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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

About this granth

Rasaratnasamuchchaya (रसरत्नसमुच्चय) is a major text of rasashastra, the branch of Ayurveda that purifies mercury, sulphur, mica, metals and gems and turns them into medicines. It is ascribed to Vagbhatacharya, usually called Rasa-Vagbhata to distinguish him from the author of the Ashtanga Hridaya.

The opening part describes the pharmacy, apparatus, crucibles, heating methods and technical terms, followed by the purification and incineration of the major and minor minerals, metals and gems. Later chapters give mineral formulations for treating particular diseases.

This edition was published in 1939 by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Benares, as No. 91 of the Haridas Sanskrit Series. It carries the Suratnojjvala Hindi commentary of Pandit Ambikadatta Shastri, Ayurvedacharya of Banaras Hindu University, with notes, introduction, indices and appendices. Each verse is followed by a plain Hindi explanation, and the book long served students and practising vaidyas. The opening leaves of this copy also carry a few remedies handwritten in Nepali by an earlier owner.

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[ ८ ]

स्वेदन ( कन्दुक ) यन्त्रवर्णनम्

स्थूलस्थाल्यां ज ' क्षिप्त्वा वासो बध्वा मुखे दृढम् ।
तत्र स्वेद्यं विनिक्षिप्य तन्मुखं प्रपिधाय च ॥ १ ॥
अधस्ताद् ज्वालयेदग्निं यन्त्रं तत् कन्दुकामभिधम् ।
स्वेदनीयन्त्रमित्यन्ये प्राहुश्चेदं मनीषिणः ॥ २ ॥

एक बडे मिट्टी के भाण्ड में जल, किसी औषधि का स्वरस अथवा क्वाथ भर कर उसके मुख को एक मजबूत वस्त्र से बन्द करके वस्त्र पर स्वेदनीय औषध को रख कर ऊपर से मुख को शराव द्वारा या जैसे चित्र में दिखाया है वैसे हण्डिका द्वारा बन्द करके कपडमट्टी द्वारा सन्धिबन्धन कर देना चाहिए । फिर यन्त्र को चूल्हे पर चढाकर अग्नि प्रदीप्त कर देनी चाहिए । इस को कन्दुकयन्त्र कहते हैं । रसशास्त्र के अन्य आचार्यों ने इसे स्वेदनीयन्त्र भी कहा है ।

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**अथवा—**यद्वा स्थाल्यां जलं क्षिप्त्वा तृणं दत्वामुखोपरि ।
स्वेद्यद्रव्यं विनिक्षिप्य पिधानं प्रविधाय च ॥
अधस्ताद् ज्वालयेदग्नि यन्त्रं तत् कन्दुकं स्मृतम् ॥

एक स्थाली में जल या औषधस्वरस भर कर उसके मुख पर वस्त्र न लगा के तृण (घास) रख कर उन पर स्वेदनीयौषध रख के शराव से बन्द करके कपडमिट्टी द्वारा सन्धिबन्धन कर देते हैं, फिर अग्नि जला कर स्वेदन करते हैं । यह भी कन्दुकयन्त्र कहलाता है । अन्यत्र इसका वर्णन निम्न रूप से मिलता है ।

यथा—
स्थूलस्थाल्यां द्रवं क्षिप्त्वा वासो बद्ध्वामुखे दृढम् ।
तत्र स्वेद्यं विनिक्षिप्य पिधान्या प्रपिधाय च ॥
आधोऽग्निं ज्वालयेत्तत्र तत् स्यात् कन्दुकयन्त्रकम् ।
स्वेदनं यन्त्रमित्येतत् प्राहुरन्ये मनीषिणः ॥
रसेन्द्रचूडामणिः

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[ ६ ]

६ धूपयन्त्रवर्णनम्

विधायाष्टाङ्गुलं पात्रं लौहमष्टाङ्गुलोच्छ्रयम् ।
कण्ठाधो द्व्यङ्गुले देशे गलाधारे हि तत्र च ॥ १ ॥
तिर्यग्लोहशलाकाश्च तन्वीस्तिर्यग्विनिक्षिपेत् ।
तनूनि स्वर्णपत्राणि तासामुपरि विन्यसेत् ॥ २ ॥
पत्राधो निक्षिपेद्धूमं वक्ष्यमाणमिहैव हि ।
तत्पात्रं न्युब्जपात्रेण च्छादयेदपरेण हि ॥ ३ ॥
मृदा विलिप्य सन्धिञ्च वह्निं प्रज्वालयेदधः ।
तेन पत्राणि कृत्स्नानि हतान्युक्तविधानतः ॥ ४ ॥
रसश्चरति वेगेन द्रुतं गर्भे द्रवन्ति च ।
गन्धाल्कशिलानां हि कज्जल्या वा मृताहिना ॥

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धूपनं स्वर्णपत्राणां प्रथमं परिकीर्तितम् ।
तारार्थं तारपत्राणि मृतवङ्गेन धूपयेत् ॥ ६ ॥
धूपयेच्च यथायोग्यैरन्यैरुपरसैरपि ।
धूपयन्त्रमिदं प्रोक्तं जारणाद्रवसाधने ॥ ७ ॥

आठ अङ्गुल चौड़ा और आठ ही अङ्गुल ऊंचा एक लोह का पात्र बनवा कर उसके कण्ठ के नीचे दो अङ्गुल चौड़े स्थान में एक आधार बनवा कर उस में पतली और तिरच्छी लोहे की शलाकाओं को टेढ़ी रख देनी चाहिए। फिर उन शलाकाओं के ऊपर छोटे २ कण्टक वेध्य सोने के पत्र रखकर प्रथम पत्रों के नीचे गन्धक हरताल आदि की कज्जली लौहपात्र में डालकर उस पात्र को एक दूसरे नीचे मुखवाले पात्र से ढक कर कपड़मिटी (या जलमृत्तिका) से सन्धिवन्धन करके चूल्हे पर चढा कर नीचे आग जलाना चाहिए। इस तरह पात्र में रखी हुई कजली के धूम से सोने के पत्र काले पड़ जाते हैं तथा मृत भी हो जाते हैं। इस तरह से मृत सुवर्णपत्रों को पारद तुरन्त ही भक्षण कर जाता है और वे भक्षण किये हुए पत्र पारद में शीघ्र ही द्रुत हो जाते हैं। गन्धक, हरताल, मनःशिला, इनकी कज्जली से अथवा मृतनाग से स्वर्णपत्रों को प्रथम धूपित करना चाहिए। चांदी के पत्रों को धूपित करने के लिये उन पत्रों को मृतवङ्ग से धूपित करना चाहिए। अन्य यथायोग्य उपरसों से भी तारपत्रों को धूपित करते हैं। जिस वस्तु से पत्रों को धूपित करना हो उस वस्तु की कज्जली बनाकर पत्रों के नीचे लोह पात्र में रख देनी चाहिए। इसको धूपयन्त्र कहते हैं। इस यंत्र को जारण करने योग्य द्रव्यों कि सिद्धि करने के लिये प्रयुक्त करते हैं ॥ १-७ ॥

