संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
36. माताके दूषित व्यवहारोंका सन्तानपर प्रभाव
मातापिताके दूषित व्यवहारोंका सन्तानपर प्रभाव । १७३
होता है गर्भके वक्षेको वैसा ही बनना पड़ता है; क्योंकि वृत्तके आत्मा मातापिताकी आत्मापर अवलंबित है । अतएव कुव्यवहारके कारण अनेक प्रकारकी सन्तान उत्पन्न होती है ।
१. जो पुरुष मोहवश ऋतु समयमें स्त्रीके नीचे होकर संयोग करता है, यदि उस समय गर्भ रह जावे और पुत्र हो तो वह स्त्री, चेष्टावाला, जनानियों, जनखा उत्पन्न होता है । इसको षण्ड कहते हैं ।
( सु० १० अ० २ श्लो० ४६ )
२. ऋतुसमयमें वलवती स्त्री पुरुषके ऊपर चढ़ कर संयोग करावे और गर्भ रह जावे और उससे यदि कन्या उत्पन्न हो तो वह कन्या दाढ़ी मूर्छवाली तथा पुरुषके समान चेष्टावाली होती है । ( सु० १० अ० २ श्लो० ४७ )
३. संयोगकी इच्छा रखनेवाली दो स्त्रियाँ यदि आपसमें पुरुषकी भाँति संयोग करे और एक स्त्रीका वीर्य गिर जावे और दूसरी स्त्रीके रजसे वह वीर्य मिल जाय, तो चिना हृद्विडयावाली पिंड सरीषी सन्तान उत्पन्न होती है
( सु० १० अ० २ श्लो० ५१ )
यहाँपर यह शंका होती है कि क्या स्त्रियोंको वीर्य होता है ? यह मानी हुई बात है कि स्त्रियोंमें वीर्य होता है । यदि ऐसा न हो तो उनमें श्रोत्र नहीं हो सकता । जब श्रोत्र न होगा तो लावण्यता और सुकुमारता इत्यादि नहीं हो सकती । अतएव उनमें वीर्य अवश्य होता है । उपर्युक्त गर्भ उस स्त्रीको रहता है जो संयोगके समय नीचे रहती है । ( १० क० )
४. दूसरे पुरुषके संयोगसे निर्ललज सन्तान उत्पन्न होती है ।
( १० क० )
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सन्तति-शास्त्र ।
७. यदि स्त्री लिंगके समान किसी वस्तु, गाजर मूली इत्यादिसे मैथुन करावे, तो पिंड सरीखा सन्तान उत्पन्न होती है । ( श० क० )
८. यदि स्त्री रजो-धर्मसे स्नान कर कामवश पुरुषसे स्वप्नमें मैथुन करावे तो वायुसे चिगड़ कर रज कुक्षिमें गर्भ सा बन जाता है और पिताके वीर्य गुणोंसे रहित बिना हडिडियोंका एक पिंड सरीखा उत्पन्न होता है ।
( सु० श० अ० २ ख० ५२ व ५३ )
इस प्रकार मातापिताके दपित व्यवहारोंसे अनेक प्रकारकी सन्तान उत्पन्न होती है । अतएव मातापिताको अत्यन्त सावधानीसे रहना चाहिये ।
(३७) सन्तानपर दूषित रजका प्रभाव ।
रज वह पदार्थ है कि जिससे शरीर चलता है । यह जितना उत्तम होता है उतनी ही अच्छी सन्तान होती है । जब किसी प्रकारसे रज दूषित हो जाता है, तो अनेक रोगयुक्त सन्तान उत्पन्न होता है । इसके अनेक भेद हैं ।
१. जब रज और गर्भोत्पादक यौग दूषित हो जाते हैं, तब वन्ध्या-दोषयुक्त कन्या उत्पन्न होती है । ( श० क० )
२ जब रजमें गर्भोत्पादक भाग दूषित हो जाता है, तब सड़ी हुई सन्तान उत्पन्न होती है । ( श० क० )
३. जब रजमें गर्भकारक पुरुष-यौग-भाग दूषित हो जाता है तब स्त्रीकी आकृतिवाली किन्तु स्त्री बिनहोसे रहित, वातां नामक सन्तान होती है । ( श० क० )
४. रजसे उत्पन्न होनेवाले जितने अवयव हैं जब उन अवयवोंका अंश, जिससे वे अवयव बनते हैं, दूषित हो