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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

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DevanagariHindipublished286 pages

Page 271 of 286

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Page 271

पंचदश प्रभाव २७५
अथ भारती-लक्षण—( दोहा )
(५०८) बरनिय जामें बीररस, अरु अद्भुत रस हास ।
कहि केसव सुभ अर्थ जहँ, सो भारती प्रकास ॥४॥
यथा—( कबित्त )
(५०६) काननि कनकपत्र चक्र चमकत चारु,
धुजा झुलमुली झलकति अति सुखदाइ ।
केसव छबीलो छत्र सीसफूल सारथी सो,
केसरि की आड़ अधिरथिक रची बनाइ ।
नीकोई नकीब सम नीको नकमोती नाक,
एक ही बिलोकनि गोपाल तौ गए बिकाइ ।
लोचन बिसाल भाल जरित जराऊ टीको,
मानो चढ्यो मीनन के रथ मनमथराइ ॥५॥
शब्दार्थ—कनकपत्र=कर्णफूल । चक्र = पहिया । झुलमुली = झुमका ।
सीसफूल = सिर का आभूषण । आड़ = तिलक । अधिरथिक = रथ पर आरूढ़,
रथ हाँकनेवाला । नकीब = बंदी, यश गानेवाला भाट । टीको = ललाट पर
का एक गहना । मनमथ = मन्मथ, कामदेव ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) कानों में सुंदर कर्णफूल चमक रहा
है, यही रथ का पहिया है। सुखदायिनी, और अत्यंत झलमलानेवाली झुलमुली
(झुमका) ही ध्वज है। शीशफूल ही छबिमान् छत्र है। केसर का तिलक, जो
भली भाँति लगाया गया है, रथारूढ़ सारथी के समान है। नाक में लगा हुआ
नकमोती ही अच्छे भाट के समान है। बड़े बड़े (मछली के से) नेत्रों के ऊपर
ललाट पर रत्नजटित टीका तो ऐसा सुशोभित है मानो मछलियों के रथ पर
मन्मथराज चढ़े चले जा रहे हैं। गोपाल तो एक ही चितवन में बिक गए,
वश में हो गए।
सूचना—युद्ध का साज-सामान होने से वीर, 'एक बिलोकनि' से हास्य
और 'मीननि के रथ चढ़यो' से अद्भुत रस व्यक्त होता है। अतः भारती वृत्ति है।
अथ आरभटी-लक्षण-( दोहा )
(५१०) केसव जामें रौद्ररस, भय बीभत्सहि जान ।
आरभटी आरंभ यह, पद पद जमक बखान ॥६॥
शब्दार्थ—जमक — ( यमक ) अक्षरमैत्री, अनुप्रास आदि ।
४-बरनिय-बरनै । अरु०-रसमय अद्भुत । ५-अधिरथिक-अधिराधिका,
अधिरातिका । नोकोई०-नीकेहीं नकीब सम नीको मोती नीकी नाक, नीके
ही में नीकी नाक नीको मोती उरजात । टीको-लाल । चढ्यो-बेगै । ६—
बीभत्सहि-बीभत्सक ।