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संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages
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सन्तति-शास्त्र ।

चता है । बार बार थक्का लगनेसे गर्भाशय ढीला पड़ जाता है और गर्भपात हो जानेका भय रहता है ।

६. कृच्छ्र । इसको लोग मामूली रोग समझते हैं, परन्तु यह एक बड़ा भयंकर रोग है । आंतोंपर दवाव पड़नेसे यह हो जाता है । इससे गर्भको बहुत बड़ा हानि पहुँचती है क्योंकि शौच जाते समय कान्धनेसे गर्भपर दवाव पड़ता, जिसका सहन करना पूरे दिनोंकी गर्भवतीका कठिन होता है । जब पेशा हो, तो जल्दी पचनेवाला हलका भोजन करना चाहिये ।

७. रक्तका कम बनना । यह रोग उन स्त्रियोंको विशेष होता है कि जो अत्यन्त दुबली और सूखी होती हैं जिनके शरीरमें रक्त पहले हीसे कम होता है और गर्भ स्थित होनेपर कम बनता भी है । कारण यह है कि भोजन किये हुए पदार्थोंसे रस बनता है और रससे रक्त । जबकि भोजन ही कम किया जाता है और चने हुए रससे चञ्चेका भी पोषण होता है, तो यदि पेशे समयमें कुपच या अतिसार पेशी बीमारी हो गई तो रक्त कम बनने लगता है और गर्भवती अत्यन्त निर्बल हो जाती है । अतएव बच्चा उत्पन्न होते समयमें कठिनाई पड़ती है ।

८. मूत्ररोग । यह उन स्त्रियोंको होता है कि जिनका गर्भाशय टल जाता है । इसके कई कारण हैं ।

१. बार बार मूत्रका आना—पेशा दो तरहसे होता है । यदि यह रोग गर्भके प्रारम्भके दिनोंमें हो, तो मूत्राशयकी गरदनकी खाड़से और जब अन्तके दिनोंमें हो, तो मसानेपर गर्भाशयके दवाव पड़नेसे होता है । जब पेशा होता है तो गर्भाशयमें सूत्र रहने ही नहीं पाता ।

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गर्भवतीके रोग ।

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२. मूत्रका बन्द हो जाना—ऐसा भी गर्भके दवावके कारण होता है। यदि ऐसा कुछ दिनोंतक रहे, तो मूत्राशयमें सूजन आ जाती है।

६. बच्चेकी थैलीमें अधिक जल भर जाना। गर्भाशयमें एक थैली होती है जिसमें जल भरा रहता है। बच्चा उसी जलमें तैरा करता है। यह रोग थैलीमें सूजन हो जानेसे होता है इसमें खेड़ी बड़ी और सूजी हुई होती है। यह पाँचवें या छठे महीनेमें होता है और गर्भ गिर जाता है।

१०. रक्तकी नादियोंका फूल जाना। यह रोग गर्भाशयपर दवाव पड़नेसे होता है। पैरमें काले रूधिरकी नसें फूल जाती है। खड़े होनेमें पैरोंका कांपना, सनसनाहट और तलुवोंमें जलन होना इसका लक्षण है।

११. गर्भाशयके रोग। ये अनेक प्रकारसे होते हैं।

१. गर्भाशयका आगे-पीछे-दहिने और बाएँ टल जाना या आगे निकल आना।

२. गर्भाशयका फट जाना और उलट जाना।

इन रोगोंकी व्याख्या 'गर्भाशयके रोग' प्रकरणमें लिखी गई है, अतएव यहाँ आवश्यकता नहीं है।

१२. हृदयकी धड़कन। यह रोग उन स्त्रियोंको होता है कि जिनका हृदय निर्बल है। इसका खास कारण हृदयपर गर्भका बोझ पड़ना है। इससे हृदयमें धड़कन और दर्द होता है।

१३. दस्तोंका होना। यह रोग उन स्त्रियोंको होता है कि जिनका हृदय निर्बल है, जिनको रंजकी बात सुननेमें दिलकी धड़कन और बेहोशी तुरन्त हो जाती है। प्रायः गर्भके पाँचवेंसे आठवें महीनेतक ऐसा होता है और इसका कारण मत्ताशयपर दवाव पहुँचना है। ऐसा रोग दो रीतिसे होता है।

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सन्तति-शास्त्र ।

एक तो वह कि दो चार दस्त बराबर चार छः दिन आजावे; और दूसरा वह कि एक ही दिनमें दस-चीस-पचास दस्त हो जावें। इसमें बहुत सोच समझकर चिकित्सा करनी चाहिये।

गर्भावस्थामें कोई भी रोग क्यों न हो अत्यन्त कष्ट होता है। पेटके रोगोंमें बहुत सावधानीसे औषधि करनी चाहियें; क्योंकि जरा भी प्रतिकूल होनेसे गर्भस्त्राव या गर्भपात हो जानेका भय रहता है।

(४८) गर्भस्त्राव और गर्भ-पात ।

१. गर्भस्त्रावके कारण ।

समय पूरा न होने के अन्दर ही बालकका पैदा होना गर्भ-पात कहलाता है। इसमें दो भेद हैं। जब चार मास तकका गर्भ गिर जावे, तो उसको गर्भस्त्राव कहते हैं और जब सात मास तकका गिरे तो उसको गर्भ-पात कहते हैं ।

