टि-भागमें पहुँचे तो मँडी आँखोंवाला या नेत्र रोग वाला या चंचलाक्ष बालक होता है ।

तेज धातुके साथ दूसरी धातुओंके मेलसे इस प्रकार वच्चों-की आँखें बनती हैं । यहाँपर एक बहुत बड़ा प्रश्न यह होता है कि तेज धातुके साथ वात पित्त इत्यादि किस प्रकार पहुँचते हैं । शरीरमें वात पित्त इत्यादिमें से जिसकी अधिकता

55. नेत्रोंका उत्तम और मध्यम होता

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अल्पजीवी और दीर्घजीवी सन्तान कैसे होती ? २२६

होगी वही प्रबल होगा और वही तेज धातुके साथ नेत्रोंमें पहुँचेगा। माता जैसा भोजन करती है उसीके अनुसार शरीर में वात पित्त इत्यादि बढ़ते हैं। बहुतसे लोग ऐसे देखे जाते हैं कि जिनकी आंखें बिल्डों की सी पीली होती हैं। उनकी आंखोंमें तेज धातुके साथ पित्त ऐसा विकार उत्पन्न करता है। यह रोग वंश परंपरासे भी देखा जाता है। माता पिता दोनोंकी आंखें पीली होनेपर बच्चोंकी भी आंखें पीली होती हैं; परंतु माता या पिता एककी आंखोंमें ऐसा विकार होने पर नहीं होती। यहां पर यह सवाल हो सकता है कि यूरोपमें सबकी आंखें सफेद क्यों होती है? इसका कारण यह है कि यूरोप सदा देश है और कफ सदीसे उत्पन्न होता है, इसलिये वहांके निवासियोंमें कफकी अधिकता रहती है। जब शरीरमें कफकी अधिकता होती है तो तेज धातुके साथ कफ दृष्टि-भागमें पहुँचता है, इस कारण यूरोप निवासियोंकी आंखें कंजी होती हैं। इस प्रकार तेजके साथ पित्तादि धातुओंके बिगाड़से अनेक प्रकारकी आंखें होती हैं।

( ५६ ) अल्पजीवी और दीर्घजीवी सन्तान कैसे होती है ?

यह एक बड़ा गंभीर विषय है। बहुतोंका तो कहना यह है कि यह वात ईश्वरके हाथमें है। बहुतसे लोग पूर्व जन्मके पाप और पुण्य पर मानते हैं, परंतु हम किसीके मन्तव्य पर आश्रय नहीं करते। हमने भी कई जगह ऐसा पढ़ा है कि आयु कर्मोंके अनुसार होती है, परंतु आजकालकी नवीन रीतिके अनुसार यह बात सिद्ध हुई है कि गर्भ रज-वीर्यके कीड़ोंसे

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सन्तति-शास्त्र ।

ही रहता है। वीर्य जव मज्जा धातुसे बनकर २६ से लेकर ३६ घंटे पर्यन्त वीर्यशयमें रह चुकता है, तव उस वीर्यके कौठे पुष्ट होते हैं। जो लोग इससे कम समयमें या दिन रातमें कई बार प्रसंग करते हैं तो कच्चे रहते हैं उनके वीर्यमें वीर्य-जन्तु होते ही नहीं, यदि होते भी हैं तो कच्चे रहते हैं और उनमें कूदने और गर्भ बनानेकी शक्ति ही नहीं होती।

