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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

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DevanagariHindipublished286 pages

About this granth

Rasikapriya (रसिकप्रिया) is Keshavdas's Braj Bhasha treatise on the erotic sentiment (shringara rasa), written in the late sixteenth century under the patronage of Prince Indrajit Singh of Orchha. It became the model for describing types of heroes and heroines in Hindi Riti poetry, later poets followed its scheme, and its scenes were painted widely in Rajasthani and Pahari miniatures.

Its sixteen prabhavas treat the nature of rasa and the kinds of shringara, the types of hero, the companion and the messenger, the types of heroine and their gestures, the eight situations of the heroine such as one whose lover is devoted, one betrayed and one who waits adorned, the lover's pique and its appeasement, and love in union and separation. For each definition Keshav gives his own verses on Radha and Krishna.

This edition carries the Priyaprasad commentary of Acharya Vishwanath Prasad Mishra, the noted critic and editor of Riti poetry, and runs to 286 pages.

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२७० रसिकप्रिया
पुरुष पुरान अरु पूरन पुरान इन्हें,
पुरुष पुरान सु कहत किहिं हेत हैं।
केसोदास देखि देखि सुरनि की सुंदरी वै,
करति बिचार सब सुमति-समेत हैं।
देखि गति गोपिका की भूलि जात निज गति,
अगतिन कैसैं धौं परम गति देत हैं ।३६'
शब्दार्थ--मधु = शहद । पुरुष पुरान = पुराने पुरुष, चिरंजीवी व्यक्ति
लोमश आदि ऋषि । पूरन = संपूर्ण, सभी । पुरुष पुरान = पुराण पुरुष,
आदिपुरुष (ब्रह्म), आप्त पुरुष । सुरन की सुंदरी = देवांगनाएँ । निज =
निश्चय ही । अगतिन = जिसकी गति न हो उसे, पापियों को । परम गति =
चरम गति, मोक्ष ।
भावार्थ- (देवांगनाओं की उक्ति) हे सखी, जो माखन का चोर है,
शहद का चोर है, दही का चोर है, दूध का चोर है (कहाँ तक कहूँ-वह तो
ऐसा भारी चोर है कि) देखती नहीं, देखते देखते वह हृदय को भी चुरा
लेता है। ऐसे को पुराने पुरुष और समस्त पुरुष भला पुराण पुरुष (ब्रह्म,
आप्त, विश्वासयोग्य) न जाने किस कारण कहते हैं। वे देवताओं की सभी
सुंदरियाँ श्रीकृष्ण को देख देखकर बुद्धिपूर्वक इस प्रकार का विचार कर रही
हैं। वे कहती हैं- 'जो गोपिका (राधिका) की गति (चाल) देखकर
निश्चय ही अपनी गति (सुध-बुध) भूल जाता है, वह भला अगति (गतिहीन,
पापी) लोगों को परम गति (उत्तम गति, मोक्ष) कैसे देता है।
अलंकार - विरोधाभास ।
अथ समरस-लक्षण - (दोहा)
(५००) सब तें होइ उदास मन, बसै एकही ठौर ।
ताही सों समरस कहैं, केसव कबि-सिरमौर ।३७।
शब्दार्थ - ताही सों = उसी को । समरस = शांतरस ।
सूचना - इसके अनंतर निम्नांकित एक छंद मुद्रित और हस्तलिखित
प्रतियों में और मिलता है, पर लीथोवाली प्रति में नहीं है। सरदार कवि ने
लिखा है- 'या कबित्त बहुत प्राचीन पुस्तकन में नाहीं मिलत' ।
पुनः, यथा- (सवैया)
बन मोहिं मिले हुते केसवराय कहा बरनौ गुन गूढ़ उघारे ।
जसुदा पै गई तब रोहिनी पै चुटियाहि गुहावत जाइ निहारे ।
३६-देखै० - देखत हौं । चित०-हियों हरि, चित चोरै । पुरुष-पूरन ।
पूरन-पुरुष । सु-धौं । सब-सच । ३७- ताही सों-तासों समरस कहत हैं,
ताहो सों सब सांत रस । केसत्र०-कहत सुकबि ।

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चतुर्दश प्रभाव २७१
घर जाउँ तु सोवत हैं फिरि जाउँ तौ नंद पै खात बरा दधिवारे ।
सपनो यह सत्त किधौं सजनी हरि बाहिर होत खड़े घरबारे ।
पाठांतर - केसवराय-केसवदास । उधारे-उधारे । तब-तौ वै । बारे-
धारे, पारे । यह-अनु । हरि-घर । घर । खड़े-बड़े ।
श्रीराधिकाजू को समरस, यथा- ( सवैया )
(५०१) देखें नहीं अरबिंदनि त्यौं चित चंद की आनँदकंद निकाई ।
कामिनी कामकथा करै कान न ताकै त्रिधाम की सुंदरताई ।
देखि गई जब तें तुमकों तब तें कछु बाहि न देख्यो सुहाई ।
छोड़ेंगी देह जु देखें बिना अहो देहु न कान्ह कहूँ ह्वै दिखाई ।३८।
शब्दार्थ-त्यौं = ओर । चित्त = चित लगाकर । कंद = जड़, मूल ।
निकाई = सुंदरता । त्रिधाम = तीनों लोक ( स्वर्ग, मर्त्य, पाताल ) ।
भावार्थ- ( सखी की उक्ति नायक से ) हे कान्ह, जब से वह आपको
देख गई है, तब से उसे कुछ देखना अच्छा ही नहीं लगता । न तो कमलों की
ओर देखती है और न चित्त लगाकर चंद्र की आनंददात्री सुंदरता ही देखती
हैं । कामिनी होकर भी कामकथा सुनने में कान नहीं लगाती और कहाँ तक
कहें उसे तीनों लोक की सुंदरता भी नहीं भाती । यदि आप उसे दिखाई न
पड़ें तो वह अपना शरीर त्याग देगी, किसी ओर ( घूमते फिरते ) आकर उसे
दिखाई क्यों नहीं पड़ जाते ?
अलंकार-पर्यायोक्ति ।
सूचना-यहाँ नायिका का मन केवल श्रीकृष्ण को देखना छोड़कर और
सबसे उदास हो गया है ।
श्रीकृष्णजू को समरस, यथा- ( सवैया )
(५०२) खारिक खात न दारयौंइ दाख न माखनहूँ सहुँ मेटी इठाई ।
केसव ऊख महूखहु दूखत आई हौं तों पहँ छाँडि जिठाई ।
तो रदनच्छद को रस रंचक चाखि गए करि केहूँ ढिठाई ।
ता दिन तें उन राखी उठाइ समेत सुधा बसुधा की मिठाई ।३६।
शब्दार्थ-खारिक = छुहारा । दारयौंइ = अनार ही । सहुँ = से ।' इठाई =
दृष्टता, स्नेह, चाह । महूख = ( मधुक ) शहद । दूखत = निंदा करते हैं ।
जिठाई = बड़प्पन । रदनच्छद = ( रदन = दाँत + छंद = ढकनेवाला ) होंठ ।
रंचक = थोड़ा । केहूँ = किसी प्रकार ।
भावार्थ- ( सखी की उक्ति नायिका से ) जब से वे तेरे होठों का किसी
प्रकार धृष्टता करके थोड़ा सा रस ले गए हैं तब से छुहारा, अनार, अंगूर
नहीं खाते । मक्खन की चाह भी छोड़ दी है । वे ऊख और शहद की भी
३८-कान-काम । देह-प्रान । ३६-महूखहु मयूषहि, पियूषहि ।