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[ १० ]

१० तप्तखल्लयन्त्रवर्णनम्

तत्रादौ तस्य प्रमाणकथनम्--
लौहो नवाङ्गुलः खल्लो निम्नत्वे च षडङ्गुलः ।
मर्दकोऽष्टाङ्गुलश्चैव तप्तखल्लाभिधोऽप्ययम् ॥ १ ॥
९ अङ्गुल की लम्बी तथा उतनी ही चौडी और ६ अङ्गुल गहरी लौह की खरल बनवानी चाहिए तथा उसकी घर्षणी (मर्दक) ८ अङ्गुल की लम्बी बनवानी चाहिए। यह तप्त खल्ल का प्रमाण है ॥ १ ॥

तप्तखल्लविधिः--
कृत्वा खल्लाकृतिं चुल्ली मङ्गारैः परिपूरिताम् ।
तस्यां निवेश्य तं खल्लं पार्श्वे भस्त्रिकया धमेत् ॥
तदन्तर्मर्दिता पिष्टिः क्षारैरम्लैश्च संयुता ॥ १ ॥
प्रद्रवत्यतिवेगेन स्वेदिता नात्र संशयः ।
सूतः कान्तायसा सोऽयं भवेत् कोटिगुणो रसः ॥ २ ॥
जितने प्रमाण की लम्बी चौडी खरल बनी हुई हो उसी के प्रमाणानुकूल चूल्हा बनवा कर उस में कोयले आदि भर के उस पर खल्ल को रख दे तथा नीचे अग्नि जला देवे और पार्श्व में धौकनी लगा कर वह्नि को प्रदीप्त करते रहना चाहिए, पश्चात् उस खरल में औषधियों के साथ घोट कर बनाई हुई

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पारद की पिष्टी और क्षार तथा काञ्जी आदि अम्लपदार्थ डाल कर घोटते रहना चाहिए । इस प्रकार स्वेदन करने से पारद की पिष्टी द्रुत हो जाती है । साधारण लौह की अपेक्षा कान्त लौह की तप्तखल्ल में स्वेदित किया हुआ रस ( पारद ) कोटिगुण अधिक फलप्रद होता है ॥ १-२ ॥

अत्रिसंहितोक्ततप्तखल्लविधिः—

अजाशकृत्तुषाग्निश्च भूगर्ते त्रितयं क्षिपेत् ।
तस्योपरि स्थितः खल्लस्तप्तखल्ल इति स्मृतः ॥ १ ॥

अर्थात् पृथ्वी के अन्दर गर्त ( गड़ा ) खोद कर उस में बकरी की मँगिन्यां, धान की भूसी या तुष और अग्नि तीनों डाल कर उन पर औषधपूर्ण खरल को रख कर रसादिक का स्वेदन करे ॥ १ ॥

\hfill इत्यत्रिसंहिता ।

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[ ११ ]

११ कोष्ठीयन्त्रवर्णनम् ।

षोडशाङ्गुलविस्तीर्णं हस्तमात्रायतं समम् ।
धातुसत्त्वनिपातार्थं कोष्ठीयन्त्रमितिसमृतम् ॥ १ ॥ रसरत्नसमुच्चयः ।

सोलह अङ्गुल चौडा और एक हस्त भर लम्बी तथा समान आकार की एक मूषा बनवानी चाहिए । इस को कोष्ठी यन्त्र कहते हैं । यह यन्त्र धातु तथा रत्न आदि के सत्त्वों को निकालने के लिए उत्तम है ॥ १ ॥

अग्निसंहिता में निम्नवर्णन अधिक है यथा—
परिपूर्णं दृढाङ्गारैरधोवातेन कोष्ठके ।
मात्रया ज्वालमार्गेण ज्वालयेच्च हुताशनम् ॥

एक लौह या मिटी की कोष्ठिका बनवाकर उसके मध्य में भस्त्रा (धोंकनी) के मुख को प्रविष्ट करने के लिये छिद्र रखना चाहिए जैसा कि चित्र में दर्शाया है। तथा कोष्ठिका के अन्दर औषधपूर्ण मूषा या डमरुयन्त्राकार की मूषा रखकर उसके ऊपर तथा चारों ओर पार्श्व में कोयले आदि भर के वह्नि प्रदीप्त कर देनी चाहिए तथा भस्त्रा के द्वारा अग्नि प्रधमन करते रहना चाहिए ।

२

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॥ श्रीः ॥

रसरत्नसमुच्चयः

रत्नोज्ज्वलाख्यभाषाटीकयाऽलङ्कृतः ।


रसोत्पत्तिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ।


मङ्गलाचरणम्—
यस्याऽऽनन्दभवेन मङ्गलकलासम्भावितेन स्फुर-
द्धाना सिद्धरसामृतेन करुणावीक्षासुधासिन्धुना ।
भक्तानां प्रभवप्रसंहृतिजरारागादिरोगाः क्षणा-
च्छान्तिं यान्ति जगत्प्रधानभिषजे तस्मै परस्मै नमः ॥ १ ॥