इसमें एक बहुत बड़ी वारीकी यह है कि पुरुषकी कम अवस्थामें ऐसे जन्तु कभी नहीं पकते। एक विद्वानकी राय है कि जन्तुओंका पकना वीस वर्षकी अवस्थासे प्रारंभ होता है, और पचीस वर्षकी अवस्थामें खूब अच्छी तरह पक जाते हैं इनके बाद हमेशा पकते रहते हैं। यह बात उन लोगोंमें पाई जाती है कि जिन्होंने पचीस वर्षतक ब्रह्मचर्य पालन किया है, परन्तु जिसका ब्रह्मचर्य इस नियत समयतक नहीं रहा, उनके वीर्य-जन्तु हमेशा बुरी दशामें रहते हैं। इस विषयमें ऐसा नहीं होता कि जिन्होंने पच्चीस वर्षतक ब्रह्मचर्य नहीं पालन किया है, सोलह अथवा वीस वर्षकी अवस्थासे ही स्त्री संयोग प्रारंभ हो गया है, तां उनका वीर्य जन्तु पचीस वर्षकी अवस्थामें जाकर पक जावेगा। यह एक बड़ी भूल है, ऐसे लोगोंके वीर्य जन्तु आगे चलकर नहीं पकते, किन्तु अधिकचरे रह जाते हैं। इसी प्रकार स्त्रियोंमें रजवती होनेके समयसे लेकर १६ वर्ष तक रज-जन्तु पक कर ठीक हो जाते हैं और सीतही अवस्थाओंमें पुष्टता आ जाती है। वैद्यकने भी ऐसा ही माना है कि पचीस वर्षकी अवस्थामें पुरुष और सोलह वर्षकी अवस्थामें स्त्री दोनों बराबरकी शक्तिवाले होते हैं। १० क

इस विषयमें स्त्री और पुरुषोंको कुर्पके संमान समझना चाहिये। जिस प्रकार दो चार हाथ भूमिमें गले हुए कुर्प थोडा

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अल्पजीवी और दीर्घजीवी सन्तान कैसे होती? २३१

सा पानी निकालने पर सूख जाते हैं और जो कुरपें अच्छी तरह से गले हैं वे चाहे जितना पानी निकालने पर भी, नहीं सूखते, इसी प्रकार जिन माता पिताओंने थोड़े दिन ब्रह्मचर्य पालन करके संयोग किया है, वे झिल्ले कुरपेंके समान हैं, परंतु जिनका ब्रह्मचर्य पूरा पालन हुआ है उनको गहर और गंभीर कुरपेंके समान समझना चाहिये।

एक खेतको देखना चाहिये, उसमें बहुतसे पेड़ हानेपर कुछ छोटे ही रह जाते हैं। कुछ बड़े होते हैं, कुछ सबमें अच्छे रहते हैं। इनका कारण यह है कि जैसा पका हुआ अच्छा वीर्य होता है उसीके अनुसार अच्छे लम्बे चौड़े पेड़ होते हैं। यह बात भी देखनेमें आवेगी कि पके हुए वीर्यके पेड़की जड़ गहरीमें होगी और वह कुछ देरमें सूखेगा परंतु जो पेड़ अध-पके वीर्यसे उगेगा उसकी जड़ तो अधिक नीचे न जायगी और वह जल्द सूख जायगा। इसी प्रकार मनुष्योंमें भी जानना चाहिये। जिन बच्चोंका गर्भ उत्तम और पके रजवीर्यके जन्तुओं से हुआ है, वे दीर्घजीवी अर्थात् ज्यादा दिन जीनेवाले; और जिनका गर्भ खराब कुछ कच्चे वीर्यसे हुआ है वे अल्पजीवी अर्थात् कम दिनों जीनेवाले होते हैं।

अच्छा और पका हुआ वीर्य हानेपर भी अल्पजीवी अर्थात् कम दिनों जीनेवाली सन्तान भी होती है। इसका कारण यह है कि जब अच्छा सूख पका हुआ वीर्य घुन जाता है, तो उससे पेड़ होता ही नहीं। यदि होता भी है तो छोटा और जल्द सूख जानेवाला। इसी प्रकार स्त्री और पुरुषोंके बीजोंमें भी समझना चाहिये। जब स्त्री पुरुषके रजवीर्यके जीव किसी रोगसे दूषित हो जाते हैं तो वह घुने हुए बीजके समान गर्भ ही नहीं उत्पन्न करते। यदि करते भी हैं, तो कच्चे

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सन्तति-शास्त्र ।

बीजके समान सन्तान पूरी उमरतक न जीनेवाली होती है। अतएव स्त्री पुरुषोंको पूरे दिनोंतक ब्रह्मचर्य्य करके संयोग करना चाहिये तभी उत्तम और दीर्घजीवी सन्तान उत्पन्न हो सकती है।

(५७) बच्चा कितने दिनोंमें उत्पन्न होता है ?