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२७२ रसिकप्रिया
-निंदा करते हैं। अतः अपने बड़प्पन का ध्यान छोड़कर (मैं तुझसे वय में
बड़ी हूँ फिर भी) तुझे समझाने आई हूँ, तू उनसे शीघ्र ही मिल। उन्होंने तो
उसी दिन से पृथ्वी के मीठे पदार्थों को छोड़ दिया है। सुधा को भी उन्होंने
मधुरों की श्रेणी से हटा दिया है।
सूचना-(१) यह छंद 'कविप्रिया' के छठे प्रभाव में मधुर वर्णन के
उदाहरण में रखा गया है।
(२) इस छंद में 'महूख' शब्द ध्यान देने योग्य है। कहीं कहीं
'महूख' के स्थान पर 'मयूख' रूप भी मिलता है। 'केशव' ने 'रसिकप्रिया' के
ही बारहवें प्रभाव के पाँचवें छंद में-'ऊख रस केतक महूख रस मीठो है
पियूखहू की पैली घा हैं जाकों न्यराइहै' लिखा है। बिहारी ने भी अपने एक
दोहे में इस शब्द का व्यवहार किया है। 'देव' ने भी इसका बहुत व्यवहार
किया है। देखने में तो यह शब्द संस्कृत 'मधूक' से बिगड़ा हुआ जान पड़ता
है। पर टीकाकारों ने इसका अर्थ 'शहद' किया है वहाँ 'महुआ' के साथ साथ
'महूख' पृथक् भी दिया है। इससे ऐसा स्पष्ट जान पड़ता है कि वे 'महूख' का
अर्थ 'महुआ' नहीं लेना चाहते-
मधुर प्रियाधर सोमकर माखन दाख समान।
बालक बातैं तोतरी कविकुल उक्ति प्रमान।
महुवा मिसरी दूध घृत, अति सिंगाररस मिष्ट।
ऊख महूख पियूष गनि केसव साँचो इष्ट।
ऐसी दशा में 'महूख' को 'मधुक' का बिगड़ा रूप ही मानना पड़ेगा और
'क स्वार्थे' (उसी अर्थ में) लगा माना जायगा।
अपरंच-(कवित्त)
(५०३) दनुज मनुज जीव जल थल जननि को,
पखोई रहत जहाँ काल सों समरु है।
अजर अनंत अज अमरी मरत परि,
केसव निकसि जानै सोई तौ अमरु है।
बाजत स्रवन सुनि समुझि सबद करि,
बेदन को बाद नाहिं सिव को डमरु है।
भागहु रे भाँगौ भैया भागनि ज्यों भाग्यो परै,
भव के भवन माँझ भय को भँवरु है।४०।
४०-जल०-जलज थलजनि। जननि०-केसोराइ। अजर०-अनंत अनंत,
अजर अमर, अनंत अजर। अमरी-अरोऊ। बाजत-जब तू। सबद०-सबै
भवत। परै-झाइ।

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१८ चतुर्दश प्रभाव २७३
शब्दार्थ—दनुज = दानव । जननि=लोगों को, जीवों को। समरु = युद्ध ।
अजर = जिसे वृद्धावस्था न हो, जरारहित, सनकादि । अनंत= जिसका अंत न
हो, विष्णु । अज = जिसका जन्म न हुआ हो, अजन्मा, ब्रह्मा। अमर = जो
मरे न, देवता । बाजत = बजता है। सुनि = सुनो। करि बेदनि = वेदों के
वाद में लगो, ज्ञानचर्चा करो । भागनि = भाग्य से । भव = संसार, मर्त्य ।
भवन = लोक ।
भावार्थ—( किसी ज्ञानी की उक्ति संसारलिप्त व्यक्ति से ) दानव, मनुष्य,
जल के जीवों तथा स्थल के जीवों को इस संसार में काल से युद्ध करना पड़ता
है । अजर, अनंत, अज, देवता सभी इस संसार के चक्कर में पड़कर मरते
हैं। इससे जो निकलना जान ले वही अमर है । अनाहत ( अनहद ) नाद हो
रहा है, कानों से ( ध्यान लगाकर ) सुन, उस शब्द को समझ और वेदों की
वार्ता ( ज्ञानचर्चा ) कर, नहीं तो शिव का डमरू बजने ही वाला है ( मृत्यु
आने ही वाली है ) । हे भाई, भागो, भाग्य से जिस प्रकार भागते बने ( इस
संसार से बचते बने ) भागो । इस मर्त्यलोक के बीच भय का ही चारो ओर
भँवर दिखाई देता है, सचेत रहो ।
सूचना—'केशव' ने अन्य रसों को श्रृंगार के भीतर ही दिखाया है ।
केवल शांत का ही यह शुद्ध उदाहरण दिया है ।
( दोहा )
(५०४) इहिं बिधि बरन्यो बरन बहु, नवरस रसिक बिचारि ।
बाँधौं बृत्ति कबित्त की, कहि केसव बिधि चारि ।४१।
शब्दार्थ—वृत्ति = कैशिकी आदि चार वृत्तियों का वर्णन अगले प्रभाव
में करेंगे ।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां नवरसवर्णनं
नाम चतुर्दशः प्रभावः ।१४।
पंचदश प्रभाव
अथ वृत्ति-वर्णन—( दोहा )
(५०५) प्रथम कैसिकी भारती, आरभटी भूनि भाँति ।
कहि केसव सुभ सात्वती, चतुर चतुर बिधि जाति ।१।
शब्दार्थ—चार वृत्तियाँ होती हैं—कैशिकी, भारती, आरभटी, सात्वती ।
४१—बरन बहु०-नवरसन केसव । बांधौं-बांधहुँ । कहि केसव-कहियतु है ।
१—कैसिकी-कौसिकी । आरभटी०-भनि अरभटी सुभाँति । २—भाव-
अर्थ ।

