रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
by महाकवि केशवदास
Page 270 of 286
Read in context२७४ . रसिकप्रिया
चतुर = प्रवीण । चतुर = चार । जाति = प्रकार, भेद ।
अथ कैशिकी-लक्षण— ( दोहा )
(५०६) कहियै केसौदास जहँ, करुन हास सिंगार ।
सरल बरन सुभ भाव जहँ, सो कैसिकी बिचार ।२।
यथा—( कबित्त )
(५०७) मिलिबे कौं एक मिली-मिली फिरैं दूतिकानि
मिलि मन ही मन बिलास बिलसति हैं ।
बोलिबे कौं एक बाल बोल सुनिबे कौं एक,
बोलि बोलि तीरथनि ब्रतनि बसति हैं।
देखिबे कौं एकै फिरैं देवता सी दौरि दौरि,
देवता मनाइ दिन दान मनसति हैं।
कीजै कहा करम कौं इहिं रूप मेरी माई,
ये तौ मेरे कान्हजू के नामहिं हँसति हैं ।३।
शब्दार्थ—एक = कोई, कुछ । करम = भाग्य । बसति हैं = अर्थात
( व्रत में ) बसती हैं, करती हैं। मनसति हैं = संकल्प करती हैं।
नाम = श्याम ।
भावार्थ—(धाय की उक्ति सखी से) मेरे कन्हैया से मिलने के लिए कुछ
स्त्रियाँ तो दूतियों से मिलती फिरती हैं (उनसे मिला देने की प्रार्थना करती हैं) ।
कुछ उनसे मिलकर मन ही मन आनंदित होती हैं। कुछ तो उनसे बोलने के
लिए चक्कर काटती रहती हैं और कुछ उनकी बातें सुनने के लिए । कुछ उनसे
बातें कर करके तीर्थ और व्रतों के करने में लग जाती हैं ( कि मुझे श्रीकृष्ण
प्रिय के रूप में मिलें ) । उन्हें (श्रीकृष्ण को) देखने के लिए जो स्वयम् देवियों
सी हैं, घूमती रहती हैं । वे उनका दर्शन करने के लिए देवताओं को मनाती
हैं और प्रतिदिन दान का संकल्प करती रहती हैं । भाग्य की बात क्या कही
जाय, इनके ऐसे रूपसौंदर्य के होते हुए भी, मैया री मैया, ये तो मेरे कन्हैया
के नाम ( श्याम ) की हँसी उड़ा रही हैं ।
सूचना—यहाँ ‘कीजै कहा करम को’ से करुण, ‘ये तौ मेरे कान्हजू के
नामहिं हँसति हैं' से हास्य तथा ‘मिलबे कौं एक’ आदि से शृंगार सूचित
किया गया है । अक्षर सरल ( कोमल, मधुर ) हैं, भाव भी शुभ है अतः
कैशिकी वृत्ति है ।
३—मिलि०–मिलि मिलि मही बिलास । मन ही०-मन मन ही । बाल -
फिरैं । एक-और, अरु । मनसति-में नसति । इहि-गुन । माई-भटू ।