टीकाकारकृतमङ्गलाचरणं व्याख्याप्रयोजनञ्च ।

ध्यात्वा साम्बमहेशपादकमलं सर्वार्थसिद्धिप्रदम्
नत्वा नीलसरोजश्यामलतनुं श्रीरामचन्द्रं तथा ।
स्मृत्वाऽहं हृदयारविन्दपटले श्रीकृष्णतातं त्वथ
भाषामाकलयामि वाग्भटकृते ग्रन्थे सुरत्नोज्ज्वलाम् ॥ १ ॥
श्रीमेदपाटदेशे हि लब्धजन्मा भिषग्वरः ।
श्रीकृष्णतनुजो वैद्यः ख्यातगुर्जरगौडजः ॥ २ ॥
अम्बिकादत्तशर्माऽहं वैद्यकोद्धारकाम्यया ।
प्राच्यं श्रमेण पाश्चात्यं चिकित्साशास्त्रसागरम् ॥ ३ ॥
निर्मथ्योभयसिद्धान्तै-र्भूषितां तत्वदर्शिभिः ।
रत्नोज्ज्वलामिमां टीका करोमि विदुषां मुदे ॥ ४ ॥

जिस परमपूज्य महेश्वर के आनन्द से उत्पन्न और शुभ शीतल कलाओं से सम्भावित, प्रदीप्ततेजयुक्त कृपादृष्टिरूप अमृत के समुद्र के समान गुणकारी, सिद्ध

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२

रसरत्नसमुच्चये—

हुए पारदरूपी सुधा के सेवन से भक्तजनों के जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और रागद्वेष मोहादि अनेक रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ऐसे उस परम प्रसिद्ध संसार के प्रधान चिकित्सक ईश्वर ( शङ्कर ) को प्रणाम है ॥ १ ॥

अथ ग्रन्थकर्तॄणां नामानि—

आदिमश्चन्द्रसेनश्च लङ्केशश्च विशारदः ।
कपाली मत्तमाण्डव्यौ भास्करः शूरसेनकः ॥ २ ॥
रत्नकोशश्च शंभुश्च सात्विको नरवाहनः ।
इन्द्रदो गोमुखश्चैव कम्बलिव्र्याडिरेव च ॥ ३ ॥
नागार्जुनः सुरानन्दो नागबोधिर्यशोधनः ।
खण्डः कापालिको ब्रह्मा गोविन्दो लम्पको हरिः ॥ ४ ॥
सप्तविंशतिसंख्याका रससिद्धिप्रदायकाः ।
रसाङ्कुशो भैरवश्च नन्दी स्वच्छन्दभैरवः ॥ ५ ॥
मन्थानभैरवश्चैव काकचण्डीश्वरस्तथा ।
वासुदेव ऋषिः शृङ्गः क्रियातन्त्रसमुच्चयी ॥ ६ ॥
रसेन्द्रतिलको योगी भालुकी मैथिलाह्वयः ।
महादेवो नरेन्द्रश्च वासुदेवो हरेश्वरः ॥ ७ ॥
एतेषां क्रियतेऽन्येषां तन्त्राण्यालोक्य सङ्ग्रहः ।
रसानामथ सिद्धानां चिकित्सार्थोपयोगिनाम् ॥
सूनुना सिंहगुप्तस्य रसरत्नसमुच्चयः ॥ ८ ॥
रसोपरसलोहानि यन्त्रादिकरणानि च ।
शुद्ध्यर्थमपि लोहानां तन्त्रादिकरणानि च ॥
शुद्धिः सत्त्वं द्रुतिर्भस्मकरणं च प्रवक्ष्यते ॥ ९ ॥

आदिम, चन्द्रसेन, लङ्केश, विशारद, कपाली, मत्त, माण्डव्य, भास्कर, शूरसेन, रत्नकोष, शम्भु, सात्विक, नरवाहन, इन्द्रद, गोमुख, कम्बली, व्याडि, नागार्जुन, सुरानन्द, नागबोधि, यशोधन, खण्ड, कपालिक, ब्रह्मा, गोविन्द, लम्पक, और हरि, ये सत्ताईस आचार्य रससिद्धि देने वाले हुए । और भी रसाङ्कुश, भैरव, नन्दी, स्वच्छन्दभैरव, मन्थानभैरव, काकचण्डी, वासुदेव, ऋषि और रसक्रिया तथा

प्रथमोऽध्यायः । ३

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प्रथमोऽध्यायः । ३

रसतन्त्र का सङ्ग्रह करने वाला स्वच्छ, रसेन्द्रतिलक, योगी, भालुकी, मैथिल, महादेव, नरेन्द्र, वासुदेव, हरिश्वर, इनके और अन्य आचार्यों के रसतन्त्र शास्त्रों को देख कर चिकित्सा में अत्यन्त उपयुक्त सिद्धरसों का इस 'रसरत्नसमुच्चय' नामक ग्रन्थ में सिंहगुप्त का पुत्र मैं वाग्भट स्वयं सङ्ग्रह करता हूं । इस ग्रन्थ में रस और उपरस तथा सप्तलौह या सप्तधातु तथा इनकी शुद्धि के लिये दोला यन्त्रादि उपकरण तन्त्र तथा इनके शोधन, सत्त्वपातन, द्रुतिकरण और भस्म करने की भिन्न २ विधियों का वर्णन भी किया जायगा ॥ २–९ ॥

अथ हिमालयवर्णनम्—

अस्ति नीहारनिलयो महानुत्तरदिङ्मुखे ।
उत्तूङ्गशृङ्गसङ्घातलङ्घिताभ्रो महीधरः ॥ १० ॥
विश्रामाय वियन्मार्गविलङ्घनघनश्रमः ।
अवतीर्ण इव क्षोणीं शरदम्बुमुचां गणः ॥ ११ ॥
राशीराशीविषाधीशफणाफलकरोचिषाम् ।
भित्त्वा भुवमिवोत्तीर्णो यो विभाति भृशोन्नतः ॥ १२ ॥
ज्वलदोषधयो यस्य नितम्बमणिभूमयः ।
नक्तमुद्दामतडितामनुकुर्वन्ति वार्मुचाम् ॥ १३ ॥
कटके सञ्चरन्तीनां यस्य किन्नरयोषिताम् ।
पादेषु धातुरागेण लाक्षाकृत्यमनुष्ठितम् ॥ १४ ॥
अवतंसितशीतांशुराच्छादितदिगम्बरः ।
यो गुहाधिगतो लोकैर्गिरीश इति गीयते ॥ १५ ॥