जिस बालकका जन्म आठवें मासमें होता है तो उसे अपूर्ण जन्म होना कहते हैं। बच्चा पैदा होनेकी अपेक्षा गर्भस्त्राव और गर्भपातमें विशेष हानि और भय समझना चाहिये ।

बालकका जन्म प्रकृति के अनुसार स्वाभाविक है, परन्तु बीच में ही गर्भ गिर पड़ना प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है। इस कारण गर्भस्त्राव या गर्भपात होनेमें स्त्रीको बड़ा कष्ट होता है। बच्चा पैदा होने की अपेक्षा गर्भस्त्राव और गर्भपात होनेमें रक्त इतना अधिक निकलता है कि जिससे बाज़ी बाज़ी निर्बल स्त्रियाँ बेहोश हो जाती हैं। सबसे अधिक कष्ट होनेका कारण यह है कि पूरे दिनोंमें गर्भाशयसे गर्भका सर्वत्र प्रकृति

48. गर्भलाव और गर्भपात

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गर्भसाव और गर्भपात ।

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के अनुसार सरलतापूर्वक कुछ थोड़े कष्टके साथ छूट जाता है, परन्तु समय पूरा न होनेके पहले बीचमें गर्भाशयसे गर्भका अधूरा संवन्ध अत्यन्त कठिनाईसे छूटता है । गर्भसाव और गर्भपातके अनेक कारण होते ।

१. गर्भसावके कारण ।

  1. १. अतिमैथुन और पेटपर चोट लगनेसे ।
  2. २. एकाएक किसी प्रकारका शोक और सदमा पहुँचनेसे ।
  3. ३. शूल, दस्त और पेटमें पैंठन होनेसे ।
  4. ४. किसी प्रकार गर्भाशयका मुख खुल जानेसे ।
  5. ५. गर्भके ठीक पोषण न हो सकनेसे ।
  6. ६. अनेक प्रकारकी औषधियोंके खानेसे ।

२. गर्भपातके कारण ।

  1. १. गर्भका ठीक पोषण न होना ।
  2. २. माताका क्षय इत्यादि कठिन रोगोंमें असित होना ।
  3. ३. स्त्रीको गर्मी सृजाक इत्यादि छूतदार रोगोंके होनेसे ।
  4. ४. शूल दस्त और विशूचिका इत्यादिके होनेसे ।
  5. ५. ऐसी गहरी चोटसे कि जिससे गर्भाशयको एकदम धक्का पहुँचे ।
  6. ६. जगरके अनेक रोगोंसे और कमरको कसकर बाँधनेसे ।
  7. ७. गर्भाशयके दल जाने या फट जानेसे ।
  8. ८. अतिमैथुन और अत्यन्त परिश्रमसे ।
  9. ९. ऐसा व्यवहार कि जिससे पेटको हाल पहुँचे ।
  10. १०. बारंबार नीचे ऊपर चढ़ने और उतरनेसे ।

जहाँतक देखा गया है देहातकी रहनेवाली स्त्रियोंका गर्भसाव या गर्भपात कम होता है । शहरकी रहनेवाली नाज़ुक-

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सन्तर्ता-शारङ्ग ।

दिमाग, आलसी और दिन रात आराम करनेवाली स्त्रियोंको विशेष होता है। गर्भसाव या गर्भपातमें सबसे पहले रक्त निकलता है। जब कि दो तीन मासका गर्भ होता है तो स्त्रियों को रजस्वला होनेका धोखा हो जाता है। ऐसी दशामें जब पीड़ा हो तो तुरन्त गर्भसाव और गर्भपातका प्रकोप समझना चाहिये। रक्तसाव होनेके साथ ही गर्भसाव या गर्भपात नहीं होता। प्रायः दो दो तीन तीन दिन तक जारी रहकर हानि होती है। किसी किसी स्त्रीके रक्तसाव होकर रह जाता है, गर्भसाव या गर्भपात नहीं होता। जब अत्यन्त पीड़ा हो तो गर्भसाव या गर्भपात का समय समझना चाहिये।

कभी कभी ऐसे समयमें दशा जडी भयंकर हो जाती है और स्त्रीको सदाके लिये संसार छोड़ देना पड़ता है।

(५०) मातापिताके किस किस अंशसे क्या क्या उत्पन्न होता है ?

यह एक बड़ा सवाल है कि शरीरमें क्या क्या माता पिताके किस किस अंश से उत्पन्न होता है ? या तो शरीरकी उत्पत्ति मातापिताके अंशसे ही होती है, परन्तु वैद्योंने गर्भको मातृज, पितृज, आत्मज, स्वात्मज और रसज माना है। इनके ही अंश से सब कुछ बनकर शरीर तैयार होता है।

१. वैद्यकका मत ।

१. माताके भ्रंशसे क्या क्या बनता है ?

१. गर्भ मातृज होता है, क्योंकि विना माताके गर्भ रह ही नहीं सकता। शरीरमें मातासे उत्पन्न होनेवाली वस्तुयें ये हैं—चमड़ा, रक्त, मांस, मेदा, नाभि, हृदय मूत्रा-शय क्रोम (प्यास लगनेकी जगह) तिह्री, पिलही,

49. मातापिताके किस किस अंशसे क्या क्या उत्पन्न होता है ?