जिन माता पिताओंको गर्भाधानका दिन याद रहता है, उनको यह मालूम करनेमें कठिनाई नहीं पड़ती कि बच्चा कब पैदा होगा ? परन्तु जहाँ इसपर कुछ विचार ही नहीं है, वहाँ कैसे पता चल सकता है ? इस विषयमें अनेक मत हैं।

१. डाक्टरोंका मत ।

१. गर्भाधानसे २७८ या २८० दिन पर सन्तान उत्पन्न होती है।

२ कोई कोई गर्भाधानसे ३०० दिनतक उत्पन्न होनेका समय मानते हैं।

२. वैद्यकका मत ।

१ नवें, दसवें और कभी ग्यारहवें महीनेमें बालकका जन्म होता है। यदि इससे अधिक समय बीते तो एक प्रकार-का विकार सम्भूना चाहिये। ( सु० ७० अ० ३ श्लो० ३५ )

२. आहार न पहुँचने से गर्भ पेटमें सूख जाता है या गिर जाता है। गर्भ जब इस प्रकार सूख जाता है, तो कई वर्षोंमें पुष्ट होता है और फिर जन्म लेता है।

( च० ३० अ० २ श्लो० ५४ )

जहाँतक देखा गया है दस मासके अन्दर ही बच्चा पैदा हो जाता है। पैसा कम होता है कि साल भरमें हो और पैसा

57. वच्चा कितने दिनोंमें उत्पन्न होता है ?

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तत्काल बच्चा जननेवाली स्त्रीके लक्षण ।

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तो देखा ही नहीं गया कि वर्षोंमें हो । परंतु आचार्योंके लिखने का प्रयोजन यह है कि ऐसा हो सकता है ।

(५८) तत्काल बच्चा जननेवाली स्त्रीके लक्षण

बच्चा पैदा होनेका समय कितना कठिन होता है ? ऐसे समयमें स्त्रियाँ ही रक्षा करनेवाली होती हैं । इसलिये यह मालूम करना कितना जरूरी है कि बच्चा कब पैदा होगा ? इस विषयमें अनेक मत हैं ।

१० वैद्यकका मत ।

१. स्त्रीका कुम्हला जाना, शरीरमें भारीपन, मुखऔर नेत्रों, में शिथिलता, वक्षस्थलका वंघन खुला जान पड़ना, कूप का मुँह नीचेकी ओर हो जाना, नीचेके आधे देहमें अधिक भारीपन, वंक्षण, बस्ती, कमर, पसली और पीठमें चर्चकियोंका चलना अन्मसे अरुचि हो जाती है और गर्भका जल गिरने लगता है । तुरंत ही ऐसे लक्षणोंसे जान लेना चाहिये कि बच्चा शीघ्र ही होनेवाला है । ( ३० श० अ० ८ श्लो० ८० ) सुश्रुत० श० अ० १० श्लो० १३ व १४ और वा० श० अ० १ श्लो० ७४ व ७५ में भी ऐसा ही कहा है ।

२. योनिसे गर्भका जल गिरनेके पीछे ही प्रसवका देर्द उत्पन्न हो जाता है । (रतिशास्त्र )

ये लक्षण विशेष रीतिसे उन्हीं स्त्रियोंमें पाए जावेंगे कि जिनके पहले पहल बच्चा होगा । कई बार बच्चा हो जानेवाली स्त्रियोंमें प्रायः सब लक्षण नहीं होते हैं । परंतु कुछ होते अवश्य हैं ।