उत्तर दिशा में स्थित, हिम का प्रधान स्थान, ऊंचे २ शिखरों के समूह से मेघों को भी अतिक्रमण करने वाला, दिनरात आकाश मार्ग में चलने से उत्पन्न हुए श्रम के निवारणार्थ भूपृष्ठ पर उतरा हुआ मानों शरद् ऋतु के मेघों के समूह के समान शोभायमान, और पृथ्वी को विदीर्ण करके निकले हुए शेष नाग के सहस्रफणों में स्थित मणियों की किरणों के समूह के सदृश श्वेतकान्ति वाला अत्यन्त उन्नत हिमालयपर्वत शोभायमान हो रहा है, और दिव्य औषधियों वाले जिस हिमालय के मध्य भाग का मणिजडित प्रदेश ( भूमियां ) रात्रि में अत्यन्त चमकती हुई विद्युत् से युक्त मेघों का अनुकरण करते हैं । और जिस हिमालय के

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४
रसरत्नसमुच्चये—

मध्य भाग में भ्रमण करती हुई किन्नर स्त्रियों के चरणों में लगी हुई पद्मरागादि मनःशिला और गैरिक आदि धातुओं की लालिमा ने अलक्तक के पादरञ्जनरूपी कार्य को सम्पादन किया है । और वहां शिवजी का स्थान होने से चन्द्रमा को अपना शिरोभूषण बनाकर, तथा दिशारूपी वस्त्रों को धारण किया हुआ (अर्थात् समग्रदिशाओं में व्याप्त) और नाना कन्दराओं से युक्त (अथवा अपने दौहित्र कार्तिकेय का अधिष्ठान है जिसमें) ऐसा यह हिमालय सर्व पर्वतों का स्वामी जनों से पुकारा जाता है ॥ १०—१५ ॥

अथ महादेवस्थितिवर्णनम्—
निमीलितदृशो नित्यं मुनयो यस्य सानुषु ।
प्रत्यक्षयन्ति गिरिशमवाङ्मनसगोचरम् ॥ १६ ॥
शिलातलप्रतिहतैर्यस्य निर्झरशीकरैः ।
अहन्यपि निरीक्षन्ते यक्षास्ताराङ्कितं नभः ॥ १७ ॥
नीहारपवनोद्रेकनिःसहा यत्र पूरुषाः ।
निजस्त्रीणां निषेवन्ते कुचोष्माणं निरन्तरम् ॥ १८ ॥
सञ्चरन्कटके यस्य निदाघेऽपि दिवाकरः ।
उद्दामहिमरुद्धोष्मा न शीतांशोर्विभिद्यते ॥ १९ ॥
गुहागृहेषु कस्तूरीमृगनाभिसुगन्धिषु ।
गायन्ति यत्र किन्नर्यो गौरीपरिणयोत्सवम् ॥ २० ॥
चकास्ति तत्र जगतामादिदेवो महेश्वरः ।
रसात्मना जगत्त्रातुं जातो यस्मान्महारसः ॥ २१ ॥

जिस हिमगिरि के शिखर प्रदेशों पर स्थित महर्षिगण ध्यान से नेत्रों को बन्द करके वाणी और चित्त से भी अवर्णनीय ऐसे महादेव का नित्य ही ज्ञान चक्षुओं से प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त करते हैं। और जिस पर्वत पर रहने वाले यक्षगण दिन में भी शिलापृष्ठ पर ताड़ित हुए झरनों के छोटे २ कणों से आकाश को नक्षत्रों से व्याप्त हुआ देखते हैं । और जहां पर निवास करने वाले पुरुष तुषार के कणों से मिश्रित वायु के वेग को सहन करने में असमर्थ होकर सर्वदा निज स्त्रियों के स्तनों की उष्णता को प्राप्त करते हैं। और जिस हिमालय के शृङ्ग पर ग्रीष्म ऋतु में सञ्चरण करने वाला सूर्य तुषार से उष्णता नष्ट होने के कारण चन्द्रमा से भिन्न-

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प्रथमोऽध्यायः ।
५

प्रतीत नहीं होता । और जिस हिमालय की कस्तूरी मृग के नाभिगत कस्तूरी से सुगन्धित कन्दराओं के गृहों में बैठी हुई किन्नरों की स्त्रियां श्रीपार्वती के शुभ विवाहोत्सव के मङ्गल गीत गाती रहतीं हैं ऐसे शुभ कैलास पर्वत पर संसार के प्रथम आराध्य भगवान् महादेव इस रूप से संसार की रक्षा के लिये विराजमान हैं जिन से ही महान् पारद रस की उत्पत्ति हुई है ॥ १६—२१ ॥

अथ रसोत्कर्षवर्णनम्—

शताश्वमेधेन कृतेन पुण्यं गोकोटिभिः स्वर्णसहस्रदानात् ।
नृणां भवेत्सूतकदर्शनेन यत्सर्वतीर्थेषु कृताभिषेकात् ॥ २२ ॥
विधाय रसलिङ्गं यो भक्तियुक्तः समर्चयेत् ।
जगत्त्रितयलिङ्गानां पूजाफलमवाप्नुयात् ॥ २३ ॥
भक्षणं स्पर्शनं दानं ध्यानं च परिपूजनम् ।
पञ्चधा रसपूजोक्ता महापातकनाशिनी ॥ २४ ॥
हन्ति भक्षणमात्रेण पूर्वजन्माघसम्भवम् ।
रोगसङ्घमशेषाणां नराणां नात्र संशयः ॥ २५ ॥
पूर्वजन्मकृतं पापं सद्यो नश्यति देहिनाम् ।
सुगन्धपिष्टसूतेन यदि शम्भुर्विलोपितः ॥ २६ ॥
अभ्रकं त्रुटिमात्रं यो रसस्य परिजारयेत् ।
शतक्रतुफलं तस्य भवेदित्यब्रवीच्छिवः ॥ २७ ॥
यश्च निन्दति सूतेन्द्रं शम्भोस्तेजः परात्परम् ।
स पतेन्नरके घोरे यावत्कल्पविकल्पनम् ॥ २८ ॥

विधि सहित किए हुए सैकड़ों अश्वमेध यज्ञों से अथवा करोड़ों गौओं के दानसे और हजारों मन सोने के दान करने से तथा काशी प्रयागादि पुण्य स्थानों में स्नान करने से जो पुण्यफल प्राप्त होता है वही फल केवल मनुष्य को पारद के दर्शन से लब्ध होता है । यदि कोई पारद का शिवलिङ्ग निर्माण कर भक्तिपूर्वक अर्चन करता है तो उसको तीनों लोकों में स्थित शिवलिङ्ग पूजन का फल प्राप्त होता है । औषध रूप से पारद का सेवन, तथा स्पर्शन, दान, ध्यान और पूजन करना यह पांच तरह की बड़े २ पापों का नाश करने वाली रसेन्द्र की पूजन शास्त्रों में कही गई है । इसको शास्त्रोक्तविधि सहित औषध रूप में सेवन करने से समस्त