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मातापिताके किस किस अंशसे क्या क्या उत्पन्न होता है ? २०७

वृक्ष, बस्ती आमाशय, पुरीषाधान, पक्षाशय, ऊपरका गुदस्थान, अग्नोगुद, छोटी अंतर्दूहि, मेद और मेदवाही ।
( च० श० अ० ३ श्ल० ९ )

शुश्रुतने भी कहा है कि 'कोमल अवयव माताके अंशसे उत्पन्न होते हैं ।'
( सु० श० अ० ३ श्ल० ४६ )

२ पिताके अंशसे क्या क्या बनता है ?

१. गर्भ पितृज होता है, क्योंकि बिना पिताके जन्म नहीं हो सकता । शरीरमें पितासे उत्पन्न होने वाली वस्तुएँ ये हैं—बाल, दाढ़ी, मूँछ, नखून, रोएँ, दांत, हड्डी, नस बड़ी नस, धमनी और वीर्य । ( च० श० अ० ३ श्ल० १० )

शुश्रुतने भी ऐसा ही कहा है कि 'स्थिर पदार्थ पिताके अंशसे उत्पन्न होते हैं ।'
( सु० श० अ० ३ श्ल० ४५ )

३ आत्माके अंशसे क्या क्या बनता है ?

१. गर्भ आत्मज होता है । शरीर बिना जीवके नहीं रह सकता और न जीव बिना शरीरके उत्पन्न होता है । आत्मासे आत्मा उत्पन्न होती है । इसलिये गर्भ को आत्मज माना गया है । शरीरमें आत्मासे उत्पन्न होने वाली वस्तुएँ ये हैं—आयु, आत्मज्ञान, मन, इन्द्रिय, उच्छ्वास, निस्वास, प्रेरणा, धारणा, आकृति भेद, स्वरवरण भेद, सुख, दुःख, रुक्षा, द्वेष, चेतना, धृति, बुद्धि, स्मृति, अहङ्कार और यत्न । ( च० श० अ० ३ श्ल० १५ )

सुश्रुतका भी इसीसे मिलता हुआ कथन है ।

( सु० श० अ० ३ श्ल० २७ )

२. सात्त्विक अंशसे क्या क्या बनता है ?

१. गर्भ सात्त्विक होता है । यदि स्त्री पुरुष असात्त्विकसेवी न होते तो उनको वन्धव्यत्व अथवा गर्भमें अनिष्ट भाव

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सन्तति-शास्त्र ।

उत्पन्न न होता । जबतक बात पित्त और कफ विग-
कर रजवीर्य और गर्भाशय को न विगाड़ें, तब तक
ही असात्य सेवन भी गर्भ उत्पन्न कर सकता है।
सात्यसेवी स्त्री पुरुषका रजवीर्य और गर्भाशय शुद्ध
होनेपर ऋतु कालमें मिलाप होता है, परन्तु जब तक
जीवात्मा प्रवेश न करे तबतक गर्भ नहीं रह सकता ।
यदि यह कहा जाय कि सात्य से ही गर्भ उत्पन्न
होता है, सो नहीं, परन्तु बात यह है कि गर्भ उत्पन्न
होनेमें सात्य भी एक कारण है। इससे ये वस्तुएं
शरीरमें उत्पन्न होती हैं—आरोग्य, अनास्यता, नीला-
भता, इन्द्रियाँकी प्रसन्नता, स्वरसम्यक्ता, वीजसम्यक्-
ता और हर्षकी अधिकता । ये सब सात्यसे उत्पन्न होती
हैं । (च० श० अ० ३ श्ल० १७ )

२. वीर्य, आरोग्यता, बल, वर्ण और मेधा भी सात्य से
उत्पन्न होते हैं । (सु० श० अ० ३ श्ल० ४७ )

५ रसके अशसे क्या क्या बनता है ?

१. गर्भ रसज होता है । गर्भ उत्पन्न करना तो दूर रह-
किलु आहार रसके चिना माताकी भी जीवन-यात्रा
नहीं चल सकती । अच्छी तरह रस सेवन करनेसे
गर्भ उत्पन्न हो सकता है । परंतु केवल रस-सेवनसे ही
गर्भ उत्पन्न नहीं होता । बात यह है कि गर्भ उत्पन्न
होनेमें रस भी एक कारण है । (च० श० अ० ३ श्ल० ५९ )

२. शरीरका मोटापन, बल, वर्ण स्थिति और क्षीणता ये
रससे उत्पन्न होते हैं । (सु० श० अ० ३ श्ल० ४७ )

यहांपर एक यह शब्दा होती है कि सुश्रुत महाराज ने
वीर्यको पित्तज और सात्यज तथा बल और वर्णको सात्यज

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गर्भमें शरीर कैसे बनता है ?

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और रसज क्यों कहा ? इसका तात्पर्य यह है कि सुश्रुतके मतानुसार वीर्य-पिता और सात्त्व्य दोनोंसे तथा बल और वर्ण सात्त्व्य और रससे उत्पन्न होता है । इस प्रकार माता-पिताके अंशोंसे शरीरका सङ्गठन होता है ।

(५) गर्भमें शरीर कैसे बनता है ?