58. तत्काल वच्चा जननेवाली स्त्रीके लक्षण

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सन्तति-शास्त्र ।

(५६) बच्चेकी पैदाइशके समयका कर्तव्य ।

ईश्वर की माया बड़ी बलवान् है। बच्चा नौ महीने गर्भ में रहकर पके फलके समान प्रकट होता है। माताको क्लेश होता यह ता प्रकृतिका नियम है। निर्वल और छोटी स्त्रियाँ तो प्रायः कुछ अधिक कष्ट पाती हैं, परन्तु जो लम्बी और बलवती हैं उन्हें कम कष्ट होता है। मोटी स्त्रियाँमें बच्चेको कष्ट अधिक होता है यह एक नाजुक समय है। इसमें बहुत बड़ी सावधानी चाहिये। बच्चा पैदा होने के आठ दस दिन पहलेसे ही स्त्रीको ऐसे उत्तम और हवादार मकानमें रखना चाहिये कि जिसका दरवाजा पूर्व और दक्षिणकी ओर हो, जिसकी लम्बाई १८ चौड़ाई १२ और ऊँचाई ८ फुट से कम न हो। ऐसे घरमें खिडकियाँ अवश्य होनी चाहियें। जहाँ बच्चा पैदा हो वहाँ धूआँ करना बहुत बुरा है, इससे प्रसूताके स्वास्थ्यपर बहुत बड़ा धक्का पहुँचता है। ऐसे मकानके आस-पास कूड़ा-कचरा न होना चाहिये और ऐसी चीजें भी न हों कि जिसमें जीव पाप जावें। पासमें पाखाना और नावदान होना बुरा है। वरकी पोताई चुनेसे होनी चाहिये। जहाँतक हो सके ऐसा प्रबन्ध हो कि जिसमें सील इत्यादिके कीड़े वहा न जा सकें। मिट्टीका तेल जलाना बहुत नुकसान करता है। आन्ध्रव्योके वक्तोंपर ध्यान न देकर लोग नर्कमें बच्चा जनाना लाभदायक समझते हैं। यदि इसपर भी बच्चों और माताओंकी मृत्यु-संख्या न बढे तो क्या हो क्या हो? जहा कूड़ा-करकट भरा हुआ है, मच्छर भिनभिना रहे हैं, मखिया उड रही हैं, सीलके कीड़े दौड रहे हैं, वायु जाती ही नहीं, अँधेरा छा रहा है, जहाँ चार छ

59. वचकेकी पैदाइशके समयका कर्तव्य

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वच्चकेी पैठाइशके समयका कर्तव्य ।

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आदमियोंके खड़े होनेपर श्वांस रुकने लगती है, ऐसा मकान खियाँ खास तौरसे वच्चा जानानेके लिये रखती हैं ।

कैसे शोककी बात है कि आज भारतकी वे देवियाँ कि जो लक्ष्मीस्वरूपा हैं, जिनको अमूल्य रत्न उत्पन्न करना है, जिनको अपने प्रसवसे संसारको कायम रखना है, उन्हें ऐसी धृणित जगह वच्चा जाननेके लिये दी जाती है !

यही नहीं, खास इसी समयके लिये हमारे भारतीय गृहस्योंके यहाँ एक टूटी और छोटी चारपाई अवश्य होती है कि जिसमे खटमलोंका तो ठिकाना ही नहीं, असंख्य जीव भरे रहते हैं । यह कितनी बुरी बात है । ऐसी चारपाईसे तुरन्त छूतका असर दौड पड़ता है । ध्यान रहे कि चारपाई नई और नए बाधसे बुनी होनी चाहिये कि जिसमें जरा भी भोल न हो । इससे प्रसूताके पेट और गर्भाशयपर दवाव पड़ता है ।

ओढ़ने और विछानेके कपडोंका भी निराला ही हाल होता है । इस विचारसे कि प्रसूताके कपड़े फिर काममें नहीं आते, अतएव ऐसे रद्दी बदबूदार और पुराने कपड़े ओढ़नेको दिए जाते हैं कि जिनके ओढ़ने विछानेसे अवश्य निरोग मनुष्य रोगी हो सकता है । गरमीके दिनोंमें एक दरी ओढ़नेकी जरूरत ही क्या है ? जाड़ेमें एक दरी और ओढ़नेको एक कमल बहुत है । हा ! भारतमें कैसी बुद्धिमानी फैल रही है, कैसे मौकेपर धन बचाया जाता है ? विचार करनेकी बात है, कि जिस स्त्रीके शरीर से वर्षोंका जोड़ा हुआ रक्त गिरा है, जिसने बच्चा पैदा करके दूसरा जन्म पाया है, उसके लिये ऐसे ओढ़ने और विछौने ! याद रहे कि जितना विछौना जाड़ोमें आम तौरसे होता है उतना गरमियोंमें और इससे दूना जाड़ेमें

