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संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

18. मूत्ररोग

रजो-धर्ममेंके रोग ।

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३. पेट्ट और कोयम भारतीयन ।

पेसी दशामें कष्ट होता है और नहीं भी होता । जिन स्त्रियोंमें रज कम होता है उनको कष्ट कम होता है; क्योंकि उनके तो रज ही कम है; परन्तु होते हुए न निकलनेसे बड़ी कठिनाई पड़ती है ।

३. कष्टरज

(१० क०)

१. रजका कष्टके साथ निकलना, यही कष्ट-रज है । इसके अनेक कारण हैं ।

१. अण्ड, फलवाहिनी नली और गर्भाशयमें विषाड । इससे, दूसरे रोग उत्पन्न हो जाना तथा किसी प्रकारकी रक्तावद ।

२. गर्भाशयके मुख और योनिमार्गमें शोथ इत्यादि ।

३. रजसे संबंध्य रसनेवाली नसाँ और रगों आदिकें किसी तरहका विकार ।

इसके अनेक लक्षण हैं ।

१. नामी और गर्भाशयके आसपास कठिन घावों के समान दर्द ।

२. काँखने और जोर देनेसे थोड़ासा रक्त निकलना ।

३. रक्त निकल जानेपर थोड़ी देरके लिये दर्द कम होकर फिर ज्योंका त्यों हो जाना ।

४. ऋतुके समयसे प्रायः आठ दिन पहले दर्दका प्रारम्भ होना ।

५. दर्दके साथ थोड़ा थोड़ासा खून निकलना ।

६. भ्रूवाशयमें जलन और दर्दका होना ।

७. नामीके नीचे दर्द और चोभसा मालूम होना ।

६२

सन्तति-शास्त्र ।

यह रोग जवान स्त्रियोंमें कम, परन्तु जिसकी जवानी ढल रही हो उनमें प्रिश्य पाया जाना है ।

४. वन्द्या स्त्रियों में कष्टरज । (शा० क्र०)

इसके अनेक कारण हैं ।

१. भीतरी अवयवोंकी कठोरता ।

२. अरुड, फलवाहिनी नली, गर्भाशय और भग तथा रजसे संवन्ध रयनेवाली नलों आदिका विकार ।

इसके अनेक लक्षण होते हैं ।

ऋतु प्रारम्भ होनेके प्रायः चार दिन पहलेहीसे ।

नाभिके नीचे और फसरमें उद्व उत्पन्न होकर ऋतुके चार छः दिन यादृक् रहता ।

२. प्यास अरुचि कृच्छ्र और हाथ पाँवोंमें जलन होना ।

३. सांसका जल्दी चलना और बेहोशी ।

५. अधिक रज निकलना ।

१. यह कई प्रकारसे होता है । (रति शास्त्र)

१. चार दिनोंमें ही अधिक रज निकलकर बन्द हो जाना ।

२. बराबर आठ-दस दिन या इससे भी अधिक दिनों तक निकलना ।

३. एक मासमें दो-तीन बार निकल जाना ।

४. बराबर गिरा करना या दो चार दिनोंके लिये बन्द हो जाना ।

५. कभी दो दो मास बराबर गिर कर बन्द हो जाना और फिर गिरने लगना ।

इसके अनेक कारण हैं ।

(रतिशास्त्र)

रजोधर्मके रोग ।

६३

  1. १. ऐसे रोगोंसे कि जिनसे शरीरका रक्त पतला पड़ जावे ।
  2. २. गर्भाशयमें उन नसांका मुग्न खुल जाना कि जिससे रक्त आता है । यह नीचे लिखे कारणोंसे होता है ।
    1. १. जब कि छोटे कदकी स्त्री पूरे जवानके साथ संयोग करे तो दवाव और चोटके कारण तन्म खुल जानी हैं ।
    2. २. पुरुषकी लिंगेन्द्रिय बड़ी होनेके कारण नसोंमें आघात पहुँचकर उनका खुल जाना ।
    3. ३. कम उम्रवाली स्त्रीका पूरे बड़े जवान पुरुषमें संयोग द्वारा नसोंमें आघात पहुँचकर खुल जाना ।
  3. ३. स्त्रुतमें किसी प्रकारकी खराबी होने से ।
  4. ४. तपेदिक और शुरदेके विकारों से ।
  5. ५. शरीरमें स्त्रुत बहुत घनने से (यह मोटी ताजी स्त्रिया-में होता है) ।
  6. ६. ऐसे रोग कि जिनसे स्त्रुतमें गरमी उत्पन्न हो ।
  7. ७. स्त्रुतका गरम हो जाना, जैसे कुछ रोगका स्त्रुत ।
  8. ८. पांडुरोगके होनेसे ।
  9. ९. गर्भाशयका मुँह चौड़ा हो जानेसे ।
  10. १०. गर्भाशयकी गरदन वा गर्भाशय में परिवर्तनसे ।
  11. ११. अतिमैथुनसे ।
  12. १२. फेफड़ेके अनेक रोगोंसे ।
  13. १३. रक्त पतला हो जानेसे ।
  14. १४. मसानेमें सृजन आ जानेसे ।
  15. १५. अरुडोंमें शोथ होनेसे ।
  16. १६. अरुडोंके पास कर्हायर शोथ होनेसे ।

६४

सन्तति-शास्त्र ।

१७. अरुओं और गर्भाशयपर दवाब पहुँचनेसे ।

१८. कलेजेके अनेक रोगोंसे ।

१९. हृदयके अनेक रोगोंसे ।

२०. वषा पैदा होनेपर यदि गर्भाशयमें खेड़ी रह जाय ।

२१. वषा पैदा होनेपर, जब कि गर्भाशय ठीक ठीक न सिकुड़े ।

२२. ऐसे अग्रधरे मेंधुनसे कि जिससे स्त्रीकी चाह पूरी नहो ।

२३. दुर्धल स्त्रियोंमें किसी प्रकारकी गरमीसे ।

२४. गरम वस्तु, जैसे मिर्च, खट्टाईके अधिक खानेसे ।

२५. गर्भाशय और अरुओंपर किसी प्रकारकी चोट पहुँचने और इनके अनेक रोगोंसे ।

२६. गरम औषधियोंके खाने और गर्भाशय तथा योनिमें लगानेसे ।

२७. शोक चिन्ता और व्यथा इत्यादिके सहन करनेसे ।

इसके अनेक लक्षण हैं ।

१. रक्तका बहुत निकलना ।

२. शरीरका दुबला, निर्बल और शिथिल पड़ जाना ।

३. शरीरका रंग पीला और फीका पड़ जाना ।

४. आलस्य और मेहनत न होना ।

५. हाथ पाँवमें दर्द, मन्दाग्नि अरुचि और मूर्च्छा ।

६. कमर और पेटमें अत्यन्त पीड़ा ।

७. आँख, सर और गर्दनमें दर्द ।

८. रीढ़, पीठ, और कोपमें दर्द, घुमनी और प्यास ।

इस रोगकी भयानक दशाके लक्षण ।

१. स्त्रीका बेहोश हो जाना ।

२. नाड़ीकी चाल कम पड़ जाना ।