संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
53. शरीरका वर्ण (रंग)
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मनोविज्ञान ।
इस समय इन विषयों का विचार उभरता है । पहला विचार यह है कि वेद वातु और दूसरी वातुओंसे मिलकर उनके रंगोंको सम्मान उत्पन्न करती है । यहाँ पर यह बात सुख है कि शरीरमें जो वातु अधिक होती वही वेद वातुसे मिलती है । इसी कारण एक ही गन्धसे कभी काली और कभी गंधा मन्त्राण पैदा होती है । इसीसे जैसे रंगोंको सम्मान पैदा होता है, उसी वातुओं और शरीरोंसे मानवियोंपर वृद्धि उत्पन्न होती है, जो मन्त्राण रंगोंको सम्मान पैदा हो सकते हैं ।
दूसरा विचार यह है कि गन्धवीज जैसे वृक्षोंका आहार संवत् करे वैसे ही सुगन्ध उत्पन्न होता है । यह ठीक है, परन्तु लोग यह समझते हैं कि गन्धके मन्त्रमें जो जैसे वृक्षोंका आहार करे वैसे ही सुगन्ध होता है । नहीं, इस जगह यह समझना है कि गन्धवीजों जैसा आहार माया हो अर्थात् गंध वृक्ष, होनेसे पहले मन्त्राण जैसे आहारका सेवन किया हो वैसे सम्मान होता है । इनका कारण यह है कि जैसा आहार माया जाता है उसीके अनुसार शरीरमें स्थित वातुओं की वृद्धि होती है । इसीसे जैसा मन्त्र या आहार वातुओं की वृद्धि होती है वही वातु वेद वातुसे मिल कर अपने रंगोंके अनुसार सम्मान उत्पन्न करती है । इसीसे जैसा रंगोंको सम्मान उत्पन्न करनेवाली वृक्षोंका आहार करती चाहिये ।
तीसरा विचार यह है कि जैसे गंध सुगन्धों और पुरुरा पर मायाका ध्यान होता उसीके अनुसार सम्मान होता है । ठीक है परन्तु इसमें बहुत गहरा विचार है । वैदिक का मत है कि जिस तरह ओकों पुलकके सूँवनेसे और पुलकको ओकों सूँवनेसे ही कन्दहरा हो जाता है, उसी तरह गन्धाधान सम्मान
शरीरका वर्ण ( रंग )
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दूसरे स्त्री वा पुष्पके रूप रंगका खयाल आ जानेसे अपने शरीरमें उसी रंगकी सन्तान उत्पन्न करनेवाली धातु उत्कट होकर तेज धातुसे मिलकर वैसे ही रंगकी सन्तान उत्पन्न करती है।
चौथा विचार यह है कि 'जैसा रूप रंग गर्भाधान समयमें स्त्रीके सामने आ जाता है उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है। ठीक है, यह भी एक गौरवका सिद्धान्त है। इस विषयमें बहुत बड़ा एक प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि प्रायः सौदागर ऐसा करते हैं कि घोड़ीसे जिस रंगका बच्चा उनको लेना होता है तो घोड़ीके गर्भाधानके समय उसी रंगका घोड़ा घोड़ी के सामने खड़ा करते हैं और घोड़ीकी आंखोंमें पट्टी बांध देते हैं, जब गर्भाधान हो चुकता है तब उस घोड़ेको, कि जिससे गर्भाधान हुआ था, अलग कर देते हैं और आंखोंकी पट्टी खोल देते हैं। पट्टी खोलते ही घोड़ीकी नजर सामनेवाले घोड़ेपर पड़ती है और उसी रंगका घोड़ा पैदा होता है। इसी प्रकार स्त्रियोंमें भी दृष्टिका बहुत बड़ा असर होता है। गर्भाधान समयमें जैसा रूप रंग स्त्रीके सामने आ जाता है, तो उसका एक ऐसा प्रभाव स्त्री पर पड़ता है कि जिससे स्त्रीके शरीरमें वैसा ही रंग उत्पन्न करनेवाली धातु उत्कट होती है और वह तेज धातुसे मिलकर गर्भाधान समयमें देखे हुए रंगके समान रंगवाली सन्तान उत्पन्न करती है। इस विषयमें यूरोपकी एक बहुत बड़ी यह आख्यायिका प्रसिद्ध है। एक यूरोपियन व्यक्ति के यहां काले रंगकी सन्तान उत्पन्न हुई थी। कारण यह सावित हुआ कि गर्भाधानके समयमें स्त्रीकी लगाह एक काले रंगके हवश्रीके चित्र पर पड़ी थी, जो पलंगके सामने था। इन प्रमाणों से सारे विचारोंका एक ही सिद्धान्त निकलता है कि शरीरम