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सन्तति-शास्त्र ।

पसृताका चाहिये । परन्तु कपड़े सब नए हों, यदि नए न हों ओ इतने थोपे हों कि उनमें बन्दू न रहे । कपड़े चाहे नए हों या पुराने, कमसे कम चार दिन धूपमें सुखलाना जरूर चाहिये, इसलिये कि जूहरीले और मामान्य जीव न रहे । ऐसे जीव अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न करते हैं ।

इस विषयमें सबसे पहले यह बात स्त्रियोंको निश्चय कर लेनी चाहिये कि बच्चा पैदा होनेमें कितनी देर है ? यह बात प्रायः एक सप्ताह पहले ही स्त्रीके लक्षणोंसे मालूम हो सकती है । वैद्यककामत है कि एक सप्ताह पहलेसे पेट हलका हो जाता है । बच्चा कुछ नीचे उतर आता है, आमाशयपर दबाव नहीं रहता, पेशाब जल्दी जल्दी उतरता है । पाखाना जानेमें कुछ कष्ट होता है । पैंसा होनेके एक दो दिन बाद एक प्रकारका पानी योनिसे निकलने लगता है और कभी कभी मीठा मीठा दर्द भी होता है । ऐसी दशा आठ दस दिनतक प्रायः रहती है । इन्हीं दिनोंमें पैदा होनेका दर्द उठता है । ऐसा दर्द दो प्रकारका होता है—सच्चा और और भूठा । भूठा दर्द प्रारम्भ होते ही खिया संमभ लेनी हैं कि अब बच्चा होनेवाला है । इसमें पीडा और योनिका सकोचन नियमके अनुसार नहीं होता और न बढ़ता है । ऐसा दर्द पेटके अगले हिस्सेमें होता है । सच्चा दर्द यह एक खास दर्द है । यह गर्भाशयके पिछले हिस्सेसे प्रारम्भ होकर आगे आता है । इसमें जरायुका मुख चौड़ा हो जाता है । भूठा दर्द होनेका कारण पाखाना और पेशाबका रुकना है । जब पाखाना पेशाब हो जाता है तब भूठा दर्द शान्त हो जाता है । सच्चे दर्दमें पहले जरायु और इसके बांट उबरके पेगी तन्तुओंमें सकोचनके दवावसे बालक नीचे उतरता है । योनिका मुख फैलता और दर्द चढ़ता चला जाता

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बच्चेकी दौदाइशके समयका कर्तव्य ।

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है। जब बालक योनि-द्वारसे नीचे उतरता है तब जो पीड़ा होती है वह सहन करने योग्य नहीं होती। ऐसी पीड़ा उन स्त्रियोंमें कि जिनको पहले पहल बच्चा होता है, कठिन होती है, परन्तु जिनके दो चार बार बच्चा हो चुका है, उनके कुछ कम होती है।

सबसे पहला काम प्रसवमे जरायुका मुख चौड़ा होना है। इसमें प्रायः दस बारह घंटे लगते हैं। परन्तु जब पहले पहल बच्चा होता है तो और भी देर लगती है। गर्भाशयका मुख चौड़ा होनेके बाद बच्चा पैदा होनेमें दो तीन घंटे उन स्त्रियोंको लगते हैं कि जिनके बच्चा कई बार हो चुका है, नयी स्त्रियोंको कुछ और देर लगती है।

