संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
10. रजो-धर्म और संयोग-शक्ति
रजो-धर्म और संयोग-शक्ति ।
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(१०) रजो-धर्म और संयोग-शक्ति ।
निरोग स्त्रियों में नियम के अनुसार रज हर महीने अरुंडोत्पादक कोष से होकर जलोत्पादक कोष में पहुंचता है और अरुंडाधार से बाहर होकर डिम्बकोष से गर्भाशय में आता है। ऐसे समय में गर्भाशय की भिल्ली मोटी पड़जाती है। इसकी धमनियों में खून अधिक जम जाता है। बलगमी या श्लैष्मिक गांठे (Mucous glands) बढ़जाती हैं। पतली धमनियों (Capillaries) और पतले सिरों से खून निकलने के कारण कहीं कहीं धमनियों फट जाती हैं। बलगम अधिक बनने लगता है और खून के साथ बाहर आता है। इसी को रजोधर्म कहते हैं। इस विषय में लोगों ने यही मान लिया है कि कन्यायें गरम देशों में गरमी के कारण जल्द और सर्द देशों में सर्दी के कारण देरसे रजस्वला होती हैं, परन्तु यह सिर्फ मान ही लेने की बात है। किसी भी देश की कन्याओं को देखिए, उनके रजस्वला होने का समय एक न मिलेगा। देशको जाने दीजिये एकही शहर को लीजिये जहाँ की सरदी गरमी वहाँ की रहने वाली कन्याओं को बराबर मिलती है वहाँ भी कन्याएँ एक समय में रजस्वला नहीं होतीं सर्द या गरम देशको किसी घर में एक ही माता पिता की दो कन्याओं को—जिनका पालन एक ही ढंग पर हुआ है—देखिए वे भी एक समय में रजवती नहीं होतीं इस से स्पष्ट है कि रजस्वला होने का समय देश की गरमी और सरदी पर निर्भर नहीं है ॥
जगत् प्रसिद्ध डाक्टर हालिक (Halliek) की राय है कि संसार की सब जातियों में कन्याएँ लगभग एक ही उमर में रजस्वला होती हैं यदि आफिका जैसे गरम देशकी
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हवसी लड़की और यूरोप जैसे सर्व देशकी गोरी लड़की एक ही ढंग से परवरिश पावें, तो दोनों एक ही साथ ऋतुमती होंगी ।
(The origin of life )
डाक्टर रावर्टसन कहते हैं कि भारत और इङ्ग्लैंड दोनों जगह नौ नौ वर्ष की लड़कियाँ रजस्वला हुआ करती हैं या हो सकती हैं ।
(Medical jurisprudence by R Chevers )
डाक्टर हटक्रिन्स कहते हैं कि दो गोरी लड़कियाँ इतनी जल्दी रजस्वला हुईं कि वे ग्यारह वर्ष सात मास की आयु में माताएँ बन सकती थीं ।
(Medical jurisprudence by R Chevers )
टेलर साहबका कहना कि किसी भी देश में नौ वर्षकी लड़कियाँ गर्भवती हो सकती हैं, अर्थात् ऐसा हो जाना असम्भव नहीं है ।
(Medical jurisprudence by R Chevers )
एक बार इङ्ग्लैंड के मॅचेस्टर लाईगन अस्पताल में २४० लड़कियों की परीक्षा ली गई तो उनमें १० ग्यारह वर्ष की, १६ बारह वर्ष की, ५३ तेरह वर्ष की, ८५ चौदह वर्ष की, ६७ पन्द्रह वर्ष की और ७६ सोलह वर्ष की उम्र में रजस्वला हुईं ।
(Dr Fayer Calcutta European Female Orphan Asylum
इन बातों से पता चलता है कि सर्वत्र करीब २ एकही बात है । हमारे देशके लिये ऋषियों का मत है कि बारह वर्ष की अवस्था के पीछे रजोधर्म प्रारम्भ होता है और बुढ़ापे से शरीर निर्बल होने पर पचास वर्ष की अवस्था तक रहता है ।
( सु० श० ५० ३ श्लो० १० )
अब विचारणीय विषय यह है कि क्या कारण है कि हमारे देशमें कन्याएँ इस समय के पहले ही रजस्वला होजाती हैं ?
