रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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Read in context२७८ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—प्रत्यनीक = शत्रु । रस की शत्रुता इन रसों में होती है—
श्रृंगार और बीभत्स में, भय और वीर में, रौद्र और करुण में—
उदाहरण—( सवैया )
(५१७) हँसि बोलतहीं सु हँसै अब केशव लाज भगावत लोक भगै ।
कछु बात चलावत घैरु चलै मन आनतहीं मनमत्थ जगै ।
सखि तूँ जु कही सु हुती मन मेरेहु जानि यहै न हियो उमगै ।
हरि त्यौ टुक डीठि पसारतहीं अँगुरीन पसारन लोग लगै ।३।
शब्दार्थ—लोक = संसार भर के लोग । घैरु = बदनामी, निंदा । मन-
मत्थ = मन्मथ, काम । त्यों = ओर । डीठि पसारना = देखना । अँगुरी
पसारना = अंगुली दिखाना, बुरा समझना ।
भावार्थ—( नायिका की उक्ति सखी से ) हे सखी, तूने जो बात कही,
वह मेरे मन में भी थी, पर यह समझकर मन में (प्रेम करने के लिए) उमंग
नहीं आती कि यदि मैं उनसे हँसकर बोली तो तुरंत सब लोग हँसी उड़ाने
लगते हैं । यदि लज्जा छोड़कर उनसे बोलती ही रहती हूँ तो लोग मुझसे
भागते हैं ( घृणा करते हैं) । (प्रिय की ) कोई बात चलाते ही निंदा होने
लगती है और यदि उन्हें मन में रखती हूँ तो काम जगता है (कामोद्दीपन होता
है) । श्रीकृष्ण की ओर थोड़ा सा भी दृष्टि फैलाती हूँ (उन्हें देखती हूँ ) तो
तुरंत लोग उँगली दिखाने लगते हैं ( बुरा समझ घृणा करने लगते हैं) ।
सूचना—( १ ) यहाँ 'हँसि बोलतहीं' आदि श्रृंगाररस की बातें हैं, पर
साथ ही 'लोक भगै', 'मनमत्थ जगै', 'अँगुरीन पसारन लोग लगै' आदि
बीभत्स-रस व्यंजक हैं । अतः श्रृंगार के साथ घृणा का वर्णन होने से रस-
शत्रुता हो गई । यही प्रत्यनीक दोष हुआ ।
( २ ) यह छंद 'कविप्रिया' में १३।४० पर है ।
अथ नीरस-लक्षण-( दोहा )
(५१८) जहाँ दंपती मुँह मिलै, सदा रहैं यह रीति ।
कपट करै लपटाय तन, नीरस रस की प्रीति ।४।
भावार्थ—जहाँ दंपती केवल मुँह से प्रेम करें, मन से नहीं । अथवा
शरीर से आलिंगनादि करने पर भी मन में कपट हो वहाँ नीरस दोष होगा ।
उदाहरण-( सवैया )
(५१६) गाहत सिंधु सयाननि के जिनकी मति की अति देह दहेली ।
मोहिं हँसी दुख दोऊ दई तिनहूँ सों जनावति प्रेम-पहेली ।
३—हँसि-हरि । कही--कहै । जानि०--जानि यहै नहिं व्यो, जानियं नेह
हिये । टुक-नेकु, निकु ।४—करै-रहै । तन-मन ।