जैसे जैसे गर्भाशयका मुख फैलता जाता है तैसे तैसे भिल्लीकी थैली जिसमे कि बच्चा रहता है आगेको निकलती चली आती है। जब गर्भाशयका मुख अच्छी तरह फैल जाता है तब जरायु और योनिका रास्ता एक हो जाता है। ऐसी दशामें तेज पीड़ा होती है। इसका कारण वह है कि बच्चा नीचे उतरता है। इस समय स्त्रियां बहुत बड़ी असामधानियां करती हैं। प्रायः देखा गया है कि स्त्रियां खड़ी होती हैं, उठती बैठती और बार बार चलती फिरती हैं। उकरूँ बैठकर काँख-ती, खांसती और जोर लगाती हैं। कभी दूसरी स्त्रियां पेट मसलती और दबाती, हैं इससे बड़ी हानियां होती है। ऐसे ही कर्म बच्चेको कभी कभी टेंहा कर देते हैं। अंगरेंजोंके यहां पलंगपर लिटा कर बच्चा जमाया जाता है। इस विषयमें वैद्य-कका मत है कि लेटकर बच्चा जानानेसे किसी अवयवमें आघात नहीं पहुंचता (१० क०) और यही धन्वन्तरिमहाजका भी मत है। बच्चा पैदा होनेमें स्त्रीको दर्द क्यों होता है ? इसका

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सन्तति-शास्त्र ।

कारण यह है कि बच्चा फिलीको फाड़कर निकलता है । दूसरा कारण यह कि गर्भाशयमें चिपटी हुई खेडी वच्चेके साथ बाहरको खिचती है । पहले पहल बच्चा होनेवाली स्त्रियोंको विशेष पीडा इस कारण होती है कि उनके श्रवयोंका फैलाव कमी नहीं हुआ है । स्त्रीके पास जिस समय दाई पहुँचे उसे पहले हाथके नार्वून काट डालना चाहिये । सफेद कपड़े कि जिनमें कुछ भी गन्धगी न हो पहनना चाहिये, हाथमें किसीप्रकारका जेवरा जैसे अँगूठी इत्यादि जिससे प्रसूताको चोट लगनेका भय हो, निकाल देना चाहिये । दाईके अतिरिक्त दो चतुर स्त्रियाँ और भी हों । इनको भी दाईके अनुसार सफाईसे श्रन्दर जाना चाहिये । प्रायः पैंसी नासमभू और वैहदी दाइयाँ या अन्य स्त्रिया प्रसूताको डराती और धमकाती हैं । यह बहुत बुरी बात है । पैंसा करनेसे बच्चा रुक जाता है । जिस समय दाई प्रसूताके पास पहुँचे उसको सबसे पहले यह देखना चाहिये कि गर्भाशयका मुख खुला है या नहीं । यदि मुख नहीं खुला है तो कोई बात नहीं । अगर मुख खुला है तो बच्चा श्रवण्य होगा । पैंसी दशामें अंगरेजी रीतिके अनुसार पलंगपर लेटा देना चाहिये । जब स्त्री चित्त लेट जावे तो दोनों कोखोंको टटोलकर यह देखना चाहिये कि बच्चा किस ओर और किस तरफ है । यह ईश्वरका नियम है कि हमेशा बच्चेका सर नीचे और पैर ऊपरको होते हैं, परन्तु कभी कभी इसका उलटा भी हो जाता है । कभी बच्चा टेढ़ा होकर आडा हो जाता है । ये कठिन दशार्थ ह ।

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जब गर्भाशयमें बच्चेका सर ऊपर होता है, तब पहले पैर निकलते हैं । जब बच्चा टेढ़ा हो जाता है, तो वह पैरके बल न सिर के बल पैदा होता है । पैंसी दशामें चतुर दाइयोंसे काम

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वच्चेकी पैदाइशके समयका कर्तव्य ।

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लेना चाहिये । पेटमें हाथ डाल कर वच्चेको सींथा कर देना परस कर्तव्य है । दाईको यह ज़रूर जान लेना चाहिये कि बच्चा किस तरह पैदा होगा । जब बच्चा दाहनी बगलमें कुलबुलावे और चाई कोख भारी हो तो जान लेना चाहिये कि पहले बच्चेका सर निकलेगा । जब चाई कोख फड़के और उसी श्रोर वालक कुलबुलाता जान पड़े और दहिनी कोख भारी हो, तो बालकका पैर पहले निकलना समझना चाहिये; परन्तु यह बात याद रहे कि दहिनी कोखकी कुलबुलाहट तो साफ जान पड़ती है; परन्तु चाई ओरकी बहुत कम । इसलिये जब चाई ओरकी कुलबुलाहट न जान पड़े तो खीसे पूछना चाहिये, क्योंकि खीको ऐसी कुलबुलाहट अच्छी तरह मालूम होती है । इस प्रकार दाईको स्वयं देखकर दहिने चाई दोनों ओरकी वावत खीसे पूछकर निश्चय कर लेना कर्तव्य है । यदि बालक आड़ा या तिरछा आ गया है तो ऐसी दशामें पहले वच्चेका हाथ निकलेगा । इस मौकेपर यह बतलाना बहुत जरूरी है कि पेटमें पैदा होते समय बच्चा क्यों तिरछा हो जाता है ? इस विषयमें वैद्यकका मत है कि अत्यन्त करवट सोने, उलटे लेटने, दौड़ने, तेज चलने, नीचे ऊँचे चढ़ने, गर्मके वन्धनोंके हीले पड़ने, और भारी चीजके उठानेसे पैदा होते समय बच्चा पेटमें टेढ़ा होता है ।