इस बातको सब मानते हैं कि गर्भ रज और वीर्यसे ही होता है । इनके मिले हुए पदार्थमें शरीर बननेका पूरा सामान रहता है ; परन्तु सूक्ष्म होनेके कारण नहीं दिखाई पड़ता । ऐसा मिला हुआ पदार्थ जब गर्भाशयमें पहुँचता है उसी समयसे गर्भका वृद्धि-क्रम प्रारंभ हो जाता है और उत्पन्न होनेतक उसमें अनेक परिवर्तन होते रहते हैं ।

१. गर्भका पहिला दिन ।

  1. १. पहली रात्रिमें रज और वीर्य मिलकर एक हो जाता है और आकार \frac{1}{16} द्रव्यसे कुछ अधिक होता है ।
  2. २. इस समय गर्भ एक एक दागके समान बीचमें कुछ उभरा सा होता । ( १० क० )

२. गर्भका पाँचवा दिन ।

  1. १. इस समय गर्भ एक बुदबुद या पानीके बबुलेकी भाँति हो जाता है । ( १० क० )
  2. २. ऐसे समयमें गर्भको खूनके एक वारीक दागके बराबर होना भी लोग मानते हैं । ( जापानी मत )

३. गर्भका दूसरा सप्ताह ।

  1. १. इस समयसे गर्भका वजन एक ग्रैन और आकार \frac{1}{8} द्रव्य होता है और साफ दिखाई पड़ता है । ( जापानी मत )

१४

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सन्तति-शास्त्र ।

२ सात दिनेके बाद गर्भकफकीसी गाँठके समान (कलस )
हो जाता है । ( वा० श० अ० १ श्लो० ३७ )

३ दूसरे सप्ताहके अन्तमें आकर १ ईश और वजन ई
रत्तीके बराबर लोग मानते हैं ।

४, गर्भका तीसरा सप्ताह ।

१ इस समयमें गर्भका वजन चार गेहूँके दानेके बराबर
और आकार जूएँके सामान होता है । ( १० क० )

१ इस समयमें सर तथा पैरका आकार बनने लगता है ।
लम्बाई ई इक्षतक वह जाती है ।

५, गर्भका चौथा सप्ताह ।

२. ऐसे समयमें गर्भ एक बड़ी भक्कीके समान होता है
और आकार एक कीड़ेके सहस देहा, लम्बाई ई इक्ष,
मस्तक कुछ उभरता जान पड़ता है ।

३. पहले महीनेमें गर्भ एक लोथड़ा सरीखा होता है ।
( सु० श० अ० ३ श्लो० १७ )

६, गर्भका पाँचवाँ सप्ताह ।

१ इस समयमें सर और पैरोंकी ओर कुछ उभार सा
मालूम होने लगता है ।

२. ऐसे समयमें गर्भ घन पिंड और अर्द्धके समान हो
जाना है ।

७, गर्भका छठा सप्ताह ।
१ इस समयमें शरीरस सर बड़ा होता है । हाथ पैर दूठे-
के समान होते हैं । अरिब, कान, नाक और मुँहके स्थान
( च० श० अ० ४ श्लो० ८ )

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गर्भमे शरीर कैसे बनता है?

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पर काले काले दाग मालूम होते हैं। लम्बाई एक इञ्च तक हो जाती है।

८. गर्भका सातवाँ सप्ताह।

१. इस समयमें छातीकी हँसली, जवड़ा, पसली और हड्डी बनने लगती है। हृदय बढ़ जाता है। सर कुछ बड़ा हो जाता है। हाथ पैर कुछ कुछ निकलने लगते हैं। आंख, कान, मुँह और नाक दिखलाई पड़ते हैं। जिगर और स्त्रीहा बड़ा हो जाता है। लम्बाई मायः १३ इञ्च होती है।

९. गर्भका आठवाँ सप्ताह।

१. इस समयमें हाथ, पैर, पंजे, मुँह, नाक, कान इत्यादि दिखलाई देते हैं। आंखोंके डौल उभरे मालूम होते हैं। मुख कुछ बड़ासा जान पड़ता है। लम्बाई २ इञ्च तक और वजन दो तोले होता है। आकार सुर्गीके अण्डेके समान होता है और नाभिकमलको बनानेवाले अंकुर बड़े होने लगते हैं।

१०. गर्भका नवाँ सप्ताह।

१. इस समय गर्भ जल्दीके साथ बढ़ता है। सर पुष्ट होने लगता है, आंखें बड़ी हो जाती है। पलकें दिखलाई पड़ती है। नाक, कान, गला साफ दिखलाई देते हैं और हृदय पूर्ण तैयार हो जाता है। लम्बाई २३ इञ्च और वजन तीन तोला होता है।

११. गर्भका दसवाँ सप्ताह।

१. इस समयमें भी गर्भ जल्दीके साथ बढ़ता है। सर गिल-गिला रहता है। गला और गुठी साफ दिखलाई पड़ती है। लम्बाई २३ इञ्च व वजन ४३ तोले तक होता है।

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सन्तति-शास्त्र ।

१२. गर्भका ग्यारहवों सप्ताह ।

१. इस समयमें आंखोंकी पलकें तैयार हो जाती हैं, परंतु चिपटी रहती हैं । नाकके छेद और होंठ बन जाते हैं, परंतु मुख बन्द रहता है । कलेजा तैयार हो जाता है । लम्बाई ३ इञ्च, वजन ६ तोलेतक होता है ।