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२७४ . रसिकप्रिया
चतुर = प्रवीण । चतुर = चार । जाति = प्रकार, भेद ।
अथ कैशिकी-लक्षण— ( दोहा )
(५०६) कहियै केसौदास जहँ, करुन हास सिंगार ।
सरल बरन सुभ भाव जहँ, सो कैसिकी बिचार ।२।
यथा—( कबित्त )
(५०७) मिलिबे कौं एक मिली-मिली फिरैं दूतिकानि
मिलि मन ही मन बिलास बिलसति हैं ।
बोलिबे कौं एक बाल बोल सुनिबे कौं एक,
बोलि बोलि तीरथनि ब्रतनि बसति हैं।
देखिबे कौं एकै फिरैं देवता सी दौरि दौरि,
देवता मनाइ दिन दान मनसति हैं।
कीजै कहा करम कौं इहिं रूप मेरी माई,
ये तौ मेरे कान्हजू के नामहिं हँसति हैं ।३।
शब्दार्थ—एक = कोई, कुछ । करम = भाग्य । बसति हैं = अर्थात
( व्रत में ) बसती हैं, करती हैं। मनसति हैं = संकल्प करती हैं।
नाम = श्याम ।
भावार्थ—(धाय की उक्ति सखी से) मेरे कन्हैया से मिलने के लिए कुछ
स्त्रियाँ तो दूतियों से मिलती फिरती हैं (उनसे मिला देने की प्रार्थना करती हैं) ।
कुछ उनसे मिलकर मन ही मन आनंदित होती हैं। कुछ तो उनसे बोलने के
लिए चक्कर काटती रहती हैं और कुछ उनकी बातें सुनने के लिए । कुछ उनसे
बातें कर करके तीर्थ और व्रतों के करने में लग जाती हैं ( कि मुझे श्रीकृष्ण
प्रिय के रूप में मिलें ) । उन्हें (श्रीकृष्ण को) देखने के लिए जो स्वयम् देवियों
सी हैं, घूमती रहती हैं । वे उनका दर्शन करने के लिए देवताओं को मनाती
हैं और प्रतिदिन दान का संकल्प करती रहती हैं । भाग्य की बात क्या कही
जाय, इनके ऐसे रूपसौंदर्य के होते हुए भी, मैया री मैया, ये तो मेरे कन्हैया
के नाम ( श्याम ) की हँसी उड़ा रही हैं ।
सूचना—यहाँ ‘कीजै कहा करम को’ से करुण, ‘ये तौ मेरे कान्हजू के
नामहिं हँसति हैं' से हास्य तथा ‘मिलबे कौं एक’ आदि से शृंगार सूचित
किया गया है । अक्षर सरल ( कोमल, मधुर ) हैं, भाव भी शुभ है अतः
कैशिकी वृत्ति है ।
३—मिलि०–मिलि मिलि मही बिलास । मन ही०-मन मन ही । बाल -
फिरैं । एक-और, अरु । मनसति-में नसति । इहि-गुन । माई-भटू ।

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पंचदश प्रभाव २७५
अथ भारती-लक्षण—( दोहा )
(५०८) बरनिय जामें बीररस, अरु अद्भुत रस हास ।
कहि केसव सुभ अर्थ जहँ, सो भारती प्रकास ॥४॥
यथा—( कबित्त )
(५०६) काननि कनकपत्र चक्र चमकत चारु,
धुजा झुलमुली झलकति अति सुखदाइ ।
केसव छबीलो छत्र सीसफूल सारथी सो,
केसरि की आड़ अधिरथिक रची बनाइ ।
नीकोई नकीब सम नीको नकमोती नाक,
एक ही बिलोकनि गोपाल तौ गए बिकाइ ।
लोचन बिसाल भाल जरित जराऊ टीको,
मानो चढ्यो मीनन के रथ मनमथराइ ॥५॥
शब्दार्थ—कनकपत्र=कर्णफूल । चक्र = पहिया । झुलमुली = झुमका ।
सीसफूल = सिर का आभूषण । आड़ = तिलक । अधिरथिक = रथ पर आरूढ़,
रथ हाँकनेवाला । नकीब = बंदी, यश गानेवाला भाट । टीको = ललाट पर
का एक गहना । मनमथ = मन्मथ, कामदेव ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) कानों में सुंदर कर्णफूल चमक रहा
है, यही रथ का पहिया है। सुखदायिनी, और अत्यंत झलमलानेवाली झुलमुली
(झुमका) ही ध्वज है। शीशफूल ही छबिमान् छत्र है। केसर का तिलक, जो
भली भाँति लगाया गया है, रथारूढ़ सारथी के समान है। नाक में लगा हुआ
नकमोती ही अच्छे भाट के समान है। बड़े बड़े (मछली के से) नेत्रों के ऊपर
ललाट पर रत्नजटित टीका तो ऐसा सुशोभित है मानो मछलियों के रथ पर
मन्मथराज चढ़े चले जा रहे हैं। गोपाल तो एक ही चितवन में बिक गए,
वश में हो गए।
सूचना—युद्ध का साज-सामान होने से वीर, 'एक बिलोकनि' से हास्य
और 'मीननि के रथ चढ़यो' से अद्भुत रस व्यक्त होता है। अतः भारती वृत्ति है।
अथ आरभटी-लक्षण-( दोहा )
(५१०) केसव जामें रौद्ररस, भय बीभत्सहि जान ।
आरभटी आरंभ यह, पद पद जमक बखान ॥६॥
शब्दार्थ—जमक — ( यमक ) अक्षरमैत्री, अनुप्रास आदि ।
४-बरनिय-बरनै । अरु०-रसमय अद्भुत । ५-अधिरथिक-अधिराधिका,
अधिरातिका । नोकोई०-नीकेहीं नकीब सम नीको मोती नीकी नाक, नीके
ही में नीकी नाक नीको मोती उरजात । टीको-लाल । चढ्यो-बेगै । ६—
बीभत्सहि-बीभत्सक ।