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६
रसरत्नसमुच्चये—

मनुष्यों के पूर्व जन्म के पापों से उत्पन्न होने वाले रोग समूह जड़ से नष्ट हो जाते हैं इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। पारे का गन्धक के साथ पेषण करके शिवलिंग पर चन्दन के समान लेपन करने से मनुष्यों के पूर्व देह कृत पाप तुरन्त नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य अभ्रक तथा किञ्चिन्मात्र भी पारद का अच्छी तरह जारण करता है उसको शत अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है, ऐसा शिव जी ने कहा है।

जारणलक्षणं यथा—
सूते गन्धादिनिक्षेपात्तत्तद्विधिविशेषतः ।
गन्धाद्यं जीर्यते यत्तु जारणं कथ्यते बुधैः ॥

जो मनुष्य परमोत्कृष्ट महादेव के तेज स्वरूप पारद की निन्दा करता है वह कल्पान्त तक नरक में पड़ा रहता है ॥ २२—२८ ॥

अथ पारदस्य विशेषतो महत्ता—

रोगिभ्यो यो रसं दत्ते शुद्धिपाकसमन्वितम् ।
तुलादानाश्र्वमेधानां फलं प्राप्नोति शाश्वतम् ॥ २९ ॥
सिद्धे रसे करिष्यामि निर्दारिद्र्यगदं जगत् ।
रसध्यानामदं प्रोक्तं ब्रह्महत्यादिपापनुत् ॥ ३० ॥
अभ्रग्रासो हि सूतस्य नैवेद्यं परिकीर्तितम् ।
रसस्येत्यर्चनं कृत्वा प्राप्नुयात्क्रतुजं फलम् ॥ ३१ ॥
उदरे संस्थिते सूते यस्योत्क्रामति जीवितम् ।
स मुक्तो दुष्कृताद्घोरातप्रयाति परं पदम् ॥ ३२ ॥

जो वैद्य सम्पूर्ण शुद्धि करके पारद की भस्म या उसका पाक करके रोगियों को औषध रूप में देता है उसको तुलादान तथा अश्वमेध यज्ञ करने का अनश्वर फल प्राप्त होता है। पारद का भस्मादि रूप में सिद्ध होने पर संसार को दारिद्र्य और रोग से मुक्त कर दूंगा इस तरह से किया हुआ पारद का ध्यान ब्रह्महत्यादि अनेक पापों का नाश करता है। पारद में अभ्रक को लीन करने के लिये जो जारण कर्म होता है उस पारद को अभ्रग्रास कहते हैं, इस तरह अभ्रक का ग्रास करना ही पारद का नैवेद्य है पारद की पूजा में भी अभ्रक रक्खा जाता है इस तरह पारद की जो पूजन करता है वह यज्ञजन्य फल को प्राप्त करता है।


(पार्श्व/पाद हस्तलिखित टिप्पणियाँ)

  • वाम पार्श्व: सिद्धे भो. लोड, जले पिक्त्वा ॥ गुटिका धारणं परा सदा ॥
  • अधोभाग:
    रसस्य गुटिकां बद्ध्वा कण्ठे चैव तु धारणम् ॥
    सर्व रोगाणि नश्यन्ति नरस्य नात्र संशयः ॥
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प्रथमोऽध्यायः ।

ग्रसनप्रकारः—
वज्रकण्टकवच्चेभ्रं वृद्धमष्टाङ्गुलं मृदा ।
विलिप्य गोकरीषाग्नौ पुटितं तत्र शोषितम् ॥ १ ॥
त्र्यहं वज्रे विनिक्षिप्तो ग्रासार्थी जायते रसः ।
ग्रसते गन्धहेमादिवज्रसत्वादिकं क्षणात् ॥ २ ॥

अभ्रादिग्रसनशक्तिसञ्जननमेव रसस्य पूजनम्—
जिस मनुष्य को औषधरूप में सेवित पारद के उदर में रहने पर अपनी आयु समाप्ति के कारण मृत्यु हो जाती है वह घोर पापों से मुक्त होकर अन्तिम मुक्तिपद को प्राप्त होता है ॥ २९–३२ ॥

अथ मूर्च्छितादिपारदगुणाः—
मूर्च्छित्वा हरति रुजं बन्धनमनुभूय मुक्तिदो भवति ।
अमरी करोति हि मृतः कोऽन्यः करुणाकरः सूतात् ॥ ३३ ॥
सुरगुरुगोद्विजहिंसापापकलापोद्भवं किलासाध्यम् ।
श्वित्रं तदपि च शमयति यस्तस्मात्कः पवित्रतरः सूतात् ३४
रसबन्ध एव धन्यः प्रारम्भे यस्य सततमितिकरणा ।
सेत्स्यति रसे करिष्ये महीमहं निर्जरामरणाम् ॥ ३५ ॥
सुकृतफलं तावदिदं सुकुले यज्जन्म धीश्च तत्रापि ।
साऽपि च सकलमहीतलनुलनफला भूतलंच सुविधेयम् ॥ ३६ ॥
भूतलविधेयतायाः फलमर्थास्ते च विविधभोगफलाः । ।
भोगाश्च सन्ति शरीरे तदनित्यमतो वृथा सकलम् ॥ ३७ ॥
इति धनशरीरभोगान्मत्वाऽनित्यान्सदैव यतनीयम् ।
मुक्तौ सा च ज्ञानात्तच्चाभ्यासात्स च स्थिरे देहे ॥ ३८ ॥
तत्स्थैर्य्ये न समर्थं रसायनं किमपि मूललोहादि ।
स्वयमस्थिरस्वभावं दाह्यं क्लेद्यं च शोष्यं च ॥ ३९ ॥

