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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

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[ ११ ]

११ कोष्ठीयन्त्रवर्णनम् ।

षोडशाङ्गुलविस्तीर्णं हस्तमात्रायतं समम् ।
धातुसत्त्वनिपातार्थं कोष्ठीयन्त्रमितिसमृतम् ॥ १ ॥ रसरत्नसमुच्चयः ।

सोलह अङ्गुल चौडा और एक हस्त भर लम्बी तथा समान आकार की एक मूषा बनवानी चाहिए । इस को कोष्ठी यन्त्र कहते हैं । यह यन्त्र धातु तथा रत्न आदि के सत्त्वों को निकालने के लिए उत्तम है ॥ १ ॥

अग्निसंहिता में निम्नवर्णन अधिक है यथा—
परिपूर्णं दृढाङ्गारैरधोवातेन कोष्ठके ।
मात्रया ज्वालमार्गेण ज्वालयेच्च हुताशनम् ॥

एक लौह या मिटी की कोष्ठिका बनवाकर उसके मध्य में भस्त्रा (धोंकनी) के मुख को प्रविष्ट करने के लिये छिद्र रखना चाहिए जैसा कि चित्र में दर्शाया है। तथा कोष्ठिका के अन्दर औषधपूर्ण मूषा या डमरुयन्त्राकार की मूषा रखकर उसके ऊपर तथा चारों ओर पार्श्व में कोयले आदि भर के वह्नि प्रदीप्त कर देनी चाहिए तथा भस्त्रा के द्वारा अग्नि प्रधमन करते रहना चाहिए ।

२