१३. गर्भका बारहवों सप्ताह ।

१. इस समयमें हृदयकी चाल सूक्ष्म रीतिसे होती है । हाथ पैर साफ साफ मालूम होते हैं । कन्या और पुत्रका निशान अच्छी तरह स्पष्ट हो जाता है । नलियोंमें रक्त बहना प्रारंभ हो जाता है । हाथ पैरकी अंगुलियों साफ दिखलाई पड़ती हैं । मस्तक कुछ ऊँचा और पिलपिला रहता है । पैरकी पिंडलियां तैयार होने लगती हैं । कमर लचलची, सरके समान होती है । नाभिकमल पूरा बन जाता है । नाल ३ ई इञ्चतक लम्बा होती है । (गर्भ का वजन ) ६ तोले और लम्बाई ३ इञ्चतक होती है ।

३. तीसरे महीनेमें दोनों हाथ, दोनों पाँच और स्तर इन पाँचोंकी पाँच शाखासी निकलने लगती हैं और थोड़ा थोड़ा अंग प्रत्यंगका विभाग प्रगट होने लगता ।

( सु० ७० अ० ३ श्लो० १९ )

३. सारी इन्द्रियां और सारे अवयव तीसरे मासमें एक ही साथ उत्पन्न हो जाते हैं । ( च० ७० अ० ३ श्लो० १ )

वामभट्टने भी ऐसा ही कहा है ।

१४. चौथा महीना ।

१. इस समयमें मस्तक और कलेजेकी अपेक्षा अपेक्षा चीजें अधिक बढ़ती हैं । नाभिकमल पूरा हो जाता है । रंग,

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गर्भमें शरीर कैसे बनता है ?

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पट्टे दिखलाई पड़ने लगते हैं। बच्चेका कुछ हिलना भी जान पड़ता है। मांस-रक्त वराबर दिखलाई पड़ती हैं। चेहरा अधिक लम्बा हो जाता है। चमड़ेका रंग गुलाबी होता है। फेफड़ा बन जाता है, लम्वाई ६ इञ्च और वजन २० तोलातक होता है।

२. सारे अंग प्रत्यंग जान पड़ते हैं। हृदय भराट हो जाता है। चैतन्य-धातु आ जाती है; क्योंकि हृदय चेतनाका स्थान है। इस कारण जीव इंद्रियोंके भोगकी क्षति करने लगता है। (सु० श० अ० ३ श्लो० १९)

३. इस मासमें स्त्रीकी दौहद संझा होती है। इसी समय वाञ्चित पदार्थ न मिलनेसे सन्तान अंगहीन हो जाती है। (श० क०)

४. इस मासमें गर्भ दृढ़ होता है और माताका शरीर भारी हो जाता है। (च० १० अ० ४ श्लो० २४)

१५. पाँचवाँ महीना।

१. इस मासमें शरीरकी अपेक्षा सर बड़ा होता है। बालक-की फड़कन मालूम होती है। सर पर भूरे बाल उग आते हैं। चमड़ी चिकनी हो जाती है। रंग और पट्टेखूब अच्छे बन जाते हैं। बच्चा बार बार हिलता है। लम्वाई १० इञ्च और वजन ३० तोले तक होता है।

२. पाँचवें मासमें मनमें अधिक चैतन्यता हो जाती है। (सु० श० अ० ३ श्लो० ३३)

३. इस मासमें गर्भका मांस और स्निग्ध पुष्ट होता है। इसलिये स्त्री दुबली हो जाती है। (च० १० अ० ४ श्लो० २५)

४. इस समयमें बुद्धिका विकास होने लगता है।

(वा० श० अ० १ श्लो० ५७)

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सन्तति-शास्त्र ।

१६. ढ़गा महीना ।

१. ऊपरकी खाल बनकर तैयार हो जाती है । चमड़ेकी सुकड़न चर्बी बननेके कारण कम हो जाती है । श्रृंगु-लियोंमें नाखून निकल आते हैं । चमड़ेका रंग लाल हो जाता है । लम्बाई १२ इञ्च और वजन १ संस्तक हो जाता है ।

२. इस मासमें बालकका बल और वर्ण पुष्ट होता है । इसलिये स्त्रीके बल और वर्णकी हानि होती है ।

( च० ५० अ० ४ श्ल० २६ )

३. इस समयमें बुद्धिका विकास होता है ।

( सु० ५० अ० ३ श्ल० ३३ )

४. इस कालमें स्नायु, शिरा, रोम, वर्ण, नख और त्वचा पुष्ट होती है ।

( वा० १० अ० १ श्ल० ५७ )

१७. सातवों महीना ।

१. इस समय शरीरके सत्र भागवन चुकते हैं । वंश्या गर्भा-शयमें उलट जाता है और निकलनेके रास्तेके सामने आ जाता है । पैर ऊपर और सर बाँफके कारण नीचे हो जाता है । पैर माताकी छातीकी ओर रहते हैं । पलकें खुलने लगती हैं । शरीरमें चर्बीके बढ़ जान से आकार गोल हो जाता है । पुतली परदेसे बन्द मालूम होती हैं । हर एक अवयव पूरा दिखलाई पड़ता है । लम्बाई १४ इञ्च और वजन ढ़ेढ संस्तक होता है ।

२. सातवें महीनेमें सारे श्रृंग प्रत्यंग स्फुट हो जाते हैं ।

( सु० ५० अ० ३ श्ल० ३३ )

३. इस कालमें गर्भ पूर्ण भावोंसे युक्त होकर पुष्ट होता है ।

( वा० ५० अ० १ श्ल० ५८ )

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गर्भमें शरीर कैसे बनता है ?