विधिसहित मूर्च्छित पारद व्याधि को नष्ट करता है, स्वेदनादि बन्धन साधन प्रक्रियाओं से बद्ध पारद मोक्ष प्रदान करता है, भस्मीभूत पारा मनुष्य को अमर बनाता है अत एव पारद से बढकर और कृपा करने वाला कौन है ? देव, गुरु, गौ, और ब्राह्मण इत्यादि प्राणिमात्र की हिंसा से उत्पन्न पापों के समूह से उत्पन्न हुए असाध्य श्वेत कुष्ठ को भी जो निश्चय ही दूर करता है ऐसे पारद से

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८

रसरत्नसमुच्चये—

अधिक पवित्र कौन पदार्थ है ? जिस मनुष्य की इच्छा प्रथम ही रस बन्धन के लिये निरन्तर होती रहती है तथा मैं रस का सम्यक् बन्धन हो जाने पर भूमण्डल के मनुष्यों को अजर एवं अमर कर दूंगा वह धन्य है ।

मूर्च्छनाप्रकारः—

गन्धकेन रसं प्राज्ञः सुदृढं मर्दयेद्भिषक् ।
कज्जलाभो यदा सूतो विहाय घनचापलम् ॥
दृश्यतेऽसौ तदा ज्ञेयो मूर्च्छितो रसकोविदैः ।
असौ रोगचयं हन्यादनुपानस्य योगतः ॥ इति र० सा० सं० ।

बहुविधमूर्च्छनाप्रकारेणु षड्गुणगन्धकजारणप्रक्रिया साधीयसी ।
यथा—

रसगुणबलिजारणं विनाऽयं न खलु रूजाहरणक्षमो रसेन्द्रः ।
न जलदकलधौतपाकहीनः स्पृशति रसायनतामिति प्रसिद्धा ॥
इति र० चि० म० ।

बन्धनप्रकारो यथा रसरत्नाकरे—

कटुतुम्बीयुद्द्भवे कन्दे वन्ध्यायाः क्षीरकन्दके ।
अपक्कैकं समादाय तद्गर्भे पिण्डिका ततः ॥
दशनिष्कं शुद्धसूतं निष्कैकं शुद्धगन्धकम् ।
स्तोकं स्तोकं क्षिपेद्गन्धं पाषाणे तु च कुट्टयेत् ॥
याममात्रे भवेत् पिण्डी रक्तकन्दे विनिःक्षिपेत् ।
अर्द्धाद्धं भस्म वैक्रान्तं दत्वा निष्कार्धमानकम् ॥
ततः कन्दस्य मज्जाभिर्मुखं बद्ध्वा मृदा दृढम् ।
लिप्तमङ्गुलमानेन सर्वतः शोष्य गोलकम् ॥
पाचयेत् भूधरे यन्त्रे तदुद्धृत्य पुनः पचेत् ।
उर्द्ध्वभागमधः कुर्यादित्येवं परिवर्जयेत् ॥
क्रमेण चालयेदूर्ध्वं वह्निर्युग्मोपलैः पचेत् ।
ततो भित्त्वा तु सङ्ग्राह्यः बद्धःस्याद्दाडिमोपमम् ॥
नाम्नां वैक्रान्तबद्धोऽयं सर्वरोगेषु योजयेत् ॥

भस्मकरणप्रकारो यथा—

द्विपलं शुद्धसूतस्य सुतार्धं गन्धकं तथा ।
कन्यानीरेण संमर्द्य दिनमेकं निरन्तरम् ॥

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प्रथमोऽध्यायः ।
९

रुद्ध्वा तत् भूधरे यन्त्रे दिनैकं मारयेत् पुटे ॥ इति र० सा० सं० ।

पूर्वजन्म कृत अच्छे कर्मों का फल है कि उत्तम वंश में जन्म हो, उसमें भी श्रेष्ठ कुशाग्र तथा आस्तिक्य बुद्धि हो और वह बुद्धि भी सम्पूर्ण भूमण्डल के ज्ञान की तुलना कर सके, फिर उस श्रेष्ठ बुद्धि से पृथ्वी को शक्ति शालिनी बनाने का यत्न करना उससे धनप्राप्ति रूप फल होता है, और धन का फल नाना प्रकार के भोग हैं, और वे भोग शरीर ही में सम्पादित होते हैं (अर्थात् शरीर द्वारा ही भोगे जाते हैं)। किन्तु वह शरीर नाशवान् है इसलिये उपर्युक्त सर्व सामग्री वृथा ही है । इस कारण धन, शरीर, तथा भोगविलासादियों को अनित्य जानकर सदा ही मुक्तिप्राप्ति के लिये प्रयत्न करना चाहिए, और वह मुक्ति सत्य ज्ञान से होती है, वह यथार्थ ज्ञान योगाभ्यास से, और योग का अभ्यास व्याधि रहित स्थिर शरीर द्वारा ही हो सकता है, इस देह की स्थिरता को बनाई रखने में मूल काष्ठ औषधियां तथा सप्तधातु स्वर्ण लोहादि कोई भी रसायन समर्थ नहीं है क्यों कि वे काष्ठादि तथा धातु औषधियां स्वयं अस्थिर प्रकृति वाली होती हैं तथा वह्नि उनका नाश कर देती है, जल से आर्द्र हो जाती हैं, सूर्य अपनी उष्णता से उन्हें जला देता है । किन्तु पारद पर किसी का भी अनिष्ट कारी प्रभाव नहीं पड़ता है अतः सब में यही उत्तम है ।

रसायनलक्षणम्— यज्जराव्याधिविध्वंसि भेषजं तद्रसायनम्। इति चरकः, ॥ ३३-३९ ॥

पारदे सर्वौषधानामन्तर्भावः—

काष्ठौषध्यो नागे नागो वङ्गेऽथ वङ्गमपि शुल्बे ।
शुल्बं तारे तारं कनके कनकं च लीयते सूते ॥ ४० ॥
अमृतत्वं हि भजन्ते हरमूर्त्तौ योगिनो यथा लीनाः ।
तद्वत्कवलितगगने रसराजे हेमलोहाद्याः ॥ ४१ ॥

काष्ठादिकमूल औषधियां सीसे में, सीसा वङ्ग में, वङ्ग ताम्र में, ताम्र रजत में तथा रजत (चांदी) सोने में और सुवर्ण पारद में विधियों द्वारा मिल जाता है, जिस तरह योगीजन श्रीशिवजी के रूप में लीन होकर अमृतत्व को प्राप्त करते हैं (अर्थात् वे शिवजी में मिलकर जन्म मृत्यु जराव्याधि, आदि