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२७६ रसिकप्रिया
यथा-( सवैया )
(५११) घेरि घने घन घोरत सज्जल उज्ज्वल कज्जल की रुचि राचैं ।
फूले फिरैं इभ से नभ पाइक सावन की पहली तिथि पाँचैं ।
चौंहूँ कुघा तड़िता तड़पै डरपै बनिता कहि केसव साचैं ।
जानि मनो ब्रजराज बिना ब्रज ऊपर काल कुटु'बिनि नाचैं ।७।
शब्दार्थ—घोरत = गरजते हैं । सज्जल = सजल । रुचि = शोभा । राचैं =
बनाते हैं । इभ = हाथी । पाइक = धावन । पाँचैं = पंचमी । कुघा = ओर ।
तड़िता = बिजली । ब्रजराज = श्रीकृष्ण । काल-कुटु'बिनि = प्रेतिनी,पिशाचिनी।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) घने और सजल बादल घिरकर
गरज रहे हैं। उज्ज्वलता और श्यामता की शोभा फैला रहे हैं। आकाश में
हाथी के ऐसे ये धावन फूले फिर रहे हैं । सावन की पहली पंचमी ( पहले
पाख की तिथि है ) को चारों ओर बिजली कड़क रही है, सचमुच स्त्रियाँ डर
जाती हैं मानो ब्रज को श्रीकृष्ण से रहित जानकर उसके ऊपर प्रेतिनियों का
नाच हो रहा है।
सूचना—'तड़िता तड़पै' से रौद्र, 'बनिता डरपै' से भयानक और 'काल-
कुटु'बिनि नाचैं' से वीभत्स रस व्यक्त हुआ है। अतः आरभटी वृत्ति है।
अथ सात्वती-लक्षण-( दोहा )
(५१२) अद्भुत बीर सिंगाररस, समरस बरनि समान ।
सुनतहि समुझत भाव जिहिं सो सात्वती सुजान ।८।
शब्दार्थ—समरस = शांत रस ।
यथा-( कवित्त )
(५१३) केतीदाम लाख लाख भाँतिनि के अभिलाष,
आरि दै री बावरी न बारि हिये होरी सी ।
राधा हरि केरा प्रीति सब तें अधिक जानि,
रति रतिनाथहू में देखौं रति थोरी सी ।
तिन माह भेद न भवानिहूँ पै पारचो जाइ,
मानत में भारती को भारति है भोरी सी ।
एकै गति एकै मति एकै प्रान एकै मन,
देखिबे कौं देह द्वै हैं नैननि की जोरी सी ।६।
७—उज्ज्वल०--कज्जल की चरचा उर । चौंहूँ कुघा—चौहूँ दिसा, चहुँ
कोदनि में, चौहूं कुदाँ । तड़पै—तलकै । कहि—लखि । ८--बीर०-रुद्र रु बीर
रस । जिहिं—मनि । सात्वती--सात्त्वकी । सुजान-प्रमान । ६—आरि—बारु ।
राधा०-राधिका हरी की । में देखौं—कै जानौ । महि—हूँ में । मानत—भारत,
आरती । आरती की-भारत की । भारती है--भारतीऊ, भारती है कहिबे कों ।

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षोडश प्रभाव २७७
शब्दार्थ—बारि दै = त्याग दे, छोड़ दे । न बारि = मत जला । केरी =
की । रति = काम की पत्नी । रतिनाथ = कामदेव । रति = प्रीति । भेद पारना
फूट डालना । भवानि = पार्वती । भानत में—( प्रेम ) तोड़ने में । भारती =
सरस्वती । भारती = वाणी, वाक् शक्ति ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति अन्य नायिका से) ऐ पगली, लाखो प्रकार के
अभिलाष करना त्याग दे, हृदय में होली मत जला । (तू जो यह चाहती है कि
उनमें भेद डाल दिया जाय सो असंभव है ) । राधिका और श्रीकृष्ण की प्रीति
(प्रेम के लिए प्रसिद्ध युगल जोड़ियों में से सबसे अधिक है ) रति और काम-
देव में ( उनकी प्रीति के सामने ) थोड़ी प्रीति दिखाई देती है । उनमें स्वयम्
पार्वती भी भेद नहीं डाल सकतीं । यदि स्वयम् सरस्वती भी अपनी वाणी से
उनकी प्रीति तोड़ना चाहें तो उनकी वाणी भी कुंठित हो जायगी । उन दोनो
की एक ही चाल, एक ही बुद्धि, एक ही मन और एक ही प्राण हैं । देखने के
लिए केवल उनके शरीर दो हैं । वे तो ( एक ही से ) दो नेत्रों की जोड़ी से
जान पड़ते हैं ।
सूचना—'एकै गति' से अद्भुत, 'तिन मंहि०' से वीर, 'राधा हरि केरी
प्रीति ०' से शृंगार और 'लाख लाख भाँति०' से शांत रस है । प्रसादगुणपूर्ण
होने से सात्वती वृत्ति है ।
( दोहा )
( ५ १४) इहिं बिधि केसवदास कबि, नवरस बरनि कबित्त ।
पाँच भाँति अनरस सुनौ, ताहि न दीजै चित्त ।१०।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां चतुर्विध-
कवित्ववृत्तित्ववर्णनं नाम पंचदशः प्रभावः ।१५।
षोडश प्रभाव
अथ अनरस-वर्णन—( दोहा )
((५१५) प्रत्यनीक नीरस बिरस केसव दुस्संधान ।
पात्रादुष्ट कबित्त बहु, करहिं न सुकबि बखान ।१।
अथ प्रत्यनीक-लक्षण—( दोहा )
((५१६) जहँ सिंगार बीभत्स भय, बीरहि बरनै कोइ ।
रौद्र सु करुना मिलतहीं, प्रत्यनीक रस होइ ।२।
१—दुरसंधान - दुस्संधान । बहु--कौं । करहि न०-करतहि कुकबि । २—
बीरहि-बिरसहि, बिर हो ।

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२७८ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—प्रत्यनीक = शत्रु । रस की शत्रुता इन रसों में होती है—
श्रृंगार और बीभत्स में, भय और वीर में, रौद्र और करुण में—
उदाहरण—( सवैया )
(५१७) हँसि बोलतहीं सु हँसै अब केशव लाज भगावत लोक भगै ।
कछु बात चलावत घैरु चलै मन आनतहीं मनमत्थ जगै ।
सखि तूँ जु कही सु हुती मन मेरेहु जानि यहै न हियो उमगै ।
हरि त्यौ टुक डीठि पसारतहीं अँगुरीन पसारन लोग लगै ।३।
शब्दार्थ—लोक = संसार भर के लोग । घैरु = बदनामी, निंदा । मन-
मत्थ = मन्मथ, काम । त्यों = ओर । डीठि पसारना = देखना । अँगुरी
पसारना = अंगुली दिखाना, बुरा समझना ।
भावार्थ—( नायिका की उक्ति सखी से ) हे सखी, तूने जो बात कही,
वह मेरे मन में भी थी, पर यह समझकर मन में (प्रेम करने के लिए) उमंग
नहीं आती कि यदि मैं उनसे हँसकर बोली तो तुरंत सब लोग हँसी उड़ाने
लगते हैं । यदि लज्जा छोड़कर उनसे बोलती ही रहती हूँ तो लोग मुझसे
भागते हैं ( घृणा करते हैं) । (प्रिय की ) कोई बात चलाते ही निंदा होने
लगती है और यदि उन्हें मन में रखती हूँ तो काम जगता है (कामोद्दीपन होता
है) । श्रीकृष्ण की ओर थोड़ा सा भी दृष्टि फैलाती हूँ (उन्हें देखती हूँ ) तो
तुरंत लोग उँगली दिखाने लगते हैं ( बुरा समझ घृणा करने लगते हैं) ।
सूचना—( १ ) यहाँ 'हँसि बोलतहीं' आदि श्रृंगाररस की बातें हैं, पर
साथ ही 'लोक भगै', 'मनमत्थ जगै', 'अँगुरीन पसारन लोग लगै' आदि
बीभत्स-रस व्यंजक हैं । अतः श्रृंगार के साथ घृणा का वर्णन होने से रस-
शत्रुता हो गई । यही प्रत्यनीक दोष हुआ ।
( २ ) यह छंद 'कविप्रिया' में १३।४० पर है ।
अथ नीरस-लक्षण-( दोहा )
(५१८) जहाँ दंपती मुँह मिलै, सदा रहैं यह रीति ।
कपट करै लपटाय तन, नीरस रस की प्रीति ।४।
भावार्थ—जहाँ दंपती केवल मुँह से प्रेम करें, मन से नहीं । अथवा
शरीर से आलिंगनादि करने पर भी मन में कपट हो वहाँ नीरस दोष होगा ।
उदाहरण-( सवैया )
(५१६) गाहत सिंधु सयाननि के जिनकी मति की अति देह दहेली ।
मोहिं हँसी दुख दोऊ दई तिनहूँ सों जनावति प्रेम-पहेली ।