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४. इस समयमें गर्भ खूब पुष्ट हो जाता है। इस कारण स्त्री सब आकारोंसे ग्लानियुक्ता होती है।

( च० श० अ० ४ श्लो० २८ )

१८. आठवाँ महीना।

१. इस मासमें शरीरके सब अवयव पुष्ट होकर अपना काम करने लगते हैं। बालकको चैतन्यता आ जाती है। नाखून इत्यादि सब अच्छी तरह दिखलाई पड़ते हैं। बच्चा कुछ मोटा हो जाता है। आँखकी पुतलीका परदा कुछ हटा जान पड़ता है। चमड़ेका रङ्ग लाल रहता है और उसके ऊपर चरबीका कुछ अंश लगा रहता है। लम्बाई १८ इञ्च और वजन ढाई सेरतक होता है।

२. इन दिनोंमें बालकके हृदयमें रसका संचार होता है। कभी माताके हृदयसे बच्चेके हृदयमें और कभी बच्चेके हृदयसे माताके हृदयमें रस आता जाता है। इस कारण माता कभी हर्ष और कभी ग्लानियुक्ता होती है। बच्चेके हृदयमें जब माताके हृदयसे रस आता है तब माता ग्लानियुक्ता और जब बच्चेके हृदयसे माताके हृदयमें जाता है तब हर्षयुक्ता होती है। अतएव इस मासमें बालकका श्रोत्र स्थिर नहीं रहता है। इस कारण आठवें मासका जन्मा बालक प्रायः नहीं जीता।

( च० श० अ० ४ श्लो० २८ )

१९. नवौँ महीना।

१. इस मासमें बच्चा सारे अवयवोंसे परिपूर्ण हो जाता है। किसी भी अंग प्रत्यंगके बननेकी कसर नहीं रहती। लम्बाई २० इञ्च और वजन ४ सेरतक होता है।

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सन्तति-शास्त्र ।

२. नवें महीनेका एक दिन भी वीत जाने से बच्चा पैदा होनेका समय कहा जाता है । ( च० ५० प्र० २ न० २९ )

२०. दसवाँ महीना ।

१. नौ महीनेके बाद पैदा होनेवाले बच्चेका अण्डकोप अत्यन्त पुष्ट होता है । ( रतिभास्त्र )

इस प्रकार गर्भमें बच्चेकी शरीर-रचना होती है । विद्वानोंकी जांचसे पता चलता है कि २० इञ्च तक लम्बा और सात सेर वजन तकका बच्चा उत्पन्न हो सकता है । इतना तो नहीं, इससे कुछ कम वजनके बच्चे तो कई देखे गये हैं । यदि बच्चेका सवल और निर्बल होना माताके स्वास्थ्यपर निर्भर माना जाय, तो निर्बल मातासे सवल और सवल मातासे निर्बल सन्तान उत्पन्न होती हुई देखी जाती है । विद्वानोंकी राय है कि माताके भोजनके अनुसार सवल और निर्बल सन्तान उत्पन्न होती है । इसको वैद्यकर्म भी माना है, परन्तु आज हम यह भी देखते हैं कि माता-पिता दोनों खूब पुष्ट हैं, गर्भके दिनोंमें माताने खाया भी खूब, परन्तु सन्तान निर्बल उत्पन्न हुई । इस विषयमें वैद्यकर्मके एक आचार्यका मत है कि गर्भकी नाभिमें ज्योति-स्थान है । उस जगह वायु हमेशा चलती रहती है । इसीसे गर्भकी देह बढ़ती है । गर्भकी साथमें हवा जैसे जैसे ऊपर तिरछी और नीचेके छिद्रोंको विस्तार करती है उसी प्रकार बच्चेका शरीर बढ़ता है । ( ग० प्र० १० प्र० ३१७ व २३८ )

माताका भोजन गर्भकी देह बढ़नेमें अवश्य सहायक होता है, परन्तु गर्भ बढ़नेका हेतु ज्योतिस्थानकी वायु ही है ।

अतएव उत्तम वायुके होनेपर अच्छी, सामान्य वायुके

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गर्भमें बच्चेका पालन कैसे होता है ?

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होनेपर मामूली और मध्यम वायुसे छोटी और निर्बल सन्तान उत्पन्न होती है।

इस प्रकार बच्चा गर्भमें बृद्धि पाकर जन्म लेता है।

(५१) गर्भमें बच्चेका पालन कैसे होता है ?

