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संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

61. वच्चोंकी तौल

वच्चोंकी तौल ।

२५१

कारण यह है कि गर्भावस्थामे यहाँ माताएँ भोजनपर किञ्चित् विचार नहीं रखतीं, परन्तु यूरोपकी माताएँ गर्भावस्थामे अच्छे से अच्छा, पुष्ट, बलकारी भोजन करती हैं । उत्पन्न होनेके दिन से बारह वर्षतक वच्चोंकी तौलपर ध्यान रखना चाहिये, क्योंकि प्रारम्भसे ही शरीरकी उन्नति होना आवश्यक है । इस विषयमें विद्वानोंकी रायके अनुसार एक सूची नीचे दी जाती है ।

उत्पन्न होनेपर वच्चोंकी तौल कमसे कम आयुके अनुसार निम्नलिखित क्रोकेके अनुसार होनी चाहिये ।

वच्चोंकी आयुतौलवच्चोंकी आयुतौल
पैदा होते ही३ सेर६ मास१० सेर
१५ दिन३½ " "१० "१०½ "
१ मास४ " "११ "१०¾ "
१½ " "४½ " "१२ "११ " "
२ " "५ " "१ वर्ष१२ " "
२½ " "५½ " "१½ " "१२½ " "
३ " "५¾ " "१ " "१३ " "
३½ " "६ " "२ " "१४½ " "
४ " "६½ " "३ " "१६ " "
४½ " "७ " "४ " "१७½ " "
५ " "७½ " "५ " "१८½ " "
५½ " "८ " "६ " "२० " "
६ " "८½ " "७ " "२२ " "
६½ " "९ " "८ " "२५ " "
७ " "९½ " "९ " "२८ " "
७½ " "१० " "१० " "३२ " "
८ " "१०½ " "११ " "३६ " "
८½ " "११ " "१२ " "

२५२

सन्तति-शास्त्र ।

कमसे कम इतना वजन बच्चोंमें होना आवश्यक है । यदि इससे कम हो तो वे निरोग नहीं कहे जा सकते ।

इन दिनोंमें माताओंको अनेक पुरुष पदार्थ खाने चाहियें; क्योंकि जो माताएँ खाने पीनेपर ध्यान नहीं रखतीं उनके बच्चे डुबले पतले और कम वजनके बने रहते हैं । बच्चा जब तक दूधके ही आसरे रहता है उस समयतक माताके आहारपर ही उसका जीवन होता है । इसलिये माता जैसा भोजन करेगी उसीके अनुसार बच्चेका वजन बढ़ेगा । जब बचपनमें वजनकी कमी रह जाती है तो वह पूरी नहीं होती । यदि होती भी है तो वर्षों लगते हैं । इसलिये बच्चोंको प्रारम्भसे ही चलवाना चनाना हमारा कर्तव्य है ।

(६२) धाय कैसी होनी चाहिये ?

बच्चोंकी जीवन-यात्राके लिये यह एक बड़ा प्रश्न है कि धाय कैसी हो ? प्रायः माताएँ स्तनोंमें दूध न होने या बच्चा पैदा होकर बारम्बार मर जाने या अपने स्तनोंको सुन्दर सुडौल बनाए रखनेके कारण दूध नहीं पिलातीं । ऐसी दशामें बच्चे गाय, भैंस और बकरियों या धायोंके दूधपर पाले जाते हैं । धाय कैसी होनी चाहिये ? यह एक बड़े महत्वका प्रश्न है ।

वैद्यकशास्त्रके एक विद्वान्ने कहा है कि धायको माताके समान होना चाहिये । ( १० क० )

इसका तात्पर्य यह है कि जो कार्य माताका बालकके प्रति है वही धायका भी है । अतएव धायका सर्व-गुण-संपन्न होना आवश्यक है । विद्वानोंने इस विषयका अनेक प्रकारसे प्रतिपादन किया है ।