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सन्तति-शास्त्र ।
स्थित धातु भोजन, चिन्तवन और दृष्टिसे उसीके अनुसार उत्तेजित हो तेज धातुसे मिलकर सन्तान उत्पन्न करती है ।
यहां पर एक बहुत बड़ी शंका यह होती है कि यूरोपमें सब गोरे ही रंगके क्यों पैदा होते हैं? इस विषयमें जहांतक निश्चय किया गया यह बात पायी गयी है कि सर्दीके कारण यूरोपके लोगोंमें तेज धातु अधिकांश जलयुक्त होती है । इस कारण लोग गोरे रंगके उत्पन्न होते हैं । हमारे देशमें ही जहां सर्दी अधिक पड़ती है वहांके लोग इसी कारण कुछ गोरे होते हैं । इसी प्रकार जहां गर्मी अधिक पड़ती है, वहांके लोगोंमें तेज धातुके साथ पृथ्वी और आकाश धातु अधिक होती है । इस कारण वहांपर काले रंगके लोग होते हैं । खानेके पदार्थोंमें भी बड़ा हेरफेर हो जाता है । सर्द देशमें खानेकी चीजें सर्दीसे अधिक जलयुक्त होती हैं । गर्म देशोंमें खानेके पदार्थ अधिक पृथ्वी धातुके अंशोंसे युक्त रहते हैं । शुद्ध लोगोंमें कि जिनको सुखसे खाने पीनेको मिलता है, उनके वच्चोंकी रंगत कुछ और ही होती है । इन सब विचारोंसे यह बात निश्चय है कि हर देशके खाने पीनेकी चीजोंमें पंचतत्वोंकी कमी-चेशी जरूर होती है । यह भी प्रत्येक प्रान्तके निवासियोंके रंगमें अन्तर होनेका एक विशेष कारण है ।
देश और प्रान्तका यदि विचार करके एक एक घरमें देखा जाय तो मालूम होगा कि संयमके साथ भोजन करने-वालों और लापरवाहीसे बिना विचारके भोजन करनेवालोंकी सन्तानोंमें कितना अन्तर होता है । इन सब विचारोंसे यह बात सिद्ध हुई कि तेज धातुके साथ जल इत्यादि दूसरी धातु अधिकांशसे मिलकर अनेक रूप रंगकी सन्तान उत्पन्न करती है । यह बात मुख्य करके मानी गई है कि भोजनका प्रभाव
मनुष्याकृति भिन्न भिन्न क्यों होती है ? २२५
रूप रंगके विषयमें दृष्टि और चिन्तवनसे प्रभावशाली होता है। क्योंकि अंगरेजोंके यहाँ गोरी ही सन्तान होती है, चाहेवे किसी देशमें रहें। इसी प्रकार काबुली, चीनी, जापानी और रंगूली कहीं रहते हुए अपने ही रूप रंगके अनुसार सन्तान उत्पन्न करते हैं। इसका कारण यह है कि प्रायः इनका भोजन दूसरे देशमें जाकर नहीं बदलता, परन्तु भारतमें यह बात नहीं है। बंगाली और मदरासी भारतके ही दूसरे प्रान्तोंमें जाकर भोजन बदल देते हैं। इनको पञ्जाब ऐसे देशमें जाकर चावलके साथ गेहूँ खानेकी वान पड़ जाती है इत्यादि। इस प्रकार भोजन बदल जाने या उसमें हेर फेर हो जानेसे शरीरकी धातुओंमें कमी वेशी हो जाती है। इस कारण भारतीय भारत के दूसरे प्रान्तोंमें जाकर वहाँके अनुसार सन्तान उत्पन्न करते हैं। इतना ही नहीं, एक ही स्थान और एक ही माता-पितासे दो रंगकी सन्तान उत्पन्न होती है। पहला लड़का गोरा दूसरा काला, इसका कारण भी भोजनका हेर फेर है, जैसे जाड़ेके दिनोंमें गरम पदार्थों और गरमियोंमें ठंडी वस्तुओंका अत्यन्त सेवन इत्यादि। इस प्रकार अनेक रङ्गकी सन्तानें उत्पन्न होती हैं कि जिनका मुख्य कारण जलादि धातु हैं और वे भोजन किये हुए पदार्थोंसे बनती हैं। अतएव भोजनके पदार्थोंका संशोधन करके मनुष्य मन-चाहे रङ्गकी सन्तान उत्पन्न कर सकता है; क्योंकि जिस धातुकी इच्छा हो वह मुख्य रीतिसे भोजनके पदार्थों द्वारा विशेष रूपसे उत्पन्न हो सकती है।
(५४) मनुष्याकृति भिन्न भिन्न क्यों होती है ?
संसारमें जितने मनुष्य हैं सबके चेहरेकी बनावट अलग अलग होती है। एकका चेहरा दूसरेसे नहीं मिलता। बहुत
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