३—हँसि-हरि । कही--कहै । जानि०--जानि यहै नहिं व्यो, जानियं नेह
हिये । टुक-नेकु, निकु ।४—करै-रहै । तन-मन ।

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षोडश प्रभाव २७६
आजु लौं काननहूँ न सुनो सु तौ देखि चली हम सौति सहेली ।
जानी है जानी मिली मुँहहीं हिय नाहियै भावति गर्बगहेली ।५।
शब्दार्थ— गाहत = थहाते थहाते । सयान = चतुराई । दहेली = ( सं०
दिग्ध ) ठिठुरी हुई । गर्बगहेली = गर्वीली ।
भावार्थ— (सखी की उक्ति नायिका से ) ( तू तो मुझे ही चराना
चाहती है ) अरी, जिनकी बुद्धि का शरीर चतुराई के समुद्र में डुबकी मारते-
मारते ठिठुर गया है, उन्हीं से तू प्रेम की पहेली बुझाने चली है । तेरी इस
बात पर मुझे हँसी भी आती है और दुःख भी होता है । आज तक जो बात
कान से नहीं सुनी वही देखने में आई कि सौत भी सखी होती है । मैंने तुझे
भली भाँति जान लिया तू केवल मुँह से ही ( नायक से ) मिली है ( बातों
से ही प्रेम प्रकट करती है ) । ऐ गर्वीली, तुझे हृदय में वह नहीं भाता ।
सूचना— ( १ ) यहाँ मुँह से प्रेम प्रकट करना और हृदय से कपट
दिखाना ही नीरस दोष है । ( २ ) सरदार ने 'कपट करै लपटाय तन' को भी
इसी में दिखाने के लिए 'मिली' का अर्थ 'भेंटना' माना है और 'दंपती' की
पूर्ति के लिए नायक की भी उपस्थिति मानकर दोनो का वहाँ उपस्थित होना
कहा है ।
अथ विरस-लक्षण-( दोहा )
(५२०) जहाँ सोक मंहि भोग को, बरनत है कबि कोइ ।
केसवदास हुलास साँ, तहीं विरस रस होइ ।६।
भावार्थ— ज्यों ही कोई कवि शोक में भोग-विलास का वर्णन उल्लास
के साथ करने लगता है, त्यों ही विरस दोष हो जाता है ।
उदाहरण-( कवित्त )
(५२१) केसौदास न्हान दान खान पान भूल्यो ध्यान,
गयो ज्ञान भयो प्रान पीठि की सी पीठि है ।
छाँड़िहु रसिक लाल यह जक वह बाल,
देखतहीं सब सुख तुमहीं उबीठिहै ।
ऐसी सों बसीठी सीठी चीठी अति डोठी सुने,
मीठी मीठी बातनि जू नीकेहू में नीठि है ।
ईठनि सों टूटी ईठी ताके सोक की अँगीठी,
उठी जाके उर में सु कैसे हँसि डीठिहै ।७।
५—के जिनकी मति—काज न कीरति । जनावति—जगावति । हूँ—ही ।
६--जहाँ-जहां । बरनत०-बरनि कहै । तहाँ तहँहि, तहहीं । विरस-बीरस ।
७--ध्यान-गान । बात-बान । सों बसीठी=सोच सीठी । हँसि-हरि । जु-में ।

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२८० रसिकप्रिया।
शब्दार्थ—पीठि = (पृष्ठ) पीठ। पीठि = (पृष्ठ) पीड़ा, आसन। भयो
प्रान ० = प्राण पीठ का आसन सा हो गया है, पीठ पीछे पड़ा है, निकल सा
गया है। रसिक लाल = हे कृष्ण। जक = धुन, रट। बाल = नायिका।
उबीठिहै = मन से उतर जायगा। बसीठी = दूतत्व। सीठी = फीकी, निरर्थक।
डीठी = जान पड़ती है। नीकेहू = भली-चंगी रहने पर भी। नीठि = कठिनाई
से। ईठ = इष्ट, मित्र। टूटी - फटी फटी, बेमन की उदास। ईठी = प्रेम।
डीठिहै = देखेगी।
भावार्थ—(दूती का वचन नायक से) हे रसिक लाल, (आप जो मुझ
से बार बार उसके पास जाने को कहते हैं, थोड़ा उसकी दशा पर तो ध्यान
दीजिए) उसने स्नान, दान, खान, पान सब भुला रखा है। न तो ध्यान करती
है और न उसे ज्ञान ही रह गया है। प्राण तो उसके निकल से गए हैं, पीठ के
पीछे पड़े हैं। आप अपनी रट छोड़ दीजिए। वह नायिका तो मुझे देखते ही
सब सुखों की तो बात ही क्या स्वयम् तुमको भी मन से उतार देगी। ऐसी के
लिए दूतत्व करने जाना ठीक नहीं जान पड़ता। रही चिट्ठी, यह तो मुझे
अत्यंत निरर्थक जान पड़ती है। जो भली-चंगी रहने पर मीठी मीठी बातों
को बड़ी कठिनाई से सुनती थी (वह इस दशा में चिट्ठी-पत्री क्या देखेगी या
सुनेगी)। सखी-सहेलियों से तो वह फटी फटी सी रहती है। उसको तो हृदय
में उठी हुई (प्रज्वलित) शोक की अँगीठी कुछ करने ही नहीं देती, वह भला
हँसकर बोलेगी भी तो कैसे ?
सूचना—यहाँ नायिका के शोक में श्रीकृष्ण के भोगविलास का वर्णन
घुस पड़ा है, अतः विरस है।
अथ दुःसंधान-लक्षण—(दोहा)
(५२२) एक होइ अनुकूल जहँ, दूजो है प्रतिकूल।
केसव दुस्संधान रस, सोभित तहाँ समूल। ८।
उदाहरण—(सवैया)
(५२३) 'दै दधि' 'दीनो उधार हो केसव' 'दान कहा जब मोल लै खैहैं।'
'दीने बिना' 'तौ गई जु गई' 'न गई न गई घर ही फिरि जैहैं।'
'गो हित बैर कियो' 'कब हो हित बैर कियें बरु नीकी ह्वै रैहैं।'
'बैर के गोरस बेंचहुगी' 'अहो बेच्यो न बेच्यो तौ ढारि न दैहैं ।६।'
शब्दार्थ—दान = कर। गो = गया, मिट गया। हित = प्रेम। गोरस =
दूध, दही।
भावार्थ—(नायक और नायिका का संवाद है)
८—जहँ ०-जिय जहँ दूजो प्रतिकूल। सोभित--सोहतु। ६—दीनो--दीनी।
हो--है। तौ--जु। जु--हो। न गई ०-तौ गई न गई। नीकी--नीके।

