संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
52. बच्चोंमें मातापिताके रोगोंका संचार
बच्चोंमें माता पिताके रोगोका संचार ।
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बातको माननेके लिये सब तैयार हैं कि सन्तान माता-पिताके गुण-दोषोंके अनुसार होती है। इसलिये यह बात निश्चय रूपसे मानी गयी है कि बच्चोंमें रज-वीर्यका असर अवश्य होता है।
यह प्रकृतिका नियम है कि वीर्य जैसा होगा उसीके अनुसार वृक्ष उत्पन्न होकर फल लेंगे। जिस प्रकार फलमें बीजके अनुसार खड़ा मीठा स्वाद रहता है इसी प्रकार बच्चोंमें माता-पिताके गुण-दोष का असर आ जाता है। जिन माता-पितामें कोई ऐसा रोग है कि जिसका असर रज-वीर्यतक पहुँच चुका है, तो ऐसे रज-वीर्यसे जो सन्तान पैदा होगी, उसका असर अवश्य सन्तानपर होगा। शरीरका हर हिस्सा अपनेमें से बहुत छोटा हिस्सा पैदा करता है। ऐसे परमाणु सारे शरीर को संचालन करते और अपने ही समान दूसरे परमाणु उत्पन्न करते हैं। इन्हीं परमाणुओंमें से शरीर उत्पन्न करनेवाले कोषोंकी उत्पत्ति होती है। इन्हीं कोषोंसे माता-पिताके गुण-दोष बच्चोंमें आ जाते हैं। ऐसे दोष दो प्रकार के होते हैं। एक खाई, दूसरे नष्ट हो जानेवाले। खायी कोष कभी नष्ट नहीं होते। इन्हीं कोषोंसे वीर्य बनता है अर्थात् ऐसे कोष वीर्यमय होते हैं। नष्ट हो जानेवाले कोष दिन-रातमें सहस्रों चार नष्ट होते और भोजन इत्यादिसे फिर पैदा हो जाते हैं।
जब इन खायी कोषोंमें किसी प्रकारके रोगका असर पहुँचता है, तो वे दूषित हो जाते हैं। इसी प्रकार मातामें भी समझना चाहिये। यही कारण है कि जिस रोगमें माता पिता म्रस्त होते हैं, दो दो चार चार वर्षकी अवधामें वही रोग बच्चोंमें देखे जाते हैं। तुलनेके पैदा हुए बच्चेतक भी प्रायः इस बातकी साक्षी होते हैं। देखा गया है कि आठ दस दिन का बच्चा है, बदनेमें दढ़ीड़े हो गए हैं। शरीरकी रंगतमें अन्तर
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सन्तति-शास्त्र ।
पड़ गया है । फोड़े फुँसी हो गए हैं । इन सबका कारण क्या है ? माता-पितासे प्राप्त हुआ रोग । यहाँपर यह शंका होती है कि पिताके बहुत दिनोंसे कोई रोग है और उनके चार लड़के हैं । इन चारों लड़कोंमें एक लड़केके वह रोग मालूम होता है, तो ऐसी दशामें क्या कहा जायगा कि उन तीन लड़कोंमें पिताको रोग है या नहीं ? यदि यह कहा जाय कि जब इन तीन लड़कोंका गर्भाधान हुआ तब पिताको वह रोग नहीं था, तो ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि बौद्धके एक एक परमाणु उस रोगसे दूषित हो चुके हैं ।
जहाँ ऐसा हो वहाँ यह मानना चाहिये कि जिस समय गर्भाधान हुआ, उस समय किसी कारणसे परमाणुओंमें उस रोगका असर कम था या जन्म लेनेपर या गर्भमें ही माताकी औषधि और मंजानसे पितासे प्राप्त रोगका असर कम हो गया । या जल वायुके परिवर्तनसे ऐसा हुआ ॥ जहाँ ऐसा होता है वहाँ बच्चोंमें ऐसे रोग नहीं दिखलाई पड़ते, परन्तु उसका अंश शरीरमें रहता अवश्य है । ऐसा भी होता है कि बहुतसे रोग समय और सहायता पाकर खड़े होते हैं । उनको भी ऐसे ही समझना चाहिये ।
जब माता पितामें रोग खूब बढ़ा हो और गर्भाधान हो जाय, तो ऐसे बालकोंमें वह रोग जन्मसे ही हो जाता है, जैसे रक्त-विकार, मिर्जी, बवासीर, अतिसार, क्षयी संग्रहणी, गरमी, सूजाक, आतिशक, नेत्र-रोग और दंत-रोग इत्यादि ।
माता पितासे पाप हुए रोग औषधि करनेसे हलके अवश्य पड़ जाते हैं, परंतु जड़से जाना असंभव है । अतएव बालकों-को निरोग पैदा होनेके लिये माता-पिताको अत्यन्त सावधानी
शरीरका वर्ण ( रंग )
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से रहना चाहिये, जिससे वे ऐसे रोगोंसे बचे रहें, जो वंश परंपरासे बच्चोंमें आते हैं।
(५३) शरीर का वर्ण ( रंग )
इस बातमें प्रायः लोगोंको सन्देह होना है कि एक ही प्रान्तके रहने वालों और एकही माता-पिता से उत्पन्न सन्तानोंके रङ्गोंमें क्यों अन्तर पड़ता है ? इसके अनेक कारण हैं।
१. वैधकका मत।
१. तेज ( अग्नि ) धातुसे ही सब रंगके बालक उत्पन्न होते हैं। गर्भाधान समयमें यदि तेज धातु जल धातुके अधिकांशसे युक्त हो, तो गौर रंगकी सन्तान उत्पन्न होती है। यदि तेज धातु पृथ्वी धातुके अधिकांशसे युक्त हो तो काले रंगकी सन्तान होती है। यदि तेज धातु पृथ्वी और आकाशके अधिकांशसे युक्त हो, तो कालापन लिये साँवले रंगकी सन्तान होगी। यदि तेज धातु जल और आकाशके अधिकांशसे युक्त हो, तो गोरापन लिये साँवले रंगकों सन्तान होगी।
( सु० १० अ० २ श्लो० ३७ )
२. गर्भवती जैसे वर्णका आहार करे वैसे ही रंगकी सन्तान होती है। ( सु० १० अ० २ श्लो० ३८ )
३. गर्भाधान समयमें माताका चित्त जैसे रंग रूपवाले स्त्री-पुरुषपर पहुँचता है, उसीके अनुसार सन्तान होती है।
( रतिशास्त्र )
४. गर्भाधान समयमें जैसा रूप स्त्रीके सामने आ जाता है, वैसी ही सन्तान होती है। ( १० क० )