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इस विषयमें माताओंका बहुत बड़ा दोष है। उनको इसका कुछ भी विचार नहीं है। कैसी शर्मकी बात है कि मूर्ख, निर्लज्ज और शौकके पंजेमें फँसी हुई स्त्रियाँ किसी बातका विचार न करती हुई बुरी संगत और बुरे कामोंसे कन्याओंको जल्दी सयानी बना लेती हैं। कन्याओंको सयानी बनानेके लिये ये बातें कारणभूत होती हैं—प्रेमकी बातें, मनमाना भोजन, दिल-चाहा शृंगार, हँसी-मजाककी बातें, वेहदे गाने, पेशाशीके वृत्तांत-से भरी हुई पुस्तकें, स्त्री और पुरुषोंकी परस्पर बात-चीतके रसभरे किस्से, शौकका सामान और निर्लज्ज स्त्रियोंका साथ। यही कारण है कि आजकल शहरोंमें कन्याएँ दस वर्षकी अवस्थामें रजवती होकर बारहवें वर्षमें पूर्ण युवतियाँ बन जाती हैं और उनके शरीरमें सारी बातें जवान स्त्रियोंकी सी देखनेमें आती हैं। यह तो भले घरानेकी अच्छे भले मानस और पद्वें रहनेवाली धनाढ्य स्त्रियोंकी दशा है, साधारण दशावाली स्त्रियाँ, जो पद्वीनशीन नहीं हैं, और भी बुरी दशामें होती हैं। बाजारू कन्याएँ (रिटियोंके यहाँ) तो इससे भी कहीं ज्यादा बुरी तरकीबोंसे जवान बनाई जाती हैं। उन दशाओंको याद करते हुए यही कहना पड़ता है कि हे भगवन् क्या होगा। यही कारण है कि देहातोंकी अपेक्षा शहरोंमें कन्याएँ बहुत जल्द रजवती हो जाती हैं, क्योंकि कन्याओंके कोमल चित्तको विगाड़कर जवानीकी गर्मी पैदा करनेके लिये शहरोंमें बहुत बड़े बड़े सामान प्रस्तुत रहते हैं।
जो लोग रजस्वला होनेका समय देशकी गरमी और सरदी पर निर्भर मानते हैं वे बङ्गाल देशका प्रमाण देते हैं। वहाँ गरमी विशेष होनेसे कन्याएँ जल्दी रजवती होती हैं। इस बातका हमने स्वयं अनुभव किया है कि बङ्गालमें कन्याएँ
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इतनी जल्दी क्यों रजवती होती है ? जहाँतक पता चला, बात यह मालूम हुई कि वहाँका भोजन और व्यवहार ही इस रीतिका है । सबसे पहले भोजनको देखिये । वहाँ सब साधारणमें मछली खानेकी प्रथा है । क्या मछली कुछ कम कामोद्दीपक है ? क्या वहाँ स्त्रियोंका भ्रृंगार और प्रान्तोंसे कम है ? अतएव इस बातको मान लेना पड़ेगा कि जिन कारणोंसे कन्यायें जल्द रजवती होती हैं यद्गुलमें उनकी कमी नहीं है, मत्स्य अधिकता ही है । वे यद्गुली कि जो पञ्जाबके सर्व जिलों में बहुत दिनोंसे हैं, उनके यहाँ भी दस वर्ष की कन्यायें रजवती होती देखी गयी हैं । इससे साफ जाहिर है कि भोजन और खाने पीने आदिकी स्वतंत्रता ही पर रजस्वला होनेका समय निर्भर है ।
हम उन्हीं स्त्रियोंको निरोध मानेंगे कि जिनका ठीक समय पर रजोधर्म प्रारम्भ हुआ हो और हर महीनेमें ठीक ठीक होता हो । जो समय रजोधर्म प्रारम्भ होने का है ? उस समय कन्याओंके शरीरकी क्या कैसी होनी चाहिये ? उस समय वे खिलनेवाली फलीके समान फोमल, और चढ़ती हुई नदी के समान बढ़नेवाली होती हैं । ऐसे समयमें कन्याओंका अंग बढ़ता है, मनकी शक्तियोंका विकास होता है । अगड़े, फल-वाहिनी नली और गर्भाशय पूर्ण रूपसे खिलते हैं । ऐसे समयमें यदि कोई इनसे सन्तान उत्पन्न करनेकी इच्छा करे, तो उसके बराबर मूर्ख कौन होगा ।
समय और गरज दोनों बलवान हैं । सूखोंकी कौन कहे, अच्छे पड़े लिये, ताजे दिमागवालोंके इदयपर यह बात तोट रही है कि रजस्वला होते ही कन्याओंमें संयोग-शक्ति आ जाती है । पर यह बड़ी भारी भूल है । रजस्वला होना एक बात है