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षोडश प्रभाव २८१
नायक — दही दे ।
नायिका — उधार तो दे चुकी ।
नायक — जब मोल लेकर खाएँगे तो दान ( कर ) कैसा ?
नायिका — तो क्या बिना दिए ही आप बरबस ले लेंगे ?
नायक — ( न दोगी ) तो फिर आगे जा चुकी ( जाने न पाओगी ) ।
नायिका — न जाएँगी न सही, घर ही लौट जाएँगी ।
नायक — तो समझ लो हमारा तुम्हारा मेल आज से टूट गया, ( समझ
रखो कि अब तुमने हमसे ) बैर कर लिया है ।
नायिका-आपसे मेल-जोल था कब, बैर करने से तो बल्कि अच्छी
ही रहेंगी ।
नायक — बैर करके क्या गोरस बेच लोगी ?
नायिका — भला, बेचा या न बेचा, उड़ेल तो देंगी नहीं ।
सूचना — ( १ ) यहाँ एक ( नायक ) तो अनुकूल बातें करता है और
दूसरा (नायिका) प्रतिकूल, अतः दुःसंधान रस है । ( २ ) कविप्रिया ( प्रभाव
३,३६ ) में यही छंद हीनरस के उदाहरण में रखा गया है । (३) दीने बिना
तौ गई जु गई — सबका सब नायक का वचन मान लेने में संवाद का क्रम
बिगड़ता है, क्योंकि ‘दान कहा जब मोल लै खैहैं' भी नायक की ही उक्ति है ।
अलंकार — उत्तर ।
अथ पात्रादुष्टरस-लक्षण — ( दोहा )
(५२४) जैसो जहाँ न बूझियै, तैसो करियै पुष्ट ।
बिन विचार जो बरनियै, सो रस पात्रादुष्ट ।१०।
भावार्थ — जहां पर जिस प्रकार पुष्ट न करना चाहिए उस प्रकार से
किसी बात की पुष्टि की जाय, इस प्रकार जहाँ विचारपूर्वक वर्णन नहीं
किया जाता वहाँ पात्रादुष्ट रस होता है ।
उदाहरण — ( कबित्त )
(५२५) कपट-कृपानी मानी प्रेम-रस लपटानी,
प्राननि को गंगाजू के पानी सम जानियै ।
स्वारथ-निधानी परमारथ की राजधानी,
काम की कहानी केसोदास जंग मानियै ।
सुबरन अरुझानी सुधा सों सुधारि आनी,
सकल-सयान-सानी ज्ञानी सुखदानियै ।
गौरा औ गिरा लजानी मोहे मुनि मूढ़ प्रानी,
ऐसी बानी मेरी रानी बिष कै बखानियै ।६१।
१० — जहां न--जाको । करियै--कीजै । पात्रादुष्ट--पातरदुष्ट ।

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२८२ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—कृपानी = तलवार । निधानी = कोश । सयान = चतुरता ?
सानी = युक्त । गौरा = पार्वती । गिरा = सरस्वती ।
भावार्थ—( नायक की उक्ति मानवती नायिका से ) हे मेरी रानी,
तुम्हारी वह वाणी जो कपट के लिए मानी हुई कृपाण है, जो प्रेम के रस से
लिपटी हुई है, जो प्राणों के लिए गंगाजी के पानी के समान शीतलता देने-
वाली है, जो स्वार्थ का कोश है, जो परमार्थ ( मोक्ष ) की राजधानी है, जो
काम की कथा के समान संसार में ( मधुर या अत्यंत प्रिय ) है, जो सुवर्ण
से उलझी हुई है,अमृत से सुधारकर लाई गई है, जो सब प्रकार से चातुर्य से
युक्त है, जो ज्ञानियों को सुख देनेवाली है, जिससे पार्वती और सरस्वती भी
लज्जित हैं, जिसे सुनकर मुनि और मूढ़ जीव भी मुग्ध हो जाते हैं ऐसी वाणी
को तुम विष कहती हो, शिव शिव ! (नायिका ने गान में कहा है कि मेरी बातें
आपको विष सी लगती हैं, इसी पर नायक ने इतना बड़ा तूमार बाँधा है) ।
( दोहा )
(५२६) केसव करुना हास्य कहूँ, अरु बीभत्स सिंगार ।
बरनत बीर भयानकहि, संतत बैर बिचार ॥१२॥
भावार्थ—इन रसों में नित्य विरोध है—करुण और हास्य में, बीभत्स
और श्रृंगार में, वीर और भयानक में ।
(५२७) भय उपजै बीभत्स तें, अरु सिंगार तें हास ।
केसव अद्भुत बीर तें, करुना कोप प्रकास ॥१३॥
भावार्थ—रसोत्पत्ति का क्रम यों है—बीभत्स से भय की, श्रृंगार से
हास्य की, वीर से अद्भुत की, क्रोध से करुण की उत्पत्ति होती है।
(५२८) इहिं बिधि ॰केसवदास रस, अनरस कहे बिचारि ।
बरनत भूल परी जहाँ, कबिकुल लेहु सुधारि ॥१४॥
शब्दार्थ—भूल = चूक, भ्रम ।
(५२६) जैसे रसिक प्रिया बिना, देखियत दिन दिन दीन ।
त्यों ही भाषाकबि सबै, रसिकप्रिया बिन हीन ॥१५॥
(५३०) बाढ़ै रति मति अति परै, जानै सब रस रीत ।
स्वारथ परमारथ लहै, रसिकप्रिया की प्रीति ॥१६॥
शब्दार्थ—अति परै = बढ़ती है, तीव्र होती है।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां
रसअनरसवर्णनं नाम षोडशः प्रभावः ॥१६॥
११—मानी-जानी। जानियै-श्रानियै। मानियै-जानियै। सुबरन-
सतरनु। ज्ञानी-गानी। प्रानी-ग्यानां। बिष कै-मुख तें, ऊझ कै। १२-कहूँ-
कहि। बरनत-बरने। १४ -मूल०-मुलि परो। १५-बिन-करि।