माता और बच्चेका बड़ा सम्बन्ध है। जब तक बच्चा गर्भमें रहता है उसका जीवन मातापर ही निर्भर करता है; क्योंकि वह बच्चेकी धात्री और जीवनदात्री है।

जब तक गर्भमें बच्चेका एक एक अवयव नहीं बन जाता, वह गिलगिला एक पिंड मरीखा होता है। नाल भी नहीं होता। गर्भ-स्थिति होनेके समयसे ही गर्भवतीके सारे शरीरमें फैलानेवाली, रस वहानेवाली और तीर्थभ्रमन करनेवाली धमनियोंका सारभूत द्रव पदार्थ गर्भका पोषण करता है।

( सु० श० अ० ३ श्ल० ३७ )

गर्भाधानके दो महिने पीछे नाल बनता है। यह बच्चेके पालनकी एक खास चीज़ है। दूसरी ओर या शील होती है, यह स्पृशके समान गोल अवयव है। ६ इञ्च लम्बी, बीचमें डेढ़ इञ्च मोटी और तीन पावके लगभग भारी होती है। इसका एक सिरा गर्भाशयसे मिला होता है। दूसरा बच्चेको ओर रहता है। इसीसे नाल उत्पन्न होकर बच्चेके नाभिसे जा लगता है। वैद्यकका मत है कि माताके शरीरमें रसके वहानेवाली नाड़ियों से नालकी नाभी लगी रहती है। वह माताके किये हुए आहार के रस और वीर्यको लेकर उसके सारसे गर्भके बालककी बृद्धि करती है।

( सु० श० अ० ३ श्ल० ३६ )

नाल, दो रक्तवाहिनी और एक साधारण नाड़ीका बना हुआ होता है। लम्बाई बच्चे लम्बाईके बराबर होती है। ज्यों

51. गर्भमें बच्चेका पालन कैसे होता है ?

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सन्तति-शास्त्र ।

ज्यों वच्चा बढ़ता जाता है त्यों त्यों नाल भी बढ़ता जाता है । माताके शरीरसे वच्चेका पोषण करनेके लिये रक्त नालसे वच्चे के शरीरमें पहुँचता है और वच्चेके शरीरका दूषित रक्त रक्त-वाहिनी नाडियोंसे श्रोरमें चला आता है ।

जिस प्रकार हम लोगोंमें भोजन किये हुए पदार्थसे रक्त बनाने और श्वास द्वारा उसको शुद्ध करनेका काम फेफड़ेका है, उसी भांति वच्चेमें पोषणके लिये माताके शरीरसे पांण-तत्व खींचने और दूषित रक्त निकालनेका काम श्रोर करता है । वैद्यकका मत है कि माता जो कुछ भोजन करती है उससे रस बनता है । यह रस तीन भागमें बँट जाता है । पहला भाग माताके शरीरको पुष्ट करता है, दूसरेसे स्तनोंमें दूध आता है, और तीसरे भागसे गर्भका पोषण होता है ।

( च० १० अ० ३ ५-७० २३ )

जिस प्रकार वृक्षकी जड़ें भूमिमें लगी रहकर रस खींचती हैं और वृक्ष द्वारा रहता है, इसी प्रकार नाल और श्रोरका काम है । यही कारण है कि माताके अन्धे डुरे भोजनका असर वच्चे पर पड़ता है । जो माताएँ उत्तम आहार करती हैं उनके वच्चे उसीके अनुसार उत्तम होते हैं । जो भोजनपर ध्यान नहीं रखतीं जो इसकी परवाह नहीं करतीं उनके वच्चे निर्बल और नाना प्रकारके रोगी उत्पन्न होते हैं । अतएव चर्मवतीका गाने पीनेका विशेष विचार रखना चाहिये ।

(५२) बच्चोंमें माता पिताके रोगोंका संसार ।

जिस प्रकार शस्त्रके अन्धे और डुरे बननेका भार सामग्री और बनानेवालोंपर निर्भर है, इसी प्रकार सन्तानका उत्तम वा मध्यम होना रजवीर्य, गर्भाशय और माता पितापर है । इस

52. बच्चोंमें मातापिताके रोगोंका संचार

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बच्चोंमें माता पिताके रोगोका संचार ।

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बातको माननेके लिये सब तैयार हैं कि सन्तान माता-पिताके गुण-दोषोंके अनुसार होती है। इसलिये यह बात निश्चय रूपसे मानी गयी है कि बच्चोंमें रज-वीर्यका असर अवश्य होता है।

यह प्रकृतिका नियम है कि वीर्य जैसा होगा उसीके अनुसार वृक्ष उत्पन्न होकर फल लेंगे। जिस प्रकार फलमें बीजके अनुसार खड़ा मीठा स्वाद रहता है इसी प्रकार बच्चोंमें माता-पिताके गुण-दोष का असर आ जाता है। जिन माता-पितामें कोई ऐसा रोग है कि जिसका असर रज-वीर्यतक पहुँच चुका है, तो ऐसे रज-वीर्यसे जो सन्तान पैदा होगी, उसका असर अवश्य सन्तानपर होगा। शरीरका हर हिस्सा अपनेमें से बहुत छोटा हिस्सा पैदा करता है। ऐसे परमाणु सारे शरीर को संचालन करते और अपने ही समान दूसरे परमाणु उत्पन्न करते हैं। इन्हीं परमाणुओंमें से शरीर उत्पन्न करनेवाले कोषोंकी उत्पत्ति होती है। इन्हीं कोषोंसे माता-पिताके गुण-दोष बच्चोंमें आ जाते हैं। ऐसे दोष दो प्रकार के होते हैं। एक खाई, दूसरे नष्ट हो जानेवाले। खायी कोष कभी नष्ट नहीं होते। इन्हीं कोषोंसे वीर्य बनता है अर्थात् ऐसे कोष वीर्यमय होते हैं। नष्ट हो जानेवाले कोष दिन-रातमें सहस्रों चार नष्ट होते और भोजन इत्यादिसे फिर पैदा हो जाते हैं।

