संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
54. मनुष्याकृति भिन्न भिन्न क्यों होती है ?
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नन्दिनि-शाल ।
सी सूरतोंमें जब कि यह कहा जाता है कि इनमें कुछ भी भेद नहीं है तथापि कुछ न कुछ अन्तर अवश्य होता है। इनके अनेक कारण हैं।
१. वैचक्यका भत।
२. रजोदर्शनके समयमें मानाके हृदयपर जिस सूत्र गललके स्त्री पुरुषका ध्यान आ जाता है या आनन्दके समयमें जैसे पुरुषका दर्शन हो और उसका ध्यान बना रहे उसी रूपको सन्तान होगी है। (रतिशास्त्र)
इसी कारण रजोदर्शन समयमें एकान्तवासका विधान कहा गया है।
२. गर्भाधान समयमें जिस जीवमें स्त्रीका चित्त होगा अर्थात् जिस जीवका ध्यान आ जावेगा उसीके अनुसार सन्तान होगी। (च० श० अ० २ श्ल० २८)
इसी प्रकार भोज वैद्य और अन्य विद्वानोंने भी कहा है। इसके अनेक उदाहरण इसी पुस्तकमें 'मनोवेल' के विषयमें लिखे गये हैं।
३. माता-पिताके मिले हुए रज-चीर्थमें गरीरके जिस अंग प्रत्यंगके बनानेवाला अंग निर्बल होता है तो गरीरका वह अंग उत्तम नहीं होता अथवा जब अंग प्रत्यंग बनानेका अंग नहीं होता तो अंग ही नहीं बनता।
(श० ६०)
४. गर्भावस्थामें माताका भोजन ठीक न होनेसे भी सन्तान की मित्र मिश्र आकृति होती है। इसके कई भेद हैं।
१. जिस अंगके जिस प्रकारका भोजन उपयोगी होता है उसके कम होने अथवा न होनेपर अधूरा अंग रह जाता है। (श० ६०)
56. अवयजीवी और दीर्घजीवी सन्तान कैसे होती है ?
मनुष्याकृति भिन्न भिन्न क्यों होती है ?
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२. जिस पदार्थके खानेसे शरीरके जिस अंगको हानि पहुँचती है गर्भमें बच्चेका वही अंग विकृत हो जाता है। ( श० क० )
३. जिस पदार्थके खानेसे जिस अंगकी पुष्टि होती है गर्भमें बालकका वह अंग उत्तम रीतिसे विकसित होता है। ( श० क० )
यही कारण है कि बच्चे माता पिता, मामा और नौकरों इत्यादिकी आकृतिके होते हैं। इसमें माताका विचार रजस्वला समयका दर्शन तथा गर्भाधान समयका चिन्तवन कारण है। स्त्री के हृदयमें एक ऐसी दैवीशक्ति है कि जिससे चिन्तवन किये हुए मनुष्यकी आकृतिकी सन्तान उत्पन्न होती है। जिस प्रकार तसवीर खिचते समयमें हँसने रोनेवालेकी उसी विकारके अनुसार तसवीर खिंच जाती है, इसी प्रकार माताके हृदयपर पड़े हुए स्त्री पुरुषके आकारके अनुसार सन्तान होती है। इस विषयमें माता-पिताका मिला हुआ रज-वीर्य भी कम असर नहीं रखता। जिस अंगके बननेका सामान रजवीर्यमें कम होता है, वह अंग बेदंगा और निस्तेज होता है। जिस अंगके बननेका अंश प्रबल होता है वह अंग पूरी रीतिसे प्रफुल्लित रहता है। इसी प्रकार गर्भावस्थामें माताके खाए हुए भोजनका कुछ कम प्रभाव नहीं पड़ता। जिस पदार्थके खानेसे जिन्न अंगकी पुष्टि होती है उसके खानेसे वह अंग गर्भमें उत्तम बन जाता है और जिसके खानेसे जिस अंगको हानि होती है वह ठेढ़ा और बदस्वरत हो जाता है।
अतएव इस विषयमें रजोधर्म और गर्भाधान समयका चिन्तवन और ध्यान तथा गर्भावस्थामें माताका भोजन मुख्य
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सन्तति-शास्त्र ।
कारण है कि जो एक सा सारी स्त्रियाँका नहीं हो सकता । अतएव प्रत्येक मनुष्यकी आकृति भिन्न भिन्न होती है ।
( ५५ ) नेत्रोंका उत्तम और मध्यम होना ।
जिस प्रकार मनुष्यका रूप रंग एकसा नहीं होता इसी प्रकार नेत्र भी एक प्रकारके नहीं होते । गर्भ जब चार महीनेका हो जाता है तब आँखोंमें कुछ ज्योति आने लगती है । इसलिये चौथे महीनेमें जैसा तेज दृष्टि-भाग में आता है वैसी ही आँखें होती हैं ।
वैयक्तिका मत ।
( सु० श० अ० २ ख० ० ९३ )
१ यदि गर्भके बालककी आँखोंमें तेज धातु न पहुँचे तो बालक जन्मसे ही अन्ध होता है ।
२ यदि तेज धातु रक्तके साथ होकर दृष्टि-भागमें जावे तो बालक लाल नेत्रोंवाला होता है ।
३ यदि तेज धातु पित्तके साथ होकर आँखोंमें पहुँचे तो बालक पीले नेत्रोंवाला होता है ।
४. यदि तेज धातु कफके साथ होकर दृष्टि-भागमें पहुँचे तो सफेद नेत्रोंवाला बालक होता है ।
५ यदि तेज धातु वायुके साथ होकर दृष्टि-भागमें पहुँचे तो मँडी आँखोंवाला या नेत्र रोग वाला या चंचलाक्ष बालक होता है ।
तेज धातुके साथ दूसरी धातुओंके मेलसे इस प्रकार वच्चों-की आँखें बनती हैं । यहाँपर एक बहुत बड़ा प्रश्न यह होता है कि तेज धातुके साथ वात पित्त इत्यादि किस प्रकार पहुँचते हैं । शरीरमें वात पित्त इत्यादिमें से जिसकी अधिकता