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प्रतीकानुक्रमणी
[ संख्याएँ प्रभावों एवम् छंदों की हैं। 'सू' का तात्पर्य 'सूचना"
में दिए हुए पद्यों से है। ]
अँखियानि मिली ।८।५० आजु मिले ।६।४
अंग-बरन बिबरन ।८।४५ आजु मैं देखी ।३।३८
अंतरिच्छ-गच्छनीनि ।४।११ आजु सखी हरि ।१४।११
अघ ज्यों उदारिहौ ।१४।२६ आतुर ह्वै उठि ।४।१३
अति आदर ।८।५६ आदर मांझ अनादरै ।३।५६
अति बिचित्र बिभ्रम ।३।५३ आदराति तें ।८।५६
अति बिचित्रसुरता ।३।३६ आन नारि के ।६।३ सू.
अति रति-गति ।१।१२ आनन लोचन ।६।१
अति सलज्ज पग ।७।२६ आपने सों ।६।८
अति हित तें ।१०।१४ आपनेहीं भाइ ।१।१६
अदभुत वीर ।१५।८ आपुनहीं तन ।८।१६
अधिक अनूढ़ा ।५।२२ आपुन हूजै ।१२।२४
अधिक बरन ।७।४३ आलंबन उद्दीप ।६।८
अपने अपने-धर्म ।१।६ आलिंगन चुंबन ।३।४१
अपस्मार मति ।६।१४ आलिनि माँझ ।८।३७
अबहीं पुनि ।१२।१७ आवत जानिकै ।६।४३
अबही तौ ।१२।७ आवत देखि लिये ।३।६०
अभिमानी त्यागी ।२।१ आवन कहि आवै।७।१६
अभिलाष सुचित्ता ।८।६ आश्रम चारि ।१।४
अवलोकन आलाप ।६।७ इक तौ उर ।४।७
अवलोकनि अंकुस ।६।१६ इन ठौरनि ।५।२५
अविलोकनि आलाप ।८।८ इहि विधि केसवदास कबि ।१५।१०
आंखिनि जो सूझत ।७।१७ इंहि विधि केसवदास रस ।१६।१४
आंधी सी धाइ ।१३।२० इहि बिधि बरन्यो ।१४।४१
आई है एक ।१४।१६ इहि बिधि मान ।१०।२८
आएँ तें आवैगी ।११।१४ इहि बिधि राधा ।५।३८
आगे कहा करिहौ ।६।१३ इहि बिधि नायक ।७।४१
आज विराजत ।३।५८ इहि बिधि स्याम ।१३।२१
आजु कछू अँखियां ।७।१८ उत्तम मध्यम ।७।३४
आजु देवारि ।१३।१० उपजि परै भय ।१०।१३

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Line 33: •काननि के
Line 34: कान्ह के

Wait! Why are there hyphens/dashes or dots before some entries?
Wait, look at line 1: -उरझत? It's a hyphen -!
Wait, in dictionaries/indices, a hyphen - or dash means a sub-entry or repetition!
Wait, no:
Why would उरझत have a hyphen?
Wait, is it a hyphen or a pencil mark / printer's artifact / bullet?
Look at line 1: -उरझत
Line 2: -ऊजरु
Line 3: -ऊढ़ा
Line 7: -एक
Line 9: -एक
Line 10: -एक
Line 12: -ऐसी
Line 15: -ऐसेंही
Line 17: -और
Line 21: -कटि
Line 23: -कबहूँ
Line 24: -करत
Line 25: -कहि
Line 26: -कहि
Line 27: -कहियै
Line 28: -कह्यो
Line 30: -काछै
Line 31: -काटौं
Line 32: -काननि
Line 33: -काननि

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प्रतीकानुक्रमणी २८५
केसव नैननि ।८।१४-सू खेलत बोलत ।६।३६
केसव प्रोषितप्रेयसी ।७।३ खेलत हे हरि ।६।४६
केसव फूलि नचीं ।३।२१ खेल न हाँसी ।८।३६
केसवराइ की सौहैं ।३।७३ खोट तुरो ।१२।१८
केसवराय बुलावत हैं ।१३।१६ गति गजराज ।१४।२५
केसव रूठि रह्यो ।१२।६ गर्व, ब्यसन ।१०।३२
केसव सुधि बुधि ।८।४१ गर्व हर्ष आबेग ।६।१३
केसव सूधे विलोचन ।२।५ गाहत सिंधु ।१६।५
केसौदास कौन बड़ी ।१३।१८ गिरि गिरि उठि ।१४।१४
केसौदास घर घर ।५।१८ गूढ़ अगूढ़ ।८।४३
केसौदास दिनराति ।१०।२२ गूढ़ भाव को ।६।५४
केसौदास नेहदसा ।४।६ गेह की नेह ।१२।२८
केसौदास न्हान ।१६।७ गोप बड़े बड़े ।७।३२
केसौदास बाल ।१४।३४ घननि की घोर ।१०।२७
केसौदास लाख ।१५।६ घेरि घने घन ।१५।७
केसौदास सकल ।८।१८ घेरी जिनि मोहिं ।१२।१४
केसौदास सबिलास ।३।४० घोरि घनो घनसार ।८।२८
केहरी कपोत ।१४।२२ चंचल न हूजै ।३।२३
कैसैं कै मलयै ।८।१५ चंद को सो ।३।३४
कोकनि की कारिका ।१०।२५ चंद चढ़ाइ ।७।३०
कोकिल केकी ।११।१० चंद नहीं बिषकंद ।८.३१
कोपसील कोबिद ।३।८ चंदन बिटप ।७।११
कोमल अमल दल ।१०।८ चंपे की सी ।१४।२०
कोमल कमल ।१२।१३ चकित चित्त ।७।२६ सू
कोमल बिमल मन ।६।२५ चपला न चमकति ।१०।२१
कौन कें न ।११।६ चपला पट मोर ।६।२६
कौनहुँ हेत ।७।७ चहूँ ओर चितवै ।७।२६ सू
कौनहूँ तोष ।१२।२४ चित चोप ।२।६
कौने रसै बिहँसै ।६।४० चितवौ चितबाएँ ।३।६१
कौ लौं पीहौ ।४।१६ चोरि चोरि चित ।५।६
खंजन हैं मतरंजन ।८।२२ चोली को सो ।७।६
खरे उपचार ।८।४६ छवि सों छबीली ।६।२८
खान पान ।११।१२ सू छार-गंध-जुत ।३।६
खारिक खात न ।१४।३६ छुटै न छूटाएँ ।१२।२५

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२८६ रसिकप्रिया
छुवौ जनि हाथ ।५।१४ सू
छूटि जात केसव ।११।१
छोरि छोरि बाँधौ ।५।११
जगनायक की नायिका ।३।७४
जनी सहेली धाइ ।५।२४
जनी सहेली सोभहीं ।७।२६ सू
जब चितवै ।५।५
जहँ गुनगन ।८।२०
जहँ परिजन ।१४।१५
जहँ सिंगार ।१६।२
जहँ सुनियै ।१४।८
जहाँ दंपती ।१६।४
जहां न मानै ।६।१८
जहां लोभ तैं ।१०।७
जहाँ हँसहि ।१४।१२
जहीं रहीं दुरै ।१२।१०
जहीं सोक मंहि ।१६।६
जाको प्रीतम ।७।१६
जाति भई संग ।५।२१
जातु नहीं कद

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प्रतीकानुक्रमणी [L01_page_number] २८७


बायाँ स्तम्भ (Left Column)