( श० श० )

पहले पहल गर्मसे पैर, निकलना भी नियमके विरुद्ध है । जब बालक पेटमें ही मर गया हो, या उसका सर बहुत भारी हो गया हो, या खीको ऐसा रोग हो गया हो कि जिससे वच्चेकी आकृतिमें अन्तर पड़ गया हो, या वच्चेको अपने स्थानसे हट जाना पड़ा हो, या खीको सख्त चोट लग जावे कि जिससे उससे उसके कमर ऐसे स्थानमें परिवर्तन हो गया हो, या

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सन्तति-शाल ।

पेटमें एकधारगी चोड लगी हो, ऐसी दशाओंमें गर्भगत बालक टेढा हो जाता है। परन्तु बालक टेढा होता कब है? इस विषयमें अनेक मत हैं। कोई यह कहते हैं कि पैदा होते समयमें, कोई यह कहते हैं कि पैदा होने समयके दो तीन मास पहले। प्रायः यह देखा गया है कि जब छः मास तकका गर्भ गिरता है, तब या तो पहले हाथ निकलता है या पैर। कारण इसका यह है कि सातवें महीनेमें बच्चे का सर बोकके कारण नीचे और पैर ऊपरको हो जाते हैं। इससे यह मालूम होता है कि छः महीनेतक गर्भमें बच्चेके रहनेका कोई ढंग ठीक तौरसे नहीं रहता। इसलिये जो समय बच्चेके ऊपर पैर और नीचे सर होनेका है यदि उस समय माताको ऊपर कहे हुए कारणोंमेंसे कुछ हो जाय तो बच्चा पेटमें तिरछा या टेढ़ा हो जाता है। प्रायः ऐसा भी देखा गया है कि जब पैर निकलता है तो यातो दोनों पैर निकलते हैं, या एक ही निकलता है। यह दशा भी एक हाथ निकलनेके समान समझनी चाहिये। किसी किसी के सर और हाथ या सर एक पाँव या चारों हाथ पाँव एक साथ निकलते हैं। यह भयङ्कर दशा है। इसका भी वही कारण है जो पहले लिखा गया है।

जब ऐसा हो कि बालक तिरछा पड़ जाय तो उसका सर सीधे रास्ते पर लाना चाहिये। सबसे पहले बालक गर्भगारके दहिने व्यासमें आता है, इससे कुछ दूर हट कर पिछला भाग सामने और मूलाधारकी बाई ओर रहता है। बालककी पीठ माताके पेटके सामने और बाई ओर रहती है। बालकका मुँह और पेट माँकी पीठकी ओर दहिने तरफ होता है। इसके बाद बालकका सर गर्भगारके बाएँ व्यासमें रहता है। सरका पिछला भाग सामने मूला धारके दहिने तरफ रहता है।

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वच्चोंकी पैदाइशके समयका कर्तव्य ।

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बालककी पीठ माताके पेटके सामने और दाहिनी ओर होती है । मुँह और पेट माताकी पीठकी ओर वायुँ तरफ रहता है ।

