रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
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Read in context२७२ रसिकप्रिया
-निंदा करते हैं। अतः अपने बड़प्पन का ध्यान छोड़कर (मैं तुझसे वय में
बड़ी हूँ फिर भी) तुझे समझाने आई हूँ, तू उनसे शीघ्र ही मिल। उन्होंने तो
उसी दिन से पृथ्वी के मीठे पदार्थों को छोड़ दिया है। सुधा को भी उन्होंने
मधुरों की श्रेणी से हटा दिया है।
सूचना-(१) यह छंद 'कविप्रिया' के छठे प्रभाव में मधुर वर्णन के
उदाहरण में रखा गया है।
(२) इस छंद में 'महूख' शब्द ध्यान देने योग्य है। कहीं कहीं
'महूख' के स्थान पर 'मयूख' रूप भी मिलता है। 'केशव' ने 'रसिकप्रिया' के
ही बारहवें प्रभाव के पाँचवें छंद में-'ऊख रस केतक महूख रस मीठो है
पियूखहू की पैली घा हैं जाकों न्यराइहै' लिखा है। बिहारी ने भी अपने एक
दोहे में इस शब्द का व्यवहार किया है। 'देव' ने भी इसका बहुत व्यवहार
किया है। देखने में तो यह शब्द संस्कृत 'मधूक' से बिगड़ा हुआ जान पड़ता
है। पर टीकाकारों ने इसका अर्थ 'शहद' किया है वहाँ 'महुआ' के साथ साथ
'महूख' पृथक् भी दिया है। इससे ऐसा स्पष्ट जान पड़ता है कि वे 'महूख' का
अर्थ 'महुआ' नहीं लेना चाहते-
मधुर प्रियाधर सोमकर माखन दाख समान।
बालक बातैं तोतरी कविकुल उक्ति प्रमान।
महुवा मिसरी दूध घृत, अति सिंगाररस मिष्ट।
ऊख महूख पियूष गनि केसव साँचो इष्ट।
ऐसी दशा में 'महूख' को 'मधुक' का बिगड़ा रूप ही मानना पड़ेगा और
'क स्वार्थे' (उसी अर्थ में) लगा माना जायगा।
अपरंच-(कवित्त)
(५०३) दनुज मनुज जीव जल थल जननि को,
पखोई रहत जहाँ काल सों समरु है।
अजर अनंत अज अमरी मरत परि,
केसव निकसि जानै सोई तौ अमरु है।
बाजत स्रवन सुनि समुझि सबद करि,
बेदन को बाद नाहिं सिव को डमरु है।
भागहु रे भाँगौ भैया भागनि ज्यों भाग्यो परै,
भव के भवन माँझ भय को भँवरु है।४०।
४०-जल०-जलज थलजनि। जननि०-केसोराइ। अजर०-अनंत अनंत,
अजर अमर, अनंत अजर। अमरी-अरोऊ। बाजत-जब तू। सबद०-सबै
भवत। परै-झाइ।