दरस रमन ।४।१६
दसन-बसन मांझ ।१४।७
दिनप्रति जहँ ।१।५
दीनो मैं पाइ ।१३।१३
दीन्ही ताहि ।१।२
दीरघ दरीनि बसै ।११।१८
दुखदायक ह्वै ।८।३०
दुरिहै क्यों ।६२।१३
दुर्लभ देवनिहूँ ।१।१६
दूती सों संकेत ।७।२२
दूरि तें देखिवे ।५।१४
देखत उदधिजात ।७।२४
देखत काहू ।६।६
देखतहीं दुति ।८।३
देखतही चि० ।५।२६
देखतही जिहि ।६।५३
देखन को प्रिय ।४।३ सू
देखी है गुपाल ।३।५२
देखै नहीं ।१४।३८
देस काल बुधि ।१०।२६
देहि री काल्हि ।५।३५
दै दधि दीनो ।१६।६
धनु भू धरि ।३।२१ सू
धाइ, जनी ।१२।१
धाई नहीं घर ।५।१५
धीरा बोले ।३।४६
नंदनंदन खेलत ।६।३२
नख-पद-पदवी ।४।१४
नदी बेतवै ।१।३
नयन बयन कछु ।१४।१
नवल-अनंगा ।३।२१
नवलबधू नवजोबना ।३।१७
नवहू रस के ।१।६
नाह लगे मुख ।१३।२


दायाँ स्तम्भ (Right Column)

नाहीं सिखावति ।१३।६
निंदामय बीभत्स ।१४।३०
निपट कपट हर ।४।१८
निर्बेद ग्लाने ।६।१२
नींद भूख दुति ।४।३
नीरहि तौ बिन ।१०।१६
नील निचोल ।७।३८
नृत्य गीत कबिता ।३।५
नेह-भरे लै ।२।१५
नैननि की चतुराई ।७।२८
नैननि के तारनि ।५।२७
नैननि नवावौ ।१२।१६
नैन बैन मन ।८।१०
न्योति कै बुलाई ।५।३४
पंथ न थकत ५।२०
पति को अति ।३।६३
परकीया द्वै भांति ।३।६८
पल ही पल ।८।५१
पहिले तजि आरस ४।५
पहिले सो हिय ।२।७
पहिले हठि ।६।५२
पाइ परै पलिका ।१२।११
पाइ परै मनुहारि ।३।२७
पाइ परेहू तें ।७।१५
पाइ परौं बलि ।८।११
पाग बनी अरु ।१३।१४
पान न खाए ।६।४७
पायन को परिबो ।६।२२
पिय सों प्रगटन ।५।४
पियहि मनावै ।१०।१८
पूरन-प्रेम,प्रताप तें उपजि ।६।१
पूरन-प्रेम-प्रताप तें भूलत ।६।१८
पूरन-प्रेम-प्रभाव ।६।२७
प्यास द्वै रही ।५।३

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? No, it's प्रीत बिना । १०।३१. Wait, look at the top of त: there's an anusvara or dot? प्रीत बिनाorप्रीति बिना? Wait, look closely: there's a matra? No, the top bar connects, but there is no left-curving loop for 'ि'. It's प्रीत बिना! Wait, there is a dot above: प्रीत बिनाorप्रींत बिना? A tiny speck. Let's transcribe प्रीत बिना । १०।३१`.

  • Line 22: बड़ी जिय लाज । १२।८ - yes, जिय!
  • Line 24: बन में बृषभानुकुमारि । १२।० or १२।८?
    Wait, look at line 24: १२।०. Wait, could that be ८? No, look at ८ in line 22 (१२।८) and line 21 (८।४). An ८ in this font looks like an English 8 or a Devanagari ८ (which is like an open loop or inverted cursive). Wait, the ८ in line 21 (८।४) is Devanagari ८ (a loop with an open top-right or curve).
    In line 24, it's a closed circle/oval: ०! So
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यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का लिप्यंतरण दिया गया है:

१६प्रतीकानुक्रमणी२८६

स्तम्भ १

भाव सु पंच ।६।२
भुवमंडल ।१४।२८
भूल होइ ।४।१४ सु
भूलि जाइ सुधि ।८।४८
भूषन भुषिबे को ।६।४५
भूषन-भेद बनाइ ।१३।८
भेद की बात ।१४।५
भोजन कै बृषभानु ।६।५०
भौंरिनी ज्यौं ।११।१७
मंदहास कलहास ।१४।२
मत्तगय'दनि साथ ।१०।६
मध्या आरूढ़जोबना ।३।३३
मध्या आरूढ़जोबना प्र० ।३।३२
मन मन मिलैं ।१२।१६
मनमोहिनी मोहि ।६।२६
मनसा बाच ।२।१६
मरन सु केसवदास ।८।५४
माखन के चोर ।१४।३६
माता ही को ।१४।३१
मान करै ।७।३५
मान करै लघु ।७।३७
मान तजहिं ।१०।१
मान बिबिध ।१०।३३
मान मनावतहूँ ।७।१३
मान-मुचावन बात ।१०।२०
मानहिं मान ।१।२०
मिलिबे कौं एक ।१५।३
मींडि मारघो ।१४।२३
मुँह मीठी ।२।११
मुकतामनीन की ।३।२३ सु
मुख रूखी बातैं ।३।६५
मुग्धा, मध्या ।३।१६
मुग्धा मान करै ।३।३०
मुग्धा लज्जाप्रायरति ।३।२४
मुग्धा सुख्व करै ।३।२८
मुग्धा सोइ रहै ।३।२६


स्तम्भ २

मेघनि ज्यों ।८।३३
मेरे कहे दहिये ।६।३४
मेरे तो नाहिन ।२।६
मेरे मिलाएहीं ८।२७
मेरौ मुख चूमें ।५।१०
मैं पठई मति ।११।३
मैन ऐसो मन ।११।१५
मोट्टाइत सुनि ।६।१७
मोहन मरीचिका ।८।३६
मोहन-साथ कहा ।१२।३
मोहिबो मोहन ।३।१६
यह संजोग सिंगार ७।४४
याही को मेरौ ।१२।२७
ये गुन केसव ।२।२
य सब जितनी नाइका ।७।१
ये सब जितनी नायिका ।५।४०
यों परछन्न प्रकास ।१।२८
यों हीं पीय ।५।८
रच्यो बिरंचि ।१।७
रति उपजै ।८।५५
रति-मति की ।१।१७
रति हाँसी अरु ।६।६
राधा राधारमन के करच्यो ।१३।२२
राधा राधारमन के कह ।६।५७
राधा राधा-रवन ।६।२१
राधिका की जननी ।८।१६
रामजनी, सन्यासिनी ।१२।२
रितु ग्रीषम ।५।३७
रीझि रिझाइ ।१३।७
रुचि पंकज ।२।१२
रूठिबे को तूठिबे ।४।१०
रूठै बारहिं बार ।७।३६
रूप प्रेम के ।६।४२
रोष में रस ।१४।२६
लंघतु है ।४।१७
लाज न गारिहु ।२।१४
लाड़िली लीनी ।७।२६