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१० | रसरत्नसमुच्चये—

रोगों से मुक्त हो जाते हैं ) इसी तरह अभ्रक को अपने में लीन किया हुआ पारद सम्पूर्ण सुवर्ण लौहादि धातुओं को अपने में समाविष्ट कर लेता है ॥४०-४१॥

अथ रसस्य जीवन्मुक्तिकारणतामाह—

परमात्मनीव सततं भवति लयो यत्र सर्वसत्त्वानाम् ।
एकोऽसौ रसराजः शरीरमजरामरं कुरुते ॥ ४२ ॥

स्थिरदेहेऽभ्यासवशात्प्राप्य ज्ञानं गुणाष्टकोपे तम् ।
प्राप्नोति ब्रह्मपदं न पुनर्भववासजन्मदुःखानि ॥ ४३ ॥

एकांशेन जगद्युगपदवष्टभ्यावस्थितं परं ज्योतिः ।
पादैस्त्रिभिस्तदमृतं सुलभं न विरक्तिमात्रेण ॥ ४४ ॥

न हि देहेन कथञ्चिद्व्याधिजरामरणदुःखविधुरेण ।
क्षणभङ्गुरण सूक्ष्मं तद्ब्रह्मोपासितुं शक्यम् ॥ ४५ ॥

नामापि देहसिद्धेः को गृह्णीयाद्विना शरीरेण ।
यद्योगगम्यममलं मनसोऽपि न गोचरं तत्त्वम् ॥ ४६ ॥

यज्ञाद्दानात्तपसो वेदाध्ययनादथात्सदाचारात् ।
अत्यन्तभूयसी किल योगवशादात्मसंवित्तिः ॥ ४७ ॥

भ्रुयुगमध्यगतं यच्छिखिविद्युत्सूर्यवज्रगङ्गालि ।
केषाञ्चित्पुण्यदृशामुन्मीलति चिन्मयं परं ज्योतिः ॥ ४८ ॥

परमानन्दैकरसं परमं ज्योतिःस्वभावमविकल्पम् ।
विगलितसकलक्लेशं ज्ञेयं शान्तं स्वसंवेद्यम् ॥ ४९ ॥

तस्मिन्नाधाय मनः स्फुरदखिलं चिन्मयं जगत्पश्यन् ।
उत्सन्नकर्मबन्धो ब्रह्मत्वमिहैव चाऽऽप्नोति ॥ ५० ॥

रागद्वेषविमुक्ताः सत्याचारा मृषारहिताः ।
सर्वत्र निर्विशेषा भवन्ति चिद्ब्रह्मसंस्पर्शात् ॥ ५१ ॥

तिष्ठन्त्यणिमादियुता विलसद्देहाः सदोदितानन्दाः ।
ब्रह्मस्वभावममृतं सम्प्राप्ताश्चैव कृतकृत्याः ॥ ५२ ॥

आयतनं विद्यानां मूलं धर्मार्थकाममोक्षाणाम् ।
श्रेयः परं किमन्यच्छरीरमजरामरं विहायैकम् ॥ ५३ ॥

प्रथमोऽध्यायः । ११

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प्रथमोऽध्यायः । ११

प्रत्यक्षेण प्रमाणेन यो न जानाति सूतकम् ।
अदृष्टविग्रहं देवं कथं ज्ञास्यति चिन्मयम् ॥ ५४ ॥
यज्ज्रया जर्जरितं कासश्वासादिदुःखविवशं च ।
योग्यं तन्न समाधौ प्रतिहितबुद्धीन्द्रियप्रसरम् ॥ ५५ ॥
बालः षोडशवर्षो विषयरसास्वादलम्पटः परतः ।
यातविवेको वृद्धो मर्त्यः कथमाप्नुयान्मुक्तिम् ॥ ५६ ॥
अस्मिन्नेव शरीरे येषां परमात्मनो न संवेदः ।
देहत्यागादूर्ध्वं तेषां तद्ब्रह्म दूरतरम् ॥ ५७ ॥
ब्रह्मादयो यतन्ते तस्मिन्दिव्यां तनुं समाश्रित्य ।
जीवन्मुक्ताश्चान्ये कल्पान्तस्थायिनो मुनयः ॥ ५८ ॥
तस्माज्जीवन्मुक्तिं समीहमानेन योगिना प्रथमम् ।
दिव्या तनुर्विधेया हरगौरीसृष्टिसंयोगात् ॥ ५९ ॥

जिस तरह संसार के सर्व प्राणी परब्रह्म परमात्मा में लीन हो जाते हैं उसी तरह रसों में राजा (श्रेष्ठ) पारद में सम्पूर्ण रस, उपरस लौहादि द्रव्य समाविष्ट हो जाते हैं, इस तरह का यह पारद शरीर को अजर और अमर बना देता है (अर्थात् परब्रह्म की उपासना से जो अजर और अमर फल प्राप्त होता है वही फल इससे है अतः पारद भी ब्रह्मस्वरूप ही है )

पारद के सेवन करने से स्थिर देह प्राप्त होने पर अभ्यास करने से गौतम महर्षि प्रतिपादित अष्टविध गुणों से युक्त यथार्थ ज्ञान को मनुष्य प्राप्त करके ब्रह्म पदको प्राप्त करता है फिर वह पुनरुत्पत्ति और वासना जनित दुःखों को प्राप्त नहीं होता है, इस तरह पारद मोक्ष देने वाला है ।

गौतमोक्त अष्टगुण, सर्वभूतदया, क्षान्तिः, अनसूया, शौच, अनायास, मङ्गलवचन, अकार्पण्य, अस्पृहा, ये हैं । तीन पादों (सत्व, रज, और तम) से युक्त अर्थात् त्रिविक्रमस्वरूप परमोत्कृष्ट ज्योतिःस्वरूप पदार्थ अपने सर्वभूतस्वरूप एक अंश (पाद) से जगत् को धारण करके स्थित है वह अमृत स्वरूप पर ब्रह्म केवल वैराग्य मात्र से प्राप्त नहीं होता है ।

‘पादोऽस्य सर्वभूतानि त्रिपादस्यामृतंदिवि’ इति श्रुतिः ।
‘विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्’ इति गीता ॥

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१२ रसरत्नसमुच्चये—

व्याधि, जरा, मरण आदि अनेक कष्टों से आक्रान्त तथा क्षण में नाश होने वाले इस देह से किसी तरह से भी वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रसिद्ध ब्रह्म कभी भी ध्यान गम्य नहीं हो सकता है। इसी को प्रकारान्तर से कहते हैं—जो निर्मल है और मन का भी विषय न होने वाला है किन्तु योग से प्राप्त होने वाला है ऐसे तत्त्वस्वरूप ब्रह्म को देहसिद्धि के बिना इस क्षणविध्वंसी स्थूल शरीर से कौन ऐसा व्यक्ति है जो प्राप्त कर सके ?

