रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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आजु लौं काननहूँ न सुनो सु तौ देखि चली हम सौति सहेली ।
जानी है जानी मिली मुँहहीं हिय नाहियै भावति गर्बगहेली ।५।
शब्दार्थ— गाहत = थहाते थहाते । सयान = चतुराई । दहेली = ( सं०
दिग्ध ) ठिठुरी हुई । गर्बगहेली = गर्वीली ।
भावार्थ— (सखी की उक्ति नायिका से ) ( तू तो मुझे ही चराना
चाहती है ) अरी, जिनकी बुद्धि का शरीर चतुराई के समुद्र में डुबकी मारते-
मारते ठिठुर गया है, उन्हीं से तू प्रेम की पहेली बुझाने चली है । तेरी इस
बात पर मुझे हँसी भी आती है और दुःख भी होता है । आज तक जो बात
कान से नहीं सुनी वही देखने में आई कि सौत भी सखी होती है । मैंने तुझे
भली भाँति जान लिया तू केवल मुँह से ही ( नायक से ) मिली है ( बातों
से ही प्रेम प्रकट करती है ) । ऐ गर्वीली, तुझे हृदय में वह नहीं भाता ।
सूचना— ( १ ) यहाँ मुँह से प्रेम प्रकट करना और हृदय से कपट
दिखाना ही नीरस दोष है । ( २ ) सरदार ने 'कपट करै लपटाय तन' को भी
इसी में दिखाने के लिए 'मिली' का अर्थ 'भेंटना' माना है और 'दंपती' की
पूर्ति के लिए नायक की भी उपस्थिति मानकर दोनो का वहाँ उपस्थित होना
कहा है ।
अथ विरस-लक्षण-( दोहा )
(५२०) जहाँ सोक मंहि भोग को, बरनत है कबि कोइ ।
केसवदास हुलास साँ, तहीं विरस रस होइ ।६।
भावार्थ— ज्यों ही कोई कवि शोक में भोग-विलास का वर्णन उल्लास
के साथ करने लगता है, त्यों ही विरस दोष हो जाता है ।
उदाहरण-( कवित्त )
(५२१) केसौदास न्हान दान खान पान भूल्यो ध्यान,
गयो ज्ञान भयो प्रान पीठि की सी पीठि है ।
छाँड़िहु रसिक लाल यह जक वह बाल,
देखतहीं सब सुख तुमहीं उबीठिहै ।
ऐसी सों बसीठी सीठी चीठी अति डोठी सुने,
मीठी मीठी बातनि जू नीकेहू में नीठि है ।
ईठनि सों टूटी ईठी ताके सोक की अँगीठी,
उठी जाके उर में सु कैसे हँसि डीठिहै ।७।
५—के जिनकी मति—काज न कीरति । जनावति—जगावति । हूँ—ही ।
६--जहाँ-जहां । बरनत०-बरनि कहै । तहाँ तहँहि, तहहीं । विरस-बीरस ।
७--ध्यान-गान । बात-बान । सों बसीठी=सोच सीठी । हँसि-हरि । जु-में ।