जब इन खायी कोषोंमें किसी प्रकारके रोगका असर पहुँचता है, तो वे दूषित हो जाते हैं। इसी प्रकार मातामें भी समझना चाहिये। यही कारण है कि जिस रोगमें माता पिता म्रस्त होते हैं, दो दो चार चार वर्षकी अवधामें वही रोग बच्चोंमें देखे जाते हैं। तुलनेके पैदा हुए बच्चेतक भी प्रायः इस बातकी साक्षी होते हैं। देखा गया है कि आठ दस दिन का बच्चा है, बदनेमें दढ़ीड़े हो गए हैं। शरीरकी रंगतमें अन्तर

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सन्तति-शास्त्र ।

पड़ गया है । फोड़े फुँसी हो गए हैं । इन सबका कारण क्या है ? माता-पितासे प्राप्त हुआ रोग । यहाँपर यह शंका होती है कि पिताके बहुत दिनोंसे कोई रोग है और उनके चार लड़के हैं । इन चारों लड़कोंमें एक लड़केके वह रोग मालूम होता है, तो ऐसी दशामें क्या कहा जायगा कि उन तीन लड़कोंमें पिताको रोग है या नहीं ? यदि यह कहा जाय कि जब इन तीन लड़कोंका गर्भाधान हुआ तब पिताको वह रोग नहीं था, तो ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि बौद्धके एक एक परमाणु उस रोगसे दूषित हो चुके हैं ।

जहाँ ऐसा हो वहाँ यह मानना चाहिये कि जिस समय गर्भाधान हुआ, उस समय किसी कारणसे परमाणुओंमें उस रोगका असर कम था या जन्म लेनेपर या गर्भमें ही माताकी औषधि और मंजानसे पितासे प्राप्त रोगका असर कम हो गया । या जल वायुके परिवर्तनसे ऐसा हुआ ॥ जहाँ ऐसा होता है वहाँ बच्चोंमें ऐसे रोग नहीं दिखलाई पड़ते, परन्तु उसका अंश शरीरमें रहता अवश्य है । ऐसा भी होता है कि बहुतसे रोग समय और सहायता पाकर खड़े होते हैं । उनको भी ऐसे ही समझना चाहिये ।

जब माता पितामें रोग खूब बढ़ा हो और गर्भाधान हो जाय, तो ऐसे बालकोंमें वह रोग जन्मसे ही हो जाता है, जैसे रक्त-विकार, मिर्जी, बवासीर, अतिसार, क्षयी संग्रहणी, गरमी, सूजाक, आतिशक, नेत्र-रोग और दंत-रोग इत्यादि ।

माता पितासे पाप हुए रोग औषधि करनेसे हलके अवश्य पड़ जाते हैं, परंतु जड़से जाना असंभव है । अतएव बालकों-को निरोग पैदा होनेके लिये माता-पिताको अत्यन्त सावधानी

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शरीरका वर्ण ( रंग )

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से रहना चाहिये, जिससे वे ऐसे रोगोंसे बचे रहें, जो वंश परंपरासे बच्चोंमें आते हैं।

(५३) शरीर का वर्ण ( रंग )

इस बातमें प्रायः लोगोंको सन्देह होना है कि एक ही प्रान्तके रहने वालों और एकही माता-पिता से उत्पन्न सन्तानोंके रङ्गोंमें क्यों अन्तर पड़ता है ? इसके अनेक कारण हैं।

१. वैधकका मत।

१. तेज ( अग्नि ) धातुसे ही सब रंगके बालक उत्पन्न होते हैं। गर्भाधान समयमें यदि तेज धातु जल धातुके अधिकांशसे युक्त हो, तो गौर रंगकी सन्तान उत्पन्न होती है। यदि तेज धातु पृथ्वी धातुके अधिकांशसे युक्त हो तो काले रंगकी सन्तान होती है। यदि तेज धातु पृथ्वी और आकाशके अधिकांशसे युक्त हो, तो कालापन लिये साँवले रंगकी सन्तान होगी। यदि तेज धातु जल और आकाशके अधिकांशसे युक्त हो, तो गोरापन लिये साँवले रंगकों सन्तान होगी।

( सु० १० अ० २ श्लो० ३७ )

२. गर्भवती जैसे वर्णका आहार करे वैसे ही रंगकी सन्तान होती है। ( सु० १० अ० २ श्लो० ३८ )

३. गर्भाधान समयमें माताका चित्त जैसे रंग रूपवाले स्त्री-पुरुषपर पहुँचता है, उसीके अनुसार सन्तान होती है।

( रतिशास्त्र )

४. गर्भाधान समयमें जैसा रूप स्त्रीके सामने आ जाता है, वैसी ही सन्तान होती है। ( १० क० )