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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

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DevanagariHindipublished286 pages

Page 276 of 286

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Page 276

२८० रसिकप्रिया।
शब्दार्थ—पीठि = (पृष्ठ) पीठ। पीठि = (पृष्ठ) पीड़ा, आसन। भयो
प्रान ० = प्राण पीठ का आसन सा हो गया है, पीठ पीछे पड़ा है, निकल सा
गया है। रसिक लाल = हे कृष्ण। जक = धुन, रट। बाल = नायिका।
उबीठिहै = मन से उतर जायगा। बसीठी = दूतत्व। सीठी = फीकी, निरर्थक।
डीठी = जान पड़ती है। नीकेहू = भली-चंगी रहने पर भी। नीठि = कठिनाई
से। ईठ = इष्ट, मित्र। टूटी - फटी फटी, बेमन की उदास। ईठी = प्रेम।
डीठिहै = देखेगी।
भावार्थ—(दूती का वचन नायक से) हे रसिक लाल, (आप जो मुझ
से बार बार उसके पास जाने को कहते हैं, थोड़ा उसकी दशा पर तो ध्यान
दीजिए) उसने स्नान, दान, खान, पान सब भुला रखा है। न तो ध्यान करती
है और न उसे ज्ञान ही रह गया है। प्राण तो उसके निकल से गए हैं, पीठ के
पीछे पड़े हैं। आप अपनी रट छोड़ दीजिए। वह नायिका तो मुझे देखते ही
सब सुखों की तो बात ही क्या स्वयम् तुमको भी मन से उतार देगी। ऐसी के
लिए दूतत्व करने जाना ठीक नहीं जान पड़ता। रही चिट्ठी, यह तो मुझे
अत्यंत निरर्थक जान पड़ती है। जो भली-चंगी रहने पर मीठी मीठी बातों
को बड़ी कठिनाई से सुनती थी (वह इस दशा में चिट्ठी-पत्री क्या देखेगी या
सुनेगी)। सखी-सहेलियों से तो वह फटी फटी सी रहती है। उसको तो हृदय
में उठी हुई (प्रज्वलित) शोक की अँगीठी कुछ करने ही नहीं देती, वह भला
हँसकर बोलेगी भी तो कैसे ?
सूचना—यहाँ नायिका के शोक में श्रीकृष्ण के भोगविलास का वर्णन
घुस पड़ा है, अतः विरस है।
अथ दुःसंधान-लक्षण—(दोहा)
(५२२) एक होइ अनुकूल जहँ, दूजो है प्रतिकूल।
केसव दुस्संधान रस, सोभित तहाँ समूल। ८।
उदाहरण—(सवैया)
(५२३) 'दै दधि' 'दीनो उधार हो केसव' 'दान कहा जब मोल लै खैहैं।'
'दीने बिना' 'तौ गई जु गई' 'न गई न गई घर ही फिरि जैहैं।'
'गो हित बैर कियो' 'कब हो हित बैर कियें बरु नीकी ह्वै रैहैं।'
'बैर के गोरस बेंचहुगी' 'अहो बेच्यो न बेच्यो तौ ढारि न दैहैं ।६।'
शब्दार्थ—दान = कर। गो = गया, मिट गया। हित = प्रेम। गोरस =
दूध, दही।
भावार्थ—(नायक और नायिका का संवाद है)
८—जहँ ०-जिय जहँ दूजो प्रतिकूल। सोभित--सोहतु। ६—दीनो--दीनी।
हो--है। तौ--जु। जु--हो। न गई ०-तौ गई न गई। नीकी--नीके।