इसके बाद वच्चोंका सर माताके कोखमें आ जाता है और फिर धीरे धीरे बालकका सर ठीक सीधे रास्तेपर आता है और सरका पिछला भाग माताकी बाईं जाँघ और मुख दहिनी जाँघकी ओर रहता है । ऐसी दशामें सर निकलता है और गरीरकन्धेसे अटक जाता है । दहिना कन्धा सामने मूलाधारकी हड्डीपर जा लगता है और बायाँ कन्धा धीरे धीरे बाहर निकलता है । इसके निकलते ही दहिना कन्धा बाहर निकल आता है और वच्चा पैदा हो जाता है । गर्भाशयके भीतर एक फिल्लीदार वारीक चमड़ेकी थैलीसी होती है जिसमें जल भरा रहता है । इसीमें बालक रहता है । ज्यों ज्यों गर्भाशयका मुख फैलता चला आता है, त्यों त्यों वह थैली कि जिसमें बालक रहता है निकलती जाती है । कभी कभी बिना थैली फटे ही थैली सहित बालक उत्पन्न होता है, परन्तु ऐसा कम होता है । प्रकृतिका नियम यही है कि बालकके निकलनेके साथ ही फिल्ली फट जाती है । जब फिल्ली मजबूत होती है तो उसे फाड़ना पड़ता है, परन्तु जब तक गर्भाशयका मुख अच्छी तरह न फैले, उस समय तक फिल्ली न फाड़ना चाहिये । प्रायः अनजान दाइयाँ गर्भाशयका मुख अच्छी तरह फैलनेके पहले ही फिल्ली फाड़ देनी हैं । ऐसी दशा बड़ी भयङ्कर होती है ।

वच्चा जिस समय गर्भसे बाहर होने लगता है उस समय दाईको बहुत बड़ी सावधानी करनी चाहिये । जब वच्चोंका सर निकले तो उस समय यह भी देखना चाहिये कि सरके साथ और तो कुछ नहीं निकलता है, क्योंकि प्रायः सरके साथ नाल भी कभी कभी लिपट कर निकलने लगता है । यदि ऐसा

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सन्तति-शास्त्र ।

हो तो वच्चके गलेमेंसे नालको निकाल देना चाहिये । पैदा होते समयमें सरको दहिने हाथसे सँभालना और वार्प हाथसे गर्भाशयको पेटके ऊपरसे दवाते रहना चाहिये । ऐसा करनेसे बच्चा पैदा होनेमें सहारा लगाता है और गर्भाशय सिकुड़ता जाता है । इस प्रकार करनेसे बच्चा सुख पूर्वक स्वयं निकलता चला आचेगा । जब पैदा होनेमें देर लगे तो समझना चाहिये कि बच्चेका सर बड़ा है या कोई विकार उत्पन्न हो गया है ।

वैद्यकका मत है कि जब बच्चा पैदा होनेमें देर लगे या न पैदा होता हो, तो ऐसे समयमें काले सर्पकी कँचुलकी धूनी देनी चाहिये । ( श० क० )

एक आचार्यका मत है कि गऊका मस्तक जिसमें मांस और चमड़ा न हो केवल हड्डी ही हड्डी हों उसको बच्चा पैदा होनेवाले मकानकी छतके ऊपर रखनेसे सुखपूर्वक बच्चा उत्पन्न होता है । ( रतिनाम्न )

नहीं रोशनीके लोग ऐसे प्रयोगोंको व्यर्थ समझते हैं, परन्तु जहाँ यह प्रयोग किया गया है सफलता हुई है । प्रायः नास-भम दार्यों बच्चेको खींचकर निकालनेकी कोशिश करती हैं । ऐसा करना भयङ्कर है । इससे हाथ पैर उखड़ जानेका भय रहता है ।

जब बच्चा पैदा हो जावे तो उस समय बहुत बड़ी सावधानीसे काम लेना चाहिये । सबसे पहले बच्चेके मुँह, आँख कान, नाक और नखोंको साफ़ कपड़ेसे नुब स्वच्छ करना और मुखमें अँगुली डालकर भाग कि जो भीतर तक भरा रहता है साफ़ करके नाल काटना चाहिये । नाल वह चीज़ है कि जिससे गर्भमें बच्चेका पोषण होता है । यह बच्चेको नाभी में लगा रहता है और पैदा होने पर बच्चेके साथ बाहर निकल