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह,

ब्रह्मज्ञानोपाय निम्न हैं—यागानुष्ठानों से, अन्न वस्त्रादि के दान से, तपश्चर्या से, वेदपाठ से, दम से, सत्पुरुषों के समान सदाचरण करने से, और योग से, अत्यन्त प्रचुर तथा सर्वोत्तम ब्रह्मज्ञानरूप आत्मसिद्धि प्राप्त होती है ।

'निग्रहो बाह्यवृत्तीनां दम इत्यभिधीयते'

सरस्वती दृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् । तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते ॥
तस्मिन्देशे य आचारः पारम्पर्य्यक्रमागतः। वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते॥
साधवः क्षीणदोषाश्च सच्छन्दः साधुवाचकः । तेषामाचरणं यत्तु सदाचारः स उच्यते॥

दोनों भ्रुकुटियों के बीच में स्थित जो अग्नि, विद्युत् और सूर्य के समान जगत् को प्रकाशित करने वाला उत्कृष्ट ज्योतिः स्वरूप परब्रह्म है वह ज्ञान चक्षुयुक्त किसी २ मनुष्य को प्रकाशित होता है ।

केवल नित्यानन्दस्वरूप, सर्वदा एकरस, और अनादि, तर्क वितर्कादि कल्पों से रहित स्वभाव वाला, समग्र क्लेशों से रहित, शान्तस्वरूप, सब के जानने योग्य तथा आत्मा ही में मनन होने वाला, ज्योतिः स्वरूप ब्रह्म है, ऐसे ब्रह्म में मन को निविष्ट कर, निखिल जगत् को उस ब्रह्म से व्याप्त और प्रकाश युक्त देखता हुआ शुभाशुभ कर्मों से युक्त होकर मनुष्य इसी संसार में ब्रह्मपद को प्राप्त कर लेता है। उस ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष स्वजनानुराग और परिजनद्वेष से रहित, शुद्ध आचार-युक्त मिथ्याभाषणादि रहित और सब में समदर्शी होते हैं और अमृत स्वरूप ब्रह्मस्वभाव को प्राप्त पुरुष अणिमादि अष्टसिद्धियों से युक्त देदीप्यमान देहवाले, और सर्वदा आनन्द ही में मग्न रहने वाले तथा अपने को कृतकृत्य जान कर रहते हैं ।

जो तत्व को साक्षात्कार कराने वाली श्रुतिस्मृत्यादि विद्याओं का आधार है

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प्रथमोऽध्यायः । | १३

और धर्म, अर्थ, काम, तथा मोक्ष का मूल है ऐसे एक जीवन मरण से रहित शरीर के सिवाय अन्य कौनसा उत्तम श्रेय है ? ।

जो पुरुष देहस्थिर करने वाले प्रत्यक्ष प्रमाणों से भी पारद को यथार्थ नहीं समझता है वह स्थूल चक्षु से अज्ञेय तथा ज्ञानस्वरूप ( चिन्मय ) शरीर से रहित ब्रह्मदेव को कैसे सत्य जान सकेगा ? जो शरीर बुढापे से जर्जरित हो गया है और कास, श्वास आदि दुःखों से व्याप्त है और सत्यासत्यनिर्णायक बुद्धि तथा स्वविषय प्रत्यक्ष करने वाली इन्द्रियों से कमजोर है ऐसा यह शरीर परमात्मा का एकाग्रचित्त से ध्यान करने में अयोग्य है ।

सोलह वर्ष की अवस्था पर्यन्त मनुष्य बालक रूप में रहता है बाद में युवावस्था प्राप्त होने पर स्रक् चन्दन वनितारूप विषयरसों में लिप्त हो जाता है, फिर ७० वर्ष के बाद ज्ञान प्राप्त होने पर वृद्ध हो जाता है इस लिये मर्त्यजन कैसे मुक्ति लाभ करें ? । जिन मनुष्यों को इसी शरीर में परब्रह्मका यथार्थ ज्ञान न हो तो फिर इस देह त्याग के पश्चात् वे ब्रह्म ज्ञान से अत्यन्त दूर रह जाते हैं । ब्रह्मादिक देवता उस ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिये दिव्यशरीर धारण करके तथा अनेक कल्पों तक स्थित रहने वाले जीवन्मुक्त होकर मुनि लोग भी उसके लिये प्रयत्न करते रहते हैं । इसलिये जीवन्मुक्ति की अभिलाषा रखने वाले योगी को चाहिये कि वह सर्वप्रथम महादेव और पार्वती से जन्य पारद और गन्धक के संयोग से निर्मित औषधि से दिव्य शरीर प्राप्त करने की कोशिश करें ।

पारदं शिववीर्य्यञ्च दुर्गा बीजञ्च गन्धकम् ॥ ४२–५९ ॥

अथ रसोत्पत्तिवर्णनम्—

शैलेऽस्मिञ्छिवयोः प्रीत्या परस्परजिगीषया ।
सम्पवृत्ते च सम्भोगे त्रिलोकक्षोभकारिणि ॥ ६० ॥

विनिवारयितुं वह्निः संभोगं प्रेषितः सुरैः ।
काङ्क्षमाणैस्तयोः पुत्रं तारकासुरनामकम् ॥ ६१ ॥

कपोतरूपिणं प्राप्तं हिमवत्कन्दरेऽनलम् ।
अपत्तिभावसंक्षुब्धं स्मरलीलाविलोकिनम् ॥ ६२ ॥

तं दृष्ट्वा लज्जितः शंभुर्विरतः सुरतात्तदा ।
प्रच्युतश्चरमो धातुर्गृहीतः शूलपाणिना ॥ ६३ ॥